आवेश तिवारी की क़लम से
सचिन और सानिया को जानने वाले ईशान को नहीं जानते होंगे . १४ साल का ईशान भी सचिन और सानिया को नहीं जानता ,उसकी निगाहें सपनों में भी गोल पोस्ट की ओर तेजी से बढते हुए अग्रिम पंक्ति के विरोधी खिलाड़ियों की ओर होती है जिनके किसी भी वार को असफल करने कीं वह हरसंभव कोशिशें करता है . वह फुटबाल खाता है ,फुटबाल जीता है ,फुटबाल को ही सोचता है | स्वीडन से गोथिया कप खेल कर वापस लौटे ईशान से जब मै पूछता हूँ , तुम्हे फुटबाल और पढाई में से कोई एक चीज चुननी हो, तुम क्या चुनोगे? मुस्कुराते हुए वह कहता है, पढता कौन है मुझे तो सिर्फ फुटबॉल चाहिए |गोथिया कप में ब्राजील ,नार्वे,पुर्तगाल जैसी टीमों को शिकस्त देकर क्वार्टर फाइनल में पहुँचने वाली ईशान की टीम सेमी–फाइनल सिर्फ इसलिए नहीं खेल पायी क्यूंकि उनका कोच मैच वाले दिन सो गया , जब वह उठा और टीम को लेकर स्टेडियम पहुंचा दूसरी टीम को वाक ओवर दिया जा चुका था ,ईशान हताश नहीं है ,मुझे हिंदुस्तान की टीम में जगह चाहिए मै देश की तरफ से खेलना चाहता हूँ |जानता हूँ ये मुश्किल है ,मगर कोशिश तो कर सकता हूँ |ईशान उस देश की टीम में हिस्सेदारी चाहता है जहाँ बच्चों को शायद ही देश की फूटबाल टीम के कप्तान का नाम मालूम हो ,जहाँ फुटबाल प्रेमियों की आँखें अपनी टीम को विश्व कप में खेलते देखने की चाह में बूढी हो गयी हैं क्रिकेट और उससे जुड़े ग्लैमर और पैसे का जुनून इस कदर सर चढ कर बोलता है कि हर माँ बाप बच्चे में धोनी और सचिन ही को ढूंढते हैं |
कहानी ईशान की है ,छोटी आँखों वाले इस लड़के को सबसे अधिक खुशी तब होती है जब वह गोली की रफ़्तार से किये गए प्रहार को अपना दमखम लगाकर रोक पाने में सफल रहता है ,उसके “इस्टर्न मेत्योर फुटबाल एकादमी “के कोच अमित नंदा और उसके खिलाडी उसके पूर्वानुमान का लोहा मानते हैं शायद यही वजह है कि देश के बड़े फुटबाल कल्ब उसे अपनी और से खेलने का बार बार न्योता दे रहे हैं ,मगर पैसा !ईशान अभी जब १० दिन पहले स्वीडन गया तो उसने अपने जेबखर्च से बचाए सारे पैसे इकट्ठे तो किये , लेकिन पैसे उतने नहीं हो पाए कि वह बाहर खेलने जा सके जैसे तैसे करके माँ आशा और पिता रामप्रकाश ने जो कि एक वक्त खुद दिल्ली की फुटबाल टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं ने टिकट का जुगाड किया तो बाहर जाने पर एक दूसरी दिक्कत आन पड़ी ,अजीब थी यह दिक्कत भी ,ईशान हँसते हुए बताता है कि हिन्दुस्तानी तीन वक्त खाते हैं वहाँ दो वक्त का ही खाना मिलता था ,तीसरे वक्त के खाने का इंतजाम भी हमें अपनी जेब से करना पड़ा|
आप जानते हैं वो हमसे बेहतर नहीं खेलते ;लेकिन बात अवसरों की होती है हमारे यहाँ अवसर कम हैं ,उन्हें देश की टीम में जगह नहीं मिले तो क्लब में खेलने को मिल जाता है वो अपना कैरियर फुटबाल में बना सकते हैं ,मगर हमारे यहाँ ऐसा नहीं हो पाता ,कभी कभी हम मैच खेलने को तरस जाते हैं ,ऐसा नहीं हो सकता क्या कि हर कालेज की अपनी फुटबाल टीम हो ,देश में क्रिकेट की तरह गली गली में फुटबाल खेली जाए ,ऐसा होगा ,मुझे लगता है होगा|
अर्जेंटीना के मेस्सी का दीवाना ईशान, माराडोना को एक बेहतरीन खिलाड़ी के लिए नहीं एक कोच के रूप में ज्यादा पसंद करता है ,कहता है “आपने देखा होगा ,वो अपने खिलाड़ियों का माता चूम उन्हें मैदान में भेजते हैं ,ऐसा भला कोई करता है ?
ग्यारहवीं में पढ़ने वाले ईशान की माँ से मै जब पूछता हूँ ,आपको डर नहीं लगता लड़का फुटबाल खेलता है ,कहती हैं, नहीं ,हम लोगों को डर नहीं लगता ,हम उसे पैसे के लिए नहीं खिला रहे ,हम उसे नाम के लिए नहीं खिला रहे ,हम चाहते हैं जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करता है, उसके साथ जिंदगी भर रहे और उसकी सबसे प्रिय चीज़ है सिर्फ फुटबाल है ,अगर ईशान को फुटबाल के मैदान में रात को २ बजे जाना है तो वह जायेगा. अमेरिका के कोंटिनेंटल कप में पैरों में चोट के बावजूद उसने गोलपोस्ट नहीं छोड़ी .हम उसके सपनों को जी रहे हैं , वह अपने आप जैसा बनना चाहता है बन जायेगा |
[लेखक-परिचय : बहुत ही आक्रामक-तीखे तेवर वाले इस युवा पत्रकार से आप इनदिनों हर कहीं मिलते होंगे, ज़रूर.! .आपका का ब्लॉग है कतरने. लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। ]


