बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
नदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 8 नवंबर 2014

चाँद को फिर-फिर बुला लाएँ


आओ ! इस शादमाँ पल में

चित्र: गूगल साभार












क़मर सादीपुरी की क़लम से

मैं तेरे ख़्याल  के क़ाबिल न था
हमने आँखों को न चुराया था
तू दिल से जुदा हरगिज़ न हुआ
पर मै तेरे प्यार के हामिल न था!

उन तारों से बात की थी मैंने
जो तेरे आस्मां से आते थे
चाँदनी को छूता था अक्सर
जिसका अक्स तेरा चेहरा था

उन हवाओं से पता पूछा था
तेरी गलियों में जिसका आना था
उनको छूने की कोशिश की हमने
तेज तूफ़ान ने डराया था

मैंने न डरने की जब क़सम खाई
उन हवाओं ने आना छोड़ दिया
मेरी अब सांस उखड़ी जाती है
दिन कहो,  रात हुई जाती है!

कहीं यह जीवन का अंतिम पहर तो नहीं!

कसमें वफ़ा भी वे जब भूल गए
हमने उनकी जफ़ा का पास रखा
दिल को न कभी उदास रखा
सूरज से जब दुआ मांगी
चाँद-तारे को साथ-साथ रखा

लेकिन बादल कहाँ से आ धमके
तूफाँ ने भी की, यूँ ही यारी
हमने ख़त को दबा कर सीने से
हरेक तहरीर को छुपा रखा

ऐसी तहरीर फिर कहाँ होगी
जिसमें तारे भी झिलमिलाते थे
चाँद सूरज से बात करता था
फूल, पत्थर भी मुस्कुराते थे

उन पत्थर को हमने घर रख कर
एक आँगन में आरती की थी
और चराग़ों से कर लिया रौशन
उसके अलफ़ाज़ को टटोला था

कहीं तो होगा वो पैमाने वफ़ा
कि जिसकी ख़ाक हमने छानी थी
कि रह-रह आंसुओं की बारिश में
तेरे होठों के लाल -लाल डोरे
कैसे तिल का कमाल करते थे

हमने तिल को दिल था दे डाला
कैसे-कैसे जमाल करते थे

हमने उस बोसा-ए-दिल से
कैसे था रूह को भिगो डाला
तुमने सजाई मांग में बूंदे
फूल का रंग भी चटख आया

ख्वाइश की राह पर चले कब थे
हमने रिश्ते को, पोसा, न पाला
स्याह रात को जगे अक्सर
कि हिचकी को पास आना था।

माँ-सी आरज़ू को मुठ्ठी में
लिये नींद से ना जागा था
ऐसे ख़्वाबों के कैसे सज्दे में
कौन सहीफ़े लिए आया था।
कि अल्फाज़ ने तपिश बन कर
पीर पयंबरी को पाया था।

आओ ! इस शादमाँ पल में
चाँद को फिर-फिर बुला लाएँ
कैसे दहक़ाँ के खेत पसीने में
रह-रह फसल को उगा आएँ।

यही ज़िन्दगी का हासिल है
यही मोहब्बतों का हामिल है!

(बोसा-ए-दिल=दिल का चुम्बन, हामिल= योग्य , सहीफ़े= ईश्वरीय संदेश, पयंबरी=पैगम्बरी, दहक़ाँ=किसान, शादमाँ=हर्षित, हामिल= धारक )

{6-7may2013 को फ़ेसबुक पर ही लिखी और पोस्ट की गयी थी.} 


छत्तीसगढ़ रायपुर के  इतवारी अख़बार के 16 नवंबर 2014 के अंक में प्रकाशित

 
read more...

मंगलवार, 21 मई 2013

कारखानों की प्यास बुझाते सूख गयीं जलथल नदियाँ














रश्‍मि शर्मा की क़लम से 


संदर्भ झारखंड उर्फ़ गाँव की गलियाँ 


नदि‍यां जीवनदायि‍नी हैं। हमारे अस्‍ति‍त्‍व की पहचान भी। सरकार कभी नदि‍यों को जोड़ने के फि‍राक में रहती है तो कभी बांटने के। नदि‍यों के बारे में मैं हाल का एक अपना नि‍जी अनुभव आप सबों को बताना चाहूंगी। परीक्षा के बाद हुई बच्‍चों की छ़ुटटि‍यां में मैं उन्‍हें अपने गांव लेकर गई....इस वादे के साथ कि‍ इस बार उन्‍हें अपने गांव की उस नदी में नहाने दूंगी, जि‍समें बचपन में मैं नहाया करती थी और उससे जुड़े सैकड़ों कि‍स्‍से उन्‍हें सुनाती थी। बच्‍चे उत्‍साहि‍त थे कि‍ कम से कम इस बार तो उन्‍हें गांव में नहाने का मौका मि‍लेगा। वादे के मुताबि‍क गांव पहुंचने के बाद मैं उन्‍हें अगले ही दि‍न नदी पर ले गई। यह क्‍या........जि‍स नदी से जुड़े अंतहीन कि‍स्‍से मेरी जेहन में कुलबुलाया करते थे...उसका तो कहीं अस्‍ति‍त्‍व ही नहीं बचा। मेरे गांव में फूलों से भरे-भरे पेड़ों के बीच छोटी-पतली सी, रम्‍य और साफ नदी बहती थी, जि‍से हम दोमुहानी नदी के नाम से जानते थे...उसका वजूद ही खत्‍म हो गया। उस नदी को बांध दि‍या गया है। और ऐसा बांधा गया कि‍  नदी अब नदी न लगकर ठहरे पानी की तरह हो गया था। जहां कलकल बहती साफ-स्‍वच्‍छ पानी  हुआ करता था....वह इतना गंदा नजर आ रहा था कि‍ मैंने बच्‍चों को उसे छूने की इजाजत भी नहीं दी। वह नदी जि‍सके पानी में मैं बचपन में घंटों छपाछप करती थी....खो गई।

बच्‍चे कहने लगे.....यही वो नदी है न मां..जहां तुम नहाया करती थी अपनी सहेलि‍यों के साथ....और छोटी-छोटी मछलि‍यां भी पकड़ा करती थी। कहां है कोई मछली...और छि:..इतने गंदे पानी से नहाती थी तुम...मैं नि‍रूतर हो गई। बड़ी मुश्‍कि‍ल से बच्‍चों को यकीन दि‍लाया कि.....हां ये वही नदी है, जि‍समें मैं तैरा करती थी....शाम को सखि‍यों संग ठंढी हवा का आनंद लेने के लि‍ए इसके कि‍नारे बैठा करती थी। अब तो...सब खत्‍म हो गया। बस उसका कि‍नारा वही है....जहां हम स्‍वच्‍छ हवा का आनंद ले सकते हैं क्‍योंकि‍ गांव का वातावरण उतना दूषि‍त नहीं हुआ है।
वाकई बहुत मलाल हुआ.....लगा..बचपन की खूबसूरत अनुभवों की कड़ी से एक कड़ी खत्‍म हो गई। उसे आज से जोड़कर देख पाना मुश्‍कि‍ल है। ऐसा नहीं कि‍ यह मेरे गांव के नदी की बात है। अब तो झारखंड की सभी नदि‍यां जहरीली होती जा रही है। स्वर्णरेखा, दामोदर, बराकर, करकरी, कोयल,अजय, कनहर, शंख  जैसी नदियां मृत होने की राह पर हैं। गर्मियों में तो यहां का पानी सूखने लगा है। लोग त्राहि‍माम करने लगते हैं। कई मील दूर जाकर पानी ढो कर लाना पड़ता है।  ऊपर से स्टील, पावर प्लांट और अन्य कारखानों की गंदगी को नदियों में छोड़ा जा रहा है। फलतः राज्य की सभी नदियां मृतप्राय होने पर हैं। नदियों के किनारे बालू निकालने के कारोबार ने तो नदियों की हालत और भी खराब कर दी है। लोग अंधाधुंध नदि‍यों को दोहन कर रहे हैं। कोई मात्रा तय नहीं कि‍ कि‍स नदी के कि‍नारे से कि‍तनी बालू ि‍नकाली जाए। फलस्‍वरूप नदि‍यां कटतीं जा रही है। जब पानी को रोककर, अपने अंदर समेटकर रखने वाले बालू ही नहीं बच रहे तो पानी का संचय कैसे होगा। उपर से जंगल का अस्‍ति‍त्‍व भी खतरे में हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। यहां तक ि‍क फोरलेन के नाम पर  अब तक प्राप्त सूचना के अनुसार 80,000 से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं। और कभी कटेंगे। बदले में पौधों का रोपण भी नहीं कि‍या जा रहा। बारि‍श के पानी के संचय की भी व्‍यवस्‍था सरकार नहीं कर पाई है अब तक।

 नदि‍यों में इतना प्रदूषण है कि‍ जि‍न नदि‍यों से पहले लोग पीने का पानी भी लाते थे.....अब नहाना भी कठि‍न हो गया है। और इसके कारण केवल हम है...हमारा स्‍वार्थ है। हमने नदि‍यों का उपयोग, उपभोग तो पूरा कि‍या..मगर न तो स्‍वच्‍छता का ख्‍याल रखा और न ही प्रदूषि‍त करने वाले हाथों को रोका। नदि‍यों में हर तरह के कूड़े-कचरे फेके जाते हैं। यहां तक कि‍ हम हिंदू लोग पूजा की वस्‍तुओं को भी नदी में प्रवाहि‍त करते हैं। यह भी तो गंदगी का ही रूप है। कल-कारखानों का कचरा सीधे नदी में गि‍रता है। 

जमशेदपुर इलाके के पानी का महत्वपूर्ण स्रोत सीतारामपुर बांध भी मिल के बिना उपचारित जल के बांध में जाने से प्रदूषित होता जा रहा है। झारखंड की उषा मार्टिन की स्टील निर्माण इकाई से फैलते प्रदूषण ने न केवल आसपास के निवासियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला है बल्कि समीपवर्ती कृषि भूमि को भी बंजर बना दिया है। उपर से कई जगह तो नदी के कि‍नारे ही बसेरा बनाकर उनका अस्‍ति‍त्‍व खत्‍म कि‍या जा रहा है। झारखंड की प्रमुख नदि‍यों...दामोदर और स्‍वर्णरेखा समेत छोटे-बड़े सभी तरह के नदी-नाले जहरीले हो गए हैं। उनमें आक्‍सीजन का स्‍तर शून्‍य हो चुका है।  फलत: जलजीवों का अस्‍ति‍त्‍व भी संकट में है। यहां तक कि‍ मछलि‍यां भी जहरीली हो रही हैं। इससे अप्रत्‍यक्ष रूप से मछुआरों की जीवि‍का पर भी असर पड़ रहा है और इसका सेवन काने वाले लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर भी। नदि‍यां भी अतिक्रमि‍त हो रही हैं। उन्‍हें कूड़ा-कचरा डालकर भरा जा रहा है। ऐसे तो कुछ वर्षों पश्‍चात उनकी पहचान ही गुम हो जाएगी। हालांकि‍ नदि‍यों को बचाने के लि‍ए स्‍थानीय स्‍तर पर प्रयास चल रहे हैं। मगर ये नाकाफी हैं। सरकार को और गंभीरता से इस पर वि‍चार करना चाहिए। झारखंड सरकार की प्रस्‍तावित जल नीति‍ में नदि‍यों के जल के इसतेमाल को लेकर मानक तय कि‍ए गए हैं। परंतु इसका सख्‍ती से अनुपालन नहीं कि‍या गया तो कोई खास परि‍णाम और सुधार  नजर नहीं आएंगे। और नदि‍यां इसी तरह मैली..जहरीली होती गई तो मानव अस्‍ति‍त्‍व को भी संकट में डाल सकती है।

ज्ञात रहे कि‍ नदि‍यां ही सभ्‍यता की पहचान होती है। इसलि‍ए हमारा दायि‍त्‍व है कि‍ हम नदि‍यों को प्रदूषि‍त होने से बचाएं। कारखानों के
कचरे के नि‍स्‍तारण के अन्‍य उपाय कि‍ए जाए न कि‍ उन्‍हें नदि‍यों में प्रवाहि‍त कि‍या जाए। जल संरक्षण कि‍या जाए। भूजल क्षरण और वनों की कटाई को रोकने का त्‍वरि‍त उपाय हो। ताकि‍ नदि‍यों का अस्‍ति‍त्‍व बरकरार और और आने वाली पीढ़ी सभी नदि‍यों का नाम सि‍र्फ पाठयपुस्‍तको में न देखे......वरन मौका मि‍लने पर उन्‍हें अपने आंखों से भी देखे।


(परिचय:
जन्म:2 अप्रैल, मेहसी थाना, मोतीहारी, बि‍हार में 

शिक्षा रांची वीमेंस कॉलेज से स्नातक, इतिहास में स्नातकोत्तर और पत्रकारिता में स्नातक उपाधि  

लेखन की शुरूआत छात्र जीवन से ही। पत्रकारि‍ता  की तरफ रूझान स्‍नातक के दौरान । यह यात्रा प्रभात खबर से शुरू होते हुए कई पत्र-पत्रि‍काओं तक पहुंची डेढ़  दशक के दौरान नौकरी भी और स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता भी। साहि‍त्‍यि‍क पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों के लि‍ए लि‍खने-पढ़ने का सि‍लसि‍ला जारी ,अध्‍ययन और शोध में संलग्‍न। साथ ही इसी बीच रेडि‍यो व दूरदर्शन में सक्रि‍य भागेदारी, अति‍थि एवं उद़घोषि‍का दोनों रूपों में। 

सृजन: कवि‍ता संग आलेख का प्रकाशन देश के वि‍भि‍न्‍न अखबारों और पत्रि‍काओं  में।  समय-समय पर कवि‍ताओं का प्रसारण 
संप्रति:स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता एवं लेखन कार्य 
ब्लॉगजनवरी 2008 में रूप-अरूप  नाम से शुरू कि‍या 
संपर्कrashmiarashmi@gmail.com  ) 



read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)