बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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रविवार, 8 मार्च 2015

कांग्रेस : भक्ति नहीं, शक्ति बटोरना जरूरी

राहुल उर्फ़ शहज़ादे के नाम वाया गांधी कुंबा 


चित्र: गूगल बाबा के सौजन्य से






 

भवप्रीतानंद की क़लम से
यह कोई पहला मौका नहीं था कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी कहीं गायब हो गए थे। वह कहां गायब हुए, इसका कोई अनुमान पार्टी के लोगों को नहीं था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से किसी के पूछने की हिम्मत नहीं थी। कई कांग्रेसी तो इस पचड़े में पडऩा भी नहीं चाहते होंगे कि  राहुल गांधी कहां हैं और क्या कर रहे हैं। पर चूंकि  पार्टी में वह बहुत ऊंचे पद पर हैं इसलिए उनका न दिखना नोटिस में आता-जाता रहता है। पार्टी में यह रुतबा तब ही होता है जब उनके मौन या मुखर होने से चीजें प्रभावित होती हैं।
राहुल गांधी भविष्य में कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। क्योंकि पार्टी की गतिविधियां लोकसभा चुनाव के बाद भी गांधी परिवार के गिर्द घूम रही है। हालांकि कुछ कांग्रेसी स्पष्ट रूप से या इशारों से गांधी परिवार के गिर्द रहने की आलोचना करते रहते हैं। लोकसभा चुनाव में हार के बाद से वैसे कांग्रेसी नेता को थोड़ा बल मिला है जो कांग्रेस को गांधी परिवार से इतर भी देखना चाहते हैं। पर यह भी सच है कि ऐसे नेताओं की कोई बहुत बड़ी फौज कांग्रेस में नहीं है जो इतर देखने की दृष्टि को मजबूती प्रदान करे। इसलिए यह पानी के बुलबुले की तरह फूलते हैं, फटते हैं और तिरोहित हो जाते हैं।
क्या राहुल गांधी खुद को अध्यक्ष पद पर रखते हुए कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र को वापस ला सकते हैं। दूसरा, क्या कांग्रसे के वरिष्ठ और सामान्य सदस्य राहुल गांधी को आत्मसात कर पाएंगे। दूसरा प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है कि चुनाव में अब कांग्रेस की भी औकात बताने की परंपरा की शुरुआत गत लोकसभा चुनाव से हो चुकी है। मतलब अब लोग कांग्रेस को गांधी परिवार से इतर भी देखना चाहते हैं। यह चीज अगर कांग्रेस को चाहने वाले वोटरों में आई है तो बिल्कुल नई है जिसे गांधी परिवार को समझ लेना चाहिए। पर जैसा कि जाहिर है गांधी परिवार के प्रति भक्ति का पैरामीटर कांग्रेस में कम नहीं है। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सोनिया गांधी मान जाती हैं तो कांग्रेस में एक मत से उन्हें अध्यक्ष मनोनीत कर लिया जाएगा, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए। यह मतेक्य वह शुरुआत है जहां से पूजन की राजनीति शुरू होती है।
कांग्रेस में अब तक जो ट्रेंड है उसके हिसाब से देखा जाए तो पार्टी में लोकतंत्र की बात गांधी परिवार के बाद शुरू होती है। गांधी परिवार खुद भी यही चाहता है कि लोकतंत्र की बात उनके बाद से शुरू हो। गांधी परिवार एक वीटो की तरह कहीं भी हस्तक्षेप कर लोकतांत्रिक स्थिति को पलट देते हैं और सब चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं- इसे हम ट्रेडमार्क कांग्रेसी ट्रेंड कहते हैं। सत्ता में रहते हुए बीते दस साल में परदे के पीछे से सत्ता चलती रही। कई बार ऐसे आरोप लगे पर कभी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्थितियों को स्पष्ट करना जरूरी नहीं समझा। जब उनसे प्रेशर देकर कोई काम करवाया गया तो एक कांग्रेसी सिपाही, गांधी परिवार के भक्त की तरह वह काम करते रहे। उनका व्यक्तित्व भी उनके आड़े नहीं आया।
इस ट्रेंड से सत्ता में भ्रष्टाचार, कालाबाजारी को इस हद तक प्रश्रय मिला कि वह जब तक पानी सिर के ऊपर से नहीं गुजर गया तक तक उसे सहते रहे और वोटरों में क्रोध वृद्धि करते रहे। कांग्रेस का शीर्ष तंत्र पारदर्शिता रखने में पूरी तरह नाकामयाब रहा। बड़ी संख्या में भ्रष्टाचार के मामले उजागर हुए और पूरा तंत्र उसे बचाने में लगा रहा। यह सब सिर्फ इसलिए हो सका क्योंकि जो ऐसा कर रहे थे वह गांधी परिवार के बहुत नजदीकी थे और उनपर कोई एक्शन नहीं लिया जा सकता था। लालू यादव ने भी राबड़ी देवी को सत्ता में रखकर ऐसे ही शासन किया था।
पर अब २०१४ के चुनाव के बाद से भारतीय लोकतंत्र में वोटरों का ट्रेंड बदल गया है। लोकसभा चुनाव और उसके बाद कई विधानसभा चुनावों में इसे देखा जा सकता है। कांग्रेस को उस ट्रेंड में फिट होना होगा। उनका पारदर्शी होना बहुत जरूरी है। अगर पारदर्शी नहीं होंगे तो दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों की तरह नामलेवा भी कोई नहीं रह जाएगा। राहुल गांधी की राजनीति को देखकर यही लगता रहता है कि उसके साथ वोटरों का कोई आंतरिक जुड़ाव नहीं है। अगर वह कांग्रेस के अध्यक्ष बनते हैं तो उन्हें सबसे पहले वोटरों के ट्रेंड को समझना होगा। करीब सालभर पहले लोकसभा चुनाव में वोटर भाजपा को सिर-आंखों पर बिठाती है। फिर सालभर में उपजी ठोस और तरल असहमतियों के कारण दिल्ली  विधानसभा चुनाव में धूल चटा देती है। झारखंड में भी आजसू साथ नहीं होता तो बहुमत के आंकड़े से पांच-छह सीटें कम ही मिलती।
अब वह दिन आ गया है जब हर पार्टी के शीर्ष को अपनी अहंकारी और भक्ति-पूजन की गतिविधियों से निजात पाना होगा। चाहे उसके लिए उन्हें खुद की बलि ही क्यों ने देनी पड़ी। वैसे भी वोटर अब फर्श को अर्श और अर्श को फर्श पर करना जान गए हैं। आपकी पारदर्शिता और संवेदनशीलता ही सत्ता देगी या सत्ता से उतारेगी। राहुल गांधी युवा हैं। वह खुद से इस तरह की शुरुआत कर कांग्रेस की पुरानी और प्रतिष्ठित पार्टी में मिसाल कायम कर सकते हैं। वह इस सोच को भी धराशायी कर सकते हैं कि कांग्रेस में गांधी परिवार के बाद लोकतंत्र शुरू होता है। कांग्रेस के लिए गत हार एक सबक और आत्मावलोकन साबित हो सकता है अगर वह अंधभक्ति और उससे उपजी कई विपरीत परिस्थितियों पर विजय पा ले। भाजपा से अब मात्र उसे सांप्रदायिक पार्टी कहकर लड़ाई नहीं की जा सकती है। यह विषय इसलिए स्थूल हो गया है कि भाजपा शासित राज्यों में वर्षों से ऐसी परिस्थितियां नहीं उपजी जहां उसे सिर्फ सांप्रदायिक सोच वाली पार्टी करार कर वोट लिया जा सके। एमपी, छत्तीसगढ़, गुजरात आदि राज्यों में तो भाजपा ने काम के बल पर वोट मांगे और उन्हें मिला। काम के बल पर वोट मांगने वाली स्थिति किसी भी कांग्रेस शासित राज्यों में कहां दिखी। अगले महीने अखिल  भारतीय कांग्रेस कमेटी का सम्मेलन है। पांच राज्यों में कांग्रेस के नए अध्यक्षों की नियुक्ति की जा चुकी है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी की सहमति के बाद ही इन अध्यक्षों की नियुक्ति हुई है। आगामी सम्मेलन में राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की हवा भी बन रही है। ऐसी स्थिति में अगर आंतरिक लोकतंत्र और उसकी सुचिता पर बात की जाती है तो कांग्रेस को इसके दूरगामी लाभ मिल सकते हैं।
यह सर्वविदित है कि परिवारवाद और हारने के बाद उसकी भक्ति से मुंह नहीं मोडऩे का ट्रेंड सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं है। मायावती, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, करुणानिधि, जयललिता, लालू यादव आदि राजनीति में ऐसे नेता हैं जो सिर्फ और सिर्फ अपने पास सत्ता रखना पसंद करते हैं। हारने के बाद भी वह जिम्मेदारी लेकर पार्टी के शीर्ष पद से इस्तीफा नहीं देते हैं। घोटालों में भी फंसते हैं तो अपनी बहू-बेटियों या फिर सबसे नजदीकी भक्त को सत्ता देते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वह शीर्ष पर नहीं रहे तो पार्टी बिखर जाएगी ओर सत्ता के कई कें्रद बन जाएंगे। पर वोटर परिवारवाद की इस परिपाटी की अतियों से बुरी तरह नाराज है। समय रहते अगर पार्टियों ने मुक्ति पाने की ईमानदार कोशिश नहीं की तो कांग्रेस वाला परिणाम उन्हें भी भुगतना पड़ेगा। फिलहाल कांगे्रस के शहजादे राहुल गांधी को भगवान सदबुद्धि दे कि राजनीति को तार्किक नजरिए से देख सकें।







 







(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )

हमज़बान पर पढ़ें  भवप्रीतानंद को


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सोमवार, 9 दिसंबर 2013

सिर्फ़ आप ही नहीं, कर सकते हो तुसी भी कमाल!

फ़ोटो गूगल महाराज की कृपया से











हालिया चुनाव पर कुछ इस तरह भी तो सोच सकते हैं
तमाम तामझाम और बेशर्मी लांघती मीडिया रपटों के बावजूद लोकमानस को समझ पाने में हम लोग असमर्थ रहे. लेकिन ज़िद की लकीर का अहं अब भी मुंह नहीं चुरा  रहा है. दरअसल सेठों का पैसा दाव पर है. उसकी अपनी ज़रूरतें हैं. अपने निहितार्थ हैं. शहरों के मध्य-वित्त वर्ग को उसका चमकीला रैपर बहुत सुहाता है. और देश को इन्हीं के मार्फ़त चलाने की क़वायद रवां-दवाँ है. गांधी का गाँव कहीं  खो गया है. उसकी चिंता जभी होती है, जब सेठों को अपने उत्पाद की बिक्री करनी होती है. इसी बहाने सड़कें तो बन ही जाती हैं. लेकिन वहीँ तक बनती हैं जहां क्रय-शक्ति है. और उत्पाद छोटे पैक में भी बिक जाता  हो.  इधर व्यस्क होते  शहरी युवाओं की ऊर्जा और उत्साह का इस्तेमाल धर्म और जाति की सियासत करने वाले उन्हें वरगलाकर करते हैं. और अभी उसका फीसद अच्छा-खासा है. लेकिन क्या यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है कि हम गाँव में रहने वालों की अनदेखी कर दें.
लेकिन सच यह भी तो है कि जनता कार्पोरेट राजनीति और राजनीतिक कारोबार को कुछ-कुछ तो ज़रूर समझने लगी है. क्या ताज़ा चुनाव इसकी तस्दीक़ नहीं करता कि दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों से जन-मोह भंग हो रहा है. और इसकी शुरुआत तो बहुत पहले दक्षिण और पूर्वोत्तर में  हुई. बाद में उत्तर प्रदेश और बिहार-झारखंड  में उभरे इलाक़ाई दलों ने बखूबी महसूस  किया। तुरंता मिसाल दिल्ली की है. जहां आप  ने कमाल कर दिया। यदि दिल्ली की तरह ही राजस्थान,  छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कोई तीसरा विकल्प होता तो क्या परिणाम यही होते। गर पुण्य प्रसून  बाजपेयी जैसा पत्रकार यह कहता है कि   'कांग्रेस के खिलाफ गये चार राज्यों के जनादेश का सबसे बडा संकेत 2014 में एक नये विकल्प को खोजता देश है' तो गलत क्या है. यह विकल्प कांग्रेस या भाजपा से इतर तीसरी राह की और अग्रसर होगा।
समय है कि हर क्षेत्र की सियासी जमात अपनी खुन्नस त्याग कर  मज़बूत तीसरा मोर्चा तैयार करें तो इन बड़बोलों का गुब्बारा हवा हो जाए! तभी नमो जाप करने वाले नमो-नमो करने लगेंगे। क्योंकि वो सोच रहे हैं कि  कांग्रेस की नीतियों को लेकर बढ़ता आक्रोश उन्हें सत्तासीन कर देगा। यदि इन दोनों के अलावा तीसरा विकल्प सामने होगा तो जनता निसंदेह उसे ही तरजीह देगी। सच्चे लोकतंत्र की भी यही मांग है.  वर्ना तमाशा देखते रहिये।
 छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के खिलाफ लगभग 59 प्रतिशत मत पड़े लेकिन रमन सिंह महज़  41.4 प्रतिशत मत पाकर फिर ताज सम्भाल लेंगे ! जबकि सिर्फ एक प्रतिशत से भी कम मत लाने वाली कांग्रेस विपक्ष का स्वाद लेगी। हालांकि विकल्प न होने की स्थिति और नक्सली हिंसा में मारे गए नेताओं की हमदर्दी में ही उसे यह वोट मिल गया। तस्वीर तो यही है कि मतदाता देश में केंद्र सरकार से नाखुश थे. हर जगह कांग्रेस के विरोध में ही मत पड़े. गर कोई लहर रहती तो वोट का प्रतिशत भाजपा का दिल्ली और छत्तीसगढ़ में इतना कम न होता। हद तो यह है कि सरगुजा में जिस नक़ली लाल क़िले से नरेंद्र मोदी ने सभा संबोधित की थी, वहाँ ही कई विस से भाजपा का सूपड़ा साफ़ हो गया.    


      




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सोमवार, 23 सितंबर 2013

सर्वधर्म समभाव वाया राजनीति @ नमो

मुज़फ्फ़र नगर फ़साद : दंगे में ख़ाक -राख हुए अपने घर को ताकता एक मासूम साभार इंडियन एक्सप्रेस

संदर्भ अनंतमूर्ति

समय अब ज्यादा क्रूर है। संकट गहरे हैं। बोलने की आज़ादी पर पहरे हमेशा रहे हैं। लेकिन देश में लोकतंत्र की गहरी जड़ों को डिगा पाना बेहद मुश्किल रहा। अब उसके ही बहाने उसे ही समूल नष्ट करने की कोशिशें तेज़ हैं। जबकि मित्रो! वाद-विवाद ही संवाद का वाहक रहा है। इसमें कुतर्क की गुंजाइश नहीं रहती। वैचारिक मतभेद हमेशा रहे हैं, रहेंगे। लेकिन तब कोई गाली-गलौज पर उतर नहीं आता था। देश के एक प्रतिष्ठित लेखक जवानी में नेहरु की आलोचना करते रहे। कुछ बड़े हुए तो इंदिरा उनके ज़द में रहीं। कभी उनके विरुद्ध अमर्यादित बर्ताव किसी ने नहीं किया। अब जबकि धुर दक्षिण पंथी एक नेता और उसके समर्थकों के सपने के पूरे हो जाने की स्थिति आने पर लेखक ने देश छोड़ देने की बात कही तो एक लम्पट तबका उनकी माँ-बहन करने में वीरता समझने लगा। दरअसल उनके ज़ेहन में हिटलर का जर्मनी रहा होगा। जब कई लेखक देश छोड़ कर चले गए थे। प्रतिकार का अपना ढंग है। क्या हम विश्व के उस नादिरशाही या हिटल शाही दौर में तो नहीं लौट रहे? क्या मोदियाबिंद अब डेंगू की तरह फैल रहा है। कि जिसमें सिर्फ एक ही रंग नज़र आता है।

मित्रो ! आप जिस राज्य में विकास का ढिंढोरा पीट रहे हैं। ज़रा उसके आगे-पीछे भी नज़र घुमा लीजिये। अभी कुछ दिन पहले "Times of India" ने ख़बर दी कि निवेशकों के लिए उड़ीसा बेहतर राज्य साबित हो रहा, वहीं गुजरात लगातार नीचे जा रहा है। सर्वाधिक प्रति व्यक्ति आय में हरियाणा एक नंबर पर है। सबसे अधिक नौकरियों में आन्ध्र प्रदेश है। इधर अपने बिहार ने 2006-2010 की ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 10.9 प्रतिशत की दर से विकास किया जबकि गुजरात की दर 9.3 प्रतिशत रही। इस दौरान सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि हरियाणा, महाराष्ट्र और उड़ीसा भी विकास दर में गुजरात से आगे निकल गया।

दोस्तो! कभी एक अफसर ने कहा था की इंदिरा ही भारत हैं और भारत ही इंदिरा, तो उसकी भी खूब आलोचना हुई थी। लेकिन इंदिरा के चाहने वाले विरोधियों की मुखालिफ़त हिंसक ढंग से नहीं करते थे। आज ऐसा माहौल निर्मित किया जा रहा है कि आप मुझे मानिए, वरना आप देशद्रोही! मित्र ! यह नहीं चल सकता। आप बसद शौक़ किसी का समर्थन कर सकते हैं। ज़रूर कीजिये। लेकिन दुसरे को भी कहने का स्पेस दीजिये। आप मुल्क की बात छोड़िये गुजरात में भी 49 फ़ीसदी वोट इस विस चुनाव में भाजपा को कम मिला था। तो क्या आप उस आवाज़ को कुचल देंगे।
गुजरात नरसंहार की निंदा समूचे विश्व में हुई थी। सिक्ख विरोधी दंगे भी सिहरन पैदा कर देते हैं। मैं कांग्रेसी नहीं हूँ। लेकिन इत्ता जानता हूँ कि उसके लिए कांग्रेस नेताओं ने कई बार माफ़ी-तलाफ़ी की। अब मुज़फ्फर नगर। यहाँ भी उसी हिंसक मानसिकता ने खेल खेला, जो गुजरात और दिल्ली वाया भिवंडी @ मुंबई अराजक रहा है। दोस्तों ! यह ज़ेहनियत तालिबानी हो या संघी। धर्म की सियासत करने वाले यह तथाकथित हमारे सूरमा आम जन का भला यही करेंगे कि खून की बारिश के बाद रोटियाँ बांटने चले आयेंगे। भूल जाएंगे कि बादल का निर्माण उन्होंने ही किया था। आप लोकतंत्र का सम्मान करें !

आओ कि देश की प्राचीन वसुधैव कुटुम्बकम परंपरा आवाज़ देती है। आओ कि कबीर, तुलसी, बुल्ले शाह के नग्मे गूँज रहे हैं। वही तुलसी जिन्होंने कहा था, मांग के खईबो मसीद (मस्जिद ) में सोइबो! वही बुल्ले शाह जो बिस्मिल्लाह कह कर होली खेलने का एलान करते हैं। आओ हम उस नरेन्द्र के विवेक का स्मरण-व्यवहार करें, जो बाद में स्वामी विवेकनद बना। उसने कहा था, वेदान्ती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर के संयोग से जो धर्म खड़ा होगा,वही भारत की आशा है।



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