बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 13 मई 2015

दबंग से अम्मा तक का सफ़र











दो अदालती फ़ैसले और कुछ शंकाएं

भवप्रीतानंद की क़लम से
जेल में बैठे संजय दत्त सोच रहे होंगे कि वह चूक गए। जयललिता और सलमान खान के मामले में हाईकोर्ट ने दशकों पुराने मामले में जैसी जल्दबाजी दिखाई, वैसी परिस्थितयों को पैदा करने में शायद संजय दत्त के वकीलों से चूक हो गई। वह जज को आरोपियों की शोहरत और अकूत धन के आभामंडल में हिप्नोटाइज करने में सफल नहीं हो सके। कर्नाटक हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति सीआर कुमार स्वामी ने जयललिता के आय से अधिक संपत्ति के मामले में 11 मई को मात्र दस सेकंड में फैसला सुना दिया। उन्हें क्षणभर में दूध का धुला बताकर भ्रष्टाचार मुक्त बता दिया। यह केस 19 साल पुराना था। वैसे, हमारे यहां के न्यायालयों में न्याय पाने में व्यक्ति के जवान से बूढ़े हो जाने की कहानी आम है।
एक सामान्य इंसान की तरह सोचें तो हमारे तर्कों को भोथरा करने में माननीय वकीलों को मिनट भी नहीं लगेगा। पर सलमान खान, जयललिता आदि नेम-फेम वाले लोगों को जब उनके पक्ष में फैसला जाता दीखता है, तो एक क्षण के लिए बंबइया मूवी की वह पंक्ति, जिसे कई फ़िल्मों में बार-बार दुहराया गया है, कहने का मन करता है:
न्याय बिका हुआ है। न्यायाधीश बिके हुए हैं। जिस न्याय को पाने के लिए आम आदमी के जूते घिस जाते हैं, उसको बड़े लोग सेकंडों-मिनटों में प्राप्त कर लेते हैं। जबकि वह केस दशकों पुराना है। दशकों से जुटाए सबूत-गवाह क्षण भर में खारिज कर दिए जाते हैं। एक वकील की बात याद आती है जिसने कहा था कि कोर्ट में प्रस्तुत सैकड़ों पन्ने की बात जज के पास जाकर एक लाइन की हो जाती है। बात दमदार थी। न्याय के कटघरे में यही होता है। पर जज उस एक लाइन में ईमानदारी से डोल जाएं तो!

जयललिता राजनीति से पहले तमिल फ़िल्मों की जानी-मानी हिरोइन थीं। जाहिर के उनके पास धन की कमी नहीं होगी। उनके पास भौतिक वस्तुओं की भी कमी नहीं होगी। सैकड़ों जोड़ी कपड़े, सेंडल होना सामान्य बात होनी चाहिए। इसलिए जब वह राजनीति में आई और नब्बे के दशक के शुरू में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने का बहुमत मिला, तो उन्होंने दरियादिली दिखाते हुए मात्र एक रुपए, मतलब टोकन मनी सेलरी लेने की घोषणा की थी। वाकई यह आम लोगों के दिलों में जगह बनाने वाला स्टेप था। पर सत्ता के पांच सालों में जयललिता के पास 66 करोड़ रुपए कैसे आ गए। 1996 में उनके घर में छापा पड़ा। 28 किलो सोना, 896 किलो चांदी के अलावा हजारों की संख्या में साड़ियां, सैकड़ों की संख्या में जूते बरामद किए गए।
एक पूर्व जानीमानी तमिल फ़िल्मों में काम करने वाली हिरोइन के घर से यह सबकुछ बरामद होता, तो आम आदमी यह सोचकर मानसिक रूप से अपने को मना लेता। चलो हिरोइन के घर से यह सबकुछ निकलना कोई बहुत मायने नहीं रखता है। पर राजनीति के आने के बाद मात्र पांच वर्षों में इतनी बड़ी मात्रा में गहनों का निकलना कई शंकाओं को तो जन्म देता ही था। बहुत संभव है कि उन्हें पांच वर्षों के मुख्यमंत्रित्व काल में यह सब बतौर गिफ्ट मिला होगा। चूंकि वह पूर्व हिरोइन थीं तो गिफ्ट देने वाले सोने-चांदी का नेग चढ़ाने के बाद ही बात आगे बढ़ाते होंगे। और वही सब जमा होते-होते इतना जमा हो गया होगा। जयललिता के व्यक्तित्व को देखकर इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंचा जा सकता है। पर तर्क की कसौटी तो यही कहना चाह रही है कि यहां एक रुपए सेलरी लेने वाली सादगी कहां चली गई थी!
अभियोग लगाने वाले पक्ष का कहना था कि उन्हें हाईकोर्ट में अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। पर निचली अदालत ने उनपर दस साल चुनाव नहीं लड़ने का भी फैसला सुनाया था। अब हाईकोर्ट के फैसले आने के बाद जयललिता चुनाव लड़ सकती हैं। दस महीने बाद तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव है। जयललिता के भक्त और मुख्यमंत्री पन्नीरसेलवम कुर्सी पर जयलिलता की चरण पादुका रखकर, एक-एक बात पूछकर सत्ता चला रहे थे। वह भी मनो-टनों विनम्रता और भक्ति के साथ जयललिता को उसी कुर्सी पर सत्ता सौंपेंगे जो उनके जाने के बाद से ही सुरक्षित रखी हुई है।
संवेदना और भक्ति के क्रूर बैर रखने वाले इस युग में जयललिता के भक्तों को नाचते और पूजा करते देखते यह प्रश्न कौंधता रहता है कि क्या यह इसी युग के कार्यकर्ता हैं या फिर सत्ता में बने रहने के लिए जयललिता ही उनके तुरुप का पत्ता हैं।
ठेठ बंबइया फिल्म के हीरो सलमान खान पर भी हाईकोर्ट ने जिस तेजी से फैसला सुनाया वह कॉमन मैन के गले नहीं पच पाया। उनपर भारतीय दंड संहिता के तहत जो धाराएं लगीं थी, पक्का विश्वास है अगर वह सलमान खान नहीं होकर कोई सामान्य अपराधी रहता, तो जेल के भीतर होता। सोशल मीडिया पर चली एक बात पर यहां गौर करना समीचीन होगा। इसमें कहा गया है कि निचली अदालतों का आईक्यू लेवल इतना ही कम है जो उनका फैसला रद्द ही होना है तो उन्हें बंद ही क्यों नहीं कर दिया जाता है। वाकई वर्षों से जुटाए सबूतों और गवाहों को सुनने और मगजमारी करने के बाद जो फैसले यह निचली अदालतें देती हैं उनकी औकात ऊपर की अदालतें चंद सेकंड में बता देती हैं।
हम सलमान के मामले को थोड़ा भावनात्मक रूप से भी सोचने को विवश हैं। वह सेलिब्रेटी हैं। शराब पीकर गाड़ी चला रहे हैं। फुटपाथ पर दीनहीन-घर विहीन लोगों को कुचलते हुए निकल गए। जब उन्हें अपराध का भान हुआ, तो घायलों को अस्पताल पहुंचाने की बजाय अपने घर में दुबक गए। निचली अदालत को एक सारगर्भित प्रश्न यह भी पूछना था कि अगर सलमान खान निर्दोष थे, वह कार नहीं चला रहे थे तो दुर्घटना के बाद वह भागे क्यों। क्या उनमें इतनी भी संवेदना नहीं थी कि उनकी कार से एक्सीडेंट हो गया है और और वह घायलों की खोज-खबर लेने की बजाय भागकर अपने घर जाना उचित समझा। बाद में जब उन्होंने मृतकों और घायलों की सहायता भी की तो व इतनी कम थी वह इलाज में ही चुक गई। एक्सीडेंट में अधिकांश अपंग हुए लोग किसी काम के नहीं रह गए हैं। उनके लिए इतनी तो व्यवस्था वह कर ही सकते हैं जिससे कि जिंदगी कट सके। बाद में कोर्ट को मानवीय कार्यों में लगे रहने का हवाला देना मात्र दिखावा ही है। वह हंसने के तर्क के अलावा कुछ और सोचने को विवश नहीं करता है। कहते हैं, ईश्वर-अल्लाह के घर देर है, अंधेर नहीं। पर प्रश्न यह भी है कि जब वही नियामक हैं तो यह अदालत किस लिए!

(लेखक-परिचय:
जन्म : 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति : दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )


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बुधवार, 1 अप्रैल 2015

सिरफुटौव्वल आपको मुबारक

ईमानदारी रखें बरक़रार आप 

कहां गए वे दिन।  फोटो : रायटर (गूगल महाराज का सौजन्य )








भवप्रीतानंद की क़लम से
कुछ विद्वान लोग जब आपस में ऐसे लड़ते हैं कि बच्चों की लड़ाई फीकी लगने लगे, तो सिर्फ और सिर्फ यही कहने का मन करता है कि आप लड़े, नो प्राब्लम। पर दिल्ली की जनता ने जिस ध्येय से आपको ऐतिहासिक जनमत विधानसभा में दिया है उसका सम्मान कीजिए। अभी के झिझिर कोना, झिझिर कोना, कोन कोना, के खेल में उस ईमानदारी को मत तिरोहित होने दीजिए जिसके लिए अरविंद केजरीवाल  आपको ६७ सीटें दी गई हैं।
जो वर्चस्व की लड़ाई आम आदमी पार्टी में जारी है उसमें सबके के निजी हित जुड़े हुए हैं। बिना किसी लाग लपेट के कहा जाए तो अभी आम आदमी पार्टी के असली हीरो अरविंद केजरीवाल ही हैं। उन्हीं को दिल्ली की जनता ने वोट दिया है। तमाम भीतरी विरोधियों की साजिश के बाद भी, जिसका उन्होंने २८ मार्च को पार्टी की हंगामेदार सभा में जिक्र किया था, दिल्ली की जनता ने उन्हें हीरो बनाया था। इस बहुमत को देखकर उनके मुंह से भी निकला था अरे बाप रे बाप। अभी यह देखना उतना अहम नहीं है कि अरविंद केजरीवाल सत्ता लोलुप हैं कि नहीं, देखना यह जरूरी है कि जो लेटर बम, जो स्ंिटग, जो नितांत निजी एसएमएस को मीडिया के सामने रख रहे हैं उनकी मंशा क्या है। अरविंद केजरीवाल की महात्वाकांक्षा को जानना इसलिए  गौण विषय-वस्तु की श्रेणी में आता है कि उन्हें तो जनता ने हीरो बनाया है। जनता अपने हीरो को जहां बिठाना चाहती थी बिठा दिया। इसके लिए  उन्हें पांच  वर्ष का समय भी दिया है। आज अगर अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री का पद छोड़कर पार्टी के किसी दूसरे नेता को यह जिम्मेदारी दे देते हैं तो उनकी छवि पार्टी में तो निखर जाएगी पर जनता इस स्टेप को कितना पचा पाएगी यह कहना मुश्किल है।

गौर करें तो पार्टी अभी अनकमांड की स्थिति में है। इसमें डेकोरम का घोर अभाव है। इसमें जितने भी उच्च पदों पर लोग हैं वह सुबह उठते ही मीडिया की माइक चाहते हैं और सोने से पहले मीडिया को ब्रीफ कर सोना चाहते हैं। योगेंद्र यादव या फिर प्रशांत भूषण या फिर और और महानुभाव को जो पद आम आदमी पार्टी में दिया गया था, उसके साथ उन्होंने कभी न्याय नहीं किया। उन्हें कोई सूचना मिलती तो वह पार्टी के भीतर बहस के बजाय मीडिया को बताना उचित समझते हैं। मीडिया से ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी को पता लगत पाता है कि पार्टी में कितना कुछ घट चुका है। अपने यहां, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उस टीनएज के दौर से गुजर रही है जहां वह अपवाह और हकीकत में फर्क नहीं कर पाती है। अपवाह को भी हकीकत की श्रेणी में लेकर शाम सात से लेकर नौ तक सभी चैनल विद्वानों के कोलाहलों से त्रस्त रहते हंै। और आप के स्वनामधन्य नेतागणों की मीडिया को लेकर लार टपकाने वाली प्रवृति अभी कम नहीं हुई है। इसका कारण एक यह भी हो सकता है कि इसमें कई विद्वान ऐसे हैं जो वर्षों वर्ष तक मीडिया में लिखते-दिखते रहे हैं। उन्हें लगता है कि पार्टी की जरूरी सूचना पार्टी के अंदर देने के बजाय पहले  मीडिया को पकड़ा दिया जाए। फिर हो हल्ला शुरू। मार्च का करीब आधा पखवाड़ा आम आदमी पार्टी के मूर्खताभरे बयानों से त्रस्त रहा है। उन्होंने ऐसा कहा, तो फलाने ने वैसा किया।

पार्टी के मुखिया होने के नाते केजरीवाल को इन सब चीजों पर कड़ाई से स्टेप उठाने के दिन आ गए है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते हैं तो चीजें उनके हाथ से निकल जाएंगी। हालांकि उन्होंने २९ मार्च को आपात बैठक बुलाकर  अनुशासन समिति और लोकपाल कमेटी को लगभग पूरी तरह से बदल दिया है। पर ध्यान इसपर भी देना चाहिए कि जिन्हें यह जिम्मेदारी दी गई है वह पार्टी के दायित्वों और मीडिया ब्रीफ के तकनीकी पक्ष से पूरी तरह से वाकिफ हों। दूसरे शब्दों  में कहा जाए तो उनमें वह स्वनामधन्यता नहीं हो जिसके कारण वे सूचनाओं को पार्टी प्रमुख तक पहुंचाने में अपना हेठी समझते हों।

इच्छा-महात्वाकांक्षा किसमें नहीं होती। जिसमें नहीं होता है वह रचनाहीन व्यक्ति होता है। राजनीति में आने से पहले अरविंद केजरीवाल एक दशक से अधिक समय तक आईआरएस थे। प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते उन्होंने कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया जिसका कि जिक्र यहां पर किया जाए। एक दूसरे आम प्रशासनिक ऑफिसर की तरह वह भी थे। पर जो बातें गौर करने लायक है वह है कि इस दौरान उन्होंने ऐसा भी कुछ नहीं किया जो उनपर कीचड़ उछले। उनकी ईमानदारी पर बट्टा लगे। पर उन्होंने एक बहादुरी भरा कदम तो उठाया ही। राजनीति में आने का। जन आंदोलन से जुडऩे का।  उसमें वह धीरे-धीरे सफल भी हुए और अपनी ऐसी पर्सनैलिटी बनाई कि कम-से-कम दिल्ली की जनता के तो दीवाने बन ही गए। साथ में एक सुचिता भरी राजनीति का वादा भी किया है जो अब तक तो  कायम है। आगे का नहीं जानता। सिरफुटौव्वल के खेल में भी अभी तक किसी ने यह नहीं कहा है कि आप के फलां नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। या फिर जनता के पैसा का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं।

आम आदमी के लिए अभी सबसे अहम यही हो सकता है कि वह लंबे  समय तक बयानबाजी करने वाली पार्टी नहीं बने। या सिर्फ बयानबाजी करने वाली पार्टी बनकर न रह जाए। मीडिया को लेकर अतिरिक्त आग्रह को कम करने की जरूरत है। पार्टी को ठोस रूप में यह बराबर बताते  रहना चाहिए कि दिल्ली की जनता से जो उन्होंने वादा किया था उसमें क्या-क्या पूरा हो गया है और किस पर काम चल रहा है। यह इसलिए भी जरूरी है कि लोगों तक सिर्फ एकतरफा संदेश नहीं जाना चाहिए।
एक पखवाड़े से जारी इस खेल का सबसे दुखद पहलू यह है कि पार्टी से मेधा पाटेकर ने नाता तोड़ लिया। मेधा पाटेकर ने गत  लोकसभा चुनाव लड़ा  था  और उन्होंने बहुत अच्छे मत प्राप्त किए थे। भारतीय राजनीति को अभी ऐसे-ऐसे प्रतिभावान लोगों की आवश्यकता है जिनके पास कुछ करने का विजन है। कुछ करने की ईमानदार कोशिश उनमें बची है। मेधा पाटेकर को थोड़ा धैय रखना चाहिए था। वर्चस्व की इस लड़ाई को चुपचाप देखते रहने देना चाहिए था। राजनीति में जो चीज मीडिया में खूब चर्चा का  विषय बनती है, इतिहास के कई प्रमाण गवाह हैं, वक्त के साथ उनके साथ कोई नहीं रहता है। ताजा प्रमाण बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का है। इसलिए मेधा पाटेकर को धैर्य रखना चाहिए था। अरविंद केजरीवाल चाहें तो उन्हें मनाकर वापस ला सकते हैं। इसके लिए दरियादिली और बड़कपन दिखाने की जरूरत है। क्योंकि मेधा पाटेकर की कार्य क्षमता और उनकी दूर दृष्टि का इस्तेमाल व्यापक हित में किया जा सकता है।
शुरू-शुरू में केजरीवाल भी खूब मीडिया फ्रेंडली थे। दूसरी बार सत्ता में आने के बाद उन्हें समझ में आने लगा कि क्या कहना सही होगा और क्या कहने का संदेश गलत जाएगा। इसलिए दूसरी बार शपथ लेने के बाद उन्होंने मीडिया के बचकाने स्वरूप का जिक्र करते हुए चुटकी भी ली थी। आप को भी अपने बचकाने  स्वरूप की छवि को तोडऩा होगा। विद्वान और पढ़ेलिखे लोग राजनीति में जरूर आएं, यह समय-समाज की मांग है। पर राजनीति का जो शास्त्र होता है वह भी तरीके से ओढ़ें, यह नितांत जरूरी होता है।


(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )

हमज़बान पर पढ़ें  भवप्रीतानंद को
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रविवार, 8 मार्च 2015

कांग्रेस : भक्ति नहीं, शक्ति बटोरना जरूरी

राहुल उर्फ़ शहज़ादे के नाम वाया गांधी कुंबा 


चित्र: गूगल बाबा के सौजन्य से






 

भवप्रीतानंद की क़लम से
यह कोई पहला मौका नहीं था कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी कहीं गायब हो गए थे। वह कहां गायब हुए, इसका कोई अनुमान पार्टी के लोगों को नहीं था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से किसी के पूछने की हिम्मत नहीं थी। कई कांग्रेसी तो इस पचड़े में पडऩा भी नहीं चाहते होंगे कि  राहुल गांधी कहां हैं और क्या कर रहे हैं। पर चूंकि  पार्टी में वह बहुत ऊंचे पद पर हैं इसलिए उनका न दिखना नोटिस में आता-जाता रहता है। पार्टी में यह रुतबा तब ही होता है जब उनके मौन या मुखर होने से चीजें प्रभावित होती हैं।
राहुल गांधी भविष्य में कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। क्योंकि पार्टी की गतिविधियां लोकसभा चुनाव के बाद भी गांधी परिवार के गिर्द घूम रही है। हालांकि कुछ कांग्रेसी स्पष्ट रूप से या इशारों से गांधी परिवार के गिर्द रहने की आलोचना करते रहते हैं। लोकसभा चुनाव में हार के बाद से वैसे कांग्रेसी नेता को थोड़ा बल मिला है जो कांग्रेस को गांधी परिवार से इतर भी देखना चाहते हैं। पर यह भी सच है कि ऐसे नेताओं की कोई बहुत बड़ी फौज कांग्रेस में नहीं है जो इतर देखने की दृष्टि को मजबूती प्रदान करे। इसलिए यह पानी के बुलबुले की तरह फूलते हैं, फटते हैं और तिरोहित हो जाते हैं।
क्या राहुल गांधी खुद को अध्यक्ष पद पर रखते हुए कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र को वापस ला सकते हैं। दूसरा, क्या कांग्रसे के वरिष्ठ और सामान्य सदस्य राहुल गांधी को आत्मसात कर पाएंगे। दूसरा प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है कि चुनाव में अब कांग्रेस की भी औकात बताने की परंपरा की शुरुआत गत लोकसभा चुनाव से हो चुकी है। मतलब अब लोग कांग्रेस को गांधी परिवार से इतर भी देखना चाहते हैं। यह चीज अगर कांग्रेस को चाहने वाले वोटरों में आई है तो बिल्कुल नई है जिसे गांधी परिवार को समझ लेना चाहिए। पर जैसा कि जाहिर है गांधी परिवार के प्रति भक्ति का पैरामीटर कांग्रेस में कम नहीं है। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सोनिया गांधी मान जाती हैं तो कांग्रेस में एक मत से उन्हें अध्यक्ष मनोनीत कर लिया जाएगा, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए। यह मतेक्य वह शुरुआत है जहां से पूजन की राजनीति शुरू होती है।
कांग्रेस में अब तक जो ट्रेंड है उसके हिसाब से देखा जाए तो पार्टी में लोकतंत्र की बात गांधी परिवार के बाद शुरू होती है। गांधी परिवार खुद भी यही चाहता है कि लोकतंत्र की बात उनके बाद से शुरू हो। गांधी परिवार एक वीटो की तरह कहीं भी हस्तक्षेप कर लोकतांत्रिक स्थिति को पलट देते हैं और सब चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं- इसे हम ट्रेडमार्क कांग्रेसी ट्रेंड कहते हैं। सत्ता में रहते हुए बीते दस साल में परदे के पीछे से सत्ता चलती रही। कई बार ऐसे आरोप लगे पर कभी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्थितियों को स्पष्ट करना जरूरी नहीं समझा। जब उनसे प्रेशर देकर कोई काम करवाया गया तो एक कांग्रेसी सिपाही, गांधी परिवार के भक्त की तरह वह काम करते रहे। उनका व्यक्तित्व भी उनके आड़े नहीं आया।
इस ट्रेंड से सत्ता में भ्रष्टाचार, कालाबाजारी को इस हद तक प्रश्रय मिला कि वह जब तक पानी सिर के ऊपर से नहीं गुजर गया तक तक उसे सहते रहे और वोटरों में क्रोध वृद्धि करते रहे। कांग्रेस का शीर्ष तंत्र पारदर्शिता रखने में पूरी तरह नाकामयाब रहा। बड़ी संख्या में भ्रष्टाचार के मामले उजागर हुए और पूरा तंत्र उसे बचाने में लगा रहा। यह सब सिर्फ इसलिए हो सका क्योंकि जो ऐसा कर रहे थे वह गांधी परिवार के बहुत नजदीकी थे और उनपर कोई एक्शन नहीं लिया जा सकता था। लालू यादव ने भी राबड़ी देवी को सत्ता में रखकर ऐसे ही शासन किया था।
पर अब २०१४ के चुनाव के बाद से भारतीय लोकतंत्र में वोटरों का ट्रेंड बदल गया है। लोकसभा चुनाव और उसके बाद कई विधानसभा चुनावों में इसे देखा जा सकता है। कांग्रेस को उस ट्रेंड में फिट होना होगा। उनका पारदर्शी होना बहुत जरूरी है। अगर पारदर्शी नहीं होंगे तो दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों की तरह नामलेवा भी कोई नहीं रह जाएगा। राहुल गांधी की राजनीति को देखकर यही लगता रहता है कि उसके साथ वोटरों का कोई आंतरिक जुड़ाव नहीं है। अगर वह कांग्रेस के अध्यक्ष बनते हैं तो उन्हें सबसे पहले वोटरों के ट्रेंड को समझना होगा। करीब सालभर पहले लोकसभा चुनाव में वोटर भाजपा को सिर-आंखों पर बिठाती है। फिर सालभर में उपजी ठोस और तरल असहमतियों के कारण दिल्ली  विधानसभा चुनाव में धूल चटा देती है। झारखंड में भी आजसू साथ नहीं होता तो बहुमत के आंकड़े से पांच-छह सीटें कम ही मिलती।
अब वह दिन आ गया है जब हर पार्टी के शीर्ष को अपनी अहंकारी और भक्ति-पूजन की गतिविधियों से निजात पाना होगा। चाहे उसके लिए उन्हें खुद की बलि ही क्यों ने देनी पड़ी। वैसे भी वोटर अब फर्श को अर्श और अर्श को फर्श पर करना जान गए हैं। आपकी पारदर्शिता और संवेदनशीलता ही सत्ता देगी या सत्ता से उतारेगी। राहुल गांधी युवा हैं। वह खुद से इस तरह की शुरुआत कर कांग्रेस की पुरानी और प्रतिष्ठित पार्टी में मिसाल कायम कर सकते हैं। वह इस सोच को भी धराशायी कर सकते हैं कि कांग्रेस में गांधी परिवार के बाद लोकतंत्र शुरू होता है। कांग्रेस के लिए गत हार एक सबक और आत्मावलोकन साबित हो सकता है अगर वह अंधभक्ति और उससे उपजी कई विपरीत परिस्थितियों पर विजय पा ले। भाजपा से अब मात्र उसे सांप्रदायिक पार्टी कहकर लड़ाई नहीं की जा सकती है। यह विषय इसलिए स्थूल हो गया है कि भाजपा शासित राज्यों में वर्षों से ऐसी परिस्थितियां नहीं उपजी जहां उसे सिर्फ सांप्रदायिक सोच वाली पार्टी करार कर वोट लिया जा सके। एमपी, छत्तीसगढ़, गुजरात आदि राज्यों में तो भाजपा ने काम के बल पर वोट मांगे और उन्हें मिला। काम के बल पर वोट मांगने वाली स्थिति किसी भी कांग्रेस शासित राज्यों में कहां दिखी। अगले महीने अखिल  भारतीय कांग्रेस कमेटी का सम्मेलन है। पांच राज्यों में कांग्रेस के नए अध्यक्षों की नियुक्ति की जा चुकी है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी की सहमति के बाद ही इन अध्यक्षों की नियुक्ति हुई है। आगामी सम्मेलन में राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की हवा भी बन रही है। ऐसी स्थिति में अगर आंतरिक लोकतंत्र और उसकी सुचिता पर बात की जाती है तो कांग्रेस को इसके दूरगामी लाभ मिल सकते हैं।
यह सर्वविदित है कि परिवारवाद और हारने के बाद उसकी भक्ति से मुंह नहीं मोडऩे का ट्रेंड सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं है। मायावती, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, करुणानिधि, जयललिता, लालू यादव आदि राजनीति में ऐसे नेता हैं जो सिर्फ और सिर्फ अपने पास सत्ता रखना पसंद करते हैं। हारने के बाद भी वह जिम्मेदारी लेकर पार्टी के शीर्ष पद से इस्तीफा नहीं देते हैं। घोटालों में भी फंसते हैं तो अपनी बहू-बेटियों या फिर सबसे नजदीकी भक्त को सत्ता देते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वह शीर्ष पर नहीं रहे तो पार्टी बिखर जाएगी ओर सत्ता के कई कें्रद बन जाएंगे। पर वोटर परिवारवाद की इस परिपाटी की अतियों से बुरी तरह नाराज है। समय रहते अगर पार्टियों ने मुक्ति पाने की ईमानदार कोशिश नहीं की तो कांग्रेस वाला परिणाम उन्हें भी भुगतना पड़ेगा। फिलहाल कांगे्रस के शहजादे राहुल गांधी को भगवान सदबुद्धि दे कि राजनीति को तार्किक नजरिए से देख सकें।







 







(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )

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बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

किसको राहत देती हैं संघ की बातें

चित्र: गूगल से साभार

हमारी अतियों से माहौल और बिगड़ेगा ही
 
भवप्रीतानंद की क़लम से
आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने जब हिंदू महिलाओं को कितने बच्चे जन्म दें के मुद्दे पर बीजेपी के कुछ सांसदों को अघोषित रूप से फटकार लगाई थी तो यह भान स्वभाविक था कि चीजों को तार्किक नजरिए से देखने की कोशिश की जा रही है। उसी के आसपास दिल्ली में चर्चों पर हुए हमलों के विरोध में पीएम नरेंद्र मोदी की स्पष्ट टिप्पणी भरोसा जगाने वाली लगी थी। पर पता नहीं क्यों बार-बार कुछ मुद्दों पर, जिसपर बोलने की आवश्यकता नहीं है और जिसका कोई तार्किक आधार हम प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं उसपर कुछ बेतुका बोल दिया जाता है। मदर टेरेसा में मन में लोगों को  ईसाई बनाने की भी मंशा थी, इसे पुष्ट करने के लिए हमारे पास कोई तथ्यात्मक सबूत नहीं है। खुद मोहन भागवत  के पास ऐसा कोई सबूत हो तो वे बताएं, और साबित करें। बाद में जब मीडिया में ऐसे बयान मुद्दे के रूप में व्याख्यायित होते हैं तो सफाई दी जाती है कि बयान को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। यही सफाई बोलते  वक्त ध्यान में रखी जाए तो ऐसी नौबत ही नहीं आएगी। इससे होता कुछ नहीं है पर ऐसे-ऐसे वक्तव्यों को एक तार में जोड़कर यह साबित करने का  प्रयास किया जाता है कि आरएसएस की सोच इससे आगे बढ़ी ही नहीं है। अगर किसी पार्टी या संगठन में समस्या समाधान करने की सम्यक सोच है तो वह कश्मीर समस्या का समाधान क्यों नहीं कर देते हैं जो सर्वमान्य हो। बार-बार उन चीजों को कुरेद कर जिसका कोई इतिहास हमारे पास उपलब्ध नहीं है, उसपर बयानबाजी से क्या होगा।

जब मुसलामानों और ईसाइयों के लिए घर वापसी वाला बेतुका शोर वातावरण में घुल रहा है तो मोहन भागवत को यह स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि हिंदू धर्म में वह मुसलमान और ईसाई बने हिंदुओं को वापस लाकर ब्रह्मण का दर्जा देंगे। क्योंकि वह भागे ही इसलिए थे कि उन्हें हिंदू धर्म की अतियां जीने नहीं दे रही थीं। लतमारा की श्रेणी में रखे हुई थी। मैला ढुलवाती थी। गांव के अंतिम छोर पर उसके रहने के लिए झुग्गी मुकर्रर थी। उसकी छाया तक ब्रह्मण-राजपूत अपनी जमीन में पडऩे नहीं देता था। कोई भी हिंदुवादी संगठन खुलकर, इतिहास को ठीक से पढ़कर बताए कि किसी देशकाल में बड़ी संख्या में ब्रह्मण और राजपूतों ने धर्म परिवर्तन किए हैं।
सत्ताधारी पार्टी भाजपा के लिए यह सतत प्रक्रिया की तरह हो जााएगा कि कोई संघी जबतब कुछ बोल देगा और केंद्र सरकार यह कहकर किनारा करते रहेगी कि इस वक्तव्य का सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। आप से दिल्ली में करारी हार के बाद प्रधानमंत्री चर्चों के हमले पर बोलने के लिए मजबूर हुए नहीं तो शायद ही उनसे इस तरह की भाषा की अपेक्षा थी।  पता नहीं अपनी इस भाषा पर वह कालांतर में कायम रह भी पाएंगे या नहीं। मीडिया से वह जिस तरह की दूरियां बनाकर रखते हैं, वह चीजों को भड़काउ बनने का वक्त दे देती हैं। गुजरात के गोधरा कांड के बाद जो उन्होंने मीडिया से परहेज किया वह पीएम बनने तक जारी है। यह बहुत खतरनाक इस मायने में  है कि राष्ट्रीय स्तर के संवेदनशील मुद्दों पर प्रधानमंत्री का वक्तव्य ही मायने रखता है, क्योंकि उसे ही पार्टी लाइन कहा जाता है।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी बहुत कम लाइम लाइट में दिखते हैं। जरूरी होने पर ही बोलते और दिखते हैं। लेकिन उनका मन भी संघी आग्रह  कहां छोड़ पाता। एक आरोपी बलात्कारी आसाराम बापू को वह पूज्य संत कहने में एक जरा हिचक महसूस नहीं करते हैं तो शक होता है कि सत्ता के इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठे लोग क्या देश की संप्रभुतता से न्याय कर पाएंगे। उसकी विविध सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रख पाएंगे। 

अभी तो सत्ता के एक साल भी पूरे नहीं हुए हैं। ऐसी नकारात्मक चीजों से उन तत्वों को बढ़ावा ही मिलेगा जो दंगे करने में या फिर अराजक स्थिति पैदा करने में सहायक होते हैं। कांग्रेस ने भ्रष्टाचार में जिस तरह से अराजकता की स्थिति पैदा कर दी थी, वैसी ही स्थिति भाजपा के शासनकाल में समाज के स्तर पर बलवती होंगी तो इसके कई खतरनाक परिणाम हमें भुगतने पड़ेंगे। आरएसएस की धर्म से जुड़ी बयानबाजी में वह तत्व निराधार रूप से संपुष्ट होते रहते हैं कि मैं इस देश का असली वारिस, बाकी सब बाहरी। बाहरी को अगर रहना है तो मैंने जो तय किया उसके तहत रहो।
किसी को कोई शक नहीं पालना चाहिए, कांग्रेस की दुर्गति का मुख्य कारण है कि वह भ्रष्टाचारी और कालाबाजारी पर मजबूती से काबू नहीं रख पाई। उसने सत्ता को बेजा इस्तेमाल होने दिया। मनमोहन सिंह को कठपुतली की स्थिति में ला दिया। लगातार दस वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद अगर भ्रष्टाचारी और कालाबाजारी पर अंकुश लगा लिया गया होता तो देश की प्रगति की रफ्तार दूनी तो निश्चित ही होती। भाजपा के शासन का मूल्यांकन जल्दबाजी होगी, क्योंकि अभी एक वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं, पर एक जिस मोर्चे पर अभी से वह कमजोर दिखाई दे रही है वह है उसका संघ से, उसके विचारों से लाग-लपेट। बार-बार संघ की ओर से और पार्टी की ओर से इस मद्देनजर सफाई दी जाती है कि दोनों एक-दूसरे के कार्यों में दखल नहीं देते हैं। पर जब बिना लगाम की बातें निकलती हैं तो समाज में उसके बहुत अच्छे अर्थ नहीं जाते। और जब कोई एक ही प्रकृति की चीजें बार-बार होती रहती हैं तो वह कई मुश्किलें खड़ी करती हैं। कें्रद के लिए यह स्थिति असमंजसपूर्ण होती है। मेक इन इंडिया को यह सफाई देनी पड़ी है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी से उनका कोई लेनादेना नहीं है। कल को गृहमंत्री जी भी सफाई देंगे।

अब जिला स्तर पर, राज्य के स्तर पर होने वाले हिंदू सम्मेलन को अधिक मीडिया कवरेज इसलिए मिलेगा क्योंकि भाजपा सत्ता में है। सम्मेलन करने में कोई गड़बड़ी नहीं है। पर वहां से कोई ऐसी  बात निकलकर समाज के आखिरी छोर तक नहीं पहुंचनी चाहिए जो बेवजह लोगों को उत्तेजित करती है। कोई भी धर्म, मथकर ही दुरुस्त और तार्किक होता है। विशुद्ध आस्था को भी तार्किकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए, नहीं तो मुश्किलें पैदा होती हैं। इराक में आईएस की गतिविधियां इस्लाम की व्याख्या नहीं है। इस्लाम के नाम पर वह रोटी इसलिए सेंक पा रहे हैं कि चीजें सामाजिक स्तर पर बहुत विद्रूप रूप में पहुंची और लोगों को उत्तेजित करती गईं। और अब वह काबू से बाहर हो गईं हैं। किसी को जला देना, किसी को काट देना, मौत की सजा देने से पहले यह पूछना कि आपको मौत से पहले कैसा महसूस हो रहा है आदि जघन्यतम स्थितियां कोई एक दिन की उपज नहीं है। विद्रूप चीजों और विचारों के हावी होने और समाज में उसके  व्यवस्थित रूप ले लेने का कारण यह नासूर पैदा हुआ। हमें इससे बचना है किसी भी कीमत पर। फरवरी-मार्च के इस मौसम में अभी फुलवारी में एक साथ कई फूल खिले होंगे,  अपना-अपना स्पेस लेकर। हमें विचारों को स्पेस देना होगा। ऊंचे पद पर बैठे लोगों को न तो लट्ठमार भाषा शोभा देती है और न ही लट्ठमार स्वभाव।

 













(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )

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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

के होतई बिहार के मांझी

चित्र: गूगल से साभार



 
बिहार के सुशासन को चुनौती देते कुछ तत्व
भवप्रीतानंद की क़लम से
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी को अपना नेता चुनने में कोई खास परेशानी नहीं हुई थी। दल की एकता  और गांधी परिवार की आशक्ति ने एकमत से राजीव गांधी को नेता चुन लिया। लालू यादव के लिए भी चारा घोटाला में फंसने के बाद मुख्यमंत्री के पद पर बने रहना असंभव हो गया था, तो पार्टी में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कोई और नहीं सूझा, पत्नी राबड़ी के अलावा। इससे न सिर्फ वह पार्टी पर कमांड रख सके, बल्कि सत्ता में भी छाया प्रशासक की भूमिका निभाते रहे। नीतीश कुमार के पास शायद ऐसा कोई नहीं था। इसलिए उन्होंने महादलित जीतनराम मांझी को चुना। नीतीश ऊपर के दोनों दोनों उदाहरण से थोड़ा  अलग इसलिए हैं कि उन्होंने सत्ता  लोकसभा में बिहार में मिली करारी हार के कारण छोड़ी थी। कमान जीतनराम मांझी को यह सोचकर दी थी, कि वह उसी कार्य परंपरा को बनाए रखेंगे, जो वह आठ वर्षों से बनाए रखे थे। इससे नीतीश ने जनता के सामने यह साबित करने का प्रयास किया कि हार के बाद उन्होंने सत्ता में बने रहने का आधिकार खो दिया है।
आम आदमी पार्टी फिर से जब दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई है, तो पार्टियों को दो खेमे में बांटकर देखने का चलन शुरू हुआ है। एक परंपरागत पार्टी का खेमा बना है जो वर्षों से राजनीति कर रहा है और नाम अलग-अलग  होने के बाद भी चारित्रिक रूप से दोनों एक हैं। मतलब दोनों में दागी नेताओं  की कमी नहीं है। दोनों के पास काले धन हैं। सत्ता में जो रहता है, वह इन दागी नेताओं से परहेज नहीं करता है। या फिर सत्ता में रहकर भी जो अलोकतांत्रिक फैसले लेता से उसपर तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, जब तक की पानी सिर के ऊपर ने न गुजर जाए।

इन्हीं परंपरागत राजनीतिक  दलों में से कई नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने विकास को एक नया आयाम दिया है। ओडिशा, छत्तीसगढ़, एमपी में वर्षों से परंपरागत पार्टी के नेताओं ने लीक से हटकर काम करके दिखाया, तो लोग उन्हें सत्ता में बनाए हुए है। बिहार के नीतीश कुमार भी ऐसे सीएम की केटगरी में देखे जाते हैं जो विकास की राजनीति करते हैं। काम के बल पर वोट मांगते हैं और जातीय गणित के जोड़-तोड़ में लिप्त रहने वाला राज्य भी उन्हें सत्ता में बनाए रखता है।

नीतीश ने भाजपा से नाता तोडऩे के बाद जो राजनीति की है, वह कई शंकाओं को जन्म देती है। लालू यादव से हाथ मिलाकर उन्होंने जातीय गणित को दुरुस्त करने की भले कोशिश की हो, पर जिस दम पर उनकी राजनीतिक  शख्सियत बनी थी, उसपर सवालिया निशान लग गया है। यह चुभने वाली बात है। जदयू और नीतीश नरेंद्र मोदी की अखिल भारतीय स्वीकृति को नहीं आत्मसात कर पाए, यह बात अपने-आप में और अपनी जगह ठीक हो सकती है। पर जदयू-शरद यादव-नीतीश कुमार इसके काट के लिए लालू यादव को गले लगाते हैं, यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है।

लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी नीतीश बिहार की सत्ता में बने रहते, तो लोगों में कोई बहुत गलत संदेश नहीं जाता। खासकर तब जब कि उन्होंने आठ वर्ष राज कर लिया था और बिहार में विकास की स्थिति को गतिशील बना दिया था। २०१५ अंत में जब वह जनता के सामने रिपोर्ट कार्ड लेकर जाते, तो शायद उनकी स्थिति भाजपा और राजद से बेहतर ही होती। पर जीतनराम मांझी के बेसुरा होने के बाद और लालू यादव को गले लगाने के बाद नीतीश उस रिपोर्ट कार्ड को बहुत अधिकार के साथ प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे, जिसे वह सुशासन कहते हैं। जीतनराम मांझी ने नीतीश की छवि सत्ता लोलुप की बना दी है। शायद इसी कारण वह जीतनराम मांझी के चुनाव को  अपनी बड़ी भूल मान रहे हैं। पर अगर बिहार की जनता विकास की राजनीति को मानक मानकर वोटे देती है तो जीतनराम मांझी से अधिक खतरनाक उनका लालू  यादव से गठबंधन वाला दांव रहेगा। लालू यादव ने सत्ता में आने के बाद से वहां बने रहने के लिए उसका जितना गलत इस्तेमाल करना था, किया था। उन्होंने बिहार में चुनाव का मखौल बनाकर रख दिया था। जिस सुशासन को नीतीश अपना गहना मानते हैं, क्या उनके साथी लालू यादव भी उसे इसी रूप में देखते हैं। यह प्रश्न इसलिए लाजिमी है क्योंकि लालू यादव को लठैती की भाषा समझ में आती है। वह चीजों को व्यवस्थित तरीके से देख ही नहीं सकते। बिहार में विकास के ग्रिप में आई जनता लालू यादव को सिरे से नकारती है। क्योंकि उन्होंने अपने कर्मों का कोई प्रायश्चित नहीं किया है। उन्होंने  कुछ ऐसा कर नहीं दिखाया है जिससे कि बिहार की जनता समझे कि चलो अब लालू यादव को सद्बुद्धि आई। ऐसी स्थिति में नीतीश का लालू के गले लगना खतरे से खाली नहीं है। क्योंकि मिलकर अगर उन्हें सत्ता मिलती है तो नीतीश के सुशासन के रथ में पहिए सुरक्षित रह भी पाएंगे-इसमें शक है।
दिल्ली में भाजपा की करारी हार के बाद जीतनराम मांझी नामक वायरस से नीतीश को आने वाले सप्ताह में मुक्ति मिल सकती है। पर मांझी के वायरस ने नीतीश को सताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। १६ फरवरी को जब हाईकोर्ट ने जीतनराम मांझी के थोक में लिए गए फैसले पर रोक लगाई तो पहली बार उनके चेहरे पर हार का डर दिखने लगा। दिल्ली में भाजपा की करारी हार के बाद से भाजपा भी बहुत उत्सुक होकर माझी के साथ नहीं चल रही है। नीतीश के दूसरी बार विधायक दल के नेता चुने जाने के बाद सत्ता पाने के लिए जो हड़बड़ाहट दिखा रहे हैं वह उनके व्यक्तित्व के इतर है। पर बात सिर्फ फिर से सीएम बन जाने की नहीं है। बात है साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव की है। वह क्या लालू यादव को साथ लेकर चुनाव जीता जा सकता है।
आप ने हर परंपरागत पार्टियों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। उसके सुशासन की परिभाषा नीतीश कुमार से भी अलग है। अगर पूरे देश की जनता ऐसे ही मानक को प्रतिमान मानकर लोगों को चुनती है तो लालू से गठबंधन नीतीश के लिए गले की फांस बन जाएगी। नीतीश जब फिर से सीएम बनेंगे तो उन्हें बहुत संभलकर कदम रखने होंगे। लालू यादव से हुए गठबंधन को अवसरवादी नहीं बताकर उसकी स्पष्टता की व्याख्या जनता के समझ प्रस्तुत करना पड़ेगा। यह चुनौती कई मायनों में अधिक जटिल है। जातीय गणित बिहार की राजनीति में अहम है। बिहार क्या पूरे देश की राजनीति में अहम है। पर लोग अब इससे परे भी देखने लगे हैं। देखने के आदी हो रहे हैं। तो राजनीति को भी उसके अनुसार बदलना होगा। राजनीति करने वाले को भी जातीय गोटी फिट करने से इतर सड़क-बिजली-पानी-शिक्षा आदि विषय-वस्तुओं पर ध्यान देना होगा। लालू यादव क्या राजनीति के इस परिवर्तन को देख-महसूस कर पा रहे हैं? नीतीश से उनका गठबंधन भी तभी सफल होगा जब विकास की राजनीति का मोर्चा उनके लिए भी जुनून का विषय बनेगा।



 









(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
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शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दिल में उतरी अरविंद की सादगी

दिल्ली में बस कुछ नहीं, आप ही आप 


चित्र: गूगल से साभार



भवप्रीतानंद की क़लम से
अरविंद केजरीवाल दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिले असाधारण बहुमत पर अचंभित हैं, और कह रहे हैं, यह बहुमत डरानेवाला है। आप कार्यकर्ताओं को चेता रहे हैं,  अधिक अहंकार मत पालो नहीं तो पांच साल बाद हमारी हालत भी भाजपा-कांग्रेस की तरह हो जाएगी। जीत के बाद यह दो बातें वही व्यक्ति कह सकता है जो चीजों को सही तरीके से देखने का आदी है। जो यह कह सकता है,  मैंने पिछली बार गलती की। मुझे दिल्ली में सरकार नहीं गिरानी चाहिए। अबकी मौका मिला तो ऐसा नहीं करूंगा। यह सादगी लोगों के दिलों में सीधे उतरती है। और उतरी भी। दिल्ली की जनता ने दिल खोलकर आप को ७० विधानसभा सीट में से ६७ सीट दे दिए।


देश में परंपरागत पार्टियों के लिए यह बहुमत सुधरकर सलीके से काम करने का संकेत दे रहा है। परंपरागत पार्टियां मतलब भाजपा और कांग्रेस को अपनी बैठकों में इस बात पर निश्चित मंथन करना चाहिए कि वह कौन-सा आंतरिक फोर्स काम कर रहा था, जो आप को लोगों ने इकतरफा वोट दे डाले। भ्रष्टाचार से मुक्ति हर आमोखास चाहता है। यह एक बहुत बड़ा मुद्दा तो है ही। दिल्ली में लोकल समस्या बिजली-पानी से जुड़ी है। इस संबंध में केजरीवाल की पिछली पचास दिनों की सरकार ने बहुत ठोस कदम उठाए थे। उस ठोस कदम का फायदा भी लोगों मिलने लगा था। इसके अलावा दिल्ली में एक प्रमुख समस्या कच्ची बस्ती की मान्यता से जुड़ी हुई है। उसके नियमन के लिए भी आप ने नीतिगत आश्वासन दिया था। ये कुछ ऐसे तत्व हैं, जो लोगों को आप के करीब ले आई। खासकर कच्ची बस्ती के नियमन से जुड़े मुद्दे ने निम्र मध्यमवर्गीय परिवार को आप के करीब ला दिया। इसके बरक्स भाजपा और कांग्रेस के वादे सिर्फ कोरे वादे ही लगते हैं। दोनों पार्टियां चुनाव के समय किए गए वादे को सत्ता मिलने के बाद लगभग भूल जाती हैं। फिर उन्हें उन लोगों की फिक्र ही नहीं रहती, जिसने उन्हें सत्ता दी है। यह जो ट्रेंड पारंपरिक पार्टियों में है, वादों से मुकरने का, इसके टूटने की दिन अब आ चुके हैं। अगर इस मिथ को इन पार्टियों ने नहीं तोड़ा तो उनका नामलेवा भी कोई नहीं रह जाएगा। जैसा कि अभी कांग्रेस की गत हुई है। लोकल मीडिया में एक जुमला खूब चला है कि भाजपा का भी यारो अजीब गम है। पहले चार कम थे...अब चार से भी कम है।
दिल्ली का विधानसभा चुनाव परिणाम है, इसलिए इसके राष्ट्रीय अर्थ भी निकाले जाते हैं। भाजपा में मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने कई चुनाव जीते हैं। दिल्ली में उन्हें मुंह की खानी पड़ी है। इसलिए कोई इसे दिल्ली  भाजपा की हार  या दिल्ली  भाजपा की रणनीतिक असफलता मानने को भी तैयार नहीं है। खासकर तब जब भाजपा ने दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के लिए हैलीकॉप्टर लेंडिंग की तरह किरण बेदी को उतारा। दिल्ली में किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर उतारने के बाद से ही भाजपा कार्यकर्ताओं में नाखुशी थी। खासकर किरण बेदी की कार्यशैली को लेकर। वह भाजपा या संघ की बातों को तवज्जो ही नहीं दे रही थीं। किरण बेदी का प्रशासनिक कार्यकलाप उन्हें राजनीति में कभी सहजता से लोगों से रूबरू नहीं होने देगा, इसे दिल्ली की चुनाव ने साफ कर दिया है। अमित शाह ने मुखमंत्री पद के लिए किरण बेदी को इसलिए प्राथमिकता दी कि वह साफ छवि की हैं। भ्रष्टाचार से मुक्ति की बात केजरीवाल के बरक्स वही करेंगी  तो दिल्ली  की जनता में अच्छा संदेश जाएगा। फिर मोदी की चार-पांच सभाएं कराकर दिल्ली के किले में भी घुस जाया जाएगा। लेकिन यह सब दांव उलट पड़े। सबसे पहले संघ और पार्टी कार्यकर्ताओं में किरण बेदी को लेकर उपेक्षा का भाव पनपा। जो ठीक चुनाव के पहले स्पष्ट रूप से दिखाई देना शुरू हो गया था। दूसरा, जो सबसे खतरनाक ट्रेंड दिखाई दिया वह यह है कि पार्टी में वर्षों समय खपाने के बाद  अगर बाहर से मुख्यमंत्री पद के लिए किसी को बिठा दिया जाता है तो पार्टी में उपेक्षा का वातावरण पसर जाता है। यही बेदी के साथ हुआ। हार के बाद उनका पहला स्टेटमेंट देखिए, मैं हारी नहीं हूं। हार के बारे में जानना है तो भाजपा से पूछो। सोचिए, जिस प्रशासनिक अधिकारी कम  नेता को आपने मुख्यमंत्री पद के लिए चुना वह पूरी पार्टी को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। भाजपा यही भूल पश्चिम बंगाल में क्रिकेटर सौरभ गांगुली को पार्टी में लाकर करना चाहती है। वो तो सौरभ ही बार-बार कन्नी काट रहे हैं। कुल मिलाकर अपने पार्टी में तपे नेता में से ही किसी एक को चुनकर उसे प्रोजेक्ट किया जाए तो अधिक अच्छा है। किरण बेदी वाला प्रयोग भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए एक सबक से कम नहीं है।
केंद्र में सत्ता में आने के बाद से भाजपा ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिसने दिल्ली चुनाव पर बुरा असर डाला है। इसमें पहला है, धर्म परिवर्तन कर घर वापसी वाली मुहिम। संघ के नेताओं को अब तो ऐसा लग रहा है,  जैसे लाइसेंस मिल गया है। कुछ सांसद तो मुंहफट हो चुके हैं। हिंदुओं को अधिक बच्चे पैदा करने के सार्वजनिक बयान ऐसे दे रहे हैं, जैसे वह उनका निजी मसला है। ऐसे बयान अगर थोक के भाव में आते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब भाजपा मूल मुद्दे से भटक जाएगी और देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा जब इस ओर इंगित करते हैं तो बुरा लगता है क्योंकि यह हमारा नितांत निजी मामला है। पर मामला निजी तभी तक रहता है, जब हम चीजों को निजी रहने देते हैं। बेलगाम होकर जहां-तहां घर वापसी के स्टेटमेंट देने से चीजों निजी नहीं रह पाएंगी। दिल्ली की जनता ने इसके विरोध में भी अपना वोट दिया है। नहीं तो दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में साक्षी महाराज ने माहौल तो बिगाड़ ही दिया था।
एक अन्य बात मोदी के पर्सनल व्यक्तित्व से जुड़ी है। वह जब सोने के तार से अपना नाम गुदवाई शेरवानी पहनते हैं और मीडिया में यह बात उछलती है कि मोदी नेदस लाख की ड्रेस पहनी है, तो इसकी कोई सार्थक छाप जनता पर नहीं जाती। मोदी से अधिक मोदी का पहनावा समाचार का विषय वस्तु बने तो इसमें भविष्य के खतरनाक संकेत  छिपे हैं। दूसरी बात, अपने विचार या किसी मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया ट्विट करने के स्थान पर पत्रकारों से मिलिए। धर्म परिवर्तन, घर वापसी ऐसे मुद्दे हैं जिसपर लोग प्रधानमंत्री की राय जानता चाहते हैं। उनकी प्रतिक्रिया से लोगों में उनसे प्यार या उपेक्षा जन्म लेगी। इस मामले में मोदी तो मनमोहन सिंह से भी आगे हैं। वह मीडिया से मिलना ही नहीं चाहते हैं। जनता को अपने सामने सरकार की स्थिति स्पष्ट ही नहीं करना चाहते हैं। हर उस मुद्दे पर, जो राष्ट्रीय स्तर पर असर डालती है उसपर मोदी की या फिर स्पोक्स पर्सन की सफाई (जवाब) आनी चाहिए। मोदी की कई मुद्दों पर अस्पष्टता ने भी दिल्ली में भाजपा के वोट काटे ही होंगे।

दिल्ली चुनाव परिणाम ने स्पष्ट संकेत दिया है जो कहो, उसे करो। जो करो उसके बारे में बताओ। जो बताओ वह तथ्यहीन नहीं हो। यानी प्रशासक और उसको चुनने वाली जनता के बीच कोई बिचौलिया नहीं हो।
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(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )
 
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