बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

2015 अलविदा खुश आमदीद 2016

गुज़रे साल का सरसरी आकलन

 



















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


उजियारा कभी, तो कभी घुप्प अंधेरा। बात जब भी होगी, तो सवेरे की होगी, क्योंकि रौशनी में हर वो चीज दिख जाती है, जिसे आप देखना चाहें या न चाहें। पिछले दिसंबर में हम 2015 का सूरज देख रहे थे। जिसके सफर के साथ हमने कई मंजिलें तय कीं। इसमें सियासत की कलाबाजियां थीं, तो विकास का दौड़ता रथ भी। जगह-जगह बनते खून के बादल थे, तो उस बारिश से बचने के लिए गंगा-जमनी संस्कृति की बरसों पुरानी हमारे पास छतरी भी थी। माइक से जगह-जगह असिहष्णुता के प्रचारक थे, तो मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना गाने वाली टोलियां भी थीं। इनमें कलमकार थे, तो फनकार भी। कल-कारखानों के मजदूर थे, तो आम अवाम भी। इस दौरान मुल्क की करीब सभी जबानों में लाखों किताबें आईं। उनमें इतिहास, भूगोल, समाज और साहित्य समेत कई अनछुए विषय हमारे सामने आए। राष्ट्रीय और अंतररराष्ट्रीय इनामों से लेखकों और शायरों को नवाजा गया। लेकिन कहीं-कहीं सांप्रदायिकता की आग की लपटों ने उनके संवेदनशील मन को प्रभावित किया। कईयों ने भावुकता में आकर बरसों पहले मिले इनामों-एकराम को लौटाने का एलान किया। वहीं असिहष्णुता के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन हुए। यह दिगर है कि इसमें नामवर न हुए। न कोई मनव्वर हो सका। रानाई अपनी जगह कायम रही। इसका असर यह हुआ कि सरकार को भी सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़े कदम उठाने पड़े। हालांकि इसमें मुल्क की इल्मो-मोहब्ब्त का कंट्रीब्यूशन सबसे ज्यादा रहा।


बिस्मिल अजीमाबादी की मशहूर गजल सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, की नेक नियत आजादी की जंग के वक्त हर हिंदुस्तानी के दिल में जोर मारा करती थी। इसमें उर्दू के सहाफी और अखबार भी थे। लेकिन आज उर्दू सहाफियों की हालत बदतर है। हालांकि रोजनामों और हफ्तारोजा अखबारों की कमी नहीं। पर उसमें खूनजिगर एक करने वाले परेशान हाल हैं। इस साल उर्दू पत्रकारों ने कई शहरों में कॉन्फ्रेंस और सेमिनार कर अपने दर्द को सरेआम किया।

इधर, दिल्ली से लकर रांची और पटना तक कई बुक फेयर लगे। जो मुल्क में तहजीबी और अदबी फिजा बरकरार रखने के बायस बने। तालीमी बेदारी का कारवां भी स्कूली बच्चो से लेकर युनिवर्सीटियों में लोगों के जेहन का मरकज बना। डिजिटल इंडिया की चमक गांवों में भी इस साल पहुंची। राजस्थान के रेगिस्तान हों या झारखंड के सारंडा। नौजवानों में इल्मो-हुनर की हरियाली फैली। वहीं वजीरेआजम नरेंद्र मोदी के सफाई मिशन का सिला यह हुआ कि लोग सड़कों पर कूड़ा-कचरा फेंकने से परहेज करने लगे हैं। शहर की स्लम बस्तियों और गांवों में हाजत के लिए अब औरतों और बुजुर्गों को झाड़ या पेड़ के झुरमुटों या सूरज ढलने का इंतजार खत्म हुआ। सरकार ने जगह-जगह पब्लिक टॉयलेट बनवाने शुरू किए हैं। औरतों के लिए बैंकों में खाते खुलवाए जा रहे हैं, यह कदम भी आने वाले दिनों में सुनहरी सुबह की तरफ गामजन होगा। औरतों को लकर मर्दों का नजरिया आज भी दकियानूसी है। वजह जो भी रही हो, उनका जिस्मानी इस्तहसाल खूब बढ़ा। रेप की खबरें साल भर सुर्खिंयां बनती रहीं। लेकिन जाते-जाते 2015 ने इस सिलसिले में सख्त कानून दे दिए। अब ऐसे मामले में 16 साल तक की उम्र सजा के लिए तय कर दी गई। साल की खुशखबर यह भी रही कि भारत के मंगलयान का सफर जारी है ही, चंद्रयान 2 को भी कामयाबी मिली। सेमी बुलेट ट्रेन का ट्रायल हुआ, कामयाब रहा। कुछ बड़े शहरों में ग्रीन कॉरीडोर जैसी पहल मरीजों के लिए ऑक्सीजन बनी। दरअसल इमरजेंसी केसों में मरीजों को वक्त पर अस्पताल पहुंचाने में अक्सर रोड की रश ट्रैफिक जानलेवा होती है। लेकिन कुछ शहरों में एक सायरन के बाद लोगों ने एंबुलेंस को जाने के लिए ट्रैप्िक रोकने की शुरुआत की। इससे कई लोगों की जानें बचीं। कई खतरनाक ऑपरेशन वक्त पर हो सके।


हालांकि गुजरे साल में ऐसी शख्यियतें भी हमसे बिछुड़ गईं। जिनका होना, हिंदुस्तानियत की शिनाख्त थी। डॉ. अबुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम जिन्हें मिसाइल मैन का लकब मिला, नहीं रहे। वे मुल्क के सदर भी रहे। लेकिन अवामी सदर के नाते उन्हें शोहरत मिली। वहीं आम आदमी को पहचान देने वाले और कॉमनमैन को हीरो बनाने वाले कार्टूनिस्ट रसिपुरम कृष्णस्वामी अय्यर लक्ष्मण (आर.के. लक्ष्मण) साल की शुरुआत में ही हमसे जुदा हो गए। उनके कार्टून ने भारत की दुनिया में अलग पहचान बनाई। आम इंसान की बात चली है, तो मदर टेरेसा का जिक्र जरूरी समझता हूं। उनके ही गरीब-मजदूर बेसहारा बच्चों को सहारा देने वाली मिशनरीज ऑफ चैरिटी की चीफ सिस्टर निर्मला जोशी का इंतकाल भी इसी साल हो गया। आउटलुक के बानी शोहरतयाफ्ता सहाफी विनोद मेहता की रहलत भी मुल्क की अमनो-सलामती में एक झटका की मानिंद है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी रहे अमीर--शरीअत मौलाना सैयद निजामुद्दीन भी आखिरी सफर पर कूच कर गए। उनकी कमी बरसों तक उनके चाहने वाले महसूस करते रहेंगे।


सड़क और रेल हादसों में कई जानें हलाक हुईं। लेकिन आइंदा इनमें कमी आए इसके लिए सरकार ने कई प्लान बनाए। अब रेलवे एक तयशुदा अवकात के साथ जीरो हादसा मिशन शुरू करेगा।इसका मकसद हादसों को टालना और मौतों की तादाद को रोकना है। इसके लिए रेलवे को हाइटेक किया जाएगा। इन खुशनुमा खबरों के दरम्यान कइ्र सूबों में कुर्सियां बदलती रहीं, सुबह-शाम जलसे-जुलूस होते रहे। आम आदमी लुटता रहा, खास जेबें भरती रहीं। हाईवे बने, तो कई सड़कें गउ़ढों में तब्दील भी हुईं। कारों ने कहीं फर्राटे भरे, तो कहीं गाड़ियां रह-रहकर उछलती भी रहीं। भ्रष्टाचार की तोंद तंदरुस्त होती रही, तो वहीं कइयों को इसके इल्जाम में जेलों की चक्कियां भी पीसनी पड़ रही हैं।

खिलाड़ी देश का नाज़ होते हैं। दुनिया के कोने-कोने में जाकर मुल्क का नाम रोशन करते हैं। इस साल भी टेनिस सितारा सानिया मिर्जा और बैडमिंटन स्टार शइना नेहवाल ने इस मिथ को मटियामेट किया कि लड़कियां पीछे रहती हैं। सानिया ने ग्रैंड स्लैम, तो शाइना ने पहली मर्तबा टॉप पर पहुंची। शानदार प्रदर्शन के लिये टेनिस स्टार सानिया मिर्जा को खेल का सबसे बड़ा सम्मान मुल्क के सदर ने दिया। हॉकी एशिया कप (जूनियर) में भारत ने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को 6-2 से हराकर खिताब अपने नाम किया।


बुजुर्गवार कह गए हैं, बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेय। 2015 की बिदाई पर आप हाथ हिलाएं या तालियां बजाएं। पर खोया-पाया का हिसाब न लगाएं। जो बुरा हुआ, उसे भूल जाएं। जो अच्छा हुआ, उसे ताकत बनाएं। कुछ सीख लें, तो कुछ सीख दें। नए साल का इस्तकबाल करें। नया सूरज आपके लिए कई सौगातें लेकर आ रहा है। जल्द ही शहर से गांवों तक 24 घंटे बिजली मिलने लगेगी। वहीं इस पॉवर का इस्तेमाल तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन में आप करेंगे।

नेक तमन्नाओं से भरी अपनी इस दुआईया नज्म के साथ आपसे इजाजत चाहूंगा:


सब की फरियाद हो
गांव शाद-बाद हो
इरादा चट्‌टान हो
खुला आसमान हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


हर होठ पे गुलाब हो
पके आम सा शबाब हो
खूबसूरत मकान हो
मुट्‌ठी में जहान हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


हर गाल पे गुलाल हो
रिश्ता न महाल हो
मां का ख्वाब हो
आंगन शादाब हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।

कोयल का साज़ हो
सब की आवाज़ हो

मसला न सवाल हो
हर हाथ में कुदाल हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।

नदी की रवानी हो
न कभी बदगुमानी हो
वक्त न होलनाक हो
हर सोच ताबांक हो।


जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


रांची आकशवाणी से यह मक़ाला 25 दिसंबर की सुबह 9:30 बजे प्रसारित हुआ।







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सोमवार, 28 दिसंबर 2015

सत्ता से ज़्यादा बाज़ार कर रहा लेखकों को प्रभावित





  













कथाकार गौरीनाथ से संवाद व्हाया सैयद शहरोज़ क़मर



हर काल में हर लेखक या कवि तेवरवाला नहीं हुआ है। अव्यवस्था और विपरीतताओं को लेकर आक्रमकता की तलाश हर रचनाकार में ढूंढना सही नहीं होगा। कबीर और गालिब युग में एक ही होता है। हर दौर में गोदान नहीं लिखा जा सकता। हां यह जरूर है कि समय का दबाव हर काल में रहा है, लेकिन सृजन कभी मंद नहीं पड़ा। आज निस्संदेह बाजार साहित्यकारों को प्रभावित कर रहा है। कारपोरेट संस्कृति से अछूता नहीं है। बाजार और लेखकों के तेवर के सवाल पर ये बातें मैथिली-हिंदी के सुपरिचित कथाकार गौरीनाथ ने कही। वे विद्यापति स्मृति पर्व समारोह में शिरकत करने रांची आए हुए थे। जहां मैथिली मंच झारखंड ने उन्हें विदेह सम्मान से नवाजा। भास्कर से खास संवाद में गौरीनाथ कहते हैं कि सत्ता से ज्यादा बाजारतंत्र लेखकों को प्रभावित कर रहा है। उसके शरीर और मन को बदल रहा है। लेकिन लेखन पूरी तरह शिथिल नहीं हुआ है।

जबतक लौकिक परंपरा, विद्यापति तबतक

मैथिली कवि विद्यापति की प्रासंगिकता पर गौरीनाथ बोले, महज भक्तिकालीन कवि कहकर, उनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। हिंदी बेल्ट में लोकसंस्कृति के बहाने कृषि आधारित समाज व्यवस्था की वकालत वह बहुत पहले कर गए थे। वे अपनी कविता में भगवान शंकर से कहते हैं, त्रिशूल को तोड़कर फल बनाएं और खेती करें। विद्यापति के प्रेमगीत जनकंठों में हैं। जन व्यवहार में उनके गीतों की उपादेयता है। जीवन की लौकिक परंपरा जब तक रहेगी, विद्यापति प्रासांगिक रहेंगे।

शहरों की अपेक्षा भयावह ढंग से बदल रहे गांव

बात बाजार की चली, तो गोदान के बहाने हम गांव भी पहुंचे। संप्रति दिल्ली में रह रहे मूलत: गांव के गौरीनाथ कहते हैं, सिर्फ शहर ही नहीं बदल रहे, गांवों में स्थिति और बदतर है। गांव भयावह ढंग से बदल रहे हैं। नैतिकता और अपनत्व का वहां लोप हो रहा है। भाई, भाई का हिस्सा हड़प रहा है। शहर से अधिक अराजकता वहां है। अपराध और हिंसा का ग्राफ शिखर पर है। उपभोगतावादी अपसंस्कृति अपनी समग्रता में गांव-जवार में पैठ जमा रही है, जिससे उसकी चौपाल और पंचायत से लेकर रसोई और आंगन भी प्रभावित है।

प्रवासियों में भाषा-संस्कृति को लेकर ज्यादा ललक

बाबा नागार्जुन मैथिली में यात्री नाम से विख्यात हैं। गौरीनाथ भी अनलकांत उपनाम से मैथिली में लिखते हैं। पर उनका मानना है कि भाषा और संस्कृति को लेकर प्रवासियों में ललक अधिक है। पटना के सम्मेलन में भीड़ भले कम दिखे, लेकिन हैदराबाद, गोहाटी, दिल्ली या रांची में आयोजित किसी भी समारोह मैथिली समाज काफी तादाद में जुटता है। मैथिली में गौरी हरिमोहन झा के बाद यात्री, ललित और राजकमल को प्रगतिशील परंपरा का वाहक समझते हैं। मौजूदा समय पत्रिका अंतिका की भूमिका उनकी दृष्टि में महत्वपूर्ण है।

हिंदी बया के साथ मैथिली पत्रिका अंतिका का संपादन

हिंदी अकादमी, दिल्ली, भारतीय भाषा परिषद, कोलकता का युवा पुरस्कार समेत कई पुरस्कारों से अलंकृत गौरीनाथ का जन्म वर्ष 1969 में मार्च की किसी तारीख में जनपद सुपौल (बिहार) के कालिकापुर गांव में हुआ। 1991 . से निरंतर कहानियां और वैचारिक लेखन। नाच के बाहर और मानुस मशहूर कहानी संग्रह। मैथिली उपन्यास दाग के लिए उन्हें विदेह सम्मान मिला है। विभिन्न अखबारों में नौकरी। करीब दशक भर हंस' के सहायक संपादक रहे। संप्रति हिंदी बया और मैथिली त्रैमासिक अंतिका के साथ अंतिका प्रकाशन का संपादन-संचालन।

भास्कर रांची के 26 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित




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गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

दाल का दलदल




















रवींद्र पांडेय का व्यंग्य



प्याज का पहाड़! दाल का दलदल!!

दोनों डींगें हांक रहे थे। पता लगाना मुश्किल कि कौन कितना बड़ा फेंकू है। प्याज अपने सुनहरे इतिहास का हवाला दे रहा था। बता रहा था कि उसकी ऊंचाई के सामने एवरेस्ट भी बौना साबित हो चुका है। एवरेस्ट फतह करने से मुश्किल माना जाता था प्याज खरीदना। प्याज एक-एक कर गिनती करा रहा था। कब-कब उसने कितनी-कितनी सुर्खियां बटोरीं। सेव भी कैसे उसके सामने शर्म से पानी-पानी हो जाता था। किस-किस सरकार को उसने प्याज के आंसूं रूलाए। विपक्ष ने कैसे उसे सर पर बिठाया! गुलाब की जगह प्याज की माला पहन अखबारों में फोटो छपवाई।

प्याज बोल चुका तो आई दाल के दलदल की बारी। बोला, तुम्हारी सभी ऊंचाइयों पर मेरी फंसाऊ शक्ति पड़ जाएगी भारी। अभी बिहार चुनाव के रिजल्ट में तूने मेरा जलवा देखा नहीं क्या। मेरा ही नाम-नाम लेकर लड़ा गया पूरा चुनाव। और, मेरी ही दलदल में रथ का पहिया पंक्चर हो गया। हाल यह कि इत्ती बड़ी पार्टी में महाभारत छिड़ गया। हार की जिम्मेवारी कोई लेना ही नहीं चाहता।

इतने में प्याज का पहाड़ मुस्कुराया। बोला, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस करके तू ही हार की जिम्मेवारी क्यों नहीं ले लेता दलदल भाई।

दलदल बोला, अरे भाई। जब जिम्मेवारी ही लेनी है, तो जीत की जिम्मेवारी क्यों न ले लूं? उसका कारण भी तो मैं ही हूं। पर दिल है कि मानता नहीं। मैं तो आज भी जनता के हाल पर चिंतित हूं। मेरी समझ में तो यह आ ही नहीं रहा कि जनता क्यों तालियां बजा रही है? वह तो अभी भी दाल के दलदल से नहीं निकली। हां, नेताजी की नैया जरूर पार लग गई। जोर लगा के हइंसा। दोस्ती की नई परिभाषा। ऐसी ही होनी चाहिए जीतने की जिद। कल तक बैरी माने जानेवाले आज तारणहार बन बैठे।

जनता का नाम सुनते ही प्याज के पहाड़ का दिल भी रो पड़ा। बोला, भइया जनता की बात ही मत करो। जनता तो अब सिर्फ ताली बजाने के लायक ही बची है। और वह ताली न भी बजाए तो क्या फर्क पड़ता है। नया जमाना है। हर चीज नई-नई है। अब तो यह कहावत भी पुरानी हो गई है कि ताली दोनों हाथ से बजती है। आज के जमाने में इशारे से भी ताली बज जाती है। बल्कि ज्यादा जोर से बजती है। टेक्नोलॉजी का युग है। अकलमंद लोग तालियों की गड़गड़ाहट का टेप कराकर रखते हैं। जहां जरूरत हुई, रिमोट दबाया और बज उठीं तालियां। जितने भोंपू लगा दो, उतनी दूर तक गूंज उठती हैं तालियां। प्याज का पहाड़ भी अब ऊंचा नहीं रहा। नेताजी का मुर्गा उसपर चढ़कर बांग दे रहा है। बांग ही क्यों, टेक्नोलॉजी का युग है। जरूरत पड़ने पर नेताजी का मुर्गा अंडा भी दे देता है।

पहाड़ अब प्रवचन के मूड में आ गया। दलदल भक्त बन सिर्फ मुंडी हिलाता रहा।

प्याज का पहाड़ बोला, पब्लिक भी अब टेंशन नहीं लेती। सब खुश रहते हैं। प्याज का पहाड़ हो या दाल का दलदल। कोई डरता नहीं। विकास-उकास की तो कई फिक्र ही नहीं करता। सब मानकर बैठे हैं, विकास ही तो कराना है। जो गद्दी पर रहेगा, वही विकास करेगा। अपने हिसाब से करेगा। जो करेगा, उसी को विकास का नाम दे देगा। अपना-अपना नजरिया हो सकता है। किसी के लिए अस्पताल खुलना विकास हो सकता है। उसकी अपनी सोच है। पुरातन टाइप की। लोगों को गांवों में ही इलाज मिल जाए, इसलिए अस्पताल खोलवा रहे हैं। दूसरे का विजन अलग हो सकता है। वह खुल चुके अस्पतालों को बंद करा देता है। उसकी अलग सोच है। आधुनिक सोच। अस्पताल जितने कम हों, उतना अच्छा। अस्पताल होता है, तो लोग बीमार पड़ने लगते हैं। जिस गांव में अस्पताल होता है, वहां रोगियों की लाइन लगी होती है। डॉक्टर फ्री में दवा देता है। सर्दी-खांसी होने पर भी, तो लोग भागे-भागे अस्पताल पहुंच जाते हैं। कंबल ओढ़कर अस्पताल के बेंच पर अइसा चिंगुड़कर बइठते हैं, जइसे खांसी नहीं हुई, लकवा मार गया है। बेचारा डॉक्टर भी घबरा जाता है। नब्ज देखने की हिम्मत ही नहीं होती। सीधे मरीज को सदर अस्पताल रेफर कर देता है। लेकिन जहां अस्पताल नहीं होता, वहां कोई बीमार ही नहीं पड़ता। क्यों पड़ेगा! जानता है, बीमार पड़े तो पांच कोस दूर जाना होगा। अब इतनी दूर जाने के लिए कौन बीमार पड़ना चाहेगा! अगर किसी को हल्की-फुल्की बीमारी हुई भी, तो फिक्र नहीं करता। देहाती इलाज है न। ओझा-गुणी, झाड़-फूंक किस दिन काम आएगा। आखिर यह भी तो अपने देश की पुरानी धरोहर हैं।... कई चीजें हैं। देखो न, जहां बिजली होती है, वहां के बच्चे पढ़ने में फिसड्‌डी हो जाते हैं। वे इसी इंतजार में रह जाते हैं कि बिजली आएगी, तो पढ़ेंगे। और बिजली आती ही रह जाती है। पर जहां बिजली नहीं होती, वहां के बच्चे ज्यादा होनहार होते हैं। उन्हें बिजली का इंतजार नहीं करना होता। वे शाम होने पर ढिबरी जलाकर पढ़ने बैठ जाते हैं। अखबारों में अक्सर खबरें भी आती रहती हैं ढिबरी की रोशनी में पढ़कर स्टेट टॉपर बना। ऐसी खबर कहीं पढ़ने में नहीं आई कि एलईडी की रोशनी में पढ़कर किसी बच्चे ने राज्य का नाम रोशन किया हो। अरे, यह भी तो सोचिए कि बिजली रहने पर बच्चा पढ़कर बोर होना चाहेगा कि तारक मेहता का उलटा चश्मा देखकर इंज्वाय करेगा। इतने सारे कार्टून शो आते हैं। वह सब क्या बच्चे के चाचा देखेंगे? सब देखना पड़ता है भाई। नहीं देखने पर नुकसान हुआ, तो उसकी भरपाई कौन करेगा। आखिर यह भी राष्ट्र का नुकसान ही माना जाएगा न!... विकास का अपना-अपना पैमाना है। जनता अच्छी तरह जानती है कि कौन कितना फेंक रहा है। लोग कहते हैं कि गांव की सड़कें चौड़ी कर देंगे। क्या फायदा होगा? फिर तो सारी बड़ी गाड़ियां इधर से ही जाने लगेंगी। चौबीस घंटे गाड़ियों का तांता लगा रहेगा। ऐसा हुआ तब तो भारी आफत हो जाएगी। गांव की महिलाएं टट्‌टी करने किधर जाएंगी। कब जाएंगी। रखो अपनी सड़क। चौड़ी सड़कों से हमारी गाय-भैंसे तकलीफ में आ जाएंगी। गांव को गांव की तरह ही रहने दो भाई।... आप किसी भी बच्चे से पूछ लो। कोई चाहता है क्या कि मास्टर रोज स्कूल आएं। फिर आप क्यों चाहते हैं कि मास्टर जी रोज स्कूल आएं। जिसे पढ़ना है, वह तो चाहता है कि मास्टर कभी स्कूल आए ही नहीं। और आप हैं कि मास्टर जी के पीछे बायोमीट्रिक अटेंडेस सिस्टम लेकर पड़े हैं।

भक्त बनकर बैठा दलदल अचानक तालियां बजाने लगा। बहुत खूब। बहुत खूब। जब सब खुश हैं, तो हमें भी तालियां बजानी ही चाहिए। आखिर हम लोग भी लोकतंत्र को मजबूत बनाने में ही जुटे हुए हैं। जय हो। जय हो।



(लेखक-परिचय :

जन्म : 4 फ़रवरी 1971 को रोहतास(बिहार) के कोथुआं गाँव में
शिक्षा : स्नातक की पढाई आरा से की
सृजन : ढेरों व्यंग्य देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में। व्यंग्य संग्रह 'सावधान कार्य प्रगति पर है'                 प्रकाशित। विदेशी भाषाओं में अनुदित।
संप्रति : दैनिक भास्कर रांची संस्करण में मुख्य उप संपादक
संपर्क :ravindrarenu1@gmail.com)




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रविवार, 17 मई 2015

शानी तुम्हें याद करते-करते

होते, तो 82 साल के होते


 








सुनील यादव की क़लम से


शानी’ भाईजान आज आप होते, तो 82 साल के होते। 16 मई, 1933 को जगदलपुर में आपका जन्म हुआ था। देश के सबसे बड़े जिले बस्तर, जो तब एक रियासत हुआ करता था। और जगदलपुर उसकी राजधानी। अत्यंत पिछड़ा हुआ, रायपुर से लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर। यातायात के साधनों से कटा हुआ, खनिज संपदा से भरपूर ‘जगदलपुर।’ जिसके बारे में आपने लिखा है, “सुंदर-असुंदर पहाड़ियों, चित्र शलभी- पंखों से सजी नशीली घाटियों और अंग में केवड़ई गोराई बांधे, दूध के उफान से उजले, तपस्वी से साधक और एकनिष्ठ और ऋषिकन्या के पाजेब की सुकुमार गूँज में मुखरित झरनों से घिरा एक छोटा सा शहर- जगदलपुर।” शानी भाईजान आपकी इंद्रावती नदी जगदलपुर को आगोश में लेकर आज भी बहती है, पर अब उसके चाल में वह मदहोशी नहीं रही, जिसमें आप घंटों डूबा रहा करते थे। अब उसके पानी का रंग लाल हो चुका है और आपके ‘मोती तालाब’ का ‘काला जल’ और भी काला । आपके अपने लोगों ने आज हथियार उठा लिए हैं, एक अघोषित जंग चल रही है। 
इसका अंदेशा तो आपको बहुत पहले हो चुका था, शानी भाईजान ! तभी तो आपने अपने उपन्यास ‘साँप और सीढ़ी’ तथा अपने प्रख्यात संस्मरण ‘शाल वनों का द्वीप’ में इसके संकेत दे दिये थे। आपने ‘शाल वनों के द्वीप’ में एक जगह लिखा है- “सुना है यह डाही खेती (अबूझमाड़ के पहाड़ी माड़ियों की खेती की एक प्रणाली जिसमें जंगल जला कर कुटकी और दाल बोये जाते हैं) सरकार कानूनन बंद करने जा रही है, पटेल(अबूझमाड़ का एक आदिवासी) को सुनाते हुए मैंने(शानी) एड (एक विदेशी शोधकर्ता ) से कहा।’ ‘क्यों?’ ‘ख्याल है कि इसमें काफी जंगल बरबाद होते जा रहे हैं’ ‘डाही खेती क्या है?’ पटेल ने पूछा। ‘यही जो तुम लोग जंगल जलाकर करते हो।’ ‘पटेल जैसे मेरी नासमझी की बात पर हँसने लगा। बोला, ‘सरकार कैसे बंद कर सकती है?’ ‘क्यों, जब कानून ही बन जाय तो क्या करोगे?’ ‘यहाँ मानेगा कौन?’ पटेल ने मुस्कराकर कहा,’ वही तो हमारा खाना-पीना है......।’ कानून न मानने की बात जैसी दृढ़ता से पटेल ने कही, उससे चकित होकर मैं ‘एड’ की ओर देखने लगा। डाही खेती सदियों पुरानी उनकी परंपरा है, जिसे एकाएक तोड़ कर बदल देना आसान नहीं । सचमुच,क्या होगा यदि ऐसा कानून ही बन जाय? क्या किसी सामूहिक विरोध की संभावना हो सकती है ? क्या यह हो सकता है कि..........।”


शानी भाईजान, आप जिस बात को कहते-कहते रुक गए थे, आज वह सच साबित हो गयी । आपका दंडकारण्य जल रहा है शानी भाईजान ! आपकी वह सब संभावनाएं सच हो गयीं, जो आपने अपने उपन्यास, कहानियों तथा संस्मरणों में व्यक्त की थीं। आप तो उसी बस्तर के थे शानी भाईजान! दंडकारण्य क्यों जल रहा है? इसकी खोजबीन में कोई आपके पास क्यों नहीं आया? क्योंकि आपके पास उसका जवाब था, शायद कोई इसका जवाब चाहता ही नहीं! आप भारत-पाकिस्तान के युद्ध के दौरान बहुत तनाव में थे, ‘युद्ध’ कहानी पढ़ते हुए मैंने समझा कि आपकी नसें क्यों फटी जा रही थीं। शानी भाईजान आप दिखावे के सेकुलिरिज़्म से क्यों इतना चिढ़ते थे, उसको मैं तब समझ पाया जब आप राही मासूम रज़ा जी से पूछ रहे थे, “मासूम भाई, महाभारत के लेखक आप क्योंकर हुए और भारत के लेखक क्यों नहीं? कैसा लगा होगा जब महाभारत के साथ किसी मुसलमान का नाम जुड़ते ही आपत्तियां उठाई गयीं और आपने अपनी प्रतिभा से उसे कीर्ति के शिखर पर पहुंचा दिया तो वे क़सीदे पढ़ने लगे? कैसा लगा होगा आपको जब तारीफ़ के तोहफ़े के बहाने किसी ने कसकर तीर मारा होगा- इन हरिजनन मुसलमानन पे कोटिन हिंदू वारिए.......।”
आप अपनों के बीच भुला दिये गए शानी भाईजान ! आपके उपन्यास ‘काला जल’ को लेकर दंभ भरने वाली आपकी साहित्यिक बिरादरी ने भी आपको भुला दिया! अभी कुछ दिन पहले आपके एक अत्यंत प्रिय मित्र जो कहते रहे कि ‘डरता कौन है शानी से!’ वहीं आपके ही क्षेत्र के एक तरुण रचनाकर के बहस के केंद्र में आपके बस्तर के लोग थे । पर आप उस बहस में कहीं नहीं थे। अरुंधति राय, गौतम नवलखा, वैरियर एल्विन, श्यामाचरण दुबे, डॉक्टर विनायक सेन इत्यादि के लेखन और कार्यो की इस बहस में लगातार चर्चा हुई। इन लोगों की चर्चा होनी भी चाहिए क्योंकि इन लोगों ने महत्वपूर्ण काम किया है, पर आपका एक बार भी जिक्र तक नहीं हुआ। क्या आपका ‘शाल वनों का द्वीप’ किसी भी एंथ्रोपोलिजकल शोध से कम है? जिसके बारे में एडवर्ड जे. जे. ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि “शानी की यह रचना शायद उपन्यास नहीं, एक अत्यंत सूक्ष्म संवेदना युक्त सृजनात्मक विवरण है, जो एक अर्थ में भले ही समाजविज्ञान न हो लेकिन दूसरे अर्थ में यह समाज विज्ञान से आगे की रचना है ।” शानी भाईजान ! आपको सिर्फ ‘काला जल’ उपन्यास के लेखक के रूप में ही याद क्यों किया जाता है ? आपके संस्मरण ‘शाल वनों का द्वीप’ जैसा संस्मरण हिंदी में दूसरा कौन है ? फिर भी हिंदी साहित्य के इतिहास की किताबों से यह गायब क्यों है ? क्या ‘काला जल’ साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लायक रचना नहीं थी ? चलिये मैं मानता हूँ कि राही मासूम रज़ा के ‘आधागांव’ को साहित्य अकादेमी इसलिए नहीं दिया गया कि उसमें बेशुमार गालियाँ(?) थी, पर काला जल में क्या था ? कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनके जवाब सबको पता होता है शानी भाईजान !


कभी ग्वालियर में अपने लिए मकान ढूँढते हुए आपको अपनी अस्मिता का बोध हो आया था। उस समय आप हिंदुस्तान के सबसे बड़े सच का सामना कर रहे थे, जब मस्जिद से सटे आपके मकान के सामने मुसलमान भाईयों ने गाय का गोश्त फेंक दिया था। क्योंकि वे आपको शानी नहीं बल्कि कोई पंजाबी साहनी समझे थे। पर शानी भाईजान ! मेरे इस छोटे से जीवन में ही, साहित्य के क्षेत्र में शोध करने वाले बहुत लोग ऐसे मिले हैं, जो ‘शानी’ नाम लेते ही ‘भीष्म साहनी’ ही समझते हैं। और अंत में जानिसार अख्तर की ये दो पंक्तियाँ जिसे आप अक्सर गुनगुनाया करते थे:
और तो मुझको मिला क्या मिरी मेहनत का सिला,
चंद सिक्के हैं मेरे हाथ में छालों के सिवा।


(लेखक-परिचय:
जन्म : 29 दिसंबर 1984 को ग्राम करकपुर, गाजीपुर (उ प्र ) में
शिक्षा : आदर्श इंटर कॉलेज गाजीपुर से अरभिक शिक्षा, इलाहाबाद
विश्वविद्यालय से बीए और एमए। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय
हिन्दी विश्वविद्यालय से पी-एच डी की उपाधि (2013)(कंप्लीट है पर उपाधि
अभी मिली नहीं है )
सृजन : पहल जैसी अहम पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित। समसामयिक सृजन पत्रिका के लोक विशेषांक का संयोजन।
ब्लॉग : देहरी
संप्रति : इलाहाबाद में रहते हुए स्वतंत्र लेखन व शोध कार्य में सक्रिय
संपर्क : sunilrza@gmail.com)
 





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रविवार, 19 अप्रैल 2015

ऐ लड़की, अम्मी और मैं


संदर्भ : कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ऐ लड़की














राकेश बिहारी की क़लम से 

 
आसमान के गहरे काले सन्नाटे पर धीरे-धीरे चिड़ियों की चहचहाहट उतर रही है. लगभग सारी रात के दूरभाषी अभिसार के बाद दूसरे छोर पर अधलेटी मेरी प्रेमिका की नींद से भारी पलकें खुद--खुद किसी स्वप्न-लोक में खोने लगी हैं और मैं खिड़की से बाहर भोर के सितारों को एकटक देख रहा हूं...

दूर टिमटिमाते तारों में सहसा अम्मी की ठहरी आवाज़ खनक उठती है- "लड़की, भोर बड़ी संपदा है. जिसने सोकर इसे गंवाया, उसने बहुत कुछ खो दिया. आंखों से रात और दिन का मिलन देखा और उनका अलग होना. पंछी जब चहचहाते हैं ऊषा की ललाई में, तो पूरी सृष्टि गूंज उठती है."

मीलों दूर सपनों के हिंडोले में झूलती अपनी स्वपन-सुंदरी को मैं हौले से जगाना चाहता हूं... उठो! भोर की इस अकूत संपदा को हम साथ-साथ अपनी अंजुरियों में भर लें...

पंछियों का शनैं-शने: तेज होता कलरव मेरे भीतर किसी मीठे सोते की तरह उतरने लगा है और मैं जैसे अपने लिंग से मुक्त हुआ जा रहा हूं. रात का छंटता अंधेरा मेरे पुरुष को अपने साथ लिये जा रहा है और मेरे अंतस के किसी सुदूर कोने में दुबकी कोई स्त्री ऊषा की लालिमा में नहाकर रक्तिम हो उठी है...

मेरे ठीक सामने की दीवान पर अम्मी लेटी हैं- क्लांत शरीर, पर मन-मिजाज पर गजब की कांति, जैसे मृत्यु की आगोश में जीवन का अनुराग गुनगुना रही हों... मुंदी हुई पलकों पर मुस्कुराहट की लेप को देख ऐसा लगता है जैसे तुरन्त ही उठ कर बैठ जायेंगी और जीवन की अतल गहराइयों से निकालकर नाना प्रकार के सिखावन के मोतियों से हमारी तलहथियों को भर देंगी. मसलन- "अपनी समरूपा उत्पन्न करना मां के लिये बड़ा महत्वकारी है. पुण्य है. बेटी के पैदा होते ही मां सदाजीवी हो जाती है. वह कभी नहीं मरती. हो उठती है वह निरंतरा..."

मेरे भीतर की स्त्री जैसे अम्मी की बेटी हुई जा रही है... अम्मीजी की मान्यतायें जैसे सीधे उसके भीतर तक उतर रही हैं. वह सिर्फ उनके सवालों का जवाब नहीं दे रही, बल्कि खुद से एक वायदा कर रही है- "जरूरत पड़ने पर मैं किसी ऐरे-गैरे को आवाज़ नहीं दूंगी. मैं अम्मीजी की बेटी हूं, अपनी दौड़ खुद दौड़ूंगी..."

अम्मीजी का चेहरा दर्प से चमकने लगा है. उनका तेज उसकी आंखों से होता हुआ नाभि तक को आलोकित कर रहा है और वह एक बार फिर नये संकल्पों से भर उठती है... मैं दिन-रात बेगार के खाते में नहीं खटूंगी... पूरे ब्रह्मांड से शक्ति खींचकर जो बच्ची मुझे जननी है उसे किसी और के सहारे नहीं छोडूंगी... उसे हमारी देह की उपज भर ही नहीं होना है, वह तो मेरी आत्मा का सपना है... उसे अपनी ताकत का अहसास कराऊंगी किसी के हाथ का झुनझुना कभी नहीं बनने दूंगी...

अम्मीजी की उंगलियों में हरकत हुई है... पलकें जैसे सोये में भी चमकने-सी लगी हैं. जीवन के तीखे-कसैले अनुभवों को कहती-सुनती अचानक उन्होंने मेरे भीतर मुखर होती लड़की की तरफ एक प्रश्न उछाला है- "एक बात सच-सच कहना! क्या किसी ने तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हें जाना है? चाहा है?" कितना तीखा है यह सवाल.. कुछ पल में ही जैसे मेरे भीतर की लड़की अपनी तरुंणाई से युवा दिनों तक की परिक्रमा कर आती है... 'दूसरों की इच्छाओं को पूरा करती-करती मैंने कभी अपनी इच्छाओं का तो ध्यान ही नहीं दिया... अम्मीजी के इस सवाल ने जैसे मेरे भीतर चाहनाओं की एक गुननुनी नदी उतार दी है..' लड़की की नसें पहली बार अपनी इच्छा से तनना-सिकुड़ना चाह रही हैं... उसके अंदर की हरित लतायें परिवेश में एक मनचाहा आत्मीय आलंबन खोजने लगी हैं. वह सोचती है- 'अम्मी ने सिर्फ सवाल ही नहीं पूछे हैं बल्कि मेरे अंतस में अपूरित इछ्छाओं की बेल रोप दी है...'

दिन और रात की अभिसंधि पर खड़ी अम्मी अपना यौवन फिर से जीना चाहती है..."कहीं से ले तो आओ उस ताज़ा लड़की को, जिसने शादी का जोड़ा पहन रखा था. ला सकती हो कहीं उसे! नहीं ला सकती ! नहीं..."

लड़की मां के बेडरूम की तरफ भागती है... उसने उनकी पेटी से उनके सुहाग का जोड़ा निकालकर पहन लिया है... सिंगारदान के आगे खड़ी वह जैसे खुद ही अम्मी हो गई है... होठों पर दहकते लिप्स्टिक के रंग को उसने थोड़ा हल्का किया है और काजल की रेखा को तनिक और गहरी... भाग के अम्मी के पास आई है वह... "अम्मीजी ये लीजिये... मैं उस लड़की को ले आई . पहचानिये इसे... ये आप ही हैं ?"

अम्मी कुछ बोलती ही नहीं... उनकी बन्द पलकें अब भी मुस्कुरा रही हैं जैसे अब बोलेंगी, तब बोलेंगी... लगातर पुकारते-पुकारते लड़की की आवाज़ की चहक रुलाई में बदलने लगी है...

अम्मी के नहीं होने का अहसास मेरे भीतर की लड़की को मर्मांतक वेदना से भर रहा है... मैं धीरे-धीरे अपने बाने में लौटने लगा हूं और उनसे पूछना चहता हूं मृत्यु की दहलीज पर बैठकर ज़िंदगी की परतें उघाड़ना कितना सुखद या तकलीफदेह होता है...?

अम्मी चुप हैं और मैं मीलों दूर नींद के हिंडोले में झूलती अपनी सखि के लिये बेपनाह दुआओं से भर गया हूं...
***


(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 11 अक्टूबर 1973 को शिवहर (बिहार) में।
शिक्षा : एसीएमए (कॉस्ट अकाउन्टेंसी), एमबीए (फाइनान्स)
सृजन : प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानियां एवं लेख। वह सपने बेचता था (कहानी-संग्रह) और केंद्र में कहानी
            (आलोचना) नामक दो पुस्तकें प्रकाशित।
चर्चित ब्लॉग समालोचन के लिए कहानी केन्द्रित लेखमाला
संपादन : स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन)
पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ (निकट पत्रिका का विशेषांक)
समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी (संवेद पत्रिका का विशेषांक)
बिहार और झारखंड मूल के स्त्री कथाकारों पर केंद्रित आर्य संदेश' का विशेषांक
अकार – 41 (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केंद्रित)
संप्रति : एनटीपीसी लि. सिंगरौली, (म. प्र.) में (प्रबंधक-वित्त)
संपर्कbrakesh1110@gmail.com)

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