बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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शनिवार, 8 जून 2013

मलयाली सिनेमा की पहली अभिनेत्री रोज़ी के दलित दामन पर दबंग दाग




















उपेक्षित हैं मलयाली सिनेमा के ओबीसी पिता जेसी डेनियल



अश्विनी कुमार पंकज की क़लम से

क्या भारतीय सिनेमा के सौ साल में पीके रोजी को याद किया जाएगा? सिनेमा का जो इतिहास अब तक पेश किया जा रहा है उसके मुताबिक तो नहीं. सुनहले और जादूई पर्दे के इस चमकीले इतिहास में निःसंदेह भारत के उन दलित कलाकारों को कोई फिल्मी इतिहासकार नहीं याद कर रहा है जिन्होंने सिनेमा को इस मुकाम तक लाने में अविश्वसनीय यातनाएं सहीं. थिकाडु (त्रिवेन्द्रम) के पौलुस एवं कुंजी के दलित क्रिश्चियन परिवार में जन्मी रोजम्मा उर्फ पीके रोजी (1903-1975) उनमें से एक है जिसे मलयालम सिनेमा की पहली अभिनेत्री होने का श्रेय है. यह भी दर्ज कीजिए कि रोजी अभिनीत ‘विगाथाकुमरन’ (खोया हुआ बच्चा) मलयालम सिनेमा की पहली फिल्म है. 1928 में प्रदर्शित इस मूक फिल्म को लिखा, कैमरे पर उतारा, संपादित और निर्देशित किया था ओबीसी कम्युनिटी ‘नाडर’ से आने वाले क्रिश्चियन जेसी डेनियल ने. 

रोजी के पिता पौलुस पलयम के एलएमएस चर्च में रेव. फादर पारकेन के नौकर थे. जबकि वह और उसकी मां कुंजी घर का खर्च चलाने के लिए दिहाड़ी मजदूरी किया करते थे. परंपरागत दलित नृत्य-नाट्य में रोजी की रुचि थी और वह उनमें भाग भी लेती थी. लेकिन पेशेवर कलाकार या अभिनेत्री बनने के बारे में उसने कभी सोचा नहीं था. उस जमाने में दरअसल वह क्या, कोई भी औरत फिल्मों में काम करने के बारे में नहीं सोचती थी. सामाजिक रूप से फिल्मों में स्त्रियों का प्रवेश वर्जित था. पर जब उसे जेसी डेनियल का प्रस्ताव मिला तो उसने प्रभु वर्ग के सामाजिक भय को ठेंगे पर रखते हुए पूरी बहादुरी के साथ स्वीकार कर लिया. 

मात्र 25 वर्ष की उम्र में जोसेफ चेलैया डेनियल नाडर (28 नवंबर 1900-29 अप्रैल 1975) के मन में फिल्म बनाने का ख्याल आया. नाडर ओबीसी के अंतर्गत आते हैं और आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं. डेनियल का परिवार भी एक समृद्ध क्रिश्चियन नाडर परिवार था और अच्छी खासी संपत्ति का मालिक था.  डेनियल त्रावणकोर (तमिलनाडु) के अगस्तीवरम तालुका के बासिंदे थे और त्रिवेन्दरम के महाराजा कॉलेज से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की थी. मार्शल आर्ट ‘कलारीपट्टू’ में उन्हें काफी दिलचस्पी थी और उसमें उन्होंने विशेषज्ञता भी हासिल की थी. कलारी के पीछे वे इस हद तक पागल थे कि महज 22 वर्ष की उम्र में उस पर ‘इंडियन आर्ट ऑफ फेंसिंग एंड स्वोर्ड प्ले’ (1915 में प्रकाशित) किताब लिख डाली थी. कलारी मार्शल आर्ट को ही और लोकप्रिय बनाने की दृष्टि से उन्होंने फिल्म के बारे में सोचा.  फिल्म निर्माण के उस शुरुआती दौर में बहुत कम लोग फिल्मों के बारे में सोचते थे. लेकिन पेशे से डेंटिस्ट डेनियल को फिल्म के प्रभाव का अंदाजा लग चुका था और उन्होंने तय कर लिया कि वे फिल्म बनाएंगे.

फिल्म निर्माण के मजबूत इरादे के साथ तकनीक सीखने व उपकरण आदि खरीदने के ख्याल से डेनियल चेन्नई जा पहुंचे. 1918 में तमिल भाषा में पहली मूक फिल्म (कीचका वधम) बन चुकी थी और स्थायी सिनेमा हॉल ‘गेइटी’ (1917) व अनेक फिल्म स्टूडियो की स्थापना के साथ ही चेन्नई दक्षिण भारत के फिल्म निर्माण केन्द्र के रूप में उभर चुका था. परंतु चेन्नई में डेनियल को कोई सहयोग नहीं मिला. कई स्टूडियो में तो उन्हें प्रवेश भी नहीं करने दिया गया. दक्षिण भारत का फिल्मी इतिहास इस बात का खुलासा नहीं करता कि डेनियल को स्टूडियो में नहीं घुसने देने की वजह क्या थी. इसके बारे में हम अंदाजा ही लगा सकते हैं कि शायद उसकी वजह उनका पिछड़े वर्ग (ओबीसी) से होना हो. 

बहरहाल, चेन्नई से निराश डेनियल मुंबई चले गए. मुंबई में अपना परिचय उन्होंने एक शिक्षक के रूप में दिया और कहा कि उनके छात्र सिनेमा के बारे में जानना चाहते हैं इसीलिए वे मुंबई आए हैं. इस छद्म परिचय के सहारे डेनियल को स्टूडियो में प्रवेश करने, फिल्म तकनीक आदि सीखने-जानने का अवसर मिला. इसके बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के उपकरण खरीदे और केरल लौट आए.

1926 में डेनियल ने केरल के पहले फिल्म स्टूडियो ‘द त्रावणकोर नेशनल पिक्चर्स’ की नींव डाली और फिल्म निर्माण में जुट गए. फिल्म उपकरण खरीदने और निर्माण के लिए डेनियल ने अपनी जमीन-संपत्ति का बड़ा हिस्सा बेच डाला. उपलब्ध जानकारी के अनुसार डेनियल की पहली और आखिरी फिल्म की लागत उस समय करीब चार लाख रुपये आई थी. आखिरी इसलिए क्योंकि उनकी फिल्म ‘विगाथाकुमरन’ को उच्च जातियों और प्रभु वर्गों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा. फिल्म को सिनेमा घरों में चलने नहीं दिया गया और व्यावसायिक रूप से फिल्म सफल नहीं हो सकी. इस कारण डेनियल भयानक कर्ज में डूब गए और इससे उबरने के लिए उन्हें स्टूडियो सहित अपनी बची-खुची संपत्ति भी बेच देनी पड़ी. हालांकि उन्होंने कलारी पर इसके बाद एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाई, लेकिन तब तक वे पूरी तरह से कंगाल हो चुके थे. 

फिल्म निर्माण के दौर में डेनियल के सामने सबसे बड़ी समस्या स्त्री कलाकार की थी. सामंती परिवेश और उसकी दबंगता के कारण दक्षिण भारत में उन्हें कोई स्त्री मिल नहीं रही थी. थक-हार कर उन्होंने मुंबई की एक अभिनेत्री ‘लाना’ से अनुबंध किया. पर किसी कारण उसने काम नहीं किया. तब उन्हें रोजी दिखी और बिना आगे-पीछे सोचे उन्होंने उससे फिल्म के लिए हां करवा ली. रोजी ने दैनिक मजदूरी पर ‘विगाथाकुमरन’ फिल्म में काम किया. फिल्म में उसका चरित्र उच्च जाति की एक नायर लड़की ‘सरोजम’ का था. मलयालम की इस पहली फिल्म ने जहां इसके लेखक, अभिनेता, संपादक और निर्देशक डेनियल को बरबाद किया, वहीं रोजी को भी इसकी भयानक कीमत चुकानी पड़ी. दबंगों के हमले में बाल-बाल बची रोजी को आजीवन अपनी पहचान छुपाकर गुमनामी में जीना पड़ा.

त्रिवेन्दरम के कैपिटल थिएटर में 7 नवंबर 1928 को जब ‘विगाथाकुमरन’ प्रदर्शित हुई तो फिल्म को उच्च जातियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा. उच्च जाति और प्रभु वर्ग के लोग इस बात से बेहद नाराज थे कि दलित क्रिश्चियन रोजी ने फिल्म में उच्च हिंदू जाति नायर की भूमिका की है. हॉल में पत्थर फेंके गए, पर्दे फाड़ डाले. रोजी के घर को घेर कर समूचे परिवार की बेइज्जती की गई. फिल्म प्रदर्शन की तीसरी रात त्रावणकोर के राजा द्वारा सुरक्षा प्रदान किए जाने के बावजूद रोजी के घर पर हमला हुआ और दबंगों ने उसकी झोपड़ी को जला डाला. चौथे दिन भारी विरोध के कारण फिल्म का प्रदर्शन रोक दिया गया. 

दक्षिण भारत के जानेमाने फिल्म इतिहासकार चेलंगट गोपालकृष्णन के अनुसार जिस रात रोजी के घर पर हमला हुआ और उसे व उसके पूरे परिवार को जला कर मार डालने की कोशिश की गई, वह किसी तरह से बच कर निकल भागने में कामयाब रही. लगभग अधमरी अवस्था में उसे सड़क पर एक लॉरी मिली. जिसके ड्राईवर ने उसे सहारा दिया और हमलावरों से बचाते हुए उनकी पकड़ से दूर ले गया. उसे बचाने वाले ड्राईवर का नाम केशव पिल्लई था जिसकी पत्नी बन कर रोजी ने अपनी शेष जिंदगी गुमनामी में, अपनी वास्तविक पहचान छुपा कर गुजारी. 

रोजी की यह कहानी फिल्मों में सभ्रांत परिवारों से आई उन स्त्री अभिनेत्रियों से बिल्कुल उलट है, जिनकी जिंदगियां सुनहले फिल्म इंडस्ट्री ने बदल डाली. फिल्मों ने उन्हें शोहरत, धन और अपार सम्मान दिया. लेकिन रोजी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. उसे लांछन, अपमान व हमले का सामना करना पड़ा. दृश्य माध्यम से प्रेम की कीमत आजीवन अदृश्य रहकर चुकानी पड़ी. 

जेसी डेनियल को तो अंत-अंत तक उपेक्षा झेलनी पड़ी. बेहद गरीबी में जीवन जी रहे डेनियल को केरल सरकार मलयाली मानने से ही इंकार करती रही. आर्थिक तंगी झेल रहे कलाकारों को वित्तीय सहायता देने हेतु जब सरकार ने पेंशन देने की योजना बनाई, तो यह कह कर डेनियल का आवेदन खारिज कर दिया गया कि वे मूलतः तमिलनाडु के हैं. डेनियल और रोजी के जीवन पर बायोग्राफिकल फीचर फिल्म ‘सेल्युलाइड’ (2013) के निर्माता-निर्देशक कमल ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि केरल के पूर्व मुख्यमंत्री करूणाकरन और ब्यूरोक्रेट मलयाट्टूर रामकृष्णन नहीं चाहते थे कि नाडर जाति के फिल्ममेकर को ‘मलयालम सिनेमा का पिता’ होने का श्रेय मिले. हालांकि बाद में, 1992 में केरल सरकार ने डेनियल के नाम पर एक अवार्ड घोषित किया जो मलयाली सिनेमा में लाइफटाईम एचिवमेंट के लिए दिया जाता है. 

रोजी और जेसी डेनियल के साहस, रचनात्मकता और बलिदान की यह कहानी न सिर्फ मलयालम सिनेमा बल्कि भारतीय फिल्मोद्योग व फिल्मी इतिहासकारों के भी सामंती चेहरे को उधेड़ती है. रोजी और डेनियल हमें सुनहले पर्दे के पीछे उस सड़ी दुनिया में ले जाते हैं जहां क्रूर सामंती मूंछे अभी भी ताव दे रही हैं. सिनेमा में वंचित समाजों के अभूतपूर्व योगदान को स्वीकार करने से हिचक रही है. यदि चेलंगट गोपालकृष्णन, वीनू अब्राहम और कुन्नुकुजी एस मनी ने डेनियल व रोजी के बारे में नहीं लिखा होता तो हम मलयालम सिनेमा के इन नींव के पत्थरों के बारे में जान भी नहीं पाते. न ही जेनी रोविना यह सवाल कर पाती कि क्या आज भी शिक्षा व प्रगतिशीलता का पर्याय बने केरल के मलयाली फिल्मों कोई दलित अभिनेत्री नायर स्त्री की भूमिका अदा कर सकती है? 


(परिचय: वरिष्‍ठ पत्रकार। झारखंड के विभिन्‍न जनांदोलनों से जुड़ाव।
सृजन: साहित्य, कला , संस्कृति पर प्रचुर लेखन-प्रकाशन। कई किताबें प्रकाशित। आदिवासी सौन्दर्य शास्त्र पर केन्द्रित पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य।
संप्रति: संताली पत्रिका जोहार सहिया और रंगकर्म त्रिमासिक रंगवार्ता का सम्पादन. इंटरनेट पत्रिका अखड़ा की टीम के सदस्‍य।
संपर्क:akpankaj@gmail.com )         


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गुरुवार, 8 सितंबर 2011

प्रकृति के आदिम सम्मान का पर्व करमा


























 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
काराम चांडुः मुलुःलेना : जुड़ि दुमाङ साड़िताना
 
 
 
 
 
 
 
 
 































अश्विनी  कुमार पंकज की क़लम से 



करमा पर्व कृषि और प्रकृति से जुड़ा पर्व है जिसे झारखंड के सभी समुदाय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस पर्व को भाई-बहन के निश्छल प्यार के रूप में भी उल्लेखित किया जाता है। यह पर्व भादो शुक्ल पक्ष के एकादशी के दिन बड़े धूमधाम और अनुष्ठानपूर्वक मनाया जाता है। करमा जीवन में कर्म के महत्व का पर्व तो है ही, यह प्रकृति के आदिम सम्मान का भी पर्व है। झारखंडी समुदायों, विशेष कर आदिवासी समुदायों के सभी पर्व-त्योहारों और सामाजिक-सांस्कृति उत्सवों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व आराधना एक अनिवार्य विधान है। जैसे सरहुल में सरई फूल, करमा में करम डाइर, कदलेटा में भेलवा की टहनियां, जितिया में पीपल और हरियारी पर्व में हरे पेड़-पौधों की पूजा।

करमा पर्व के दिन करम गाड़ने के बाद कोटवार द्वारा समुदाय के लोगों को करम कथा सुनने के लिए बुलाया जाता है। श्रोता एवं उपासर अपने-अपने करम दउरा या थाली में पूजन सामग्री तेल, सिंदूर, धूप-धुवन, खीरा, चीउड़ा, जावा फूल, अरवा चावल, दूध, फूल, फल सजाकर इसमें दीपक जलाते है। इसे सारू पत्ते से ढककर अखाड़ा में लाते है और करम के चारों ओर बैठ जाते है। दूसरी ओर करम अखाड़ा में चारों ओर भेलवा, सखुआ या केंद इत्यादि लाकर खड़ा कर दिया जाता है। कथा अंत होने के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है। युवक-युवतियां करमा नृत्य संगीत प्रस्तुत करती है। दूसरे दिन सुबह भेलवा वृक्ष की टहनियों को धान की खेती में गाड़ दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे फसल फसल में कीड़े नहीं लगते है। कमोबेश थोड़े हेर-फेर के साथ झारखंड के सभी आदिवासी एवं मूलवासी समुदायों में करमा अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग विश्वास एवं मान्यता के साथ मनाया जाता है। करमा पूजन का आयोजन विभिन्न चरणों में पूरा होता है। जिसमें करमा के लिए जावा उठाना, करम काटने जाने के समय पूजन, करम काटने से पहले पूजा, करम डाल को अखाड़ा में गाड़ने की प्रार्थना, पाहन द्वारा करमा पूजा, करम कहानी की परंपरा एवं करम बहाने की पूजन विधि मुख्य है। करमा पर्व के संबंध में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। अधिकांश कहानियों में कुछ भिन्नताओं के बावजूद एकरूपता है। 
कहते हैं रामदयाल मुंडा

डॉ. रामदयाल मुंडा और रतन सिंह मानकी द्वारा संग्रहित-संपादित पुस्तक ‘आदि धर्म’ में करमा पर्व की कथा इस प्रकार से कही गयी है - करमा और धरमा दो भाई होते थे। सुखी-सम्पन्न, धन-धान्य से भरे-पूरे। बड़े भाई करमा को एक राजभोज में सम्मिलित होने का अवसर मिला मिलता है तो उसे जीवन में पहली बार एक नई चीज, नमक, के स्वाद का पता होता है। उस स्वाद के वशीभूत वह उसके व्यापार का मन बनाता है। वह अपने छोटे भाई के सामने प्रस्ताव रखता है और उसकी सहमति के बाद व्यापार को निकलता है। महीने भर की विदेश व्यापार यात्रा ेके बाद वह कई बैल गाड़ियों में माल लादे हुए वापस आता है। अपने गाव की सीमा पहुंचने पर भाई को संदेश भेजता है ताकि वह उसका उचित स्वागत कर सम्मानपूर्वक उसकी अगुवाई करे। किन्तु आशा के विपरित धरमा नहीं दिखाई दे रहा। उल्टे संदेशवाहक भी उधर ही रह जाता है। करमा दूसरा दूत भेजता है, तीसरा भेजता है, किन्तु वे भी वापस नहीं आते। अपमानित, क्रोध से आग बबूला, तमतमाया हुआ वह स्वयं देखने आता है। देखता है, धरमा सारे लोगों के साथ करम देवता की पूजा अर्चना में लगा हुआ है। करमा की ओर कोई देख भी नहीं रहा। फिर तो क्या था - क्रोध में आपे से बाहर करमा पूजा में बैठे ध्रमा को पीछे से लात मारता है, सामने आरोपित करम की डाली को उखाड़ फंकता है और पूजा की सारी सामग्रियों को तितर-बितर कर बड़बड़ाते हुए निकल जाता है और पीछे-पीछे आने वाले उसके भाई ध्ररमा और दूसरे लोगों ने उसे बताना चाहा - करम देवता की पूजा में थोड़ी देरी हो गई उसे अपमानित करने जैसी कोई बात नहीं थी। छोटे भाई की गलती मानकर कृपया शांत करें। किंतु करमा की नाराजगी नहीं गई। उसने गांव वालों को धरमा का साथ देने का बुरा परिणाम भुगतने की धमकी दे डाली। किंतु बुरे परिणाम धरमा और गांववालों पर नहीं खुद करमा पर दिखाई देने लगे। करमदेवता करमा पर नाराज हो गए। उसके खेत सूखने लगे। खड़ी फसल मुर्झाने लगी और उसके खलिहान में एक दाना नहीं भी गिरा। भूखा-प्यासा करमा जंगल जाकर फल तोड़ता, उसमें कीड़े लगे मिलते हैं। जल स्रोत से पानी पीने को झुकता, वहां भी उसे कीड़े-मकोड़े मिलते हैं। अंत में वह अपनी पत्नी को धरमा के यहां खाने की भीख मांगने को भेजता है। वहां भी उसकी पत्नी के पहुंचने तक सारा खाना समाप्त मिलता है। उसे कहा जाता है कि थोड़ी देर रूको फिर से पानी चढ़ाते हैं। तुम्हारे लिए खाना बनाते हैं। उसी दौरान करमा को झपकी के सपने में एक आवाज सुनाई देती है कि तुमसे नाराज करम देवता अब तुमसे अलग हो गए हैं और जब तक तुम उसे मनाकर वापस नहीं लाते, तुम्हारी दुर्गति बढ़ती ही जाएगी। तुम्हारे बुरे दिनो का अंत नहीं होगा। इस पर करमा की सुमति जगती है। वह जानना चाहता है करम देवता कहां छिप गए हैं। उसको पता चलता है करम देवता सात समुन्दर पार एक टापू को चले गए हैं। वहीं जाकर अनुनय-विनय और पश्चाताप करने से उन्हें वापस लाया जा सकता है। करमा दूसरी बार घर छोड़ने की तैयारी करता है। अनेक परीक्षाओं से गुजरते हुए वह करम देवता को अपने साथ वापस ले आने में सफल होता है और आंगन में स्थापित करके सबके सामने अपनी गलती स्वीकार करता है। करम देवता की पुनर्वापसी के साथ ही करमा के बुरे दिन बीतने लगते हैं और अच्छे दिन वापस आने लगते हैं। उसके खेतों में फसल लहलहा उठती है और भरे-पूरे खलिहान की संभावनाएं बनने लगती है। 
लोककथा में करम कथा
 एक अन्य लोककथा में करम कथा इस प्रकार है। कर्मा और धर्मा नामक दो भाई थे। दोनों ही बड़े प्रेम से रहते थे, तथा गरीबों की सहायता किया करते थे। कुछ दिन बाद कर्मा की शादी हो गई। कर्मा की पत्नी बहुत ही अधार्मिक तथा बुद्धिहीन स्त्राी थी। वह, हर वह काम किया करती थी, जिससे कि लोगों को हानि और क्लेश पहुंचे। यहां तक कि उसने धरती मां को भी नहीं छोड़ा, वह चावल बनाने के बाद मांड जो पसाती वह भी जमीन पर सीधे गिरा देती। इससे कर्मा को बड़ा तकलीफ हुई। वह धरती मां को घायल और दुखी देखकर काफी दुखी था। गुस्से में वह घर छोड़कर चला गया। उसके जाते ही पूरे इलाके के आदमियों का करम (तकदीर) चली गई। अब वे काफी दुखी और पीड़ित जीवन बिताने लगे।

कुछ दिन बाद जब धर्मा से नहीं रहा गया। इलाके की अकाल और भूखमरी से जब वह व्याकुल हो गया तो अपने भाई कर्मा को खोजने के लिए निकल पड़ा। कुछ दूर जाने के बाद उसे प्यास लगी। पानी की खोज में वह इधर-उधर भटकने लगा। सामने एक नदी दिखाई दिया पर वह सूखी पड़ी थी। नदी ने पास आकर धर्मा से कहा कि जबसे हमारे कर्मा भाई इधर से गए हैं हमारे तो करम ही फूट गए हैं। अब यहां कभी पानी नहीं आता है, यदि आपकी मुलाकात उनसे हो तो हमारे बारे में जरूर कहिएगा। धर्मा आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक आम का वृक्ष मिला, जिसके सब फलों में कीड़े थे। उसने भी धर्मा को कहा कि जबसे कर्मा भाई इधर से गुजरे हैं, इस पेड़ के सारे फल खराब हो गए हैं। यदि आपकी मुलाकात उनसे हो तो इसका निवारण पता कीजिएगा। धर्मा वहां से आगे बढ़ा। कुछ दूर और चलने पर उसे एक वृद्ध व्यक्ति मिला, जिसके सिर का बोझ तब तक नहीं उतरता था, जब तक कि चार-पांच आदमी मिलकर उसे नोच-नोच कर उतारते नहीं थे। उसने भी धर्मा को कर्मा के मिलने पर अपना दुखड़ा सुनाने तथा उसका निवारण पूछने की बात कही। आगे मार्ग में उसे पुनः एक औरत मिली। उसने भी धर्मा को कहा कि यदि कर्मा उसे मिले तो उससे कहे कि जब वह खाना पकाती है तो उसके हाथ से कढ़ाई-बर्तन जल्दी छूटते नहीं हैं, वह हाथ में हीं चिपक जाता है यह समस्या किस तरह से दूर होगी।

चलते-चलते धर्मा एक रेगिस्तान में पहुंच गया। वहां जाकर उसने देखा कि उसका भाई कर्मा धूप और गर्मी से व्याकुल रेत पर पड़ा था। उसके पूरे शरीर पर फफोले पड़े थे। धर्मा ने उसकी यह हालत देखी और काफी दुखी हुआ। उसने कर्मा को घर चलने के लिए कहा तो कर्मा बोला मैं उस घर में कैसे जाऊं। वहां पर मेरी पत्नी है, जो इतनी अधार्मिक और बुद्धिहीना है कि मांड़ तक जमीन पर फेंक देती है। इस पर धर्मा बोला मैं आपको वचन देता हूं कि आज के बाद कोई भी स्त्राी मांड़ जमीन पर नहीं फेंकेगी।

कर्मा अपने भाई धर्मा के साथ घर की ओर चला तो मार्ग में उसे सबसे पहले वह स्त्राी मिली। उसे कर्मा ने कहा कि तुमने किसी भूखे ब्राह्मण को खाना नहीं दिया था, इसलिए तुम्हारी यह दशा हुई है। आज के बाद किसी भूखे का तिरस्कार मत करना, तेरे कष्ट दूर हो जाएंगे। 
अपने हिस्से का फूल खिलाएंगे 


अंत में उसे वह नदी मिली जिसमें पानी नहीं था। नदी को देखकर कर्मा ने कहा तुमने किसी प्यासे आदमी को साफ पानी नहीं दिया था, इसलिए अब तुम्हारे पास पानी नहीं है। आगे से तुम कभी अपना गन्दा जल किसी को पीने मत देना, कोई तुम्हारे तट पर पानी पीने आए तो उसे स्वच्छ जल देना, तुम्हारे कष्ट दूर हो जाएंगे। इस प्रकार कर्मा पूरे रास्ते में सभी को उसके हिस्से का कर्म प्रदान करते हुए अपने घर आया तथा घर में पोखर बनाकर उसमें करम डाइर लगाकर उसकी पूजा की। इलाके के अकाल समाप्त हो गए। खुशहाली लौटी। उसी कर्मा की याद में आज भी लोग कर्मा पर्व मनाते हैं। कर्मा की पूजा में नदी के किनारे करम की डाली लगाकर उसमें फूल खोंसा जाता है। लोक मान्यता है कि जो भी स्त्राी करम डाइर की पूजा करेगी और अपने हिस्से का कर्म पाएगी उसके कांटे जैसे स्वाभाव में भी फूल खिल जाएंगे।

कुछ करम गीत
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1. केकेर मुड़े हरदी रंगल फेंटा रे
केकर मुड़े जवा फूल रे .... 2
राजा कर मुड़े हरदी रंगल फेंटा रे
रानी कर मुड़े जवा फूल रे ... 2

2. गोड़ धोय, गोड़ धोय देले गे आयो
करम के विदा कइर देगे आयो ... 2
तेल सिन्दुर देले गे आयो
करम के विदा कइर देगे आयो ... 2
कोने डाइर आले रे करम
कोने डाइर जाबे करम ... 2
बन डाइर आले रे करम
नदी डाइर जाबे करम ... 2

3. करम का दिन आले रे जोगिया
बैठले धरम-दुवार रे ... 2
दे से गे आयो अनवा-धनवा
जोगी भइया दुवारे बैसय रे ... 2
न लेबो अना-धना, न लेबो सोना-रूपा
हमें लेबो कनिया कुंवार रे .... 2

मुंडा करम गीत -
1. काराम चांडुः मुलुःलेना
काराम ओड़ः सालबाल
काराम बोंगा को धेआन धोरोमताना
हाइ-जिलु काको जोमताना

(भावार्थ -
करम का चांद उग आया
करम देवता के घर चहल-पहल है
लोग करम देवता का ध्यान-धर्म करते हैं
वे मांस-मछली नहीं खाते।)

2. काराम दारू को आगुलेदा
राचा रेको बिद केदा
चुमान सिंदुरि, धुना-धुपकेदा
काराम बोंगा पुंजीः ओमाकोताना।

(भावार्थ -
लोग करम की डाली ले आए
उसे आंगन में रोपा
सिंदूर दान और धुवन-धूप से उसका चुमावन किया
करम देता उन्हें धन-धान्य देते हैं।)

3. काराम चांडुः मुलुःलेना
जुड़ि दुमाङ साड़िताना
दोति दोलाङ, दोति दोलाङ
किता गालाङ होंकाताम सुसुनालाङ।

(भावार्थ -
करम का चांद उग आया
मांदर की जोड़ी बज रही है।
वलो हम चलें, चलो हम चलें -
चटाई बिनना छोड़ो, हम नाच आएं। )



लेखक-परिचय: सक्रिय लेखक व एक्टिविस्ट . कई पत्र-पत्रिकाओं व सामाजिक आन्दोलनों से जुडाव. रांची में रहकर संताली पत्रिका जोहार सहिया और रंगकर्म त्रैमासिक रंगवार्ता का संपादन. नेट जर्नल अखडा के सदस्य . कुछ फिल्मों का निर्माण. कई किताबें प्रकाशित.सम्प्रति आदिवासी सौन्दर्य शास्त्र पर एक आलोचना पुस्तक लिख रहे हैं. संपर्क: akpankaj@gmail.com







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