बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
ब्लॉगर्स लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ब्लॉगर्स लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 11 मार्च 2014

दुपट्टे को बांध दूंगी बरगद की ऊंची शाख पर परचम की तरह


 






























ब्लॉगर्स की कविताओं की रंगत बेशुमार @ शब्द संवाद

सैयद शहरोज क़मर
की क़लम से

'अपने दुपट्टे को  बांध दूंगी
उस पक्की  सडक़ के  कि नारे वाले
बरगद की  ऊंची शाख पर परचम की  तरह।'

 इसे पढ़ते हुए तुरंत ही मशहूर शायर मजाज का शेर जेहन में उतर आता है,
'तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इससे परचम बना लेती तो अच्छा था।'
बरसों बाद युवा कवयित्री रश्मि शर्मा दुपट्टे को परचम बना लेने की बात कहती हैं। उनके साहस को  सलाम! वर्ना अब ऐसे बदलाव तो कविताओं से भी लुप्त होते जा रहे हैं। उनकी कविता अंतिम गांठ की यह पंक्ति है। ऐसी कई कविताएं वीना श्रीवास्तव के संपादन में प्रकाशित कविता संकलन 'शब्द संवाद' में संगृहित हैं। रश्मि की  रचनाओं में मौन का  जंगल पसरा है, जिसमें हवाओं की  अलगनी पर झूलते कई सवाल पूछते हैं कि हम इंसान हैं या जानवर। मौजूदा हिंसक  वातावरण में स्त्री पूछती है, 'क्या एक  औरत कर पाएगी / कभी किसी पर विश्वास/ कौन देगा/ इन अनगिनत प्रश्नों का  जवाब।'

इस संकलन में ब्लॉग पर सक्रिय  22 कवियों की रचनाएं शामिल हैं। इनमें 70 वर्षीय अशोक  सलूजा 'अकेला' से लेकर बीस साल के  टटका कवि मंटू कुमार भी हैं। पुस्तक  आधी दुनिया के पूरे सपने के  नाम समर्पित तो जरूर है। लेकिन इनमें महज 9 कवयित्रियों को  ही जगह मिली है। बकौल संपादक  हिंदी में 20 हजार ब्लॅागर हैं। इनमें नियमित लिखने वाले बहुत कम हैं। पर उन्होंने प्रतिनिधि रचनाकारों को सम्मिलित करने का  दावा किया है। कोई शक  नहीं कि कुछ नाम बहुत ही लोकप्रिय हैं। इनकी लोकप्रियता का  कारण भी उनकी रचनाधर्मिता है। पर बाकी  कवियों की रचनाएं अपेक्षाकृत कमजोर हैं, प्रतिनिधि तो क़तई नहीं कह सकते। लेकिन इनमें जिंदगी के  प्रति उत्कट लगाव है। विडंबनाओं को लेकर क्षोभ है।

छायावादी स्तंभों में रहे सुमित्रानंदन पंत की मानस-पुत्री सरस्वती की कवयित्री बिटिया रश्मि प्रभा 'कड़ी धूप में निकल गए समय से'  आंचल में कुछ छांह बांधकर बच्चों को वसीयत में देती हैं। इनके यहां चिडिय़ों की चोंच में उठा लिए गए और बादलों की  पालकी  पर उड़ते शब्द हैं। जो 'शब्द कभी विलीन नहीं होते / प्रेम हो / इंतजार हो / दुआ हो, मनुहार हो / वियोग हो, त्योहार हो।'  इनकी  कविताओं में 'शब्द साथ-साथ चलते हैं / कभी सिर्फ खिलखिलाते हैं / कभी बालों में घूमती मां की  उंगलियों से निकलते हैं, शब्द।'  कलावंती की पंक्तियां, 'स्त्रियां सुख का हाथ छोडक़र / दुख को पार करा देती हैं सडक़' या ' पिता जब तक थे जीवित / कितनी बड़ी आश्वस्ति थे।'  अनमोल वचन की भांति स्मरण में रह जाती हैं। रीता प्रसाद उर्फ ऋता शेखर मधु 'वाणी और क़लम' के  बल पर कहती हैं, 'उम्मीदों के  चिराग जलाके रखो'  क्योंकि  'जीवन के  कुरुक्षेत्र में...../ कोई भी होता नहीं / ज्ञान कोई देता नहीं।'  शारदा अरोड़ा भी 'सोच के दीप जलाकर'  देखने की बात कहती हैं।

'इंसान अब रहा नहीं तेरी दुनिया में ऐ खुदा
कोई यहां हिंदू, कोई मुसलमान रह गया।'
युवा कवि अमित कुमार अपने इसे शेर के  साथ संग्रह में सबसे पहले अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वहीं मदन मोहन सक्सेना की पंक्तियां भी असर छोड़ती हैं,
'भरोसा है हमें यारो कि कल तस्वीर बदलेगी
गलतफहमी जो अपनी है, वो सब दूर हो जाएं
लहू से फिर रंगा दामन ना हमको  देखना होगा
 जो करते रहनुमाई है, वो सब मजदूर हो जाएं।'

वहीं युवा चितेरे मंटू की  रचनाओं का खिच्चापन आकर्षित करता है। इस संकलन में शामिल दस कवियों ने दामिनी के बहाने पुरुष के  दुरंगेपन का बखूबी पोस्टमार्टम किया है। इनमें अशोक  कुमार सलूजा, मनोरमा शर्मा, मंटू, निहार रंजन, राजेश सिंह, रश्मि प्रभा, डॉ. शिखा कौशिक  'नूतन', वीना श्रीवास्तव और बिधू शामिल हैं। संकलन में आशु अग्रवाल, किशोर खोरेंद्र, नीरज बहादुर पाल, प्रकाश जैन, प्रतुल वशिष्ठ, रजनीश तिवारी, शशांक  भारद्वाज की भी कविताएं हैं।

पुस्तक : शब्द संवाद (कविता)
संपादक : बीना श्रीवास्तव
पृष्ठ: 228
मूल्य: 399 रु.
प्रकाशक : ज्योतिपर्व, दिल्ली

भास्कर झारखण्ड के 25 फ़रवरी 2014 के  अंक में प्रकाशित

read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)