ज़ाकिर हुसैन की क़लम से
तीन कविता एक ग़ज़लनुमा
1.
सुनो!
मन
व्यथित है
इन दिनों।
वे
हिन्दी फिल्मों की तरह
धीरे-धीरे
'सब्जैक्ट की डिमांड' के नाम पर
'लोकतांत्रिक स्क्रीन' में
'राजनीतिक नग्नता'
परोसते जा रहे हैं
और
इसी क्रम में
अब उन्होंने
भाषणों के झीने वस्त्र पहन
अपनी-अपनी
जुबानों के
'धमकियाते कर्व्स'
और 'नफरती क्लीवेज'
पूरी 'क्लासिकता' के साथ
दिखाने शुरू कर दिये हैं।
अपनी
जन स्वीकार्यता के लिए
वे
पहले ही
एक ऐसा
'विशेष वर्ग'
तैयार कर चुके हैं
जो
उनके इस 'मादक'
प्रदर्शन की डोज से
'उत्तेजनाओं' की 'लहर' पर सवार
'कामुक' दरिन्दा-सा
निकल पडा है
गलियों और सड़कों पर
कालिजों और दफ्तरों में
गांवों और शहरों की तरफ।
देखना
अब फिर
किसी शहर में डोलती
'सामाजिक एकता' से
'गैंग रेप' किया जाएगा।
देखना
अब फिर
किसी गांव में रहने वाले
'भाई-चारे' की
लाश गिरायी जाएगी।
2.
डरो मत!
कुछ नहीं होगा।
न तुम्हारी दिवाली
मेरे बिना मनेगी
न मेरी ईद
तुम्हारे बिना।
कुछ नहीं होगा।
चुनावों का मौसम है।
इस मौसम में
कुछ लोग
अपनी-अपनी
देह के
कीचड से बाहर
आ ही जाते हैं।
कुछ
तुम्हारे घर की नाली से
निकलेंगे
कुछ
मेरे घर की नाली से।
टर्रायेंगे।
गुर्रायेंगे।
गन्धायेंगे।
फिर
उसी कीचड में चले जायेंगे।
फिर भी
आदत डाल लो इनकी।
जब-जब चुनाव आयेंगे
ये भी पैदा हो जायेंगे।
तुम्हारे ही आजू-बाजू से।
चुपचाप।
अचानक।
अप्रत्याशित।
इतने चुपचाप
कि
तुम इन की पैदाइश न रोक सको।
इतने अचानक
कि
तुम इनकी पैमाइश न कर सको।
इतने अप्रत्याशित
कि
तुम इन्हें सामाजिक न बना सको।
ये
लोकतंत्र की नाजायज संताने हैं।
अविकसित।
असामाजिक।
मानवीय विकास में
पिछडी हुई।
और
इन्सान बनने से
ठीक उसी तरह डरती हैं
जिस तरह
तुम
जानवर बनने से।
3.
सुनो!
मैं जानता हूं
तुम्हारी
मुझसे कोई दुश्मनी नहीं
दोस्ती भी नहीं
कोई रिश्ता भी नहीं
फ़क़त इसके
कि
हम दोनों
एक ही देश के वासी हैं
समझो तो अर्थ बडा-सा है
न समझो
तो बात जरा-सी है
और
तुम मानो चाहे न मानो
इस बात को तुम भी जान गये
''मैं भारत भाग्य विधाता हूं
मैं कुरसी तक पहुंचाता हूं
बदकिस्मत हूं, मतदाता हूं''
4.
लोग मिलते हैं मिलते रहते हैं
सिलसिले यूं ही चलते रहते हैं.
लाख मुश्किल हो पेट का पलना
ख्वाब आंखों में पलते रहतें हैं.
प्यास से होंट सूख जायें भले
अश्क हैं कि उबलते रहते हैं.
ये हौसला है कुछ दुआओं का
हम जो गिर के सम्भलते रहते हैं.
और क्या खाक इन्तेहां होगी
दिल चरागों से जलते रहते हैं.
जिन्दगी तू भी सोच ले कुछ तो
वक्त सबके बदलते रहते हैं।
(कवि -परिचय:
ज़ाकिर हुसैन 'जवाहर' नाम से भी लेखन
जन्म: 19 फरवरी 1978 मुराद नगर ग़ाज़ियाबाद (यूपी)
शिक्षा: हिंदी से स्नातकोत्तर और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मॉस मीडिया में पीजी डिप्लोमा
सृजन: कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख, रपट व कहानी-कविताएं प्रकाशित
संप्रति: जयपुर में एक विज्ञापन कंपनी में हिंदी कॉपी राइटर
ब्लॉग: ख़ामोश बोल (जो पांच सालों से खामोश है)
संपर्क: anjum.zakir@gmail.com)
हमज़बान पर ज़ाकिर की एक कविता पहले भी आ चुकी है
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आशीष मिश्रा की क़लम से
हादसों की गूँज में इंसान का मातम
इन हाथों का काम ही क्या है? सुबह उठकर अखबार की पोथी थाम लेते हैं। चश्मा
आगे पीछे खिसका कर देखते हैं। कसमसाते हुए पढ़ते हैं, दिल्ली में बस में रेप
कर दिया। दारू के नशे में कहीं नीम की छांहों में पड़ा पुलिसकर्मी भी एक
फोटो कैपशन के साथ है। मामा मंत्री ने भांजे को करोड़ की घूस दिला दी। सरकार
ने किसी चिट्ठी में व्हाइटनर घिस डाला। मंत्री का बच्चा गुंडागर्दी करते
पकड़ा गया। मां के कड़ों के लिए बेटे ने पैर काट डाले। पति ने प्रेमिका के
साथ मिलकर बीवी की हत्या कर दी। 55 साल के बुजुर्ग ने बच्ची को फुसलाया।
फिर ताली पीटने लगते हैं ये हाथ, ओत्तेरी, गेल ने छक्कों की झड़ी लगा दी?
मॉडल ने टॉपलैस शूट कराया? अचानक कुछ होने लगता है। भीतर कुछ बेचैनी सा।
विचलित होकर यहां वहां ताकने लगता हूं। घर में सब ठीक है। ऑफिस ठीक चल रहा
है। तनख्वाह सही समय पर मिल रही है। किसी का उधार नहीं है। फिर? कुछ तो है
कहीं।
अपने सिर, पंजों और पैरों की उंगलियों के पोरे सहलाकर देखता हूं।
डर लगा रहता है। इंसान ही हूं ना अभी। कहीं सिर पर सींग तो न उग आए हैं।
कहीं उंगलियों के नाखून नुकीले और गोल तो नहीं हो गए हैं। कहीं पैरों की
जगह खुर तो नहीं निकल आए हैं। कहीं पशुत्व का कोई बीज तो मुझमें नहीं आ रहा
है। कभी कभी सीने पर हाथ रखकर सहलाता हूं। आवाज देता हूं अपने ही भीतर
झांक कर-’ओ दिल, ज़िन्दा है ना, ये धड़कन नकली तो नहीं।’ धड़कन का अपना उतार
चढाव होता है। डरता हूं ये समतल न हो जाए। कहीं ऐसा न हो कचरे के ढेर पर
थैली में लिपटी नवजात बच्ची देखूं और धड़कन की रफ्तार को कोई फर्क ही न पड़े।
चार दिन मां से बात न हो और ये उतरे ही ना। किसी गरीब को चिटफंड में लुटता
देखकर ये पसीजना तो बंद न कर देगा। कभी कभी दांत भी टटोलता हूं। गौर से
देखता हूं। ये सामान्य से ज्यादा तो नहीं बढ़ आए हैं। कहीं इनकी भूख अन्न और
जल से ज्यादा तो नहीं हो गई है। कहीं ये लहू तो न मांग बैठेंगे। कहीं किसी
स्त्री की देह तो न मांग बैठेंगे। क्या पता। आजकल हम खुदको कहां टटोलते
हैं। मोटरसाईकिल पर पीछे बंधे बैग की तरफ बार बार ध्यान जाता है। कहीं
रास्ते में गिर न जाए। पर अपने ही तरफ...? कहीं कुछ गिर न जाए। चरित्र या
सोच। कहां सोचते हैं हम? सोचने का वक्त भी कहां है। बस, एक निर्मम दौड़ में
शामिल हैं। थकना मना है। युवराज ने कहा था। युवराज थका तो सलमान ने कहना
आरंभ किया। दौड़ बराबर करनी है। दौड़ नहीं थकनी है। ऐसे में क्या पता। कब
अवसर मिले और हम गिर पड़ें। अपने आप में। कब अचानक से मालूम हो कि सिर पर
सींग उगे हैं, उंगलियों के आगे गोल और नुकीले नाखून निकले हैं और पैर खुर
हो गए हैं। हम तब शायद ये समझें कि ये सब अचानक हुआ। लेकिन अचानक तो कुछ
नहीं होता। अच्छा है कुछ होने की नब्ज ली जाए। टटोला जाए। हर वक्त, हर घड़ी।
अपने आप को टटोलना अच्छा है।
वरना किसी दिन अखबार में कोई पढ रहा होगा,
चिटफंड का फर्जीवाड़ा कर भागी कंपनी, और हम अपना फोन स्विच ऑफ कर कहीं छुपे
होंगे। छपा होगा बस में छेड़छाड़ के आरोपी को धरा, और हम भीड़ को सफाई दे रहे
होंगे कि गलती से हाथ लग गया। लिखा होगा रिश्वत लेते कर्मचारी रंगे हाथ
गिरफ्तार, और हम कह रहे होंगे ये पैसे तो उसने रिश्तेदार के इलाज के लिए
दिए थे। जाने क्या क्या लिखा होगा और हम हथकड़ियों, कोर्ट परिसर, थाने या
भीड़ न जाने कहां होंगे। अगर अखबार में हमारा जिक्र नहीं, या हम इनमें से
किसी जगह नहीं, इसका ये मतलब तो नहीं कि हममें पशुत्व नहीं। हम हंस न रहे
हों कि ’मैं पकड़ा नहीं गया।’
(
लेखक-परिचय:
जन्म : 10 नवंबर 1982 को राजस्थान में
शिक्षा: एमए हिन्दी एवं राजनीति विज्ञान, बीजेएमसी
सृजन: वर्चुअल संसार में छिटपुट। किसी ब्लॉग पर पहली बार
सम्प्रति: पिंकसिटी डॉट कॉम में कंटेंट राइटर
संपर्क: vinaysagar.mishra@gmail.com)
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