बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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रविवार, 15 मार्च 2015

चंद्रशेखर के मुनीश्वर भाई, सुषमा के दादा

मुनीश्वर बाबू अपनी लाडली बिटिया प्रीति (लेखिका) के साथ
स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता  मुनीश्वर प्रसाद सिंह  पर उनकी बेटी का संस्मरण


प्रीति सिंह की क़लम से



एक बार फिर सामने हूं अपने बाबूजी की कुछ यादें लेकर। वो यादें जो मुझे हर पल आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं । अगर आपको कोई राह दिखाने वाला हो, तो जीवन कितना सुगम बन जाता है. यह वही जान समझ सकता है जिसे जीवन पथ पर किसी अपने का साथ मिला हो। आज जब लोग किसी का काम बिना जान-पहचान के करने को तैयार नहीं होते। वैसी दुनिया में बाबूजीजी ने कितने अंजान लोगों की सहायता की है। उनका कहना था कि हम सिर्फ निमित्त होते हैं, मदद करने वाला तो ईश्वर होता है और जब ईश्वर ने जब हमें किसी को पास सहायता के लिए भेजा है तो फिर हम उसकी मदद नहीं करके ईश्वर का अपमान करेंगे। इसीलिए हर किसी की मदद को वो हर क्षण प्रस्तुत रहते थे।


जब मोटरसाइकिल हुई खराब,  बाबूजी ने दी बेटी-पिता को लिफ़्ट
उम्दा शख्सियत वाले बाबू जी का दिल दूसरों के लिए भी कितनी दया और सहानुभूति से भरा हुआ था, इसे बताने के लिए एक कहानी काफी होगी। एक बार देर रात हाजीपुर से किसी मीटिंग में हिस्सा लेकर बाबूजी घर लौट रहे थे। उनकी पुरानी एम्बेसडर कार को भैया  चला रहा था। साथ में सरकार की ओर से मिला बॉडीगॉर्ड भी था। गांधी सेतु पर उन्होंने एक मोटरसाइकिल चालक को अपनी गाड़ी घसीटते देखा। उनके साथ दो लड़कियां भी थीं। ये देखकर बाबूजी को ये समझते देर नहीं लगी कि मोटरसाइकिल खराब हो गई है। इतनी रात में उन्हें अकेले देखकर उन्होंने  कार रुकवाई और अपने बॉडीगॉर्ड हवलदार कलक्टर सिंह को मोटरसाइकिल वाले को गाड़ी में चलने का आग्रह लेकर भेजा। अंजान लोगों की ओर से मदद की पेशकश देखकर मोटरसाइकिल चालक थोड़ा घबराए । जमाने की हवा ही ऐसी है कि किसी को किसी पर यकीन नहीं आता। आज की इस मतलबी दुनिया में निस्वार्थ मदद भी सामने वाले के मन में संदेह पैदा करती  है। असमजंस में पड़े उस शख्स को देखकर बाबूजी ने उन्हें खुद अपना परिचय दिया और देर रात पैदल दो बेटियों को अपने साथ लेकर जाने से उन्हें मना किया। भैया ने मोटरसाइकिल को कार में टोचन किया। उसको हवलदार साहब लेकर चले। जबकि कार में वो व्यक्ति और उनकी दोनों बेटियां बैठीं।  बाबूजी ने उन्हें गंतव्य पर उतार कर ही राहत की सांस ली। ऐसी कई घटनायें हैं। उन्होंने न जाने कितने लोगों को प्रोफेसर, इंजीनियर और डॉक्टर बनवाया। कितने लोगों की पढ़ाई में मदद की और न जाने कितनों को राजनीति का ककहरा सिखाया। लेकिन समय के साथ लोग आगे बढ़ते चले गए और उन्हें ही भूल बैठे।

आचार्य कृपलानी का घड़ा सुचेता की फ्रिज

बाबूजी की तेज बुद्धि, निर्णय लेने की अद्भुत शक्ति, जबरदस्त उत्साह और सकारात्मक सोच का कुछ भी प्रतिशत मुझमें होता तो मैं खुद को धन्य मानती।  युवावस्था में जब बाबूजी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे तब उन्हें पार्टी के कद्दावर नेता जेबी कृपलानी को चुनाव लड़ने के लिए मनाने की जिम्मेवारी दी गई। उस वक्त तक जेबी कृपलानी  ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया था और पार्टी के तमाम बड़े नेता उन्हें मना कर थक चुके थे। उनका चुनाव लड़ना जरुरी था। क्योंकि पार्टी को इसकी जरुरत थी। उस वक्त लोग उसूलों के लिए चुनाव लड़ते थे, न कि अपने क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने के लिए। खैर, सब ओर से हारकर हाईकमान ने बाबूजी को ये जिम्मेवारी सौंपी। बता दें कि जेबी कृपलानी देश के कद्दावर समाजवादी नेताओं में से एक थे और उनकी धर्मपत्नी सुचेता कृपलानी कांग्रेस की नेता। सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और देश की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं। लेकिन वैचारिक दृष्टिकोण अलग-अलग होने की वजह से दोनों अलग-अलग पार्टियों में थे। बहरहाल, जब बाबूजी आचार्य कृपलानी को मनाने पहुंचे तो उस वक्त भीषण गर्मी थी। बातचीत के दौरान आचार्य कृपलानी ने  फिर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। बाबूजी ने उन्हें कई तर्क-वितर्क के द्वारा मनाने की कोशिश की। अचानक बीच में आचार्य कृपलानी ने बाबूजी से पानी पीने के लिए पूछा। चूंकि मौसम गर्मी का था। प्यास बाबूजी को भी लगी थी। उन्होंने पानी के लिए हां कर दिया। इस पर कृपलानी जी ने पूछा कि तुम किसका पानी पीना पसंद करोगे, मेरा या सुचेता का? बाबूजी ने कहा कि आपका। पानी पिलाने के बाद कृपलानी जी ने एक बार फिर बाबूजी से पूछा कि आखिर तुमने मेरा पानी क्यों चुना और इस प्रश्न के पूछने के पीछे मेरा मकसद क्या था? तब बाबूजी ने बहुत शांत लहजे में कहा कि – दरअसल आप इस प्रश्न के द्वारा मेरी बुद्धिमता और मेरे मकसद को जानना चाहते थे। आपने किसका पानी पियोगे ये पूछकर पार्टी के प्रति मेरी प्रतिबद्धता को भी जांचा। चूंकि सुचेता जी कांग्रेस नेता और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं तो जाहिर सी बात है कि उनके पास फ्रिज होगा। जबकि आप सोशलिस्ट नेता हैं तो आपके पास घड़ा है। इसीलिए आपने पूछा कि तुम सुचेता का या मेरा पानी पियोगे? और चूंकि मैं आपके दल का कार्यकर्ता हूं और आपका अनुयायी भी। इसीलिए मैंने  फ्रिज के बजाय घड़े के पानी को पीना स्वीकार किया। कृपलानी जी बाबूजी के इस जवाब से काफी खुश हुए और उन्होंने चुनाव लड़ने की बात को मान लिया। पार्टी की ओर से उन्होंने बांका से चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से विजयी हुए। कृपलानी जी ने बाबूजी की जमकर तारीफ की और आलाकमान को भी युवा नेता के तौर पर उनको पार्टी में शामिल करने करने के लिए बधाई दी।


खर्च अपना पैरवी दूसरों की किया करते थे
हालांकि सच और बेबाक बोलने की अपनी आदत की वजह से वो कई बार न होने वाले काम के लिए अपनी असमर्थता भी जता देते थे। आज-कल के नेताओं की तरह झूठे आश्वासन देकर लोगों को अपने पीछे घुमाना उन्होंने नहीं सिखा था। कई बार शुभचिंतकों ने उन्हें लोगों के मुंह पर काम नहीं होने की बात न बोलने की सलाह भी दी। लेकिन उन्होंने हर बार इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि किसी के मन में झूठी उम्मीद को जगाया जाये।  आज जहां राजनेता काम कराने के बदले रुपये लेते हैं। वहीं बाबूजीजी अपने रुपये खर्च कर उनकी पैरवी किया करते थे। बार-बार फोन करने की वजह से टेलीफोन का बिल हजारों रुपये का आता था। और-तो-और वो घरवालों को भी परेशान कर दिया करते थे। कई बार तो उनकी इस परोपकार की प्रवृति से हमलोग चिढ़ जाया करते थे। लेकिन उनका कहना था कि किसी भी सूरत में प्रत्येक इंसान का ये कर्तव्य है कि वो दूसरों की मदद करे और वो भी बिना किसी स्वार्थ के। इसीलिए शायद ये गुण जाने-अंजाने मुझ में भी आ गया। बाबूजी को देश के बड़े-बड़े राजनेताओं का प्रेम और सम्मान मिला। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने हमेशा उन्हें मुनीश्वर भाई कह कर ही संबोधित किया। तो सुषमा स्वराज उन्हें दादा कहकर बुलाती थीं। दक्षिण के वरिष्ठ राजनेता रामकृष्ण हेगड़े उनके प्रगाढ़ मित्रों में से एक थे। इन सबके बावजूद बाबूजी ने अपनी राजनीतिक पहुंच का फायदा कभी भी अपने परिवार या बच्चों के लिए नहीं उठाया। उन्हें अपनी कर्मभूमि महनार से असीम लगाव था। तभी तो पार्टी द्वारा कई बार लोकसभा चुनाव लड़ने की गुजारिश के बाद भी उन्होंने सिर्फ इसलिए महनार विधानसभा नहीं छोड़ा कि वो अपने क्षेत्र से दूर चले जायेंगे, जो कि उन्हें किसी भी सूरत में गवारा न था। लेकिन कहते हैं न कि ज्यादा प्रेम तकलीफ भी लेकर आता है। तभी तो इस क्षेत्र ने उन्हें 1995 के चुनाव में वो दर्द दिया, जो लंबे समय तक उनके जेहन में ताजा रहा। इस चोट ने उन्हें राजनीति का परित्याग करने को मजबूर कर दिया। ओछी राजनीति ने उन्हें गहरी पीड़ा दी और उन्होंने सक्रिय राजनीति से एक दूरी बना ली।

 ऐसी खुशबू कहां से लाऊंगी
बाबूजी धार्मिक रुढ़ियों को नहीं मानते थे। लेकिन अध्यात्म में उनकी गहरी रुचि थी। खाली वक्त में वो रामायण, महाभारत और गीता पढ़ते थे। हमलोगों से भी वो अक्सर कहते थे कि इन पुस्तकों को पढ़ो। धार्मिक पुस्तकें समझ कर नहीं, बल्कि ज्ञान हासिल करने के लिए। उन्हें पढ़ने का बेहद शौक था। वो पुस्तकों का गहन अध्ययन करते थे। मुझे याद है.. जब बाबू जी  विधायक थे तो मुझे विधानसभा के पुस्तकालय से अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाकर पढ़ने के लिए देते थे। चंद्रकांता संतति का संपूर्ण भाग मैंने जब पढ़ा था। उस वक्त मैं सांतवीं कक्षा की छात्रा थी। पटना में पुस्तक मेला से पुस्तकें लाने के लिए भी  उत्साहित करते थे और रुपये देकर पुस्तकें खरीदने भेजा करते थे। अपनी अस्वस्थता के दौर में जब वो पढ़ने-लिखने में असमर्थ हो गए थे। उस वक्त मैं उन्हें अखबार और किताबें पढ़कर सुनाया करती थी। ये दौर बेहद पीड़ादायक था। जब कोई अपना लाचार होकर बिस्तर पर पड़ जाता है तो उसके साथ-साथ पूरे परिवार को उस दर्द को झेलना पड़ता है। हालांकि बाबूजी ने कभी अपनी शारीरिक बेबसी की वजह से घरवालों को कोई तकलीफ नहीं पहुंचाई। लेकिन जो शख्स महीनों तक घर नहीं आते थे। जिनका एक-एक पल कीमती था। वो आज जिस तरह से बिस्तर पर पड़े हुए थे। ये खुद में दुखद था। घड़ी की घंटी को सुनकर वो अपने बगल में रखी हाथ घड़ी को उठाकर देखते थे और समय काटते थे। उन्हें बिस्तर पर पड़े-पड़े यूं समय काटते देख मैं कितनी बार रोई हूं। जब शाम को मैं उनके कंधे पर सिर रखकर उनके बगल में सो जाती थी। तो स्वर्ग का सुख भी उसके सामने फीका नजर आता था। हां, मेरे बाबूजी वो इंसान हैं जिनसे मैंने  जिंदगी में सबसे ज्यादा प्यार किया। वो बेमिसाल थे। हालांकि अब मुझे लगता है कि कई बार मैंने उन्हें उतना समय नहीं दिया, जितना देना चाहिए था। कई बार मैंने उनसे गुस्से में बात की और कई बार बेवजह बहस भी की। लेकिन ये हमें तब कब अहसास होता है जब हम अपनों के साथ होते हैं। उन्हें खोने के बाद ही हम उनका मोल समझते हैं। लेकिन तब पछतावे और आंसू के अलावे कुछ नहीं रह जाता। मां-बाप आपके सिर की वो छत होते हैं जो आपको हर मौसम की मार से बचाते हैं और इसका अहसास तब होता है जब सब कुछ खत्म हो जाता है। मुझे लगता है सात्विक लोगों के शरीरों से अच्छी सुंगध निकलती है। बाबूजी के कपड़ों और उनकी देह से भी ये खुशबू आती थी। उनके शरीर से निकलने वाली इस सुंगध को मैं लाखों-करोड़ों लोगों सुगंध में भी पहचान सकती हूं। वो अपनी तरह की अलग एक ऐसी खुशबू थी जिसे शायद मैं ही पहचानती हूं। ये इस कारण भी शायद संभव था। क्योंकि मैं अतिसंवेदनशील हूं।


. . . और  डायरी का वो पन्ना

बाबूजी  हर दिन की अपनी गतिविधियों और विचारों को  डायरी में लिखते थे। वो हमें भी डायरी लिखने के लिए प्रोत्साहित करते थे। बीमारी में जब वो लिख पाने में असमर्थ थे तो उनकी डायरी मैं लिखती थी। ये नियम था। वो अपनी बातें बताते जाते थे और मैं लिखती जाती थी। आज जब उन डायरियों को पढ़ती हूं तो सारी बातें आंखों के सामने किसी रील की तरह आकर चली जाती है। अगर आत्मा की आत्मा से भेंट होती है तो मैं मौत के बाद अपने बाबूजी की आत्मा से सबसे पहले मिलना चाहूंगी। काश कि ये दुनिया एक बार और वक्त को पलट देता तो मैं अपने बाबूजी के साथ और भी समय बिता पाती। वो सारी गलतियां जो मैंने जाने-अंजाने की। उन सभी को मैं दूर कर देती। लेकिन शायद यही जीवन है। यहां कुछ भी हमेशा नहीं रहता। रह जाती हैं तो बस यादें और वो गलतियां, जो हमें अपने बुरे बर्ताव और अपनी बेवकूफियों की याद हमेशा दिलाती रहती हैं।

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 20 मई 1980 को पटना बिहार में
शिक्षा: पटना के मगध महिला कॉलेज से मनोविज्ञान में स्नातक, नालंदा खुला विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में हिन्दी से स्नाकोत्तर
सृजन: कुछ कवितायें और कहानियां दैनिक अखबारों में छपीं। समसायिक विषयों पर लेख भी
संप्रति: हिंदुस्तान, सन्मार्ग और प्रभात खबर जैसे अखबार से भी जुड़ी, आर्यन न्यूज चैनल में बतौर बुलेटिन प्रोड्यूसर कार्य के बाद फिलहाल एक संस्थान में कंटेंट डेवलपर और  आकाशवाणी में अस्थायी  उद्घोषक
संपर्क: pritisingh592@gmail.com)

हमज़बान पर पहले भी प्रीति सिंह को पढ़ें
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मंगलवार, 6 जनवरी 2015

कौन जानता है आज़ादी के योद्धा तेगवा बहादुर को

बिहार के पूर्व मंत्री व समाजवादी नेता मुनीश्वर प्रसाद सिंह



 














प्रीति सिंह की क़लम से

"तेगवा बहादुर सिंह" के नाम से प्रसिद्ध मुनीश्वर प्रसाद सिंह का जन्म 29 नवम्बर 1921  को वैशाली जिला के महनार थाना के बासुदेवपुर चंदेल गांव में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में  हुआ था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय बांकेबिहारी सिंह और माता का नाम स्वर्गीय गया देवी था। स्व. मुनीश्वर प्रसाद सिंह छ: भाई-बहनों में सबसे बड़े थे।. बचपन से मेधावी रहे. सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के संस्कार आँगन से  हासिल किया। प्राथमिक शिक्षा गाँव में, फिर जन्दाहा  हाईस्कूल  में दाख़िला लिया। लेकिन अंग्रेजी दासता से मुक्ति के उपाय नित्य दिन सोचा करते। इस बीच सन् 1937 में अंडमान-निकोबार जेल से छूट कर स्व. योगेन्द्र शुक्ल आये.  उनके भाषण ने किशोर मुनीश्वर को मानो प्रेरणा दे दी.  और वो स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में कूद पड़े।

रेल, डाक और तार सेवा बाधित किया
 भारत सरकार के तत्कालीन सचिव श्री डार्ननरी का रेडियो भाषण (जिसमें उन्होंने रेल,डाक और तार सेवा को बाधित नहीं करने की अपील की थी) सुनने के बाद मुनीश्वर ने क्रांतिकारी कदम उठाया और रेल,डाक औऱ तार सेवाओं को बाधित कर अंग्रेज सरकार की नींव हिलाने का निश्चय किया। फलत: अपने साथियों युगल किशोर खन्ना,   राजेन्द्र सिंह,   लाला सिंह और  बलभद्र सिंह को साथ लेकर उन्होंने उत्तर बिहार में अनेक स्थानों पर इन सेवाओं को बाधित कर दिया। इस घटना के बाद  मुनीश्वर  अंग्रेज सरकार की आंखों की किरकिरी बन गए। अंग्रेज सरकार इन्हें जोर-शोर से पकड़ने के लिए जुट गई। जल्द ही ये अंग्रेज सरकार द्वारा पकड़ लिए गए। लेकिन कुछ ही दिनों में छूटकर जेल से बाहर आये और भूमिगत होकर स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में अपना योगदान देते रहे।
 
जयप्रकाश के आजाद दस्ता में शामिल
सन् 1942 में जयप्रकाश नारायण द्वारा गठित आजाद दस्ता में शामिल होकर मुनीश्वर ने हनुमान नगर, नेपाल में  गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग ली. इसके बाद  अंग्रेज सरकार की नाक में एक बार फिर से दम भर दिया। जब जयप्रकाश नारायण को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया तब मुनीश्वरने  दस्ता के अपने साथियों के साथ मिलकर उन्हें जेल से बाहर निकाला।  इसी बीच दरभंगा के लहेरियासराय के अंदामा गांव में अंग्रेज दारोगा आदित्य झा की हत्या आजाद दस्ता के दरभंगा के सरदार रामलोचन सिंह के घर कुर्की-जब्ती करने जाते वक्त कर दी गई। इस मामले में मुनीश्वर को आरोपी बनाया गया।

बनारस में गिरफ्तार, लखनऊ जेल में
लेकिन युवा  तेगवा बहादुर और उसके साथी इससे तनिक न घबराए।  शहीद सूरज नारायण सिंह, गुलाबी सोनार, देवनारायण गुरमैना, अक्षयवट राय, योगेन्द्र शुक्ल , अमीर गुरुजी, सीताराम सिंह, लाला सिंह, राजेन्द्र सिंह, युगल किशोर खन्ना, बलभद्र सिंह और मुनीश्वर प्रसाद सिंह सहित आजाद दस्ता के अन्य साथियों ने 1942 से 1944 तक तिरहुत एवं दरभंगा कमिश्नरी में गुरिल्ला युद्ध के द्वारा अंग्रेज शासन की चूलें हिला दीं।
12-13 सितम्बर 1944 को आजाद दस्ता को भंग किए जाने के बाद शहीद सूरज बाबू के साथ मुनीश्वरभी  बनारस आ गये। ये दोनों बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रावास में रुके थे। यहां से ये दोनों क्रांतिकारी अपने आंदोलन को  गति देने लगे।  11 नवम्बर 1944 को डॉ. सम्पूर्णानंद से मिलकर छात्रावास लौटते वक्त बनारस अस्सी घाट में ये दोनों अंग्रेज सरकार द्वारा पकड़ लिए गये। मुनीश्वर प्रसाद सिंह को लखनऊ जेल में रखा गया।

बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर तलवे में बेंत से पिटा जाता
जेल में इन्हें अमानुषिक तकलीफें दी गईं। हफ्तों इन्हें भूखा रखा जाता था, ठंड की कड़कड़ाती रात में नंगे बदन ठंडे पानी में सारी रात खड़ा रखा जाता था। मारपीट तो रोज की बात थी। बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर पैर के तलवे में बेंत से पिटा जाता था, नाखून उखाड़ लिए जाते थे। इसी टॉर्चर के दौरान एक अंग्रेज सरकार ने डॉ. विजयालक्ष्मी पंडित को एक भद्दी सी गाली दे दी। जिसका मुनीश्वर  ने जबरदस्त विरोध किया। जिसके बाद अंग्रेज अफसर ने इन पर जुल्म की इंतिहा कर दी और अमानुषिकतायें अपनी सीमा लांघ गईं। फिर भी इन्होंने उफ तक नहीं की और अपने क्रांतिकारी साथियों का नाम नहीं बताया। इसी दौरान इनके सिर पर इतने डंडे बरसाये गए जिसकी वजह से मुनीश्वर बाबू की बांयीं आंख की रोशनी हमेशा के लिए कम हो गई। 

अंदामा कांड में  सुनाई गई फांसी की सजा
लखनऊ जेल में मुनीश्वर बाबू स्वर्गीय सिंह वाई. वी. चव्हाण, लालबहादुर शास्त्री, अलगू चौधरी, रफी अहमद किदवई आदि के निकट संपर्क में आये। लखनऊ जेल से मुकदमे की सुनवाई के सिलसिले में इन्हें दरभंगा लाया गया।मुनीश्वर बाबू पर  अंग्रेज सरकार ने 88 से ज्यादा मुकदमों में नामजद किया। अंग्रेज जज ब्लैक बर्न ने "अंदामा कांड" में फांसी की सजा सुनाई। लेकिन अन्य मुकदमों में सुनवाई चलते रहने की वजह से इन्हें उस वक्त फांसी की सजा नहीं दी गई। सुनवाई के दौरान इन्हें हजारीबाग सेंट्रल जेल में रखा गया। 26 जून 1946 को बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के आदेश पर इन्हें जेल से रिहा किया गया। मुनीश्वर प्रसाद सिंह सन् 1948 में वकाश्त आंदोलन में भी सक्रिय रहे।
     
समाजवादी आंदोलन को दी गति 
आजादी के बाद स्वर्गीय मुनीश्वर प्रसाद सिंह जी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए। बाद में वो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में चले गए। आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया, नाथपाई, एन.जी.गोरे, एस.एम.जोशी, अशोक मेहता, मधु दंडवते, बसावन बाबू, रामानंद तिवारी, सुरेन्द्र मोहन, प्रेम भसीन, एस.एन. द्विवेदी, यमुना शास्त्री, जॉर्ज फर्नांडीस, चंद्रशेखर, कर्पूरी ठाकुर , रामबहादुर सिंह, युवराज सिंह और रामसुंदर दास के साथ मिलकर मुनीश्वर प्रसाद सिंह समाजवादी आंदोलन को मजबूती प्रदान करने में लगे रहे।1974 में "जयप्रकाश आंदोलन" में जयप्रकाश जी के आह्वान पर बिहार विधानसभा की सदस्यता से 6 जून 1974 को स्वर्गीय मुनीश्वर प्रसाद सिंह ने इस्तीफा दे दिया। ऐसा करने वाले ये बिहार विधानसभा के पहले विधायक थे।
 
चार बार महनार विधानसभा का प्रतिनिधित्व 
मुनीश्वर प्रसाद सिंह  ने  सन् 1962, 1972, 1977 और 1990 में वैशाली जिला के महनार विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। विधानसभा के कई महत्वपूर्ण कमिटियों के सदस्य रहे। सन् 1979-80 में बिहार सरकार के सिंचाई एवं विद्युत विभाग के मंत्री के रुप में अपनी प्रशासकीय क्षमता का उत्कृष्ट परिचय आप ने दिया। इस दौरान उनके कई फैसले अति महत्वपूर्ण और लीक से हटकर रहे। लेकिन उन्हें ज़्यादा समय राजनीतिक विडंबना ने नहीं दिया। ओछी राजनीति के तहत तत्कालीन  सरकार को अचानक गिरा दिया गया।

92 वें वर्ष में  त्यागा देह  
मुनीश्वर प्रसाद  ने आजीवन समाजवादी आंदोलन को गति देने का काम किया।  अपनी ईमानदारी, धर्मनिरपेक्षता, समाजवादी चिंतन और अक्खड़ मिजाज के लिए मुनीश्वर प्रसाद सिंह विख्यात रहे। 75-76 वर्षों के लंबे राजनैतिक-सामाजिक जीवन के बाद अपने जीवन के 92 वें वर्ष में 5 नवम्बर 2013 को इलाज के दौरान बिहार की राजधानी पटना के एक निजी अस्पताल में मुनीश्वर प्रसाद सिंह का निधन हो गया।
इसके साथ ही स्वतंत्रता संग्राम और समाजवादी राजनीति की एक अहम कड़ी हमेशा-हमेशा के लिए टूट गई।

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 20 मई 1980 को पटना बिहार में
शिक्षा: पटना के मगध महिला कॉलेज से मनोविज्ञान में स्नातक, नालंदा खुला विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में हिन्दी से स्नाकोत्तर
सृजन: कुछ कवितायें और कहानियां दैनिक अखबारों में छपीं। समसायिक विषयों पर लेख भी
संप्रति: हिंदुस्तान, सन्मार्ग और प्रभात खबर जैसे अखबार से भी जुड़ी, आर्यन न्यूज चैनल में बतौर बुलेटिन प्रोड्यूसर कार्य के बाद फिलहाल  कंटेंट डेवलपर और  आकाशवाणी में नैमित्तिक उद्घोषक
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लेखिका मुनीश्वर बाबू की सुपुत्री हैं। जल्द उनका आत्मीय संस्मरण पढ़ें।

हमज़बान पर पहले भी प्रीति सिंह को पढ़ें पटना में कामकाजी स्त्री








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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)