बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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सोमवार, 31 अगस्त 2015

सड़क के बहाने औरंगज़ेब की बातें भी हैं कुछ और

इधर की टोपी उधर गई



















उमाशंकर सिंह की क़लम से



दिल्ली में हजारों सड़कें हैं। सैकड़ों फ्लाईओवर हैं। रोज नई सड़कों-फ्लाईओवरों का निर्माण होता ही रहता है। ऐसे में ऐसी क्या मजबूरी थी कि औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर आपको माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम रोड करना पड़ा?? आप इसके लिए किसी नई सड़क को चुन सकते थे। क्या आपको ये लगता है कि औरंगज़ेब का नाम एक सड़क से मिटा कर आप इतिहास से यह बात मिटा देंगे कि वह दिल्ली का सबसे लंबे वक्त तक शासक रहा है?? फिर औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर आप हाल ही में सड़क दुर्घटना में दिल्ली में ही दिवंगत हुए इसी सरकार के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे के नाम पर रख सकते थे। पर, चूंकि वह हजारों साल से बदनाम किए गए औरंगज़ेब के नाम का रोड था, इसलिए आपकी सस्ती धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक समझदारी के हिसाब से उसके रिप्लेसमेंट के लिए भी आपको एक मुसलिम नाम चाहिए था जो आपको सूट भी करता हो और आपने औरंगज़ेब रोड का नाम कलाम रोड कर दिया!! असल में हार्दिक पटेल की उम्र कम है जिसकी राजनीति से पार पाने के लिए आपको बहुत कुछ करना पड़ रहा है, पर आपकी राजनीतिक समझदारी और इतिहास ज्ञान उससे भी गया-बीता है। मैं बताता हूं आपको औरंगज़ेब के बारे में आप कितना कम और कितना गलत जानते हैं!


औरंगज़ेब के बारे में कुप्रचार की कहानी सैकड़ों साल पुरानी है और उसके मरने के बाद से ही जारी है। इसमें ब्राह्मण और मौलवी दोनों समान रूप से भागीदार थे। उसके बीज यहां से पड़े जब औरंगज़ेब ने ब्राह्मणें पर तीर्थयात्रा के लिए लगने वाला जज़िया कर कर लगाया जो शेष हिंदुओं पर पहले से लगता था। इसे इस तरह प्रचारित किया गया कि औरंगज़ेब ने हिंदुओं पर जज़िया लगा दिया। जबकि गैर- ब्राह्मण हिंदुओं पर पहले से जज़िया और गैर-मौलानाओं पर जदिया लगता था। औरंगज़ेब ने दोनों को करों के ज़द में लाकर एक साथ दोनों की दुश्मनी मोल ले ली। नतीजा सामने है। कुछ साल पहले बजरंग दल के नेता विनय कटियार ने अपने एक भाषण में कहा था कि औरंगज़ेब संस्कृत ग्रंथों को देखते ही जलवा देता था। अब सचाई देखिये।

मशहूर काव्यशास्त्री और कवि पंडितराज जगन्नाथ औरंगज़ेब के दरबारी थे और उन्हीं के संरक्षण और हौसला अफ़ज़ाई में पंडितराज ने 'पीयूषलहरी', 'गंगालहरी', 'अमृत लहरी', 'लक्ष्मी लहरी' और काव्यशास्त्र मीमांसा ग्रंथ 'रसगंगाधर' लिखा था (काव्यशास्त्र और हिंदी साहित्य के रीतिकाल के छात्र इस पर और प्रकाश डाल सकते हैं) । औरंगज़ेब ने ना तो पंडितराज जगन्नाथ को जलवाया और ना उनके लिखे इन ग्रंथों को। ये ग्रंथ अभी भी उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं पंडितराज ने औरंगज़ेब के राज्याश्रय में रहते हुए बादशाह की बहन से शादी की और उसका नाम तन्वंगी (जहां तक मुझे याद है) रखा। उस पर संस्कृत में कविता भी लिखी। औरंगजेब ने यह रिवर्स लव जिहाद अपने समय में अपने राज में बल्कि अपने दरबार में अपनी बहन के साथ होने दिया!


यह किविदंति हो सकती है। पर, यह किविदंति और किसी उदार मुगल बादशाह के बारे में नहीं, सिर्फ बदनाम औरंगज़ेब के बारे में सुनने को मिलती है कि वह अपने जीवनयापन के लिए शाही कोश को हाथ नहीं लगाता था। टोपियां सिल के अपना गुजारा करता था। और एक दिन जब खाना पकाते हुए उनकी बेगम का हाथ पक गया और तुनकते हुए उसने खानसामे की मांग की, तो औरंगज़ेब ने कह कर इंकार कर दिया कि वह खानसामे का खर्च अफोर्ड नहीं कर सकता। वह पांच वक्त का नमाजी था और इस्लामी रवायत के अनुसार दरबार में शाही पोशाक नहीं पहनता था। शिवाजी को पराजित करने के बावजूद उसने उनकी हत्या नहीं की। उसने दारा शिकोह की हत्या की, पर पर दारा शिकोह के फायनेंसर जो उस वक्त के गुजरात के व्यापारी थे का पूरा पैसा चुकाया। उसने कई मंदिरों को जमीनें दान की, जिनमें मथुरा के मंदिर खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। बनारस के जिस मंदिर को उसने तोड़ा उसके पुजारियों पर किन्हीं हिंदू महिला के बलात्कार का ही अभियोग था। जैसे आशाराम ने अपने हिंदू अनुयायी महिला का ही यौनशोषण किया वैसे ही! बाकी जैसे शासक होते थे वह वैसा ही था। थोड़ा सा निरंकुश! थोड़ा सा न्यायप्रिय! थोड़ा सा खुशामदपसंद। पर ऐसा उसमें क्या था कि आप उससे सदियों तक खुन्नस पालें और उसके नाम का रोड तक बदललते रहें!


वैसे मसला सिर्फ औरंगज़ेब को हीरो या विलेन बनाने का नहीं, पूरे इतिहास को एक आंख से देखने की खतरनाक रवायत का है। वैसे नामकरण की पॉलटिक्स की रोड बहुत आगे नहीं जाती। जनता के प्रतिरोध का अपना तरीका होता है। वह आपके तमाम नामकरण की हवा उड़ा देती है। छ़त्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) के आधिकारिक नाम के बहुत साल बाद भी 'वीटी' (विक्टोरिया टर्मिनस) लोगों के जुबां से कम नहीं हुआ है। दिल्ली के कांग्रेस अध्यक्ष रहे जयप्रकाश अग्रवाल के पिता और अपने वक्त के ताकतवर कांग्रेस नेता रामचरण अग्रवाल के नाम पर दिल्ली का सबसे अहम चौराहा है। पर कोई रामचरण अग्रवाल चौक नहीं बोलता! सब आईटीओ ही बोलते हैं। मेट्रो रोज लाखों लोगों के कान में बोलता रहता है कि अगला स्टेशन राजीव चौक है पर फिर भी राजीव चौक नाम कनॉट प्लेस को रिप्लेस नहीं कर पाया है। अपनी तो बस इतनी ख्वाहिश है आपसे कि कुछ ठोस कीजिये। सिर्फ नाम बदलने से कुछ नहीं होने वाला है। हालांकि मैं जानता हूं ये आपके हिसाब से एक बड़ी मांग हो गई!


(रचनाकार -परिचय:

जन्म: 9 सितंबर को
शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर।
सृजन: कई प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
संप्रति: मुंबई में रहकर सिनेमा के लिए लेखन
संपर्क: uma.change@gmail.com )









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शनिवार, 29 अगस्त 2015

कैसे बढ़ी मुसलमानों की आबादी और हिंदुओं की घटी































रक्त रंजित गोधरा, रस रूप मंथन करे
शव की उड़ती धूल, शिव का महिमा मंडन करे



गुंजेश की क़लम से

ठीक है, मेरी गणित कमज़ोर है। लेकिन फिर भी मैं समझना चाहता हूँ कि जब किसी हिन्दू घर में कोई मुसलमान बच्चा पैदा नहीं हो सकता तो फिर, मुसलमानों की आबादी बढ़ी कैसे, और कैसे हिंदुओं की घटी। 2001 में हिंदुओं की आबादी 82.75 करोड़ थी जो 2011 में 96.63 करोड़ हो गई है। फिर सरकार इसे घटा हुआ क्यों बता रही है? क्या वृद्धि में प्रतिशत कमी जनसंख्या में भी कमी है? 2001 के मुक़ाबले 2011 में 13 करोड़ से ज़्यादा हिन्दू बढ़े हैं। वहीं 2001 में आबादी का 13.4 प्रतिशत हिस्सा रहे मुसलमानों की आबादी 2001 में 13.8 करोड़ थी जो अब 3.42 करोड़ बढ़ कर 17.22 करोड़ हो गई है। इस लिहाज से देखा जाय तो 2001 से 2011 के बीच जहां मुसलमों की आबादी में 24.78 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है वहीं हिन्दू भी इस अवधि में 15.7 प्रतिशत बढ़े हैं। जनसंख्या में 2.3%, 1.7%, 0.7%, 0.4% की हिस्सेदारी रखने वाले धर्मावलंबी जो क्रमशः ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन हैं की संख्या में भी क्रमशः 15.5%, 8.4%, 6.1% और 5.4 की बढ़ोतरी हुई है। तो गज़ब देश के देश भक्त नागरिकों, एक बात तो पक्की है कि किसी भी कौम की संख्या कम नहीं हुई है, प्रतिशत वृद्धि में कम-बेसी हुआ है। देश की जनसंख्या बढ़ी है तो इसमें हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन सबका योगदान है और अभूतपूर्व योगदान है।
इतना ही नहीं, एक आंकड़ा देखिये। यह दशक वार जनसंख्या में प्रतिशत वृद्धि का आंकड़ा है। जो यह भी बताता है कि हिन्दू बनाम मुसलमान आबादी में प्रतिशत वृद्धि के मुक़ाबले में, हिन्दू कभी आगे नहीं रहे, मतलब यह ब्रेकिंग न्यूज़ वाला मामला नहीं है। ये आंकड़े साथ ही यह भी बताते हैं कि दशक दर दशक, हिन्दू बनाम मुसलमान आबादी में प्रतिशत वृद्धि का अंतर लगातार काम होता जा रहा है।

वर्ष 1961 की जनगणना के मुताबिक, 1951 के मुक़ाबले मुस्लिम आबादी में 32.49% की वृद्धि हुई थी तो हिन्दू आबादी में 20.76 % की। 1971 में 61 के मुक़ाबले मुस्लिम आबादी में 30.92 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और हिन्दू आबादी 23.68 की औसत से बढ़ी थी। 1981 में 71 के मुक़ाबले मुस्लिम आबादी 30.78 प्रतिशत की दर से बढ़ी तब हिन्दू आबादी की बढ़ोतरी दर 24.07 प्रतिशत थी। 81 के मुक़ाबले 1991 में हिन्दू आबादी 22.71 प्रतिशत से बढ़ी तो मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर 32.88% रही थी। 2001 में हिन्दू आबादी 19.92 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ी, 1991 के मुक़ाबले, तो इस दौरान मुस्लिम आबादी में वृद्धि दर 29.52 प्रतिशत रही। 2001 के मुक़ाबले 2011 में हिन्दू आबादी की वृद्धि दर 16.76 प्रतिशत रही तो मुस्लिम आबादी में यह 24.60 दर्ज़ की गई। तो जिम्मेदार नागरिकों अगर हम पिछले 50 साल के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि मुस्लिम आबादी के प्रतिशत वृद्धि में भी कमी आ रही है। लेकिन, बहुमत वाले भाई लोगों जनगणना 2011 के आंकड़ों से आप लोगों को चिंतित तो होना चाहिए क्योंकि सेक्स रेशिओ (लिंगानुपात) के पेरामीटर पर देखें तो मुसलमाओं में जहां 951 महिला प्रति हज़ार पुरुष है, हिंदुओं में यह 939 महिला प्रति हज़ार पुरुष है।


अब आइये, गणित के जंजाल से निकल कर सामाजिक विज्ञान के समर में चलें। पहली बात जो सरकारी विज्ञापन से चलने वाले देश के प्रमुख हिन्दी समाचार पत्र आपको नहीं बताएँगे वह यह कि ये आंकड़े ऐसे क्यों हैं? क्या धर्म आधारित जनगणना का कोई ताल्लुक सीधे धर्म से है भी? क्या जनसंख्या के बढ़ने का सीधा ताल्लुक, यह एक मात्र ताल्लुक धर्म से है? यह इसके कुछ अधिक गहरे सामाजिक आर्थिक कारण हैं। फिलहाल मैं सच्चर कमेटी के द्वारा उठाए गए समस्याओं और उसके सुझावों पर नहीं जाऊंगा। पर एक ज़रा पढ़िये कि द हिन्दू अख़बार को दिये बयान में अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान, मुंबई के प्रोफेसर और जनसंख्याविद P. Arokiasamy क्या कहते हैं। P. Arokiasamy कहते हैं कि यह एक सामान्य रुझान है। शिक्षा का सत्र बढ़ने और परिवारों की जरूरतों में बदलाव की वजह से जनसंख्या की वृद्धि दर में कमी आना स्वाभाविक और उम्मीद के मुताबिक है। उन समुदायों में जो ज़्यादा शिक्षित हैं और जिनतक स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतर पहुँच है, वहाँ जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आई है। P. Arokiasamy केरल का उदाहरण हमारे सामने रखते हैं और बताते हैं कि केरला में मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर पूरे राज्य में किसी और समुदाय के मुक़ाबले सबसे कम है। मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना....


आखिर मैं इन आंकड़ों पर इतना लंबा क्यों लिख रहा हूँ, क्योंकि मैं डरा हुआ हूँ, क्योंकि मुजफरनगर अभी बांकी है, क्योंकि इस देश में अभी बीजेपी की सरकार है, जो आरएसएस, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक इकाई है, आरएसएस जो भारत को एक हिन्दू राष्ट्र की तरह देखना चाहता है, और अभी अभी मैं जमशेदपुर को जलते- झुलसते महसूस किया है। मैं सोच रहा हूँ कि सरकारें और संस्थाएं आंकड़ों से जो प्रामाणिकता हासिल करती हैं, उससे कैसे बचा जाय। खास तौर से, ऐसे गज़ब देश में। जहां दो लोग आपसी बातचीत में भी अपनी बात मनवाने के लिए तुरंत किसी तीसरे अंजान व्यक्ति से कंसेंट लेते भी नहीं घबराते हैं ; क्यों भाई साहब सही कह रहा हूं न !!, और यह सिर्फ इसलिए होता है कि बंदे के पास इतना पेशेंस नहीं होता कि वह अपनी बात के पक्ष में जिरह कर सके। यह राजनीति का “फैसला ऑन द स्पॉट काल” है, यह राजनीति का आरएसएस काल है। अभी तो सिर्फ आंकड़े आए हैं। अब गली मोहल्लों में चर्चा भी पहुंचेगी कि हिन्दुत्व पर खतरा है। हिन्दू अपनी संख्या न भी बढ़ाएँ तो भी हिंदुओं को मुसलमानों की संख्या कम करने पर सोचना होगा, ऐसी बातें फैलाई जाएंगी। मैं डरा हुआ हूँ कि नेक लेकिन असहिष्णु लोगों से भरा यह समाज इन अफवाहों से कैसे लड़ेगा, अफवाहों से लड़ेगा या अफवाहों के चक्कर में लड़ेगा। मैं डरा हुआ हूँ इसलिए क्योंकि 60 प्रतिशत साक्षारता वाले देश में, किसी भी बात को धार्मिक उन्माद और फिर दंगों का रूप दिया जा सकता है। सरकार और मीडिया को जिस तैयारी के साथ ऐसे आंकड़े जारी करने चाहिए वो तैयारी नहीं की गई, जनता तक पूरी और साफ-साफ जानकारी नहीं दी गई। मोटा-मोटी जानकारी, ऐसे मामलों में नीमहकीम से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो सकती है। इसलिए मैं अपील करता हूँ, अगर आप वाक़ई हिन्दू या मुसलमान होकर सोचते हैं तो इन आंकड़ों के हिस्ट्री, जियोग्राफी, एकोनोमिक्स, पोलिटिकल साइंस, फ़िजिक्स, केमेस्ट्री सबके बारे जानिए फिर राय बनाइए।वरना मत सुनिए कि कौन सी सरकार कौन सा आंकड़ा जारी कर रही है।




(रचनाकार -परिचय:
जन्म: बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में 9 जुलाई 1989 को
शिक्षा: वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा से। प्रभात खबर व भास्कर से संबद्ध रहे।
सृजन: अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस में लेख, रपट, कहानी, कविता
संप्रति: हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क: gunjeshkcc@gmail.com )

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गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आबादी के आंकड़े का फ़र्जी खेल

कौन कितना जानना आसान नहीं इतना


 















फ़राह शकेब की क़लम से

संघ परिवार अपने निर्धारित विध्वंसक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए झूठ, फरेब, धोखा, मक्कारी, हिंसा, द्वेष और गोयबल्स के फ़र्ज़ी प्रचार तन्त्र पर आधारित हथकण्डे किस शातिराना ढंग से अम्ल में लाता है। इस पर संघ के नब्बे साला अतीत को ध्यान में रखते हुए काफी लम्बी बहस हो सकती है, लेकिन फिलहाल एक मूल तर्क को सामने रखते हुए जनसंख्या वृद्धि के नव अवतारित मुद्दे पर हर सम्भव तर्क के साथ अपना पक्ष रख रहा हूँद्। संघ की सफलता का मूल मन्त्र ये है कि वो देश के 20 से 25 प्रतिशत अल्पसंख्यकों विशेष कर मुसलमानों और ईसाइयों से 75 प्रतिशत से अधिक बहुसंख्यक समाज को मनोवैज्ञानिक रूप से भययुक्त कर उनके मानसिक पटल एक विशेष प्रकार का खौफ बिठाए रखना चाहता है। निरन्तर नित नए-नए प्रोपगंडा और अफवाहों से उस भय को खाद्य पानी उपलब्ध करवाते हुए उसे सींचते हुए बहुसंख्यक सामज के दिल दिमाग में सुनियोजित ढंग से उसकी जड़ को अंदर तक मज़बूत करने में संघ ने काफी सफलता पाई है इससे इनकार करना खुद को झूठी तसल्ली देने जैसा लगता है।


इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि अल्पसंख्यक समुदाय विशेष कर मुसलमानों और ईसाइयों के विरुद्ध फासिस्टों के तमाम षडयन्त्रों और साज़िशों में सामन्ती पूंजीवादियों का पोषक मेन स्ट्रीम मीडिया विशेष कर हिंदी मीडिया भी शामिल है। 26.08.2015 को देश के अस्सी. प्रतिशत प्रिंट मीडिया विशेष कर हिंदी मीडिया ने फासिस्टों की मंशा और लक्ष्य के अनुकूल इस अंदाज़ में सुर्खियां लगाया कि देश में केवल मुसलामनों की आबादी की बढ़ी है और किसी भी धर्म समुदाय की जनसंख्या में कोई वृद्धि नहीं हुई।

गुजरात के वर्तमान हालात के सामने इसे प्राथमिकता देना और पहले पन्ने की सुर्खी बनाना भी कुछ कम संदिग्ध नहीं है। संदिग्ध इसलिए कि इसी मीडिया के द्वारा अब देश भर को ये प्रभाव दिया जाता रहा है कि गुजरात के सिवा भारत में कहीं विकास नहीं हुआ और आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात की धरती सोना उगल रही है। अम्बर हीरे बरसा रहा है, दूध की नदियां बह रही हैं। लेकिन पिछले दो दिन से विगत दशकों से गुजरात की आधी सत्ता पर क़ाबिज़ बीएमडब्ल्यू और ऑडी जैसी गाड़ियों में घूमने वाला सम्पन्न व्यापरी समुदाय वहां की सड़कों पर आतंक मचा रहा है। उसे भी आरक्षण की ज़रूरत है तो फिर विकास किसका हुआ देश ये भी जानना चाहता है।
इधर, खबरों को आंकड़ों की वास्तविकता की कसौटी पर देखने के बाद ये सच सामने आता है कि मुसलमनों की जनसख्या वृद्धि दर में विगत कुछ वर्षों में लगभग 5 प्रतिशत और अगर 1991 से 2011 की बात करें तो सामूहिक रूप से लगभग 10 प्रतिशत की कमी आई है। 1991 में ये वृद्धि दर 34 प्रतिशत के आसपास थी जो 2011 में 24.5 प्रतिशत रह गई। इसी दौरान हिंदुओं की जनसंख्या वृध्दि दर 9 प्रतिशत कम हुई। अगर इस मापदण्ड को सामने रखा जाए तो देश के जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में मुसलमान हिंदुओं से 1 प्रतिशत अधिक ही हैं।
2001 में हिंदुओं की जनसंख्या 82 करोड़ 75 लाख थी, जो 2011 में 96 करोड़ 63 लाख पहुँच गयी और 2001 में मुसलमनों की जनसंख्या 13 करोड़ 80.लाख थी, जो 2011 में 17 करोड़ 22 लाख पहुंची। स्पष्टत: इन दस वर्षों में हिंदुओं की जनसंख्या में उतनी वृद्धि हुई जितनी मुसलमानों की कुल जनसंख्या थी। वर्ष 2001 में तो फिर हिंदुओं की आबादी घटी कैसे ??

लेकिन आंकड़े जारी करने वाले बाजीगरों ने बड़ी शातिराना ढंग से इसे प्रस्तुत करते हुए केवल ये प्रभाव देने की कोशिश की कि केवल मुसलमनों की जनसंख्या ही बढ़ी है. इन आंकड़ों में अप्रत्यक्ष रूप से एक और संघी षड्यंत्र को बल देने का प्रयास हुआ है .पश्चिम बंगाल और आसाम के मुसलमनों को बांग्लादेशी घुसपैठिये कहना भी फ़ासीवादियों का एक पसंदीदा अमल रहा है। इस जनसंख्या वृद्धि वाले ड्रामे में भी उन्हीं प्रदेशों में अधिक जनसंख्या वृद्धि वाली जगह के तौर पर चिन्हित किया गया है। जनगणना के इन आंकड़ों में इस पहलू को विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा कि विगत कुछ वर्षों में मुस्लिम समाज जो अशिक्षा के कारण इन सब चीजों के प्रति उतनी रुचि नहीं लेता था। वहाँ अब काफी हद तक इन क्षेत्रों में जागरूकता आई है और पहले के मुकाबले अपने आधार कार्ड, राशन कार्ड, मतदाता सूची में नामकरण, मतदाता पहचान पत्र और जनगणना के समय उपस्थित होकर अपनी एवम् अपने परिवार की विस्तृत जानकारी इस क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को उपलब्ध करवाने के प्रति सचेत हुआ है।

इस पूरे प्रकरण और सांप्रदायिक सरकार के सांप्रदायिक षड्यंत्र और इस सामन्ती साज़िश को तर्कसंगत और अधिकृत रूप देने में लोकतंत्र के चौथे खम्बे की संज्ञा अपने माथे पर सजाये घूमने वाले पूंजीवाद की पोषक मीडिया के योगदान को देश का बहुसंख्यक समाज आंकड़ों के फर्जीवाड़ और वास्तविकता की रौशनी में किस तरह समीक्षा कर पाता है ये तो समय ही बताएगा। लेकिन इस प्रकरण के पीछे आरएसएस के रणनीतिकारों का हाथ और उनके संरक्षण का पर्दाफाश करने के लिए मैं यहां संघ के संचालन में चलने वाले बिहार सांस्कृतिक विकास परिषद के धर्म जागरण समन्वय विभाग, उत्तर बिहार द्वारा प्रकाशित साहित्य का हवाला देना ज़रूरी समझता हूँ. ये समाज तोड़क विध्वंसक साहित्य बिहार के सीमांचल इलाके में स्वयम्भू धर्मरक्षकों द्वारा बहुसंख्यक समाज के उन गावँ में बंटवाए जा रहे हैं जहां निर्धनता है, अशिक्षा है और धर्मनिरपेक्ष संविधान पर आधारित भारतीय राष्ट्र के सभ्य नागरिक गुणों एवम् जागरूकता का अभाव है।

मतांतरण से घटता भारत
घटता हिन्दू मरता भारत के शीर्षक से इस साहित्य के पहले और दूसरे पन्ने पर वर्णित कुछ पंक्तियाँ शब्दशः यहां अंकित कर रहा हूँ..

"" जहाँ जहाँ हिन्दू घटा, वहाँ का वह भाग भारत नहीं रहा! अफ़ग़ानिस्तान से ब्रह्म देश तक भारत था लेकिन आज पूर्व भारत का एक ही भाग हमारे पास है !
आखिर क्यों??
1947 में देश का विभाजन हुआ ! धर्म के आधार पर यानी द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर जब देश का विभाजन हुआ उस समय भारत में तीन करोड़ मुसलमान थे! पश्चिमी पाकिस्तान में एक करोड़ हिन्दू और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में 1.5 करोड़ हिन्दू थे, आज जब हम 67 वर्ष बाद विचार करते हैं तो पकिस्तान में हिंदुओं की संख्या केवल 8-10 लाख तथा बांग्लादेश में 60 लाख हिन्दू बचे हुए हैं! आखिर पाकिस्तान व बांग्लादेश के हिंदुओं का क्या हुआ ??
आसमान खा गया कि धरती निगल गयी, या तो उनका बलात् इस्लामीकरण कर दिया गया या वे मार दिए गए अथवा देश छोड़ने पर मजबूर हो गए! आज इन दोनों देशों में हिंदुओं की दुर्दशा हम आये दिन अखबारों में पढ़ते रहते हैं, दूसरी तरफ जहां भारत में तीन करोड़ मुसलमान थे आज वे 16 करोड़ हो गए हैं.
आये दिन सेकुलरिस्ट ये कहते नहीं थकते कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है, तो ये संख्या क्यों बढ़ रही है ! आज देश में सैकड़ों ऐसे स्थान हैं जहाँ हिंदुओं की बहन बेटियां सुरक्षित नहीं हैं! वे अपने ही देश में दो नम्बर के नागरिक बनने को मजबूर हैं! एक तरफ हम दो हमारे दो और दूसरी तरफ हम पांच हमारे पचीस--इस पर हिन्दू समाज को बिचार करना होगा नहीं तो हम कब तक देश का विभाजन होते देखेंगे,क्या हमें कश्मीर असम पश्चिम बंगाल और बिहार के हिंदुओं की दुर्दशा दिखाइ नहीं देती""""

इसके बाद एक चित्र बना कर सन् 2001 की जनगणना के आधार पर ये दर्शाने की कोशिश की गई है कि हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर घट रही है, जो 25 प्रतिशत से 20.प्रतिशत हो गयी है और मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर 34.5 प्रतिशत से 36 प्रतिशत हो गयी है।

ऐसे ज़हरीले साहित्यों के माध्यम से ये पुनीत कार्य दूसरे प्रदेशों में नहीं हो रहे होंगे शायद ही सम्भव हो सकता और इसी पर्दे के पीछे के असली अनधिकृत खेल को औपचारिक रूप से अधिकृत करने और आरएसएस के इस दुष्प्रचार को तर्कसंगत बना कर बल देने के लिए कल स्वर्ण सामन्ती और दलित अल्पसंख्यक विरोधी मीडिया ने अपना नैतिक सहयोग दिया है।
इससे पहले साध्वी प्राची साक्षी महाराज जैसे भाजपा नेताओं ने मौखिक विषबाण चला कर वातावरण तैयार किया। हिंदुओं को कितने बच्चे पैदा करने चाहिये जैसे प्रवचनों को भी मीडिया में खूब जगह मिली और अंततः उन बयानों को तर्कसंगत तौर पर इन खबरों के माध्ध्यम से प्रस्तुत किया गया..

ज्ञात हो कि ये जनगणना रिपोर्ट 2014 में ही प्रकाशित होनी थी। लेकिन अपने हर काम को सांप्रदायिक रंग दे कर सत्ता लोलुप भाजपा को आम जनता को गुमराह कर लाभ लेने में महारत हासिल है और इस रिपोर्ट को ठीक बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रकाशित कर संप्रादयिक ध्रुवीकरण का लाभ लेने की योजना के तहत ही मीडिया को भागीदार बना कर इस अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया। जातिगत आधारित जनगणना भी सार्वजनिक की जाए, तो कुछ और तस्वीर साफ़ हो सकती है। क्योंकि बहुसंख्यक वर्ग की कुछ जातियों में मुसलमानों की तुलना में जन्म दर अधिक है। जिसे चर्चा में लाना न्यायसंगत होगा।

(लेखक परिचय:

जन्म: 1 जनवरी 1981 को मुंगेर ( बिहार ) में

शिक्षा: मगध यूनिवर्सिटी बोधगया से एमबीए

सृजन: कुछ ब्लॉग और पोर्टल पर समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन

संप्रति: अनहद से संबद्ध

संपर्क: mfshakeb@gmail.com)



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शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

मीडिया में मुस्लिम औरत











शिरीष खरे की क़लम से  

बीते दिनों बिट्रेन के मशहूर अख़बार गार्जियनने मोबाइल से दो मिनिट का ऐसा वीडियो बनाया जिसमें पाकिस्तान की स्वात घाटी के कट्टरपंथियों ने 17 साल की लड़की पर 34 कोड़े बरसाए थे। इसी तरह के अन्य वीडियो के साथ अब यह भी यूटयूब में अपलोड है, जो संदेश देता है कि वहां कोई लड़की अगर पति को छोड़ दूसरे लड़के के साथ भागती है तो उसका अंजाम आप खुद देख लीजिए। मुस्लिम औरत को इस्लाम की कट्टरता से जोड़ने वाला यह कोई अकेला वीडियो नहीं था, मीडिया के कई सारे किस्सों से भी जान पड़ता है कि मुस्लिम औरतों के हक किस कदर धर्मनिरपेक्षताऔर लोकत्रांतिकताकी बजायसाम्प्रदायिकताऔर राष्ट्रीयताके बीचोबीच झूल रहे हैं।
कहते हैं कि "जो सच नहीं होता, कई बार वह सच से भी बड़ा सच लगने लगता है।"
                                                                      

वैसे तो अपने देश के विभिन्न समुदायों में भी ऐसी घटनाएं कम नहीं है मगर इधर की मीडिया ने उधर की घटना को कुछ ज्यादा ही जोर-शोर के साथ जगह दी। यह अलग बात है कि उन्हीं दिनों के आसपास, उत्तरप्रदेश के अमरोहा जिले से खुशबू मिर्ज़ा चंद्रयान मिशन का हिस्सा बनी तो ज्यादातर मीडिया वालों को इसमें कोई खासियत दिखाई नहीं दी। देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने इस स्टोरी को हाईलाईट किया भी तो ऐसी भूमिका बांधते हुए कि उसने मुस्लिम महिलाओं की सभी नकारात्मक छवियों को तोड़ा है।अब नकारात्मक छवियां को लेकर कई सवाल हो सकते हैं मगर उन सबसे ऊपर यह सवाल है कि क्या एक औरत की छवि को, उसके मज़हब की छवियों से अलग करके भी देखा जा सकता है या नहीं ? आमतौर से जब मुस्लिम औरतोंके बारे में कुछ कहने को कहा जाता है तो जवाबों के साथ इस्लाम’, ‘आतंकवाद’, ‘जेहादऔर तालीबानीजैसे शब्दों के अर्थ जैसे खुद-ब-खुद चले आते हैं। पूछे जाने पर ज्यादातर अपनी जानकारी का स्रोत अख़बार, पत्रिका या चैनल बताते हैं। उन्हें लगता है कि मीडिया जो कहता है सच है। इस तरह मुस्लिम औरतों के मुद्दे परधर्मनिरपेक्षचर्चा की बजाय राष्ट्रवादके क्रूर चहेरे उभर आते हैं।

यह सच है कि दूसरे समुदायों जैसे ही मुस्लिम समुदाय के भीतर का एक हिस्सा भी दकियानूसी रिवाजों के हवाले से प्रगतिशील विचारों को रोकता रहा है। इसके लिए वह आज्ञाकारी औरतकी छवि को पाक साफ औरतका नाम देकर अपना राजनैतिक मतलब साधता रहा है। दूसरी तरफ, यह भी कहा जाता है कि पश्चिम की साम्राज्यवादी ताकतें दूसरे समुदाय की नकारात्मक छवियों को अपने फायदे के लिए प्रचारित करती रही हैं। ऐसे में इस्लाम की दुनिया में औरत की काली छाया वाली तस्वीरों का बारम्बार इस्तेमाल किया जाना जैसे किसी छुपे हुए एजेंडे की तरफ इशारा करता है। जहां तक भारतीय मीडिया की बात है, तो ऐसा नहीं है कि वह पश्चिप के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर-तरीकों से प्रभावित न रहा हो।

अन्यथा भारतीय मीडिया भी मुस्लिम औरतों से जुड़ी उलझनों को सिर्फ मुस्लिम दुनिया के भीतर का किस्सा बनाकर नहीं छोड़ता रहता। ज्यादातर मुस्लिम औरतें मीडिया में तभी आती हैं जब उनसे जुड़ी उलझनें तथाकथित कायदे कानूनों से आ टकराती हैं। मीडिया में ऐसी सुर्खियों की शुरूआत से लेकर उसके खात्मे तक की कहानी, मुसलमानों की कट्टर पहचान को जायज ठहराने से आगे बढ़ती नहीं देखी जाती। इस दौरान देखा गया है कि कई मज़हबी नेताओं या मर्दों की रायशुमारियां खास बन जाती हैं। मगर औरतों के हक़ के सवालों पर औरतों के ही विचार अनदेखे रह जाते हैं। जैसे एक मुस्लिम औरत को मज़हबी विरोधाभास से बाहर देखा ही नही जा सकता हो। जैसे भारतीय समाज के सारे रिश्तों से उसका कोई लेना-देना ही न हो। विभिन्न आयामों वाले विषय मज़हबी रंगों में डूब जाते हैं। इसी के सामानान्तर मीडिया का दूसरा तबक़ा ऐसा भी है जो प्रगतिशील कहे जाने वाली मुस्लिम संस्थानों के ख्यालातों को पेश करता है और अन्तत : मुस्लिम औरतों से हमदर्दी जताना भी नहीं भूलता।

मीडिया के सिद्धांत के मुताबिक मीडिया से प्रसारित धारणाएं उसके लक्षित वर्ग पर आसानी से न मिटने वाला असर छोड़ती हैं। खास तौर पर बाबरी मस्जिद विवाद के समय से भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष तेवर अपेक्षाकृत तेजी से बदले और उसी हिसाब से मीडिया के तेवर भी। नतीजन, खबरों में चाहे तिहरा तलाक़ आए या बुर्का पहनने की जबर्दस्ती, उन्हें धार्मिक-राजनैतिक चश्मे से बाहर देखना नहीं हो पाया। यकीनन जबर्दस्ती बुर्का पहनाना, एक औरत से उसकी आजादी छिनने से जुड़ा हुआ मामला है, उसका विरोध अपनी जगह ठीक भी है। मगर दो कदम बढ़कर, उसे तालीबानी नाम देने से तो बुनियादी मुद्दा गुमराह हो जाता है। यह समझने की जरूरत है कि मुस्लिम औरतों के हक़ों से बेदखली के लिए पूरा इस्लाम जिम्मेदार नहीं है, वैसे ही जैसे कि गुजरात नरसंहार का जिम्मेदार पूरा हिन्दू समुदाय नहीं है। मगर अपने यहां इस्लाम ऐसा तवा है जो चुनाव के आसपास चढ़ता है, जिसमें मुस्लिम औरतों के मामले भी केवल गर्म करने के लिए होते हैं।

मामले चाहे मुस्लिम औरतों के घर से हो या उनके समुदाय से, भारतीय मीडिया खबरों से रू-ब-रू कराता रहा है। मुस्लिम औरतों के हकों के मद्देनजर ऐसा जरूरी भी है, मगर इस बीच जो सवाल पैदा होता है वह यह कि खबरों का असली मकसद क्या है, क्या उसकी कीमत सनसनीखेज या बिकने वाली खबर बनाने से ज्यादा भी है या नहीं ?? मामला चाहे शाहबानो का रहा हो या सानिया मिर्जा का, औरतों से जुड़ी घटनाओं के बहस में उनके हकों को वरीयता दी जानी चाहिए थी। मगर ऐसे मौकों पर मीडिया कभी शरीयत तो कभी मुस्लिम पासर्नल ला के आसपास ही घूमता रहा है। इसके पक्ष-विपक्ष से जुड़े तर्क-वितर्क भाषा की गर्म लपटों के बीच फौरन हवा होते रहे। नई सुर्खियां आते ही पुरानी चर्चाएं बीच में ही छूट जाती हैं, मामले ज्यादा जटिल बन जाते हैं और धारणाओं की नई परतें अंधेरा गहराने रह जाती हैं।

अक्सर मुस्लिम औरतों की हैसियत को उनके व्यक्तिगत कानूनों के दायरों से बाहर आकर नहीं देखा जाता रहा। इसलिए बहस के केन्द्र में औरतकी जगह कभी रिवाजतो कभी मौलवीहावी हो जाते रहे। इसी तरह नौकरियों के मामले में, मुस्लिम औरतों के पिछड़ेपन को लेकर कभी धार्मिकतो कभी सांस्कृतिकजड़ों में जाया जाता रहा, जबकि मुनासिब मौकों या सहूलियतों की बातें जाने कहां गुम होती रहीं। असल में मुस्लिम औरतों के मामलों की पड़ताल के समय, उसके भीतरी और बाहरी समुदायों के अंतर्दन्द और अंतर्सबन्धों को समझने की जरूरत है। जाने-अनजाने ही सही मीडिया में मुस्लिम औरतों की पहचान जैसे उसके मजहब के नीचे दब सी जाती है।

जिस तरह डाक्टर के यहां आने वाला बीमार किसी भी मजहब से हो उसकी बीमारी या इलाज कर तरीका नहीं बदलता- इसी तरह मीडिया भी तो मुस्लिम औरतों को मजहब की दीवारों से बाहर निकालकर, उन्हें बाकी औरतों के साथ एक पंक्ति में ला खड़ा कर सकता है। जहां डाक्टर के सामने इलाज के मद्देनजर सारी दीवारें टूट जाती हैं, सिर्फ बीमारी और इलाज का ही रिश्ता बनता है जो प्यार, राहत और भरोसे की बुनियाद पर टिका होता है- ऐसे ही मीडिया भी तो तमाम जगहों पर अलग-थलग बिखरीं मुस्लिम औरतों की उलझनों को एक जगह जमा कर सकता है।

मुस्लिम महिलाओं के कानूनों में सुधार की बातें, औरतों के हक़ और इस्लाम पर विमर्श से जुड़ी हैं। इसलिए मीडिया ऐसी बहसों में मुस्लिम औरतों को हिस्सेदार बना सकता है। वह ऐसा माहौल बनाने में भी मददगार हो सकता है जिसमें मुस्लिम औरतें देश के प्रगतिशील समूहों से जुड़ सकें और मुनासिब मौकों या सहूलियतों को फायदा उठा सकें। कुल मिलाकर मीडिया चाहे तो मज़हब के रंगों में छिपी मुस्लिम औरतों की पहचान को रौशन कर सकता है।


















[लेखक-परिचय
जन्म:३०जून, 1981
शिक्षा: माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल से स्नातक. 
शुरुआत के चार साल विभिन्न डाक्यूमेंट्री फिल्म आरगेनाइजेशन में शोध और लेखन के साथ-साथ मीडिया फेलोशिप . उसके बाद के दो साल "नर्मदा बचाओ आन्दोलन, बडवानी" से संबद्धता.
सम्प्रति :'चाइल्ड राईट्स एंड यू, मुंबई के संचार विभाग में
संपर्क:shirish2410@gmail.com ]

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मंगलवार, 20 जुलाई 2010

व्यवस्थाविरोधी हर पत्रकार नक्सली नहीं होता















फर्जी मुठभेड़ पुलिस का चरित्र-सा बन गया है. अपनी असफलताओं 
की खीझ निकलने के लिए पुलिस ऐसा करती है. पत्रकार हेमचंद्र पांडे उर्फ हेमंत पांडे की मौत हमें सोचने पर विवश करती है. लेकिन मै इस बात का पक्षधर हूँ, कि चाहे पत्रकार हो, लेखक हो, कोई भी हो, वह हिंसा के साथ कभी न खडा हो. मैं सरकारी हिंसा का भी प्रबल विरोधी हूँ. नक्सली हिंसा का भी मै समर्थन नहीं कर सकता. बहुत से बुद्धिजीवी समर्थक नज़र आते है. नक्सलियों ने मासूम बच्चो के गले तक काटे है. यह दुःख की बात है. हमें अन्याय का प्रतिकार करनाही है. मैं लगातार सरकार के चरित्र पर लिखता ही रहाहूं. यह कोई छोटी पंक्ति नहीं है,कि 
लोकतंत्र शर्मिंदा है 
राजा अब तक ज़िंदा है


सत्ता में एक सामंती मिजाज़ काम कर रहा है अब तक. उसकी निंदा होनी चाहिए.मगर इसकारण हम हिंसक हो कर नक्सली हो जाएँ, हत्याएं करने लगें, यह भी ठीक नहीं. स्वतंत्र पत्रकार पांडे को प्रेस मालिकों ने अपना मानने से इंकार कर दिया, यह दुखद बात है. प्रेस का चरित्र ही ऐसा है.पांडे की मौत कि उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए. विश्वास है, कि वे नक्सलियों के साथ नहीं रहे होंगे. निसंदेह वे वैचारिक आदमी रहे होंगे. व्यवस्थाविरोधी हर पत्रकार नक्सली नहीं होता. व्व्यवस्था गलत कर रही है तो प्रतिकार हमारा धर्म है. कर्त्तव्य है. यह हमारा संवैधानिक अधिकार भी है.

पिछली पोस्ट पर वरिष्ठ पत्रकार-व्यंग्यकार गिरीश जोशी ने उक्त प्रतिक्रिया व्यक्त की है.
अब कल हुई पत्रकारों और प्रबुद्ध तबक़े की बैठक की रपट पढ़ें : 

सभी ने कहा अघोषित आपातकाल है!

गांधी शांति प्रतिष्ठान, नयी दिल्‍ली में 20 जुलाई की शाम नवगठित समूह जर्नलिस्‍ट फॉर पीपुल के बैनर तले एक सभा हुई, जिसमें देश में अघोषित आपातकाल को कई घटनाओं के जरिये समझने की कोशिश की गयी। साथ ऐसे वक्‍त में पत्रकारों की भूमिका क्‍या हो सकती है, इस पर चर्चा की गयी।
सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने कहा कि आज ही नहीं, हमेशा से देश में आपातकाल जैसी स्थितियां रही हैं। स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय और भाकपा (माओवादी) के प्रवक्ता कॉमरेड आजाद की कथित मुठभेड़ में की गयी हत्‍या पर सवाल उठाते हुए अग्निवेश ने कहा कि किसी भी कीमत साहस और सच का साथ नहीं छोड़ना है।
इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के सलाहकार संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा ने स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय और भाकपा माओवादी के प्रवक्ता आजाद की हत्या को शांति प्रयासों के लिए धक्का बताया। गौतम ने कहा कि आज राजसत्ता का दमन अपने चरम पर है। देश के अलग अलग हिस्सो में सरकार अलग-अलग तरीके से पत्रकारों का दमन कर रही है। इसके खिलाफ चलने वाले हर संघर्ष को एक करके देखना होगा।
समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि अब सरकारें अपने बताये हुए सच को ही प्रतिबंधित कर रही हैं और जो भी इसे उजागर करने की कोशिश करता है, उसे गोली मार दी जाती है या देशद्रोही करार दे दिया जाता है।
अंग्रेजी पत्रिका हार्ड न्यूज के संपादक अमित सेनगुप्ता भी मौजूद थे। उन्‍होंने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता कॉरपोरेट घरानों के मालिकों के इशारे पर संचालित हो रही है। देश के अलग अलग हिस्से में हुई घटनाओं को अलग अलग तरीके से पेश किया जाता है। खासकर एक संप्रदाय विशेष के लिए मुख्यधारा का मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। गुजरात दंगों और बाटला हाउस एनकाउंटर की रिपोर्टिंग पर भी अमित ने सवाल उठाये।
कवि नीलाभ ने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता को बचाने के लिए एक सांस्‍कृतिक आंदोलन की जरूरत है। सरकारी दमन के मसले पर हिंदी के लेखकों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए उन्‍होंने संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों, चित्रकारों को आह्वान किया कि वे अपने माध्‍यमों का इस्‍तेमाल सरकारी नीतियों को बेनकाब करने के लिए करें।
युवा पत्रकार पूनम पांडेय ने कहा कि आपातकाल केवल बाहर ही नहीं है बल्कि समाचार पत्रों के दफ्तर के अंदर भी एक किस्म के अघोषित आपातकाल का सामना करना पड़ता है।
इस मौके पर हिंदी के तीन अखबारों (नई दुनिया, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण) के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया गया। इन अखबारों ने पत्रकार हेमचंद्र पांडेय को न सिर्फ पत्रकार मानने से इनकार कर दिया था बल्कि इसका खुलासा होने पर कि हेमचंद्र हेमंत नाम से इन अखबारों के लिए कभी कभार लिखता था, इन अखबारों ने अलग से खबर छाप कर ये स्‍पष्‍टीकरण दिया था कि हेमचंद्र पांडे से उनके अखबार का कभी कोई रिश्‍ता नहीं रहा।
सभा में पत्रकार हेमचंद्र की याद में हर साल दो जुलाई को एक व्याख्यानमाला शुरू करने की घोषणा की गयी।
इस सभा को सामयिक वार्ता की मेधा, उत्तराखंड पत्रकार परिषद के सुरेश नौटियाल, जेयूसीएस के शाह आलम, समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट, पीयूसीएल के संयोजक चितरंजन सिंह ने भी संबोधित किया।
सभा का संचालन पत्रकार भूपेन ने किया। इस कार्यक्रम में बड़ी तादाद में पत्रकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता भी मौजूद थे।
मोहल्ला से साभार
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