डर
डर कहीं और था
मैं कहीं और डर रहा था
डर उस जर्जर खड़े
पेड़ की छाँव में था
और मैं धूप से डर रहा था
दुनिया भर की तमाम
पवित्र किताबें
भय और आतंक से
भरी पडी थीं
और मैं
अपने सबसे डरे समय में
उन्ही को पढ़ रहा था।
मैं इन ठंडी किताबों में क्या कर रहा हूँ
अगर मुझे बाज की उड़ान पसंद है
तो मुझे अपनें पठारी मैदानों में होना चाहिए
तब मैं इस तंग काफी हाउस में
क्या कर रहा हूं
अगर मैंने पिछली सर्दी में
आलू बोना सीखा है
तो मुझे ठंडी में अपने
खेत और क्यारियों को
तैयार करना था।
मैं इन ठंडी किताबों में क्या कर रहा हूं
अगर मैंने अभी हाल में
कविता लिखना सीखा है
तो मुझे सबसे पहले
अपने गांव के उस
अलमस्त गडरिये को सुनना चाहिए था
मैं इन वातानूकूलित सभागारों में
क्या कर रहा हूँ।
मुझे वहां होना चाहिए
जहां कहीं नए मकान को
बनाने के बुनियादी प्रयत्न किए जा रहे हैं
इन हवाई किलों में
मेरा दम घुटता है।
जौ भर नहीं जुमका
पक कर तैयार है धान की फसल
दूज का चाँद पंहट कर अपनी हंसिया
फसल कटाई की शुरुआत कर रहा है
मैं फटे कपड़ों में खुद को समेटे
खेत काटती औरतों को देख रहा हूँ
इन्हें इसी हालत में मेरे पुरखों
के पुरखों ने भी देखा था
कब से डटी हैं ये भूख के खिलाफ
इनके हिस्से है इस धरती की भूख
पर इनके समय का धंसा पहिया
लाख कोशिशों के बाद भी
जौ भर नहीं जुमका
इनका वक्त दुनियां की घड़ियों
के बाहर है
ये धान सटक रही है
इनकी घरों की मुंडेरों पर
बैठा चांद
सुन रहा है इनकी बोलचालभर
मेरा मन समय के उस
धंसे पहिये में ही फंसा है।
खेत जगाए जा रहें हैं
दिवाली है
खेत जगाए जा रहे हैं
मेड़ों पर जलाए जा रहे है दिए
न धान को जड़ों भर पानी
न खेतों को कम्पोस्ट और डी .ए.पी .
भूखे प्यासे खड़े हैं खेत
मैं उनको भी जानता हूं
जो इन खेतों के साथ साथ जाग रहे हैं
और उनको भी जो लगातार
सड़ते हुए अनाज पर
गलत बयानी करते जा रहे हैं
मैं पूछना चाहता हूं
इनकी सजा कौन तय करेगा
ये खेतों के साथ जागते लोग
या फिर एक और तीसरा आयोग
कराहती क्यों हैं
रात के पास क्या कोई बीन है
जो घने अंधेरे में भी
बजती है धीमे धीमे
फूल सुंघनी क्या गा गई
सुर्ख अड़हुल के कान में
कि मुंह खोले है अवाक
समुद्र के पास क्या कोई मृदंग है
जो शाम ढलते ही
देने लगता है ताल
पेड़ों के पास तो
पत्तों की करतल धुने हैं
सुरों में डूबी धरती
फिर कराहती क्यों है
क्या धरती के हृदय में
कोई कांटा गड़ा हुआ है।
मुराद अली
मशक बीन के उस्ताद मुराद अली
गलगल हो गई शरीर पकी ढाढी
बिना दांत का मुंह
बात-बात में फूलती सांस
ऐसे ही नहीं थे मुराद अली
जिसने देखा हो उन्हें जवानी में
मशकबीन कांख में दबाए
पैंतरा बदल बदल कर बजाते
वही जाने क्या थे
गरीब गुरबा सेठ जमींदार
किसके कार परोजन में
नहीं गूंजी उनकी मशक बीन
मैंने पहली बार इन्ही धुनों पर
नाचते देखा था नइका को
नयी नयी आई थी ब्याहकर
नाम मिल गया था नइका
कुछ दिन बाद किसी और के
साथ उढर गई
उसके तोड़ की नाचने वाली
फिर नहीं देखी
आज भी याद करते हैं मुराद अली
सूना सूना कर गई गड़रियान
कुछ दिन ही टिकी पर नाम कर गई
नाचते ही आई थे और
नाचते ही चली गई
चढी दुपरिया जब बाग़ में
टिकाई जाती बारात
सन्नाटे और घमस के बीच
गूंज उठती उनकी मशक बीन
बराती समझ जाते
रंग में मुराद अली
सुर मन में ही नहीं गदराये आमों में
धीरे धीरे
मिठास की तरह उतर रहे होते
समय के लम्बे दौर में वो
सक्रिय रहे अपनी मशक बीन
के सुरों के साथ
पूरे के पूरे पवस्त में कहाँ कहाँ नहीं
उनके सुरों की छाप
हम जैसे कितने जवान हुए
उनके सुरों के साथ
बँसवारी के कितने बांस
कैची से आकाश छूने लगे
भले ही आज भोंडे शोर में
कहीं दब गए मुराद अली
के मशक बीन के सुर
पर खूंटी पर टंगी लगभग फट चुकी
मशक बीन
यह हिलती डुलती काया
बता रही है अपने समय में
किस तरह हस्तक्षेप किया उसने।
मोमिना
खटिया बिनती है मोमिना
गाँव- गाँव जाकर
साईकिल मिस्त्री पति नहीं रहा
सयाने होने को दो बच्चे
खटिया बीनना सीख लिया
घुरुहू गडरिया से
यूँ तो दूसरे निकाह की भी
सलाह दी मायके वालों ने
पर लड़के बेटी का मुंह देख
उधर सोचा भी नहीं
रकम रकम के फूल काढती है
वे अपनी बिनाई में
आप ने धूप में स्वेटर बुनती
महिलाएं देखी होंगी
नीम के नीचे खटिया बिनते
मोमिना को देखिए
सधे हाथों में बिनाई का बाध
मछली सी चलती चपल उँगलियाँ
हाथ और चेहरे की तनी नसें
एक थकी थकी फीकी सी मुस्कान
खटिया बिनती मोमिना
मेरे गाँव की
सबसे जागती कविता है
ये जानती भी नहीं कब में
आगे बढ़कर निकल आई
परदे के बाहर
मौलवियों की तिरछी नजर से
बा खबर
गांव -गांव घूमती
जिन्दगी के चिकारे का
तना तार है मोमिना।
(कवि-परिचय:
जन्म: 4 नवम्बर 1963, प्रतापगढ़, अवध के छोटे से गाँव में
शिक्षा: वाणिज्य स्नातक
सृजन : देश की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में कविता, समीक्षा और आलेख। ‘इस मिट्टी से बना’, ‘आसान नहीं बिदा कहना’ कविता-संग्रह प्रकाशित
सम्मान: सूत्र सम्मान से अलंकृत
संप्रति: एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अधिकारी
संपर्क : keshav_bnd@yahoo.co.in )

