कमाल अहमद की कवितायें
शाम नहीं बन जाती है माँ
माँ को सबकुछ याद रहता है
ठीक मेरी नानी की तरह...
देखता हूँ की वह अपनी यादों की बची हुई
रोटियां रख आती है चाँद की रोशनी में
... और चुपचाप करवटें बदलती
सुबह बन जाती है
मेरी ओर देखती हुई
पल्लू से अपने पसीने को पोंछती
पैर के दर्द की टीस को
अपने चेहरे से छुपाकर
वह मुस्कुरा रही होती है
सुबह सुबह
माँ माँ होती है
और हमेशा माँ ही बनी रहती है
माँ को कभी किसी ने शाम बनते नहीं देखा गाँव की भाषा एक ग्रामीण कवि के लिए सिमरिया एक गाँव है सायटिका एक रोग शशिधर एक कवि है दुर्दिनों का एक मित्र भी जो कभी कभी शहर आता है और जब कभी होती है मुलाक़ात शहर डूब जाता है गाँव में . कल भी आया था अपनी गठरी के साथ कहने लगा : साहबजी के द्वारे पर बांके मोची को बैठाकर खुद चला आया है उस नगर में जहाँ हाट नहीं लगते . सुबह तोड़ लाया था नीम का दातुन थूकता रहा शहर की बेहोशी पर महसूस करता रहा सूरज के अंखुवाने के संगीत को. जब मेरी नींद खुली सौंफ और अजवाइन की महक टकराई कहने लगा : बोझ से दब गयी है कविता. अखबार पर चलती हुई नज़र मेरे चेहरे पर आ ठिठक गयी कहा ; स्सालों ने बेच ही दिया उसकी नसें फड़क रही थीं एक उच्छ्वास .. देखो , देखो सिमरिया की सड़कें अपने संसाधनों को ढोती हुई सैन फ्रांसिस्को की ओर जा रही है..... मैंने उसे बहुत समझाया वह नहीं माना कहने लगा :तुम्हारी चेतना सोवियत संघ की तरह बिखर चुकी है जानते हो शहर की एक ऊँचाई होती है अलग इतिहास और भूगोल भी गाँव का अपना आकाश होता है अपनी मिट्टी और महक भी तुम नहीं समझ सकते गाँव की भाषा . हाजीपुर वर्ष १९९२ का था.. विश्व के प्रथम गणतंत्र का वर्तमान मुख्यालय केलों के लिए बहुत प्रसिद्ध है गौतम बुद्ध को लोग भूल चुके होंगे आम्रपाली को ज़रूर जानते होंगे गंगा और गंडक के संगम पर बसा यह शहर गज और ग्राह के युद्ध का प्रत्यक्ष गवाह रहा था कभी. एक सुसज्जित रथ पर आडवानी का प्रकट होना इस शहर को बदल गया बहुत जल्द ही लोग मस्जिद चौक को महावीर चौक और बागमली को बजरंग बली चौक पुकारने का अभ्यास करने लगे और देखते ही देखते रामभक्तों द्वारा पवनसूत हनुमान की मूर्ति इन चौकों पर रोप दी गयीं . रथ गुज़र जाने के महीनों बाद एक नए चलन के रूप में एम.चौक और बी.चौक अस्तित्व में आया लोगों ने सोचा हम अपनी सुविधा से इन शब्दों का इस्तिमाल कर लेंगे. पर आज भी मस्जिद चौक के आस-पास रहनेवाले लोगों के जीवन में अज़ान की आवाज़ बहुत मायने रखती है और बागमली चौक पर स्थित अनजान पीर के मज़ार पर लोगों का तांता इस बात का सबूत है कि लोग अभी जिंदा हैं. [कवि-परिचय जन्म 1.मार्च, 76 बिहार में .शिक्षा :हाजीपुर और पटना से एम ए [हिंदी] करने के बाद जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय, दिल्ली से से पी-एच.डी सृजन :
ढेरों पत्र-पत्रिकाओं में कविता,समीक्षा और समसामयिक लेखों का प्रकाशन.
दो तीन किताबें जल्द प्रकाश्य सम्प्रति :नेशनल बुक ट्रस्ट के सम्पादकीय विभाग से संबद्ध. ट्रस्ट के मुख्य पत्र संवाद का सम्पादन संपर्क : kamalahmad26@gmail.com ]
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