बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
दलित साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दलित साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 25 मार्च 2015

कहानी : दहलीज़

 युवा कवि की पहली कहानी 












संजय शेफर्ड की क़लम से 

यह लड़कियां भी ना ? ना जाने किस परिवेश और संस्कार में पलती- बढ़ती और बड़ी होती हैं ? एक अधेड़ 
व्यक्ति ने खुद से मन ही मन में प्रश्न किया और उस चौदह वर्षीय लड़की की आवश्यकता से थोड़ी ऊंची उठ 
रही  स्कर्ट के अंदर झांकने की कोशिश की। लड़की उस अधेड़ व्यक्ति की नज़रों को भांप थोड़ी सकपकाई और 
असहज महसूस करते हुए करीब छह इंच की दूरी बनाते हुए बगल में खड़ी हो गई। अब उस अधेड़ की नज़र 
सीधे- सीधे लड़की की छातियों के आसपास से घूमती हुई कुछ देर बाद लड़की के उन उभारों पर जा टिकीं जहां 
एक अधोवस्त्र के आलावा कुछ भी नहीं था। लड़की की सकपकाहट बेचैनी में परिवर्तित होने लगी थी और 
असहजता बौखलाहट का रूप लेकर अब फूटे क तब फूटे। परन्तु वह अधेड़ उस लड़की की इन तमाम 
स्थितियों से बेखबर उसकी देह के तमाम हिस्सों में अपनी नज़र इस कदर गड़ाए जा रहा था कि मानों उसकी 
देह के तमाम छिद्रों को अपनी वासना से भर देगा। लड़की की मानसिक व्यथा बढ़ने के क्रम में दैहिक पीड़ा में 
परिवर्तित होने लगी। लड़की को लगा उसकी देह के तमाम छिद्रों में एकाएक किसी ने हजारों की संख्या में 
तलवार घुसेड़ दिया है। उसकी देह की कराह चीख में परिवर्तित होकर उठी और उसके मन की कब्र में जा 
समाई।

सही मायने में यह स्थिति लड़की के संयम के दायरे से बाहर की थी फिर भी लड़की ने अपने अथाह दर्द और 
उफनते आवेग पर कायम रखते हुए थोड़ी और दूरी बनाकर खड़ी हो गई। पर उसे यह दूरी उस अधेड़ की नज़र 
से ज्यादा नहीं ले जा पाई। इस बार उसकी नज़र लड़की के वक्ष से नीचे उतर नाभि के इर्द-गिर्द ही टिकी हुई 
थी।  लड़की ने उस अधेड़ की चुभती हुई नज़र को दूबारा जैसे ही अपने नाभि में महसूसा, साथ ही यह भी 
महसूसा  कि अब यह नजरें नाभि के नीचे उतरने की कोशिश करेंगी उसकी बंद मुठ्ठियां खुली और एक जोरदार 
तमाचे की आवाज पूरे ठसमठस भीड़ भरी बस में गूंज पड़ी। किसी को कुछ समझ में ना आए इसका तो सवाल 
ही नहीं था। इस तरह की घटनाएं आये दिन दिल्ली के बसों में होती रहती हैं। करीब बीस सेकेंड तक पूरे बस में 
शांति छाई रही उसके बाद धीरे-धीरे कुछ आवाजें अपना-अपना मुंह खोलने लगी।

मारों साले को मारों, लड़की को ताड़ता है, तेरी मां- बहन नहीं है। इतना सुनते ही मानों भीड़ का पूरा का पूरा 
जत्था उस अधेड़ व्यक्ति पर टूट पड़ा। दो मिनट के अंदर उस पर कितने लात- जूते पड़े होंगे उसे इस बात का 
अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है। लोगों की मार से उसके शरीर के तमाम हिस्से ज़ख्मी हो गए थे। उसके 
होंठ कट गए थे और नाक से खून टपक रहा था। लेकिन आश्चर्य की बात यह कि उस व्यक्ति ने जरा भी 
भागने  का प्रयास नहीं किया। इतनी मार खाने के बाद भी जस का तस बस की सीट पर ही पड़ा रहा। दूसरी 
तरफ लड़की जोर-जोर से सिसक रही थी। उसके आसपास कई औरतों की भीड़ जमा हो गई थी। कोई उसके 
बालों में  हाथ फेरते हुए सन्तावना के स्वर में यह कह रहा था कि चुप हो जा बेटा- चुप हो जा। कोई उल्टे उसके 
पहनावे को दोषी ठहराते हुए कह रहा था इस तरह के कपडे पहनती ही क्यों हो जब सती - सावित्री बनती हो ? 
जितने  मुंह उतनी बात ! कोई कुछ कह रहा है तो कोई कुछ ! लोगों की कहा सुनी, आपस की घुसर-पुसर के 
मध्य यह  तिहत्तर नंबर की बस निर्माण विहार के स्टैंड पर जैसे ही पहुंची वह लड़की बस से उतर गई।

सिर्फ एक स्टेशन के बाद मुझे भी बस से उतरना था। उस लड़की के बस से उतरने के बात यात्रियों की आपसी 
सुगबुगाहट थोड़ी और तेज हो गई। कहा सुनी, आपस की घुसर-पुसर का स्वर धीरे-धीरे और ऊंचा उठने लगा। 
जो घटना महज़ पांच मिनट पहले एक घटना थी अब वह इंटरटेनमेंट से ज्यादा कुछ नहीं रह गई थी। इस बस 
में मैं करीब साल भर से सफ़र कर रही हूं। बस में अक्सर इस तरह की छेड़छाड़ की घटनाएं होती ही रहती हैं। 
और मेरे ही साथ क्या पब्लिक या फिर प्राइवेट बस में चलने वाली हर लड़की के साथ होती ही रहती हैं। फिर 
धीरे-धीरे यह घटनाएं रोजमर्रा यात्रा करने वाली लड़कियों या महिलाओं के रूटीन की एक हिस्सा बन जाती हैं। 
अब भला कामकाजी महिलाएं और लड़कियां करें भी तो क्या करें, सामान्य तरीके से अगर समझाने की 
कोशिश करें तो यह मनचले पीछे पड़ जाते हैं और असामान्य तरीके से समझाएं तो उनके जान पर ही बन 
आती है। भरी भीड़ में ही कब किस हरकत पर उत्तर आएं। और घर-परिवार ? दरअसल हम लड़कियों को 
रोटी  भी कमानी होती है और अपनी इज्ज़त भी बचानी होती है अन्यथा परिवार के लोग ही कह देंगे कि- 
नौकरी करने की कोई जरुरत नहीं घर में ही बैठी रहो ? यह कह देना सचमुच बहुत आसान है पर एक 
पढ़ी-लिखी लड़की का घर की दहलीज़ के अंदर कैद हो जाना बहुत ही मुश्किल। लेकिन मां- बाप और 
घर-परिवार वाले भी क्या करें ? उनके पास दिन- ब- दिन बढ़ते भ्रष्टाचार और सामाजिक विषमताओं ने बहुत 
ही सीमित दायरे छोड़े हैं।

दिल्ली की बसों में भीड़ एक समस्या है लेकिन आये दिन कोई ना कोई इस भीड़ का फायदा उठाकर किसी 
लड़की की कमर या छाती पर हाथ फेर ही देता है। ऐसी स्थिति में लड़कियां अपने आपको असहज महसूस 
करती हैं। पर करें भी तो क्या करें सामने वाला बंदा अपने इस कृत्य के लिए बाकायदा सॉरी भी बोलता है 
लेकिन मौका मिलते ही दुबारा कमर या पेट पर कोहनी धंसा देता है। ज्यादातर लड़कियां इस तरह कि 
घटनाओं को नज़रअंदाज करने की कोशिश करती हैं। परन्तु कुछ लड़कियां इस घटनाओं को एन्जॉय करती 
और हंसकर टाल भी जाती हैं। विस्मय तो तब होता है जब कोई 40 -45 साल का युवक 14-15 साल की 
लड़की  को छेड़ रहा होता है और बात- बात में उसकी जांघ पर हाथ रखने से नहीं चुकता। पर ऐसी घटनाओं के 
प्रति लड़कियों को गंभीर हो जाना चाहिए और कठोर लहजे में सख्त आवाज के साथ अपना विरोध दर्शना 
चाहिए।

पिछले दिनों सलोनी के साथ भी तो आखिरकार यही तो हुआ। आखिर उसने एक मुस्कराहट का जबाब एक 
मुस्कराहट से हे तो दिया। तीन लड़के करीब एक  महीने तक उस लड़की का पीछा करते-करते उसके घर और 
ऑफिस तक पहुंचते रहे थे। नौबत यहां तक आ  गई कि वह चाक- चौराहे और बाज़ार जहां भी होती वही तीन 
गिने चुके चहरे नजर आ जाते। अंतत जब वह  इस हालत से तंग आ गई तो पुलिस को फ़ोन करना पड़ा और 
तब कहीं जाकर इस मुश्किल से निजात मिल  पाई। लेकिन महिने भर भी नहीं बीते थे कि प्रतिशोधवश उन्हीं 
मनचलों ने दुबारा उसे परेशान करना शुरू कर  दिया। फिर इस बात को वह अपने घर पर भी नहीं बता पाई। 
लेकिन स्थिति जब उसके मानसिक प्रताड़ना के  रूप में असहनीय होने लगी तो एक अपने ही हमउम्र पुरुष 
मित्र के साथ पुलिस थाने पहुंच गई। उन मनचलों  के  छेड़छाड़ ने उसे सिर्फ मानसिक प्रताड़ना का शिकार 
बनाया था पर पुलिस के सवालों ने महिला सुरक्षा  कानून का बलात्कार कर दिया। कितने दिन छेड़ रहे हैं ? 
क्यों छेड़ रहें हैं ? तुम्हारे पहले से कोई आपसी  सम्बन्ध तो नहीं हैं ? सिर्फ तुम्हें ही क्यों छेड़ते हैं ? तुमने 
इतने  छोटे कपडे क्यों पहनी हो ? तुम अपने मां-बाप  के साथ क्यों नहीं आई ? तुम्हारे साथ यह पुरुष मित्र 
कौन है ?  और ना जाने क्या- क्या ?

मैं इन्हीं सभी ख्यालों में उलझी हुई थी तभी मेरी नजर उस सीट पर पड़ी तो वह अधेड़ व्यक्ति और उसके 
बगल  वाली सीट पर बैठी महिला गायब थे। बीच में तो कोई बस स्टैंड भी नहीं आया ? लग रहा है वह व्यक्ति 
भी निर्माण विहार के उसी स्टैंड पर उतर गया जहां वह लड़की उतरी थी। क्या ? कहीं वह उस लड़की का दुबारा 
पीछा तो नहीं करेगा ? मेरे अंदर एक सवाल कौंधा परन्तु तब तक बस प्रीत विहार बस स्टैंड के करीब पहुंच 
चुकी थी। मैं बस से उतरने से पहले अपने सामान को सहेजती नजर पास में पड़े लेडीज़ बैग पर पड़ी। मैंने 
अगल बगल नजर दौड़ाई आसपास दो-चार पुरुष यात्रियों के आलावा कोई और नजर नहीं आया तो मुझे यह 
समझने में तनिक भी देर नहीं लगी की यह पर्स उस पीड़ित लड़की का ही है जो असहजता की स्थिति में 
भूलवश छोड़कर चली गई होगी। मैंने उस लावारिस बैग को उठा लिया पहले जी चाहा कि कंडक्टर को दे दे 
ताकि वह वापस ढूंढने आये तो वह लौटा दे। परन्तु फिर ख्याल आया नहीं - आजकल दूसरे का सामान भला 
कौन सहेजकर रखता और लौटाता है। और कहीं कोई जरुरी डाक्यूमेंट्स हुआ तो …?

बस से उतरने के बाद पीजी पहुंची तो घडी की छोटी सुई सात और बड़ी बारह पर थी। कनॉट प्लेस से प्रीत 
विहार पहुँचाने में करीब करीब एक घंटे का समय तो लग ही जाता है। दिन भर ऑफिस की थकान के बाद यह 
आधे घंटे की कमरतोड़ बस की यात्रा पूरे शरीर को चूस लेती है। और इस बार तो पीरियड भी पता नहीं क्यों 
पांच दिन पहले आ गया। इस ईश्वर ने भी जाने क्यों सारे दर्द हम लड़कियों के हिस्से में लिख रखे हैं ? वाशरूम 
पहुंचकर मैंने चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारे और वापस आकर उस बैग को टटोला ताकि ऐसा कुछ मिल जाये 
जिसके आधार पर उसे वापस लौटाया जा सके। कोई डायरी, नोट बुक, विजिटिंग कार्ड कुछ भी जिसमें अमुक 
लड़की का नाम या फिर पता लिखा हो। पर बैग में एक पैकट सैनिटरी नैपकिन, एक लंचबॉक्स और पानी की 
बोतल के आलावा कुछ दिखाई नहीं दिया। लेकिन साईड पॉकेट में हाथ डाला तो एक छोटी डायरी मिल गई। 
डायरी में कोई पता तो नहीं पर कुछ टेलीफोन नंबर जरूर थे। एक नंबर पर जिसके ऊपर पापा लिखा था मैंने 
अपने फोन से डॉयल किया तो दूसरी तरह से जो आवाज़ आई वह एक महिला की थी। मैंने बिना कोई भूमिका 
बनाए बैग के बस में मिलाने की बात बताई तो उसने धन्यवाद ज्ञापन के भाव के साथ बिना पूछे ही यह बता 
दिया हां, यह मेरी बेटी का बैग है जो 73 नंबर की डीटीसी बस में छूट गया था। मैंने फ़ोन पर ही उस महिला के 
घर का पता लिया और अगले दिन पहुंचाने का आश्वासन दिया तो उसे यह कहते देर नहीं लगी कि कोई बात 
नहीं बेटी आप अपना पता दे दो आकर मैं ही ले लूंगी। पर मैंने कोई बात नहीं कहते हुए फ़ोन काट दिया।


दूसरे दिन घर से करीब पांच बजे के आसपास घर से निकल गई। उस लड़की का घर मुख्य सड़क से दस 
मिनट  की दूरी पर एक बिल्डिंग के तीसरी मंजिल पर था। मैंने थोड़ी सी पूछताछ की और तीसरे मंजिल पर 
पहुंची। अपने आपको थोड़ा आस्वश्त किया और डोरवेल बजाकर दरवाजा खुलने का इन्तजार करने लगी। 
थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला तो आवाक रह गई- यह तो वही अधेड़ आदमी था जिसे उस दिन लोगों ने बस में 
पीटा था। और उसके बगल में खड़ी महिला भी वही थी जो उस दिन इस अधेड़ के बगल वाली सीट पर बैठी थी। 
किसी अनहोनी के डर से मेरे हाथ- पैर थर- थर कांपने लगे, मुझे पल भर के लिए ऐसे लगा कि मैं किसी बहुत 
बड़ी साजिश की शिकार हो चुकी हूं। परन्तु ऐसे में अपना धैर्य खो देना किसी मूर्खता से कम नहीं था। मैंने 
अपनी आवाज़ को थोड़ा कसा तथा कठोरता और संदेह भरे लहज़े में उन दोनों की तरफ नजरे तरेरते हुए उन 
प्रश्न किया ? उन दोनों ने बिना किसी गहरे भाव के अंदर आने को कहा और एक लड़की की तरफ इशारा 
करते  हुए कहा नहीं, मेरा नहीं, मेरी बेटी का है। इसका नाम अनन्या है और यह सेकण्डरी की स्टूडेंट है।


मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था ! मेरे पैर के नीचे की जमीन अब खिसके की तब खिसके। मेरे घर के अंदर 
 की तरफ बढ़ते हुए कदम अचानक दहलीज़ के बाहर ही अटक गए- क्योंकि यह लड़की भी वही लड़की थी 
 जिसने अधेड़ को थप्पड़ जड़ा था। उस वक़्त मेरे पास एक मां- एक बेटी और एक बाप के तीन चेहरे थे। मेरे मन  में उस लड़की, उस महिला, और उस पुरुष के लिए एक जोरदार समुंद्री लहर की तरह कुछ घिनौने ख्याल आए। रिश्तों के मर्म का बिना कोई परवाह किए मैं उल्टे पैर भागी। पर इन घिनौने रिश्तों से कब तक भागा जा सकता है ? इस घटना को करीब दो साल हो गए- परन्तु ऐसा लगता है कि तब से लेकर अब तक मैं एक अंतहीन रास्ते पर भागे जा रही हूं - और एक मर्दाना आवाज़ ''उस दिन जो कुछ हुआ वह महज़ एक कमजोर लम्हा था'' आज भी मेरा पीछा कर रही है। उफ्फ ! यह लम्हें भी इतने कमजोर क्यों होते हैं ? जो एक स्त्री की ढकी अथवा खुली देह में छाती, कमर और योनि तो देखते हैं पर अपनी ही बहन- बेटियों का चेहरा नहीं तलाश पाते।

 
 
 
(रचनाकार-परिचय: 
मूल नाम: संजय कुमार पाल।
जन्म: 10 अक्टूबर 1987 को उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जनपद में।
शिक्षा:
स्कूली तालीम जवाहर नवोदय विद्यालय गोरखपुर से,  भारतीय मीडिया संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता व जन संचार में स्नातक, जबकि जेवियर इंस्टिट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन मुंबई से इसी में स्नातकोत्तर किया
कार्यक्षेत्र: एशिया के विभिन्न देशों में शोधकार्य, व्यवसायिकतौर पर मीडिया एंड टेलीविजन लेखन, साहित्य, सिनेमा, रंगमंच एवं सामाजिक कार्य में विशेष रुचि।
नुक्कड़ नाटकों का निर्देशन।  25 से अधिक नाटकों का लेखन।
सृजन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, टेलीविजन एवं आकाशवाणी से रचनाओं का प्रकाशन व प्रसारण।
संप्रति: बीबीसी एशियन नेटवर्क में शोधकर्ता एवं किताबनामा प्रकाशन, हिन्दीनामा प्रकाशन के प्रबंध निदेशक के तौर पर संचालन।
संपर्क: sanjayshepherd@outlook.com)
 
 
 
 
read more...

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

‘मुर्दहिया’ के बहाने लोक-चिंता

ज़मीन की अतल गहराईयों में धँसी थी जिसकी जड़े






 






सुनील यादव  की क़लम से

मुर्दहिया तद्भव में छप रही थी उससे पहले मैं प्रो. तुलसी राम को बहुत कम जानता था, अगर जानता था तो गोरख पाण्डेय पर उनके अविस्मरणीय और जीवंत सस्मरणों  के लिए. अद्भुत यदाश्त थी इस व्यक्ति के पास, बनारस से लेकर जेएनयू तक के गोरख से जुड़े किस्से जब वे सुनाते थे तो एक छवि बनती जाती थी गोरख की और साथ में तुलसी राम जी की भी.  हालांकि बाद में उन्होने अपनी आत्मकथा मणिकर्णिका में उसे लिखा भी । मुर्दहिया को तद्भव में पढ़ने के बाद उसकी फोटो कॉपी के साथ मैं प्रो. तुलसी राम के गाँव धरमपुर पहुंचा.  धरमपुर मेरे गाँव से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। वहाँ पहुँचकर यह अहसास हुआ कि कुछ नहीं बदला है, मैं उसी मुर्दहिया में खड़ा हूँ.  यह मुर्दहिया सिर्फ धरमपुर में ही नहीं है यह मुर्दहिया पूर्वी उत्तरप्रदेश के हर गाँव में है। अन्य गांवो की तरह दक्खिन टोला मेरे गाँव में भी है जिसे लोग ‘चमरौटी’ कहते हैं, यह ‘चमरौटी’ उसी तरह नहीं है, जिस तरह अहिराना, कोइराना, साहबाना या कनुवाना है, यह चमरौटी एक पूरवा का नाम नहीं है बल्कि एक घृणा का नाम है, यह एक तरह की गाली है, जो इसमें रहने वालों की आत्मा को हर रोज छलनी करती रहती है । मुर्दहिया इसी दक्खिन टोले का मर्मांतक दास्तावेज है । यह अकारण नहीं है कि तुलसीराम अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ नाम से लिखते हैं.  हिंदू समाज में जो स्थान मणिकर्णिका का है वही स्थान उनके गाँव धरमपुर की दलित बस्ती का मुर्दहिया से है। वे लिखते भी हैं कि “उनमें से किसी की भी आत्मकथा लिखी जाती तो उसका शीर्षक मुर्दहिया ही होता।”
    
युवा कथाकार और पत्रकार अनिल यादव उनके संदर्भ में बिलकुल सटीक लिखते है कि “वे लंबे समय तक स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफेसर रहे। लेकिन कभी उस फर्मे में फ़िट नहीं बैठे जिसमें सगर्व समा जाने के बाद जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के ज़्यादातर अध्यापक चमकीले प्लास्टिक के बने ज्ञानी लगने लगते हैं। उन्हें देखकर हमेशा मुझे उस धातु की महीन झंकार सुनाई देती थी जिसके कारण भुखमरी, जातीय प्रताड़ना का शिकार, सामंती पुरबिया समाज में दुर्भाग्य का प्रतीक वह चेचकरू, डेढ़ आंख वाला दलित लड़का घर से भागकर न जाने कैसे अकादमियों में तराश कर जड़ों से काट दिए गए प्रोफेसरों की दुनिया में चला आया था। अपमान से कुंठित होने के बजाय पानी की तरह चलते जाने का जज़्बा उन्हें बहुतों के दिलों में उतार गया था। तुलसी राम ने दिखाया कि दलित सिर्फ बिसूरते नहीं हैं, उनकी भी आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लड़ने की परंपरा है, अपने हथियार हैं।”(कबाड़खाना ब्लॉग पर)
    प्रख्यात दलित चिंतक प्रो. तुलसी राम के चिंतन पर बहुत कुछ लिखा गया है उसे मैं छोड़ रहा हूँ, मैं उनके एक बिलकुल अलग रूप को आपके सामने रखने जा रहा हूँ, वह है उनकी ‘लोक चिंता’। इनकी चर्चित आत्मकथा मुर्दहिया लोक-चेतना से सराबोर है। इस आत्मकथा ने आत्मकथा के लगभग सारे प्रतिमानों के साथ सिद्धांतों को भी ध्वस्त कर दिया । जहाँ परंपरागत आत्मकथाओं में लेखक ‘मैं’ से ‘समाज की ओर जाता है। वही इस आत्मकथा में लेखक अपने समाज की पूरी सांस्कृतिक प्रक्रिया से गुजरते हुए ‘अपने’ तक आता है। इसमें लेखक अपने समाज का जिस तरह समाजशास्त्रीय आख्यान प्रस्तुत करता है,  वह किसी भी समाज के अध्ययन के लिए समाजशास्त्रियों को चुनौती है। अपने समाज के जीवन स्तर के एक-एक तत्व की बेबाक प्रस्तुति है ‘मुर्दहिया’। इसमें लोक की तमाम रीति-रिवाज, परंपराएँ, लुप्त होते संस्कार, गीत तथा जातियों के साथ अपने भाषा के लुप्त होते शब्दों को बचा लेने की जोरदार मुहिम है। इसमें ‘लोक’ और ‘लेखक’ एक-दूसरे के सहचर बनकर चलते हैं। प्रो. तुलसीराम ने लिखा है कि ‘‘मेरे जैसा कोई अदना जब भी पैदा होता है। वह अपने इर्द-गिर्द घूमते लोक-जीवन का हिस्सा बन ही जाता है। यही कारण था कि लोकजीवन हमेशा मेरा पीछा करता रहा।”1

आज जिस तरह बाज़ारीकरण ने गाँवों को अपने चपेट में लिया है। गाँवों की सामूहिकता नष्ट-भ्रष्ट हो गई है। कई लोक-कलाएँ लुप्त होती जा रही हैं और कितनी तो नष्ट हो गई है। इसके बारे में ‘मुर्दहिया’ में प्रो. तुलसीराम लिखते हैं कि ”शादी विवाहों के इन अवसरों पर भांड़-मंडलियों या नौटंकियों का आयोजन दलितों के बीच आम बात थी। इन अत्यंत आकर्षक मंडलियों या नौटंकियों में नाटक से लेकर गायक, तबलची, अभिनेता, स्वांग आदि कोई प्रोफेशनल व्यक्ति नहीं बल्कि वही अधपेटवा गुजारा करने वाले हरवाहे हुआ करते थे।”2 वास्तव में लोक कलाकार बनने के पीछे भूख के अर्थशास्त्र को रेखांकित करना, उसके नष्ट होने के कारणों तक पहुँचने का रास्ता भी दिखाता है। बाज़ारवाद के दबाव के बीच ‘थियेटर’ तक दम तोड़ने लगे हैं तो ये लोक कलाएँ कैसे ठहर पाती। आज लोक कलाकारों की स्थितियाँ आत्महत्या तक पहुँच चुकी है। यह भूख के अर्थशास्त्र से ही समझा जा सकता है।
    “लोक कला मंडलियों में लैला-मजनूँ, शीरी-फरहाद, सुल्ताना डाकू आदि जैसे नाटकों का मंचन भी दलित कलाकार आकर्षक ढंग से करते थे। इन सभी नाटकों का अंत एक विचित्र समापन शैली में होता था।... इस कड़ी में बरात प्रस्थान के समय एक खास किस्म का नृत्य किया जाता था, जिसे ‘दुक्कड़’ कहते थे। यह बहुत शक्तिशाली नृत्य होता था। इसमें सिर्फ दो कलाकार एक दफलावादक तथा दूसरा दुक्कड़ची नर्तक हाता था, दफले की जोरदार लक्कड़ ध्वनि पर नाचने वाला व्यक्ति गोलाकार आवृत्ति में नाचते हुए तरह-तरह की कलाबाजियाँ दिखाता रहता था। इन कलाबाजियों में उसका मुकाबला तबलची स्वयं करता था।.... ऐसे ही एक नाच हुआ करता था ‘हूड़क’ की ध्वनि पर ‘कहंरउवा’। हूड़क डमरू की आकृति वाला उससे काफी बड़ा वाद्य होता था, जिसे कलाकार अपनी बांह के नीचे कांख में दबा लेता था तथा उसे अपनी कुहनी से बजाता था। यह बड़ा गजब का वाद्य होता था, जिससे बहुत सुरीली ‘केहुरवा’ शैली में आवाज निकलती थी। वाद्यक स्वयं जो कुछ गाता था, उसके बीच-बीच में ‘दहि दहि दे-दहि दहि दे’ नामक तकियाकलाम भी ठोंक देता था।... आज के जमाने में तो वे सम्भवतः विलुप्त ही हो गए हैं।... एक रोचक बात यह थी कि इस तरह की सारी लोककलाएँ सिर्फ दलितों के बीच ही केंद्रित थीं। सवर्ण जातियों में किसी तरह की लोककला मौजूद नहीं होती थी। शायद यही कारण था जिसके चलते इन कलाओं के साथ जाति सूचक विशेषण जुड़ गए थे जैसे-चमरउवा नाच, या गाना, धोबियउवा नाच कहैरउवा धुन, गोड़इता नाच (हूड़क के साथ) आदि।”3
इन लोक कलाओं के बाद लोकगीतों पर आते हैं। लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता संप्रेषीकरण की होती है। लगभग हर प्रकार के उत्सव तथा श्रम के अलग-अलग गीत लोक में प्रचलित थे, जिनका सौंदर्यबोध अभिजात साहित्य के सौंदर्यबोध से एकदम भिन्न होता है। “धान की रोपनी करती हुई दलित मजदूरिनें हमेशा एक लोकगीत की कुछ पंक्तियाँ दिन भर गाती रहतीं थीं, जो इस प्रकार थीं, अरे रामा परि गय, बलुआ रेत, चलब हम कइसे ऐ हरी।’  इसी तरह जब मजदूरिनें पूर तथा घर्रा के दौरान मोट छिनते हुए कुँए से पानी निकालतीं तो दलित मजदूर एक लोकगीत गाते:
ऊँचे-ऊँचे कुअना क नीची बा जगतिया रामा
निहुर के पनिया भरै, हइ रे साँवर गोरिया
पनिया भरत कै हिन कर झुमका हेरैले रामा
रोवत घरवां आवै ले रे सावर गोरिया।
पनिया भरत के हिन कर टीकवा हेरैले रामा
रोवत घरवा आवै ले रे सांवर गोरिया।”4

इस प्रकार औरत के सारे आभूषणों के कुएँ में गुम हो जाने का वर्णन हो जाता था। यह आभूषण औरतों के मन की कल्पना हुआ करते थे और ये गीत के माध्यम से कुछ देर ही सही कल्पना में जी कर खुश हो लिया करती थीं। “इस प्रकार श्रम के अनेक सौंदर्य गीत भुखमरी के शिकार दलित के जीवन के अभिन्न अंग थे, जो किसी कालिदास या जयदेव के बस की बात नहीं थी।”5  “इसी तरह बालविवाह जैसी कुरीतियों पर तीखी टिप्पणियाँ, जो नंगी सच्चाइयों का पर्दाफाश कर देने वाली होती थीं......इस पर विरहा शैली में बड़ा लोकप्रिय गीत गाया जाता था, जिसकी इन पंक्तियों में गूढ़ रहस्य छिपे रहते थे, जैसे- बाबा विदा करौ लं लरिका क मेहरिया रहरिया में बाजै घुंघरू।”6
    “उपरोक्त पंक्तियों में छिपा हुआ रहस्य यह है कि बाल-विवाह से उत्पन्न कुरीति के कारण बालक दूल्हे की जवान पत्नी को उसका ससुर अरहर और सनई की संयुक्त खड़ी फसल के बीच से जाने वाले रास्ते से विदा कराकर ले जा रहा है। अतः सामाजिक रूप से अमान्य व्यवहार के स्पर्श से गहन फसल के बीच सनई के पौधों से घुंघरू की गूंजती आवाजों से सारा रहस्य उजागर हो जाता है। ‘गीत गोविन्दम’ में जयदेव द्वारा वर्णित कृष्ण के शारीरिक स्पर्श से राधा के पैरों में बंधी पायल के खनक जाने से जो रहस्य खुल जाता है, उससे कहीं ज्यादा सौंदर्यशास्त्रीय रहस्य इन लोकगीतों में मिलता है।”7
 
ऐसे ही लोक के तमाम विषयों एवं उत्सवों पर लोकगीतों की भरमार थी, जो आज लुप्त होती जा रही है। पूरे लोक के सांस्कृतिक एवं सामाजिक परंपरा को अपने अंदर समेटे ये लोकगीत आज लोक से बिसर गये हैं। गाँवों में बच्चों को बहलाने के लिए काव्यमय कहानियाँ गाई जाती थीं जैसे,  ‘‘राजा रानी आवैली, पोखरा खनावैली, पोखरा के तीरे-तीरे इमिली लगावैली, इमिली के खोढ़रा में बत्तीस अंडा, रामचंद्र, फटकारै डंडा, डंडा गयल रेत में-मछरी के पेट में, कौआ कहे काँव-काँव, बिलार कहै झपटो-आ लगड़ी क टांग धइके रहरी में पटको रहरी में पटको।”8  इसी तरह एक अन्य लघुकथा गाई जाती थी, जो इस प्रकार है-  “कड़ा-कड़ा कौआ, नेपाल क बेटउवा, नेपाल गइलै डिल्ली, उठाइके लिअउलै पिल्ली, खेलावा हो कौआ, खेलावा हो कौवा।”9
आज न तो ऐसे काव्यमय कहानी गाकर बहलाने वाला बचा है और ना ही कोई इसे सुनने वाला। पर इन काव्यमय कहानियों का बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक पक्ष होता था, जो बच्चों में जिज्ञासु होने की प्रवृत्ति को पैदा करता था।
प्रो. तुलसी राम ने अपने इस आत्मकथा में बच्चों के उन तमाम खेलों का विस्तार से वर्णन करते हैं जो आज क्रिकेट के चकाचैंध में गायब हो गए हैं। ‘अक्का-बक्का’’’10 से लेकर ‘लखनी’ तथा ‘ओल्हवा के पाती’ तक के खेलों का परिचय ‘मुर्दहिया’ में मिलता है। ‘लखनी’ और ‘ओल्हापाती’ खेल में “एक-दो फिट पतली लकड़ी पेड़ के नीचे रख दी जाती, फिर एक लड़का पेड़ से कूदकर उस लकड़ी जिसे ‘लखनी’ कहा जाता था, को उठाकर अपनी एक टांग ऊपर करके उसके नीचे से फेंककर पेड़ पर पुनः चढ़ जाता था। जहाँ लखनी गिरती थी, पेड़ के नीचे खड़ा दूसरा लड़का उसे उठाकर दौड़ता हुआ पुनः पेड़ के नीचे आकर उसी लखनी से पहले वाले को जमीन से ऊपर कूदकर छूने की कोशिश करता, वह भी सिर्फ एक बार में। यदि उसे छू लिया तो पेड़ चढ़े लड़के को मान लिया जाता कि वह अब ‘मर’ चुका है, इसलिए वह खेल से बाहर हो जाता था फिर लखनी से छूने वाला लड़का विजेता हो जाता। इस ‘मरे’ हुए लड़के को पेड़ के नीचे खड़े होना पड़ता तथा विजेता पेड़ पर चढ़ जाता और खेल की वही प्रक्रिया दोहराई जाती।”11
विवाह के दौरान दीवारों पर ‘कोहबर’ कलाकृतियाँ बनाने की परंपरा थी। “दीवार पर गेरू तथा हल्दी से जो पेंटिंग की जाती थी, उसे कोहबर कहा जाता था। ऐसी कलाकृतियों में केले का पेड़, हाथी, घोड़े, औरत, धनुषवाण आदि शामिल होते थे। एक विशेष बात यह थी कि इन कोहबर कलाकृतियों का प्रचलन सवर्ण जातियों में नहीं था। इन परंपराओं से जाहिर होता है कि सदियों से चला आ रहा दलितों का यह बहिष्कृत समुदाय एक अलौकिक कला एवं संगीत का न सिर्फ संरक्षक रहा, बल्कि उसका वाहक भी है। अशिक्षा के कारण लिपि का ज्ञान न होने के कारण दलित लोग संभवतः भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अभिव्यक्ति के लिए कोहबर पेंटिग का सहारा लिया था।”12
बाजारवाद की मार सबसे ज्यादा लोक में उन लोगों पर पड़ी जो गांवों में घूम-घूम कर सामान बेचा करते थे। जैसे “हिंगुहारा’ हिंग बेचने वाला, ‘पटहारा’ जो शीशा, कंघी, सुई-डोरा, टिकुली इत्यादी चीज़ बेचता था, ‘चुड़िहारा’ जो चूड़ियाँ बेचता था। ‘कपड़हारा’ जो कपड़ा बेचता था।”13 यह सब आज लोक से गायब हैं और बाजार लोक में अंदर तक घुस आया है। ऐसे ही ‘डोम’ जो टोकरी चंगेरी, छिट्टा, दउरी इत्यादि बनाते थे, धोबी जो कपड़ा धोते थे, ‘कुम्हार’ जो वर्तन बनाते थे, ‘नाई’ इत्यादि व्यवसायिक जातियाँ आज लोक से विलुप्त हो रही है। मुर्दहिया में इनके चिंता से रूबरू होने का प्रयास दिखता है।
प्रो. तुलसी राम ने अपने दादी के माध्यम से अनेक दवाओं की चर्चा करते हैं, जो लोक में ‘खरबिरिया’ दवाएँ के नाम से जानी जाती हैं, जैसे- “दाल चीनी तथा बांस का सींका पीसकर ललाट पर लगाने से सिरदर्द बंद हो जाता था।”14 पेचिश की बीमारी के लिए “अमरूद या अमलताश की पत्ती पीसकर छानने के बाद उसके रस को पिलाया जाता।”15 खुजली ठीक करने के लिए ‘‘भंगरैया नामक पौधे की पत्तियाँ पीसकर छोपने से खुजली ठीक हो जाती है।”16 फोड़े फुंसी के ऊपर “अकोल्ह के पत्ते पर मदार का दूध पोतकर चिपकाने से वह ठीक हो जाते।”17 इस प्रकार के अनेकों दवाएँ लोक में उपलब्ध थीं, जिनका उपयोग किया जाता था।
‘मुर्दहिया’ के बहाने लोक के पुर्नसृजन का प्रयास प्रो. तुलसी राम करते हैं, उनकी नजर लोक के उन सब चीजों तक जाती है, जो आज विलुप्त हो गये हैं या होने के कगार पर हैं। वे विस्तार से उन चीजों को फिर से संजोते हैं। खेती के उपकरणों से लेकर सिंचाई के साधनों तक जिनका प्रयोग पहले से होता था, का विस्तार से वर्णन यहाँ मिलता है। लोक की तमाम प्रकार की कुरीतियों की समाजशास्त्रीय आधारों की चर्चा भी यहाँ मिलती है, जिसमें एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिखता है।
लोकोक्तियों तथा लोक के उन शब्दों को जिनका प्रयोग आज होना बंद हो गया है, उन्हें वे पुर्नव्याख्यायित करते हैं। लोक का पूरा संस्कार ‘मुर्दहिया’ में जीवित हो उठता है। यही इसकी विशेषता भी है। लेखक लोक से किस तरह संपृक्त है इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है “चरवाही के दौरान हम किसी के खेत से पकी-पकी धान की बालियाँ पांग कर लाते और गमछा बिछाकर उन्हें लाठी के हूरे से मूसल की तरह कूच-कूच कर चावल बना देते। इस थोड़े से चावल को हम आग जलाकर छोटी सी मिट्टी की भरूकी में पकाते तथा वहीं किसी की बकरी को दूहकर पलाश के पत्ते के दोने में दूध निकालते। बकरी के इस कच्चे दूध में सिंघोर की पत्ती के तोड़ने से निकलते द्रव की एक-दो बूँद मिला दिया जाता, जिससे तत्काल दहीं जम जाती थी। भरूकी में ही मटर की दाल पकाई जाती, जिसमें पलाश का पत्ता डाल देने से वह तुरंत गल जाती थी।”18 

तत्काल दही जमाने तथा तुरंत दाल गलाने का उपाय लोक में ही मिल सकता है। यही लोक की ताकत है, जिसका अहसास मुर्दहिया से गुजरते हुए बार-बार होता रहता है।
    अंत में प्रो तुलसी राम के लिए यह कह सकते हैं कि जमीन की अतल गहराईयों में धँसी थी जिसकी जड़े वह बरगद इतनी जल्दी ढह जाएगा ऐसी आशा न थी ।


संदर्भ:
1.    मुर्दहिया (आत्मकथा प्रथम खण्ड) प्रथम संस्करण-2010) - प्रो.
तुलसीराम,     राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ - 5
2.    वही पृष्ठ - 106
3.    वही पृष्ठ - 107-108
4.    वही पृष्ठ - 67
5.    वही पृष्ठ - 67
6.    वही पृष्ठ - 106
7.    वही पृष्ठ - 107
8.    वही पृष्ठ - 28
9.    वही पृष्ठ - 28
10.    वही पृष्ठ - 29
11.    वही पृष्ठ - 43
12.    वही पृष्ठ - 105
13.    वही पृष्ठ - 33
14.    वही पृष्ठ - 49
15.    वही पृष्ठ - 62
16.    वही पृष्ठ - 62
17.    वही पृष्ठ - 62
18.    वही पृष्ठ – 145



(लेखक-परिचय:
जन्म: 29 दिसंबर 1984 को ग्राम- करकपुर , पोस्ट अलावलपुर, गाजीपुर (उ प्र ) में
शिक्षा: आदर्श इंटर कॉलेज गाजीपुर से आरंभिक शिक्षा,  इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद से बीए और एमए, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय से पी-एचडी कंप्लीट, उपाधि प्रतिरक्षा रत
सृजन : पहल जैसी अहम पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित.
‘समसामयिक सृजन’ पत्रिका के  लोक विशेषांक का संयोजन
संप्रति:   स्वतंत्र लेखन और शोध कार्य में सक्रिय
संपर्क: sunilrza@gmail.com)

हमज़बान पर सुनील यादव के और लेख पढ़ें

 

read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)