बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

के होतई बिहार के मांझी

चित्र: गूगल से साभार



 
बिहार के सुशासन को चुनौती देते कुछ तत्व
भवप्रीतानंद की क़लम से
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी को अपना नेता चुनने में कोई खास परेशानी नहीं हुई थी। दल की एकता  और गांधी परिवार की आशक्ति ने एकमत से राजीव गांधी को नेता चुन लिया। लालू यादव के लिए भी चारा घोटाला में फंसने के बाद मुख्यमंत्री के पद पर बने रहना असंभव हो गया था, तो पार्टी में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कोई और नहीं सूझा, पत्नी राबड़ी के अलावा। इससे न सिर्फ वह पार्टी पर कमांड रख सके, बल्कि सत्ता में भी छाया प्रशासक की भूमिका निभाते रहे। नीतीश कुमार के पास शायद ऐसा कोई नहीं था। इसलिए उन्होंने महादलित जीतनराम मांझी को चुना। नीतीश ऊपर के दोनों दोनों उदाहरण से थोड़ा  अलग इसलिए हैं कि उन्होंने सत्ता  लोकसभा में बिहार में मिली करारी हार के कारण छोड़ी थी। कमान जीतनराम मांझी को यह सोचकर दी थी, कि वह उसी कार्य परंपरा को बनाए रखेंगे, जो वह आठ वर्षों से बनाए रखे थे। इससे नीतीश ने जनता के सामने यह साबित करने का प्रयास किया कि हार के बाद उन्होंने सत्ता में बने रहने का आधिकार खो दिया है।
आम आदमी पार्टी फिर से जब दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई है, तो पार्टियों को दो खेमे में बांटकर देखने का चलन शुरू हुआ है। एक परंपरागत पार्टी का खेमा बना है जो वर्षों से राजनीति कर रहा है और नाम अलग-अलग  होने के बाद भी चारित्रिक रूप से दोनों एक हैं। मतलब दोनों में दागी नेताओं  की कमी नहीं है। दोनों के पास काले धन हैं। सत्ता में जो रहता है, वह इन दागी नेताओं से परहेज नहीं करता है। या फिर सत्ता में रहकर भी जो अलोकतांत्रिक फैसले लेता से उसपर तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, जब तक की पानी सिर के ऊपर ने न गुजर जाए।

इन्हीं परंपरागत राजनीतिक  दलों में से कई नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने विकास को एक नया आयाम दिया है। ओडिशा, छत्तीसगढ़, एमपी में वर्षों से परंपरागत पार्टी के नेताओं ने लीक से हटकर काम करके दिखाया, तो लोग उन्हें सत्ता में बनाए हुए है। बिहार के नीतीश कुमार भी ऐसे सीएम की केटगरी में देखे जाते हैं जो विकास की राजनीति करते हैं। काम के बल पर वोट मांगते हैं और जातीय गणित के जोड़-तोड़ में लिप्त रहने वाला राज्य भी उन्हें सत्ता में बनाए रखता है।

नीतीश ने भाजपा से नाता तोडऩे के बाद जो राजनीति की है, वह कई शंकाओं को जन्म देती है। लालू यादव से हाथ मिलाकर उन्होंने जातीय गणित को दुरुस्त करने की भले कोशिश की हो, पर जिस दम पर उनकी राजनीतिक  शख्सियत बनी थी, उसपर सवालिया निशान लग गया है। यह चुभने वाली बात है। जदयू और नीतीश नरेंद्र मोदी की अखिल भारतीय स्वीकृति को नहीं आत्मसात कर पाए, यह बात अपने-आप में और अपनी जगह ठीक हो सकती है। पर जदयू-शरद यादव-नीतीश कुमार इसके काट के लिए लालू यादव को गले लगाते हैं, यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है।

लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी नीतीश बिहार की सत्ता में बने रहते, तो लोगों में कोई बहुत गलत संदेश नहीं जाता। खासकर तब जब कि उन्होंने आठ वर्ष राज कर लिया था और बिहार में विकास की स्थिति को गतिशील बना दिया था। २०१५ अंत में जब वह जनता के सामने रिपोर्ट कार्ड लेकर जाते, तो शायद उनकी स्थिति भाजपा और राजद से बेहतर ही होती। पर जीतनराम मांझी के बेसुरा होने के बाद और लालू यादव को गले लगाने के बाद नीतीश उस रिपोर्ट कार्ड को बहुत अधिकार के साथ प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे, जिसे वह सुशासन कहते हैं। जीतनराम मांझी ने नीतीश की छवि सत्ता लोलुप की बना दी है। शायद इसी कारण वह जीतनराम मांझी के चुनाव को  अपनी बड़ी भूल मान रहे हैं। पर अगर बिहार की जनता विकास की राजनीति को मानक मानकर वोटे देती है तो जीतनराम मांझी से अधिक खतरनाक उनका लालू  यादव से गठबंधन वाला दांव रहेगा। लालू यादव ने सत्ता में आने के बाद से वहां बने रहने के लिए उसका जितना गलत इस्तेमाल करना था, किया था। उन्होंने बिहार में चुनाव का मखौल बनाकर रख दिया था। जिस सुशासन को नीतीश अपना गहना मानते हैं, क्या उनके साथी लालू यादव भी उसे इसी रूप में देखते हैं। यह प्रश्न इसलिए लाजिमी है क्योंकि लालू यादव को लठैती की भाषा समझ में आती है। वह चीजों को व्यवस्थित तरीके से देख ही नहीं सकते। बिहार में विकास के ग्रिप में आई जनता लालू यादव को सिरे से नकारती है। क्योंकि उन्होंने अपने कर्मों का कोई प्रायश्चित नहीं किया है। उन्होंने  कुछ ऐसा कर नहीं दिखाया है जिससे कि बिहार की जनता समझे कि चलो अब लालू यादव को सद्बुद्धि आई। ऐसी स्थिति में नीतीश का लालू के गले लगना खतरे से खाली नहीं है। क्योंकि मिलकर अगर उन्हें सत्ता मिलती है तो नीतीश के सुशासन के रथ में पहिए सुरक्षित रह भी पाएंगे-इसमें शक है।
दिल्ली में भाजपा की करारी हार के बाद जीतनराम मांझी नामक वायरस से नीतीश को आने वाले सप्ताह में मुक्ति मिल सकती है। पर मांझी के वायरस ने नीतीश को सताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। १६ फरवरी को जब हाईकोर्ट ने जीतनराम मांझी के थोक में लिए गए फैसले पर रोक लगाई तो पहली बार उनके चेहरे पर हार का डर दिखने लगा। दिल्ली में भाजपा की करारी हार के बाद से भाजपा भी बहुत उत्सुक होकर माझी के साथ नहीं चल रही है। नीतीश के दूसरी बार विधायक दल के नेता चुने जाने के बाद सत्ता पाने के लिए जो हड़बड़ाहट दिखा रहे हैं वह उनके व्यक्तित्व के इतर है। पर बात सिर्फ फिर से सीएम बन जाने की नहीं है। बात है साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव की है। वह क्या लालू यादव को साथ लेकर चुनाव जीता जा सकता है।
आप ने हर परंपरागत पार्टियों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। उसके सुशासन की परिभाषा नीतीश कुमार से भी अलग है। अगर पूरे देश की जनता ऐसे ही मानक को प्रतिमान मानकर लोगों को चुनती है तो लालू से गठबंधन नीतीश के लिए गले की फांस बन जाएगी। नीतीश जब फिर से सीएम बनेंगे तो उन्हें बहुत संभलकर कदम रखने होंगे। लालू यादव से हुए गठबंधन को अवसरवादी नहीं बताकर उसकी स्पष्टता की व्याख्या जनता के समझ प्रस्तुत करना पड़ेगा। यह चुनौती कई मायनों में अधिक जटिल है। जातीय गणित बिहार की राजनीति में अहम है। बिहार क्या पूरे देश की राजनीति में अहम है। पर लोग अब इससे परे भी देखने लगे हैं। देखने के आदी हो रहे हैं। तो राजनीति को भी उसके अनुसार बदलना होगा। राजनीति करने वाले को भी जातीय गोटी फिट करने से इतर सड़क-बिजली-पानी-शिक्षा आदि विषय-वस्तुओं पर ध्यान देना होगा। लालू यादव क्या राजनीति के इस परिवर्तन को देख-महसूस कर पा रहे हैं? नीतीश से उनका गठबंधन भी तभी सफल होगा जब विकास की राजनीति का मोर्चा उनके लिए भी जुनून का विषय बनेगा।



 









(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )
 
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शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

बिहार में नीतीश के विकास की झलक

 संदीप मौर्य की क़लम से


बिहार में इन दिनों लूट मची है। लूट के तरीके भी अजीबोगरीब हैं। अजीबोगरीब इस मायने में कि करोड़ों रुपये का घोटाला हो जाता है और किसी को इसकी भनक तक भी नहीं लगती। आज हम जिस घोटाला की बात कर रहे हैं वह बिहार राज्य प्रशासनिक सुधार मिशन से जुड़ा है। ब्रिटेन सरकार के डीएफ़आईडी विभाग की सहायता से बिहारी बाबूओं को सशक्त बनाने की योजना चलाई जा रही है। इसी योजना के तहत सरकार ने उन्हें लैपटाप उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। इस योजना के तहत प्रत्येक बाबू को 60 हजार रुपये दिये गये। सबसे अहम बात यह कि सरकार ने उन्हें कम्प्यूटर का प्रशिक्षण दिलाने के लिये डीओईएसीसी नामक संस्थान से समझौता किया। इस समझौते के तहत सरकार ने सभी जिलों में संस्थान के जरिये कम्प्यूटर प्रशिक्षण की व्यवस्था की। अब बेचारे बाबू लोग को कम्प्यूटर क्लास करने से रहे। उन्हें तो बस लैपटाप लेने की हड़बड़ी थी। इसलिये बेचारे बाबू लोगों ने कुछ ले देकर फ़र्जी सर्टिफ़िकेट बनवा लिया और लैपटापधारी बन गये।सरकार की यह योजना चल रही है और हर महीने कम्प्यूटर प्रशिक्षण के नाम पर प्रति माह करीब 2 करोड़ 55 लाख रुपये लूटाये जा रहे हैं। लूटाये इसलिये कि कम्प्यूटर प्रशिक्षण केवल कागजी हो रहा है।
ग्रामीण सड़कों के मामले में बिहार सरकार किस कदर फ़िसड्डी रही है, उसका एक नमूना सरकारी आंकड़े ही दे रहे हैं। वैसे सबसे बड़ी बात यह है कि यदि सरकार ने अपने उपलब्धि पत्र में 4712 किलोमीटर सड़क का निर्माण कराया है और इसके लिये 3478 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं तो इस हिसाब से प्रति किलोमीटर सड़क के निर्माण में सरकार को करीब 80 से 90 लाख रुपये खर्च करने पड़े हैं। अब यदि इस आंकड़े के हिसाब 4712 किलोमीटर का 22 फ़ीसदी अलग कर दें तो कुल मिलाकर 3675 किलोमीटर सड़कें कागज पर बनीं और इसके लिये सरकारी खजाने से 2940 करोड़ रुपये की निकासी की गई है। अब वैसे भी बिहार में सुशासन का राज है, इसलिये कोई इस सरकार से 2940 करोड़ रुपये के हिसाब की जानकारी तो मांगेगा नहीं। कम से कम सूबे में रसूख वाले मीडिया यानी अखबार और टेलीविजन चैनलों वालों से तो इसकी उम्मीद नहीं की जानी चाहिये।
क्या बिहार में सुशासन इसी का नाम है?
बिहार में विकास का आलम यह है कि यहां 58 फ़ीसदी बच्चे कूपोषण के शिकार हैं। 80 फ़ीसदी का आंकड़ा उन बच्चों का है जिनकी उम्र 5 वर्ष से कम है। बांका और सासाराम जिले में सरकारी तफ़्तीश के दौरान यह सच सामने आया है कि करीब डेढ लाख छात्र-छात्राओं ने फ़र्जी नामांकन के आधार पर सरकारी साइकिल और पोशाक की राशि हड़प ली। मानव विकास संसाधन विभाग के सूत्रों की मानें तो पूरे बिहार में यह संख्या करीब 12 लाख है। सबसे बड़ा सवाल यह कि 12 लाख फ़र्जी छात्रों का नामांकन किसने और कैसे कर दिया।
बिहार देश का पहला राज्य है, जहां सबसे पहले भूमि सुधार के प्रयासों को शुरु किया गया। जमींदारी उन्मूलन के प्रयास सबसे पहले यही शुरु हुए और फ़िर भूदान के प्रणेता संत विनोबा भावे को वास्तविक कामयाबी भी बिहार में ही मिली।नीतीश सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले बिहार के महादलित भूमिहीनों को आश्वस्त किया था कि सरकार उन्हें रहने के लिये 3 डिसमिल जमीन देगी। सरकार की यह घोषण चुनाव जीतने के साथ ही खत्म हो गई। आज हालत यह है कि सरकार अभीतक केवल 7 जिलों में करीब 373 महादलित भूमिहीनों को ही 3 डिसमिल जमीन का पर्चा दे सकी है।सरकार एक ओर कहती है कि गरीबों के लिये उसके पास जमीन नहीं है और दूसरी ओर बड़े-बड़े तथाकथित उद्योगपतियों को बियाडा की ओर से बेशकीमती जमीन दी जा रही है।
सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना में अपराध अनुसंधान विभाग ने बताया कि सूबे बिहार में महिलाओं के अपहरण व दहेज हत्या के मामले काफी बढ़ गए हैं. 2005 में महिलाओं के अपहरण के 854 व दहेज हत्या के 1044 मामले दर्ज किए गए. इसी तरह 2006 में अपहरण के 925 व दहेज हत्या के 1006, 2007 में अपहरण के 1184 व दहेज हत्या के 1091, 2008 में अपहरण के 1494 व दहेज हत्या के 1233, 2009 में अपहरण के 1997 व दहेज हत्या के 1188, 2010 में अपहरण के 2552 व दहेज हत्या के 1307 मामले और 2011 के अगस्त माह तक अपहरण के 1856 व दहेज हत्या के 953 मामले दर्ज हो चुके हैं. ये तो सरकारी आंकड़े हैं. सूबे के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि यहां आधे से अधिक मामले दर्ज होते ही नहीं है. खासकर महिलाओं से जुड़े मामले तो और भी दर्ज नहीं हो पाते हैं.पटना अपराध के लिहाज़ से अव्वल रहा. ज़िले में हत्या की 304, अपहरण की 283 और दुष्कर्म की 50 घटनाएं दर्ज की गईं. दुष्कर्म की सबसे ज़्यादा घटनाएं कटिहार में दर्ज हुईं तो अपहरण के लिहाज़ से पटना और मुज़फ्फरपुर अव्वल रहे.
बिहार में अभी भी जनवितरण प्रणाली अस्तित्वविहीन हो चुकी है!सवाल यह नहीं है कि सड़े गेहूं को क्यों जला दिया गया, सवाल यह है कि जब बिहार 1 करोड़ 47 लाख परिवार(मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अनुसार) बीपीएल परिवार की श्रेणी में शामिल हैं, फ़िर गेहूं सड़ कैसे गया, उसे समय से वितरित क्यों नहीं किया गया?भारत सरकार द्वारा गरीबों को कम कीमत पर वितरित करने के लिये वर्ष 2009-10 में आवंटित गेहूं दिसंबर 2011 में भी नहीं बंट सका और सड़ गया। सड़े गेहूं के निशान को छिपाने के लिये सरकारी अधिकारियों ने उसे जलाने की कोशिश की, लेकिन सरकार का यह पाप छुप नहीं सका। पिछले दिनों राजधानी पटना के मनेर प्रखंड में एसएफ़सी यानी राज्य खाद्य निगम के गोदाम परिसर में जब गेहूं जलाया जा रहा था, तब आम लोगों ने सरकार की पोल खोल दी.







बिहार के अररिया सदर अस्पताल में ओटी के निकट एक मां हाथ से नली पकड़कर अपने बच्चे को आक्सीजन दे रही है। कमिश्नर के अस्पताल का निरीक्षण कर ने के तीन दिन बाद का यह मंज़र है। फोटो जागरण से साभार
(लेखक-परिचय:
जन्म:२२ अक्टूबर १९८६ को, मगध के अरवल जवार में.
शिक्षा: पटना विवि से पत्रकारिता जनसंचार में उपाधि
सम्प्रति: हिंदुजा समूह में अधिकारी
संपर्क:फेसबुक )



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सोमवार, 4 जुलाई 2011

किसका कसूर है कि कैसा निज़ाम ए दस्तूर है .संदर्भ फारबिसगंज

क्या बिहार में मुसलमान होना गुनाह है ??????
























संदीप मौर्य की क़लम से
आज के बदलते दौर में यह सवाल संभवतः कई सवालों को जन्म देता है। मसलन क्या भारत वाकई में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र नहीं है? अथवा क्या भारत के मुसलमानों को जीने का अधिकार नहीं है? अथवा क्या भारत के मुसलमानों को अभी भी कुर्बानियां देनी होगी, यह साबित काने के लिये कि वे भी इसी माटी के सपूत हैं? जाहिर तौर इस सवाल का कोई मतलब नहीं होता अगर भारत में गुजरात नहीं होता या फ़िर गुजरात में नरेंद्र मोदी जैसा शासक नहीं होता। लेकिन दुर्भाग्य कहिये कि अब ये सवाल हमारे बिहार में भी उठने लगे हैं। यह सवाल उठा है उस व्यक्ति के शासनकाल में जो स्वयं को बिहार का सबसे काबिल मुख्यमंत्री बताते फ़िरते हैं और फ़िर बिहार की गरीब जनता के पैसे को विज्ञापन के रुप में बांटकर पालिटिशियन आफ़ द इयर का अवार्ड लेना इनका शौक बन चुका है।
जी हां, हम बात कर रहे हैं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की। इनकी बात हम बाद में करेंगे। सबसे पहले हम बात करेंगे उपर तस्वीर में दिख रहे चेहरों की। इन सभी लोगों का गुनाह यह है कि ये सभी बिहार के अररिया जिले के फ़ारबिसगंज के निवासी हैं। इनमें से एक अब इस दूनिया में नहीं है। लेकिन 3 जून तक वह बिहार का वासी था। उसके साथ कुछ और लोगों ने इस दूनिया को अलविदा कहा। यह उनके जाने का समय नहीं था। मरने वाले सभी की उम्र 35 वर्ष से कम ही रही होगी। इनमें से एक की उम्र तो केवल 7 महीने की थी। उसका नाम नौशाद था। उसकी मां उसे अपने गोद में छिपाये सुरक्षित स्थान की ओर भाग रही थी। पुलिस ने सामने से उस पर गोली चलाया और गोली नौशाद को लगी। 7 महीने का नौशाद खुशनसीब था कि उसकी मौत मां की गोद में हो गई। नौशाद की मां अपने लाल को मरा देख दहाड़े मारकर रोने लगी। पुलिस को फ़िर भी रहम नहीं आई। उसने नौशाद की मां पर भी गोली चलाई। गोली उसके जांघ में लगी और वह गिर पड़ी। एक तरफ़ नौशाद की लाश पड़ी थी, तो दूसरी ओर उसकी मां गोली लगने की वजह से बेसुध पड़ी थी।
कुछ दूरी पर एक और लाश पड़ी थी। वह लाश थी मुस्तफ़ा की। मुस्तफ़ा 18 वर्ष का नौजवान था। वह फ़ारबिसगंज में ही कर्बला के पास पान की दूकान चलाया करता था। उसके पिता फ़ुलकान अंसारी ने बताया कि उनका बेटा बाजार से सामान लेकर लौट रहा था। इसी बीच वह पुलिस की गोली का शिकार हो गया। 18 साल के नौजवान मुस्तफ़ा को पुलिस ने 4 गोलियां मारी थी। लेकिन वह मरा नहीं था। उसके शरीर में जान बाकी थी। एक पुलिस वाला उसके शरीर पर कूद रहा था और उसे अपने बूट से मारे जा रहा था। मुस्तफ़ा मरा तो नहीं, लेकिन उसके शरीर में प्रतिरोध की शक्ति नहीं थी। वह पुलिस वाला उस बेजान पर अपनी मर्दानगी दिखा रहा था। बाद में पुलिस ने उसे मरा हुआ जानकर पोस्टमार्टम के लिये भेज दिया। पोस्टमार्टम के दौरान डाक्टरों ने उसे जीवित पाया। डाक्टरों ने उसे तत्काल ही इलाज के लिये भेज दिया और उसे तत्काल ही आक्सीजन लगाया गया। लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी और इस बार वह हमेशा-हमेशा के लिये मर चुका था।
एक महिला भी सुशासक नीतीश कुमार के राज में पुलिस की गोली का शिकार हुई। वह भी फ़ारबिसगंज के भजनपुर गांव की ही रहने वाली थी। उसका पति उसी निर्माणाधीन फ़ैक्ट्री में काम करता था, जिस फ़ैक्ट्री के संचालकों के दबाव पर बिहार पुलिस ने लोगों पर कहर बरपाया। वह गर्भवती थी। उसके पेट में 6 माह का बच्चा था। वह बाजार में एक मैटरनिटी सेंटर से अपना चेक अप कराकर घर लौट रही थी। लेकिन वह घर नहीं पहुंच सकी। इसकी वजह रही कि वह घर पहुंचने से पहले ही परलोक सिधार चुकी थी। उस गर्भवती महिला और उसके अजन्मे बच्चे को भी नीतीश कुमार की पुलिस ने गोली से मार दिया। जरा सोचिये कि आखिर उस महिला ने बिहार के मुखिया अथवा सत्ता में बैठे लोगों अथवा उस कंपनी के मालिकों का कौन सा हक छीनने का प्रयास किया कि पुलिस ने उसे एक नहीं 6 गोलियां मारी।
जाहिर तौर पर इन सवालों का जवाब बिहार सरकार के पास नहीं है। बिहार सरकार की गद्दी पर जो महानुभाव बैठे हैं, उनका एक ही एजेंडा है। गरीबों को मारो, उद्यमियों को खुश रखो। विकास के इसी फ़ार्मूले को नीतीश कुमार न्याय के साथ विकास कहते हैं।
खैर, उस घटना, घटना के कारणों और घटना को अंजाम देने वाले लोगों के बारे में बता दें कि आखिर क्यों और किसने भजनपुर गांव के लोगों के घर में लाशों का ढेर लगा दिया। बदलता बिहार का एक बदलता हुआ जिला है अररिया जिला। इस जिले को सरकार ने दो हिस्सों में बांट रखा है। एक हिस्सा खास अररिया के नाम से जाना जाता है तो दूसरे हिस्से को लोग फ़ारबिसगंज के नाम से जानते हैं। वह वही फ़ारबिसगंज है, जहां कभी मैला आंचल के जनक फ़णीश्वरनाथ रेणु का जन्म हुआ था। इसी फ़ारबिसगंज में एक गांव है भजनपुर गांव और इसके बगल में एक और गांव है रामपुर। नाम से लगता है कि ये दोनों गांव हिन्दूओं के गांव होंगे। लेकिन भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अधूरा प्रमाण कि इन दोनों गांवों के अधिकांश वाशिंदे मुसलमान हैं।

दरअसल यह जमीन जिसके नाम पर बिहार सरकार ने आवंटित किया है, वह भाजपा विधानपार्षद अशोक अग्रवाल का बेटा है। यह वही अशोक अग्रवाल हैं जिनपर हत्या करने का एक मामला हाईकोर्ट में चल रहा है और इनके उपर स्मगलिंग करने का आरोप भी लग चुका है। जब स्थानीय प्रशासन आम नागरिकों को समझाने में असफ़ल रही तो उसने 2 जून को ही ग्रामीणों के साथ लिखिज समझौता किया। लिखित समझौते के हिसाब से कंपनी को पहले गांव में आने-जाने के लिये रास्ता बनवाने का वायदा किया गया। लेकिन 3 जून को दोपहर में पुलिस वालों की मौजूदगी में कंपनी वालों ने भजनपुर गांव के लोगों के लाइफ़लाइन पर दीवार खरी कर दी। फ़िर क्या था, यह खबर इलाके में जंगल की आग की तरह फ़ैल गई। लोग जूटने लगे। गांव वाले दीवार हटाने की मांग कर रहे थे। लेकिन जब प्रशासन की ओर से बातचीत के लिये कोई पहल नहीं की गई तब ग्रामीणों का आक्रोश बढने लगा। इस बीच ग्रामीणों ने कंपनी प्रबंधकों द्वारा बनाये गये नवनिर्मित दीवार को ढाह दिया। इस घटना से आपा खोते हुए स्थानीय आरक्षी अधीक्षक ने फ़ायरिंग करने का आदेश दे दिया। फ़िर जो कुछ हुआ, उस पर अफ़सोस ही जताया जा सकता है।
खैर, अब इस घटना को बीते एक सप्ताह हो चुका है और अभी तक मृतकों के परिजनों और घायलों को मुआवजा नहीं दी गई है। इस पर तुर्रा यह कि राज्य का सुशासक यह दलील दे रहा है कि सभी को मुआवजा न्यायिक जांच के बाद दी जायेगी। यानि पहले पूरे घटना की जांच की जायेगी और फ़िर मुआवजे की राशि तय की जायेगी।
वैसे इस संबंध में मेररी निजी राय है कि बिहार सरकार को इस घटना के लिये जिम्मेवार लोगों को कोई मुआवजा नहीं देना चाहिये। सबसे पहले तो मुआवजा उस कंपनी के प्रबंधकों को मिलनी चाहिये, जिसे इतना नुकसान हुआ। गरीब ग्रामीणों का क्या है, उन्हें मुआवजा देने से क्या लाभ? वैसे भी गलती उनकी है कि उन्होंने सच के लिये अपनी कुर्बानी दी और आज की तारीख में ऐसे लोगों को शहीद कहा जाता है। शहीदों की शहादत की कोई कीमत नहीं होती है। शहीदों की शहादत कभी बेकार नहीं जाती। संभव है कि लाशों के ढेर पर बिहार में खड़ा होने वाले उद्योगों से बिहार की गरीबी दूर हो। हालांकि एक सवाल यह भी क्या वाकई इस राज्य में मुसलमान होना कोई पाप है। जरा सोचिये कि अगर भजनपुर और रामपुर गांव के लोग मुसलमान के बजाय हिन्दू होते तो क्या भाजपाई उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी अपने दल के क्रिमिनल विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के पक्ष में बिहार की भलमानस पुलिस को ग्रामीणों पर फ़ायरिंग करवाते। इसका सीधा जवाब है- नहीं। इसका एक प्रमाण यह कि जब उत्तरप्रदेश के नोयडा के एक गांव में जमीन अधिग्रहण को लेकर हिंसा हुई तो भाजपा के सभी बड़े नेताओं सहित सुशील मोदी ने भी उत्तप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की आलोचना की थी। बहरहाल, हम तो आप सभी से इसी सवाल का जवाब जानना चाहते हैं-
फेस बुक से साभार




(लेखक-परिचय: जन्म:अरवल बिहार में, २२ दिसंबर १९८८
शिक्षा: पत्रकारिता और जन संचार में उपाधि
सम्प्रति :महिंद्रा-महिंद्रा में जनसंपर्क अधिकारी ,पटना  )


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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

बिहार: इस बार जीते हैं सबसे ज्यादा पढ़े लिखे मुस्लिम विधायक

 हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव ने साबित कर दिया है कि बिहार में बदलाव की लहर चल पड़ी है। इसकी तेज और मंद गति को लेकर बहस संभव है। लेकिन इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनकर आए 19 मुस्लिम विधायकों में से ज्यादातर उच्च शिक्षा प्राप्त हैं,साथ ही इनकी औसत उम्र 45 साल है। इनमें डॉक्टर, वकील और पीएचडी धारी भी हैं । 14 विधायक तो पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं ।

डॉ मोहम्मद जावेद ने गवर्मेंट कश्मीर युनिवर्सिटी,मेडिकल कालेज से एमबीबीएस किया है,तो डॉ दाऊद अली ने डीएच मेडिकल कालेज, दानापुर से डीएचएमएस की डिग्री हासिल की है। वहीं शाहिद अली खां ने बीबीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर,तो इज्हार अहमद ने मगध विश्वविद्यालय से एलएलबी किया है। अहमद पीएचडी भी हैं । फैयाज अहमद ने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा और अब्दुल गफूर ने पटना विश्व विद्यालयसे एमए और एलएलबी की पढ़ाई की है। जावेद इकबाल अंसारी ने रांची विश्वविद्यालय से पीएचडी की है । जबकि अख्तरुल ईमान और मोहम्मद आफाक आलम, एमए पास हैं,तो सबा जफर,नौशाद आलम,जाकिर हुसैन, सरफराज आलम और परवीन अमानउल्लाह स्नातक हैं।

पुराने समाजवादी और राजद से अली नगर से राजद विधायक अब्दुल बारी सिद्दीकी ने एएन कालेज ,पटना से तो अख्तरुल इस्लाम शाहीन ने एमएचकेजी कालेज , समस्तीपुर से आइएससी किया है। कल्याणपुर से जदयू की टिकट पर जीत कर आई रजिया खातून सिर्फ मैट्रिक हैं। इसके अलावा मोहम्मद तौसीफ आलम और शर्फउद्दीन ने मदरसे से तालीम हासिल की है।

सबसे कम उम्र के हैं

मो तौसीफ आलम और अख्तरुल शाहीन इस बार विस में पहुंचे सबसे जवान मुस्लिम विधायक हैं । इनकी उम्र 31 साल है।

सबसे जयादा उम्र वाले

सबसे उम्रदराज मुस्लिम विधायक हैं अब्दुल बारी सिद्दिीकी, 63 और रजिया खातून, 57।







भास्कर के लिए लिखा गया
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शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

हीरोशीमा की बरसी पर एक रिक्शा चालक

अमरीका !! अमरीका !!













रम्ज़ अज़ीमाबादी की क़लम से



फ़ितरत-ए-आज़र


दस्त-ए-सफ्फ़ाक में मरहम भी है नश्तर भी है
ख़ार-ए-नफ़रत भी मोहब्बत का गुल-ए-तर भी है
परचम-ए-अमन भी है, जंग का मंज़र भी है
शाख़-ए-ज़ैतून भी है शोला-ए-जौहर भी है

एशिया वालों को हैरत है इसे क्या कहिये
दस्त-ए-क़ातिल उसे कहिये कि मसीहा कहिये


हर जगह उसने सजा रखी है साज़िश की दुकाँ
अर्ज़-ए-लेबनान पे छ जाता है रह रह के धुआँ
काट दी रिश्ते की तलवार से फ़ैसल की ज़बां
आरिज़-ए-नील पे हैं उसके तमाचों के निशाँ

सोज़-ए-इख्लास से वह प्यास बढ़ा देता है
पानी देता है, मगर ज़हर मिला देता है

कोरिया आज भी है वहशत ए डालर का शिकार
वियतनाम उसकी सितमरानी का ज़िंदा शाह्कार
है गिराँ उस पे फ़िलस्तीनी महाजिर की पुकार
एशिया उसकी तिजारत का कुशादा बाज़ार

सख्त है मशरिक़-ए-वुस्ता पे शिकंजा उस का
खून से सुर्ख नज़र आता है पंजा उसका

उंगलियाँ उसकी हैं क़ौमों को नचाने वाली
शाख़-ए-ज़ैतून के पत्तों को जलाने वाली
काले गोरे के मसायल को उठाने वाली
खून से अमन की तस्वीर बनाने वाली

मोअजज़ा अपनी सियासत का दिखा देता है
वह तो ज़ालिम को भी मज़लूम बना देता है


जो भी है मौत का ताजिर वही प्यारा उसका
सब को मफ़्लूज बनाता है सहारा उसका
यू एन ओ में है हमेशा से इजारा उसका
ज़र-ख़रीदों को नचाता है इशारा उसका

सारी दुनिया से निराली है मोहब्बत उसकी
बीच दरिया में डुबोती है मोहब्बत उसकी

उसके किरदार से मजरूह है इन्सां का वक़ार
छीनकर तख़्त अता करता है वह तख्ता-ए-दार
सुबह के नूर का दुश्मन है रफ़िके-शब्-ए-तार
हीरोशीमा पे है छाया हुआ एटम का ग़ुबार

मुन्दमिल हो न सका सीना-ए-जापान का ज़ख्म
एक रिसता हुआ नासूर है ईरान का ज़ख्म




कुछ शब्दों के अर्थ देने की कोशिश :
1.फ़ितरत-ए-आज़र -दुःख देनेवाली फ़ितरत
2.दस्त-ए-सफ्फ़ाक -निष्ठुर,रक्तरंजित हाथ
3.अर्ज़-ए-लेबनान - लेबनान का इलाक़ा
4.आरिज़-ए-नील -नील नदी के गाल
5.सोज़-ए-इख्लास -व्यवहार की जलन
6.कुशादा- फैला हुआ, व्यापक ,बड़ा
7.मशरिक़-ए-वुस्ता -पूरब का इलाक़ा
8.मसायल- समस्या
9.मोअजज़ा- चमत्कार
10.ताजिर - व्यापारी
11.मफ़्लूज- शिथिल,बेकार,विकलांग
12.ज़र-ख़रीदों -पैसे से ख़रीदे हुए
13.मजरूह- ज़ख़्मी
14.वक़ार- उच्चता, स्वाभिमान
15.तख्ता-ए-दार - सत्ता ,तख़्त रखने वाला
16.रफ़िके-शब्-ए-तार - अंधेरी रात का दोस्त
17.मुन्दमिल - मद्धिम



[कवि-परिचय

ढेरों क़लमकारों और शायर-अदीब की तरह रम्ज़ अज़ीमाबादी भी कभी साहित्य के केद्र में न रहे.वह खालिस अदीब था, शायर था.ऐसे लोग संसार की चालाकियां और होशियारियाँ कहाँ जान पाते हैं.कहा जाता है कि खुदाबख्श खां पुस्तकालय के रज़ा बेदार साहब  उन्हें अदीबों के दरम्यान लाये.और गुमनामी के अंधेरों में ज़रा हलकी किरण इन पर भी पड़ गयी.

रोज़ी के लिए ताज़िंदगी रिक्शा चलाते रहे.आख़िरी वक़्त में अदब-नवाज़ सियासतदाँ  अब्दुल कय्यूम अंसारी की इन पर नज़र पड़ी और उन्होंने पी डब्लू डी में चपरासी के पद पर रम्ज़ को नियुक्त करवा दिया.

रम्ज़ का पूरा नाम था रज़ा अली खां.बिहार के रहने वाले थे.
जन्म भी वहीँ हुआ १९१६ ,जून का कोई दिन. और संसार से कूच भी वहीँ से हुए.तारीख बतायी जाती है १५ जनवरी १९९७ जब अदीबों के शहर अज़ीमाबाद यानी पटना में उनका देहांत हुआ.

ज़िंदगी में नग़मा-ए-संग पहली किताब प्रकाशित हुई.देहावसान के बाद सैयद फैयाज़ उद्दीन  और मोइन कौसर के सम्पादन में शाख़-ए-ज़ैतून शीर्षक से उनके चयनित रचनाओं का संकलन छपा.
जीते जी उर्दू अकादमी और राजभाषा विभाग ने इनका सम्मान कर दिया था, गनीमत है.]


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गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बिहार में माओवादी: यानी पैसा उगाओ














राकेश पाठक की क़लम से


जिस जनपक्षधरता को लेकर नक्सलपंथ का गठन हुआ था , संघटन के लोग खुद उससे आज विमुख हो गए है. अब नक्सल गरीबो के हक़ हुकुक के लिए आवाज उठाने वाला संघटन न रहकर एक लिमिटेड कम्पनी बन गयी है जिसका टर्न ओवर कई हज़ार करोड़ रूपये से ज्यादा है..न तो अब वैसे जमींदार रहे और न ही दलितों को दास बनाकर उनका शोषण करने वाले भूपति.शायद यही वजह है कि नक्सली अपने कार्यशैली में काफी बदलाव ला चुके है. जुल्म और बदले की भावना उतना बड़ा घटक नहीं रहा इस संघटन से जुड़ने का..बिहार में रोजगार के अभाव में लोग नक्सली संघटन से जुड़ रहे है..नक्सली बतौर वेतन का भुगतान कर रहे है अपने कामरेडों को.और कामरेड भी पैसे, रोजगार और पॉवर के चक्कर में बन्दूक उठाने को तैयार है. जनसत्ता में नक्सली संघटन पर लम्बी रिपोर्ट सुरेन्द्र किशोर जी की पढ़ी. कई मुद्दे और कारण अब अप्रासंगिक लगे. बिहार के औरंगाबाद की स्थिति भी काफी बदल चुकी है मध्य बिहार में अब नक्सलियों का एकमात्र उदेश्य पैसा कमाना रह गया है नीति सिद्दांत जैसी कोई चीज नहीं रह गयी. शोषण का तरीका भी बदल गया है जाति बहुलता वाले क्षेत्र में खुद नक्सली संघटन के लोग वही करते है जो उनके इर्द-गिर्द रहने वाले उन तथाकथित नेताओं को बताते है.नक्सलियों ने खुद एक शोषक वर्ग खड़ा कर दिया है जो सचमुच के "जन " का शोषक ,सामंती बन बैठा है. संघटन से जुड़ना आज फायदे की बात हो गयी है खाटी कमाई का जरिया और घर बैठे रोजगार .
ख़बर है कि  नक्सलियों  के खिलाफ राज्य साझा अभियान चलाएंगे तब कई बाते इस से जुडी सामने आने लगी, लगा आवाज दबाकर और बन्दूक के दम पर इसे रोका नहीं जा सकता है आज नक्सलवाद देश के सबसे बड़ी आंतरिक समस्या के रूप में सामने है. पूरे देश में इससे निबटने की, समस्त उपायों पर चर्चाएँ चल रही है. लेकिन मुद्दा घूम-फिर कर जमीनी विवाद तथा इसका सही वितरण न होना माना जा रहा है ..हो सकता है, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भूमि की असमानता इसके पनपने का एक कारण हो लेकिन बिहार जैसे राज्यों में यह अब सही नहीं रह गया ........जब दो दशक पूर्व डी.वन्दोपाध्याय ने नक्सलवाद का मुख्य कारण जमीनों के असमान वितरण को माना था तब बिलकुल सही था आज स्थितिया बदल चुकी है .अभी हाल ही में मै बिहार गया था एक पखवाड़े की छुट्टी पर .......मै बताता चलूँ कि मेरा घर गया जिले के सुदूरवर्ती प्रखंड इमामगंज में है ....घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र जहाँ  आज भी नक्सलियों की ही सरकार चलती है. इन क्षेत्रो में एक स्टिंगर रूप में क़रीब में मैंने छह वर्षों तक काम भी किया है.. अपने स्तर पर खोजी रिपोर्टिंग की है. कई जन अदालतों में भी शामिल हुआ ...... इनके खिलाफ रिपोर्टिंग के कारण कई बार हाथ-पावँ काटने की धमकियाँ भी मिली .......मै कई वैसी चीजो का खुलासा किया था जो कही से भी जन सरोकार से जुड़ा हुआ नहीं था ........मैंने नक्सल संघटन से जुड़े कई ऐसे लोगो की सूची प्रकाशित की थी जो संघटन से जुड़ने के बाद लखपति-भूमिपति हो गए, इसमें संघटन के करीब डेढ़ दर्ज़न शीर्ष नेतायों का नाम था .........आज की स्थिति यह है कि लोग संघटन से सिर्फ पैसो के लिए जुड़ रहे है .....उपभोक्तावादी दौर में लोगो के महत्वकांक्षा इतनी बढ़ गयी है कि आज का युवा सिर्फ पैसा चाहता है और यही पैसे पाने की लालसा का फायदा देशविरोधी पाक-समर्थित आतंकवादियों के साथ -साथ यह नक्सली भी उठा रहे हैं. संघटन से जुड़ने वाले लोगो को ४०००/- से लेकर २५०००/- तक बतौर मेहनताना दिया जा रहा है और ताकत ,अहम्, गुरुर तथाकथित सम्मान अलग मिल रहा है. इनसे जुड़ने का दूसरा कारण खासकर कमजोर वर्गों का बहुत समय से दबाया जाना भी है .....आज भी बदले की भावना से लोग संघटन से जुड़े हैं...... तथा जुड़ रहे हैं.. ग्रामीण अंचलो में नक्सलियों की अदालत बैठती हैं जिसमे सैकड़ो मुद्दे जो विशेष जमीनी विवाद से जुड़े होते हैं निबटाया जाता है ......
बिहार सरकार मान रही है कि नक्सली घटनाओ में कमी इसके द्वारा की जा रही उपायों से हो रही है जो कुछ हद तक तो सही हो सकता है पूरी तरह से नहीं.....
हाल ही में मेरी मुलाकात नक्सली गतिविधियों से जुड़े एक नेता से हुई थी उसने जो सच्चाई बताई ,हैरतअंगेज थी .....अब माओवाद सिर्फ तक रह गया है,व्यहवहार में उसके समर्थकों का काम चन्दा या लेवी वसूलना भर रह गया है..आज हरेक कस्वे ,गाँव बाज़ार में इन्होने अपना नेटवर्क फैला रखा है. सूचना देने के बदले नक्सली इन युवाओं को सरकारी ठीकेदारी, बीडी पता का ठेका ,बस स्टैंड,बाज़ार का ठेका ,जंगली सामानों लकड़ियों की तस्करी, लेवी बसूलने जैसे कामो के जरिये रोजगार दे देते हैं.......बताया जाता है कि बिहार सरकार के सालाना बज़ट से ज्यादा तो इनका बज़ट है एक अनुमान के मुताबिक आज इनके पास ५००००/-करोड़ से ज्यादा का नगदी प्रवाह है . कुछ लोगों को यह सच स्वीकारना गवारा न हो लेकिन कहने में कोई गुरेज़ नहीं  कि माओवादी कमुनिस्ट पार्टी अब जन सरोकार से सम्बन्ध रखने वाली पार्टी न रहकर लिमेटेड कंपनी बन चुकी है.
संघटन से जुड़ने वाला हरेक व्यक्ति व उसका परिवार तब तक संघटन के वेलफेयर का फायदा लेता है जबतक वह संघटन से जुड़ा रहता है ...इस संघटन से जुड़े कई लोगो के बच्चे उच्च स्तरीय अंग्रेजी स्कूलों में पढाई कर रहे हैं. .......उन सारी चीजो का उपभोग कर रहे हैं. जिसे फिजूलखर्ची बोला जाता है ........संघटन के एक बड़े नेता एवं एक शीर्ष नक्सल नेत्री से शादी के दरम्यान वो सब किया गया जो संघटन के नीतियों के विरुद्ध था ....दर्जनों गाड़ियाँ और हजारो को खाना खिलाने की व्यवस्था की गयी थी इसी तरह संघटन से जुड़े एक नेता के गृहप्रवेश पर भी धन और बाहू बल का जमकर प्रदर्शन किया गया. यह  सब छोटे छोटे वाकये हैं जिसे मैंने यहाँ जिक्र किया है जो यह बतलाता है कि संघटन एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह काम कर रही है .एक वाकया मुझे आज भी याद है दलित तबके का एक व्यक्ति मेरे घर आया और कहा कि सरकार से भूदान में हम ४२ दलित लोगो को ४२ कट्ठा जमीन का परचा दिया गया था जिसपर आज नक्सलियों का खुला संघटन किसान कमिटी का कब्ज़ा है...जिससे जुड़े हुए सभी लोग पुर्व सरकार के समर्थक रहे एक जाति विशेष से हैं..और हम भूखो मर रहे हैं. जब मैंने इसे अखबार में छापा तो खाफी हंगामा हुआ और दलितों को जमीन वापस दी गयी . यह सारी बाते यहाँ इसलिए कही जा रही है ताकि सच्चाई सामने आ सके. आज सरकारी कारिंदे खुद मिले हुए हैं , इन लोगो के साथ .....पुलिस खुद समझोता करती है कि  हमारे क्षेत्र में अपराध नहीं करो, हम तुम्हारे आदमियों को नहीं पकड़ेगे .......और इसे ही सरकार नक्सल गतिविधियों का कम होना मानती है . महीने में सात से दस दिन तो नक्सली अपने प्रभाव वाले क्षेत्रो में जब चाहते है पूरा बाज़ार बंद करवा देते हैं .....पिछले साल ही केताकी औरंगावाद के पास नक्सलियों ने पूरे एक महीने तक एक बाज़ार को बंद करवा रखा था ............क्या कहेगे इसे आप ........?????
नक्सलियों ने लोगो को धन दिया है सम्पनता दी है. आप क्या दे रहे, उसे आज़ादी के छः दशक में उसे जीने की आज़ादी तो दे ही नहीं सके .....भूख से मरना आज भी जारी है .......गरीबो की एक बड़ी तादाद आपका मुह चिढ़ा रही है ........अकाल और बाढ़ पर आज इतने सालो बाद भी अंकुश नहीं लगा सके, सुदूरवर्ती क्षेत्रो में चिकित्सा के अभाव में आज भी लोग दम तोड़ रहे है और आप कहते है हम नक्सलवाद का नियंत्रण कर लेंगे .....??? नक्सलियों से मिले पैसे और रोजगार के दम पर खुद ही जीना सिख रहे हैं लोग आज लिमिटेड कम्पनी की तरह हजारो लोगो के परिवार का भरण पोषण इन नक्सलियों के द्वारा हो रहा है. इनके लिए मसीहा हैं नक्सली ..
क्या सरकार इन लोगो को रोजगार मुहैया करवा पायेगी जो नक्सली संघटन कर रहे हैं....... ????
सिर्फ खेती पर आश्रित रहने वाले लोगो के पास चार महीने से ज्यादा का काम नहीं. संघटन से जुड़ना इनकी मजबूरी है आप इन्हें रोजगार दे सुविधा दे...........परिणाम आपके सामने आ जायेगा. सिर्फ कागज़ पर आंकड़ो के खेल से गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं हो सकता और न ही अर्धसैनिक बलों के दम पर !



[लेखक -परिचय : जन्म: मगध अंचल , बिहार के रानीगंज हल्क़े में 01 मार्च 1977 को. पेशे से पत्रकार। करीब 6 साल तक दैनिक जागरण(पटना) में बतौर संवाददाता । नक्सल प्रभावित क्षेत्रो पर विशेष रिपोर्टिंग और कुछ पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता भी की । कुछ कविताओं का यत्र-त्रत प्रकाशन ...फिलवक्त :एक निजी कंपनी में अजमेर में ऑफिसर(प्रशासन) के पद पर कार्यरत]. .
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