बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता। इससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता। कई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल का ताज़ा स्टेटस मुखिया कुरुवा


जीवन पर बनी फिल्म ‘बुरू-गारा’ को मिल चुका है राष्ट्रीय पुरस्कार
 




















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुट्ठी भर सवाल लिए मैं
दौड़ती-हांफती-भागती
तलाश रही हूं सदियों से निरंतर
अपनी जमीन, अपना घर
अपने होने का अर्थ।

स्त्री के अस्तित्व की खोज करती यह काव्य पंक्तियां संताली व हिंदी कवयित्री निर्मला पुतुल की हैं। जद्दोजेहद की एक और मंजिल उन्होंने हासिल की है। जिसे पंचायती जबान में मुखिया कहा जाता है। बीती सदी के अंतिम दशक में धुमकेतु की तरह उभरी झारखंड की इस आदिवासी बाला ने साहित्य संसार के सभी तीसमारों को चकित कर दिया था। स्त्री, तिस पर आदिवासी। लेकिन साहस के पंख के सहारे उन्होंने कला, प्रतिभा और आंदोलन की उड़ान जारी रखी। तीन-चार किताबों, दर्जन भर पुरस्कारों और देशी-विदेशी कई भाषाओं में अनुवाद उनके नाम दर्ज होते गए। लेकिन धरती आबा बिरसा मुंडा को आदर्श मानने वाली झारखंड की यह बेटी महज साहित्य तक सीमित कैसे रहती। उसने ग्रामीण महिलाओं को उनका वाजिब अधिकार दिलाने के लिए पंचायत चुनाव में शामिल होने का निर्णय लिया। पहले से ही उनके जमीनी संघर्ष के अनुभव ने उनका साथ दिया। भारी मतों से जीत कर वह दुमका जिला की कुरूवा पंचायत की मुखिया बन गईं। उन्होंने 1037 वोट हासिल कर पुनिका टुडु और अनिल मरांडी को पराजित किया।

हौसले से किया संकटों को परास्त

निर्मला पुतुल का जन्म 6 मार्च, 1972 को हुआ। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। इस संकट से पार पाने के लिए उन्होंने नर्सिंग का कोर्स किया। बाद में उन्होंने इग्रू से स्नातक की डिग्री हासिल की। ग्रामीण आदिवासी जीवन की त्रासदी ने उन्हें लिखने को प्रेरित किया। पहले संताली में उन्होंने कविता लिखना शुरू किया। देश की पत्र-पत्रिकाओं में जब उनकी कविताएं छपीं, तो तहलका मच गया। उसके बाद वह हिंदी में भी लिखने लगीं। उनके जीवन पर आधरित ‘बुरू-गारा’ नामक फिल्म बनाई गई है, जिसे 2010 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

नगाड़े की तरह बजते शब्द

उनके शब्द नगाड़े की तरह बजते हैं। यही वजह है कि भारतीय ज्ञानपीठ जैसे संस्थान से प्रकाशित उनके पहले कविता संग्रह का नाम भी ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’ है। इसके बाद रमणिका फाउंडेशन ने उनका काव्य संग्रह ‘अपने की घर की तलाश में’ छापा। ‘फूटेगा एक नया विद्रोह’ उनका तीसरा संग्रह है। ओनोंड़हें में उनकी संताली कविताएं संगृहित हैं। उनकी कविताएं अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उडिय़ा, कन्नड़, नागपुरी, पंजाबी व नेपाली सहित अनेक भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं।

झोली में हैं कई राष्ट्रीय सम्मान

निर्मला के व्यक्तित्व और कृतित्व को कई पुरस्कार और सम्मानों से नवाजा जा चुका है। 2001 में उन्हें केंद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने ‘साहित्य सम्मान’ प्रदान किया। झारखंड सरकार ने 2006 में ‘राजकीय सम्मान’, तो 2008 में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, 2014 में हिमाचल प्रदेश हिंदी साहित्य अकादमी ने उन्हें सम्मानित किया। पहला शैलप्रिया स्मृति सम्मान समेत उन्हें मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान, भारत आदिवासी सम्मान और राष्ट्रीय युवा पुरस्कार मिल चुका है।

दैनिक भास्कर के रांची संस्करण में 15 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित











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वंचित बच्चों के लिए रिज़वाना का मुफ़्त स्कूल


पांच शिफ्ट में 22 सालों से संचालित है तालीमी आशियाना
 





















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

पांच शिफ्ट में संचालित महज चार कमरे वाले किसी स्कूल के बारे में आपने शायद कम ही सुना होगा, जहां नर्सरी से लेकर मैट्रिक तक के स्टूडेंट्स पढ़ते हों। वो भी नि:शुल्क। ये वो बच्चे हैं, जो कहीं काम करते हैं, या उनके माता-पिता मजदूरी कर गुजर-बसर चलाते हैं। यहां से पढ़ चुके कई छात्र इंजीनियर और अधिकारी तक बन चुके हों। यह कहानी हिंदपीढ़ी मुजाहिद नगर की आजाद गली स्थित रिजवाना के केयूजी स्कूल की है। उनके साथ हैं छह टीचरों की टीम। सवाल उठना लाजिम है कि सब कुछ होता कैसे है। एमए और बीएड कर चुकीं रिजवाना कहती हैं कि वे देर रात तक संपन्न परिवारों के बच्चे को ट्यूशन पढ़ाती हैं, उससे प्राप्त आय से वह टीचरों को नाम मात्र का मुआवजा देती हैं। अलग-अलग शिफ्ट में अलग-अलग टीचर सेवा देती हैं। इसलिए बाकी समय वे दूसरे स्कूलों में पढ़ाने चली जाती हैं, ताकि उनका खर्च चल सके। वहीं इसी स्कूल की कभी स्टूडेंट रही ये टीचर रिजवाना के जज्बे को ऊर्जा देती हैं। बच्चों के इस तालीमी आशियाना की शुरुआत जून 1993 में की गई थी।

सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक पढ़ाई

सुबह होने के साथ ही गली में चहल-पहल शुरू हो जाती है। ये कक्षा नौवीं से दसवीं तक के छात्र हैं, जिनकी क्लास 06 बजे से 09 बजे तक चलती है। इसके बाद 09 से 11 बजे तक 5वीं से 8 वीं तक के बच्चे पढ़ते हैं। इसी तरह 11 से 01 बजे तक नर्सरी से चौथी, 02 बजे से 08 बजे रात तक फिर नौवीं से दसवीं और 08 बजे से 10 बजे रात तक 06 वीं से 07 वीं तक की कक्षाएं यहां संचालित होती हैं। कमरों की कमी के कारण कक्षाएं शिफ्ट में लगती हैं।

250 स्टुडेंट्स के लिए हैं 6 टीचर्स

रिजवाना के तालीमी हौसले को स्कूल की टीचर्स बढ़ावा देती हैं। स्कूल के 250 बच्चों को पढ़ाने के लिए नेहा परवीन, शबनम निसा, शबनम परवीन, रूबी परवीन, शमा परवीन और मो. अर्शद अपनी सेवा देते हैं। ये बतौर मुआवजा हजार रुपए से अधिक नहीं लेतीं। वहीं कुछ की ममता कभी-कभी इन बच्चों के लिए कॉपी-पेंसिल और टॉफी भी ले आती है। वहीं कुछ अभिभावक स्कूल की मदद के प्रति छात्र बतौर 20 रुपए मासिक शुल्क भी अदा कर देते हें।

एक किताब से पढ़ते हैं दो से तीन बच्चे

रिजवाना कहती हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत बच्चों के लिए किताब और कॉपी की उपलब्धता की है। इसलिए एक किताब से दो से तीन बच्चे पढ़ते हैं। कभी-कभार समर्पित फाउंडेशन और वीकर सोसायटी जैसी एक-दो संस्थाएं और संपन्न लोग बच्चों के लिए किताब-कॉपी स्कूल में आकर दे जाते हें। लेकिन सरकार की ओर से आज तक स्कूल या यहां पढ़ रहे बच्चों की कभी किसी तरह की सहायता नहीं मिली। दो कमरे बिना छत के थे। लोगों की मदद से उसे छा दिया गया है।


दैनिक भास्कर रांची के संस्करण में 15 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित



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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

फुटपाथ : बाजार एवं व्यापार की संवेदनहीनता

















सैयद एस.तौहीद की कलम से 


 'फुटपाथ'  व्यापार, मुनाफा एवम भ्रष्टाचार से बढ़कर गम्भीर कालाबाजारी की अमानवीय,मर्मविहीन समस्या पर सामयिक विमर्श है।पचास दशक में बनी यह फ़िल्म अपने विषय एवम प्रभाव में समकालीन समय एवम उससे काफ़ी आगे की थी।भ्रष्टाचार व कालाबाजार की चुनौती आज भी कायम है । उसका रुप पहले से हो सकता अलग हो गया हो।

देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी काट रही, फुटपाथ के लोगों की तक़दीर पहले से कोई बहुत ज्यादा नहीं बदली। महंगाई, भ्रष्टाचार व कालाबाजार का ताप सबसे ज्यादा निचली परत को को सदा से बर्दाश्त करना पड़ा है, फुटपाथो पर रहने वालो का सारा दिन जिंदा रहने में ही गुज़र जाता है। गरीबी, लाचारी और बेबसी  उन्हे हिंसक बना रही है।

आसमान छूती महंगाई के लिए कालाबाजार को बहुत हद तक जिम्मेदार माना जाना चाहिए।मुनाफा और सिर्फ मुनाफे के लिए खडी यह व्यवस्था अहम चीजों की सप्लाई को बाधित कर उनकी कीमतें आसमान पर ले जाती है।

लाभ का व्यापार करने वाले को आदमी के दुख से सम्वेदना नहीं होती,क्योंकि आपदा या दुख से भी मुनाफा कमाने का भारी अवसर मिलता  है। बाजार एवम व्यापार की इस सम्वेदनहीनता को परखने वाली फिल्मों में फुटपाथ ने पहल ली थी।सम्वेदनशील नज़र से देखें तो समझ आता है कि  भ्रष्टाचार तत्कालिक तौर पर मुनाफा ज़रूर लाता है, किंतु आदमी से सम्वेदना, भावना,सहयोग एवम समर्पण जैसे मूल्य भी  चुरा  लेता है। नतीजतन आदमी में आदमीयत खो जाती है। जबकि दूसरी ओर यह इंसान का आदमी होना भी दुश्वार कर देता है। तत्कालिक मुनाफे एवम बहुत अधिक मुनाफे की खराबी से समाज के हर तबके को आगे चलकर नुकसान उठाना पड़ता है। स्वीकार करना,ना करना अलग बात है.

व्यापार की मजबूरी है कि वो मुनाफे बगैर चल नहीं सकता,जिसका वो अक्सर फ़ायदा उठाता रहता है. लेकिन उसे नही पता कि मुनाफे के समुद्र की कामना अपराध है।  व्यापार का नुकसान बाज़ार बहुत कम उठाना जानता है, उसका असर उपभोक्ता अथवा खरीददार को उठाना है। जिसके पास बाजार से खरीदने की क़ीमत नहीं वो गरीब और भूखा रहने को मजबूर होता है, जिसके पास कीमत नहीं वो जीने से भी मज़बूर हो जाता है। यह नहीं तो फिर अपराधी बन जाना आम है। 
गरीब, मजबूर से उससे जीने का अधिकार छीन लेना।उसे अपराधी बनने को मज़बूर करना गुनाह है. गरीब को और गरीब बनाने वाले बाज़ार को  'कालाबाजार' नहीं कहें तो फिर क्या ?जिसका बचपन फुटपाथ पर गुजरे, उसके मन में व्यवस्था को लेकर ज़हर सा बन जाता है। गरीबी से भी बदतर जिंदगी काटने वाले फुटपाथ के गरीब बच्चे अपराधी बन जाते हैं, जो नहीं कर सकते वो महंगाई, गरीबी लाचारी,अत्याचार के ताप में दम तोड़ देते हैं। क्या कालाबाज़ार इन जवान मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं ? लहलहाते खेतो में यदि पैदावर कम बताई जाए,अनाज गोदामों में सडे और गरीब भुखमरी में आत्महत्या कर ले।  महंगाई आसमान पर हो, महामारी में दवाइयों की कीमतें कम होने बजाए दुगनी क़ीमत पर मिले, तो समझ लेना चहिए कि कालाबाजार काम पे लगा हुआ है।

'फुटपाथ'  महंगाई,भ्रष्टाचार,कालाबाजार एवम मुनाफाखोरी के गम्भीर विषयों को इंसानियत और इंसाफ के संदर्भ में देखने वाली महत्वपूर्ण प्रस्तुति थी।

फुटपाथ है नोशू ( दिलीप कुमार ),माला (मीना कुमारी ),बानी मास्टर (रोमेश थापर),धरती अख़बार, फुटपाथ की कहानी. कहानी रामबाबू (अनवर हुसैन ) सरीखे मुनाफापरस्त द्बारा चलाए जा रहे  कालाबाजार की कहानी।फुटपाथ पर गरीबी,लाचारी,बेबसी की वंचित जिंदगी में बचपन खो रहे नोशू को अपना कर बानी ने बड़ा काम किया। बानी में उसे अपना बड़ा भाई मिल गया था। बानी  मास्टर उसे अपने भाई से बढ़कर मानता था।नोशू के बिलखते बचपन को फुटपाथ के अंधेरे और गुमनामी से उठा कर घर की रौनक में ले आया।विस्थापितों की पीड़ा का संज्ञान लेनी वाली फिल्मों में अग्रणी स्थान इसे दिया जाना चाहिए.

नौजवान नोशू ने अख़बार में काम पकड़ लिया कि भाई बानी का बोझ कम हो जाए। वो ख़ुदगर्ज नहीं था, लेकिन खुद कमाना चाहता था। खोजी खबरों का समर धरती अखबार आए दिन बंदी झेल रहा, किसी को भी बराबर तनख्वाह नहीं मिल रही।नोशू के हालात अब भी पहले जैसे थे।वो गरीबी,लाचारी और फुटपाथ को पीछे छोड़ देने का ख्वाब देख रहा था । अपने हालात से तंग आकर उसने जुर्म की पनाह लेकर कालेबाज़ार की ख़ुदगर्ज,अंधेरी बेशुमार दुनिया में चला आया। नोशू की  लाखों रुपए कमा कर अमीर बनने की चाहत यही आसानी पुरी कर सकता था !  रामबाबू ने यही बताया था.कालाबाजार की छांव में वो बड़ा आदमी बन गया, उसे नही मालूम कि चार दिन की चमक फीकी पड़ेगी।


ईमानदार बानी ने नोशू और उसकी दुनिया से नाता तोड़ लेता है। भ्रष्टाचार, कालाबाज़ार की काली दुनिया के बनावटी उजाले ने मुहब्बत की ' सच्ची रोशनी ' माला की आस भी ले ली,पुराने साथी बिखर गए, दिल का रिश्ता टूट गया..नोशू को वो  दुनिया सदा दे रही थी। दिल मे तूफान उठा और बुरा नोशू अमीरों से  गरीब,मजलूम,मजबूर लोगो का बदला लेने वाला मसीहा बन गया। खुद के गुनाह का उसे एहसास था कि दौलत की अंधी लालच ने उसे बहुत बुरा आदमी बना दिया..अनाज के काला बाज़ार का व्यापारी बना दिया।

ईमानदार, इंसानियत के फरिश्ते बानी को नोशू की दुनिया से सख्त नफरत थी .

नोशू को जेल हुई।नोशू के सभी साथी भी गिरफ्तार हो गए..कालाबाज़ार का पर्दाफाश हुआ।

नोशू जेल जा रहा, उधर माला मोनू से कह रही...रोओ  नहीं मोनू.वो दिन ज़रूर आएगा, जिसका तुम्हें इंतजार है..मुझे इंतजार है।

नोशु के किस्म किरदार से दुनिया बदल सकती है,लेकिन परेशानी यह कि कितने भ्रष्ट लोग,संवेदनाहीन व्यापार करने वाले कारोबारियों  को मुक्ति का यह मानवीय रास्ता नज़र भी सुहाए ? क्योंकि यह समर्पण  त्याग एवम इंसानियत और नैतिक  जिम्मेदारी की बेहतरीन मिसाल थी। स्वार्थ के अंधेरे में डूबे को समाज की पीडा नज़र नही आती। ऐसा भी नही कि दुनिया में भले लोग नहीं,लेकिन खुश रहने के वास्ते ग़ालिब यह ख़याल अच्छा है।

राजा का बेटा जग्गु दो दिन की भूख से रो रहा था ,तब उसी नोशू ने उसके दर्द को समझा..
क्या बात है मोनू जग्गु रो क्यों रहा ?इसके और इसके बाबा ने कल से खाना नही खाया है,जग्गु के हांथ मे रुपया देते हुए..जाकर खाना खा लेना। जग्गु के बाबा गरीब होकर भी बहुत खुददार आदमी थे, लेकिन गरीबी,लाचारी ने एक बाप के दिल को गहरा ज़ख्म दिया था। वो नोशू से कुछ अहम जवाब मांग रहा..मानो हाशिए का सारा दुख कह डाला..इतना समझाया था कि बेटा रोना नही, तेरे रोने से मेरी बदनामी होगी।दुनिया समझेगी मै शराबी हूं, जुआरी हूं, बदमाश हूं  जाने क्या हूं। मेरा एक ही बच्चा है, वो भी आए दिन भूखो मरता है। मै किस किस को समझाता फिरुंगा  कि जो तनख्वाह मिलती है उसमे गुज़र नही होती।
दिन रात मेहनत मज़दूरी करने के बाद भी हम भूखो नंगे हैं, अंदर बाहर से गल सड़ गए हैं।ना घर बार का ठिकाना है,ना दो टुकडे रोटी का  सहारा है।नोशू तुम तो समझदार आदमी हो तुम ही बताओ कि हमारे बच्चों की रोटी कौन छीनता है ? उन्हे रास्ते की ठोकरें खिलाते -खिलाते कौन मार डालता है ? इतनी आबाद दुनिया में हमारे बर्बाद होने के सामान कौन करता है ?बताओ  नोशू,बताओ क्या बात है ?क्या खेतों को आग लग गई..वहां अनाज नही रहा ?  दुनिया को क्या हो गया ? आदमी को क्या हो गया ?जग्गु मैं कुछ नही जानता, आदमी को क्या हो गया (झल्लाते हुए ) मेरी आंखो मे आंख डाल क्या देख रहे हो ?ज़माने में बर्बादी का बीज कोई मैने थोड़े ही बोया है। मै क्या जानता हूं...कुछ नही जानता।

राजा के सवाल नोशू को इसलिए झकझोर गए क्योंकि वो उसी संवेदनहीन दुनिया को पाने की चाहत में डूबा युवा था..इन चुभते हकीकत ने उसे एक बार दोबारा दोराहे पर ला दिया, उसे  एक कठोर फैसला लेना था...

माला आज मुझे एक बहूत बड़ा फैसला लेना करना है. बहुत बड़ा फैसला करना है। यह फैसला करना है कि जिंदगी भर इसी तरह गरीब रहना होगा, राजा और उसके बच्चों कि तरह भूखो रहना होगा,सपने उठाने होंगे या ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने की कोशिश करनी होगी। पैसे की कीमत कौन  नही जानता ! इसके बगैर क्या हो सकता है ?कुछ भी नही हो सकता। आपसे मेरा  रिश्ता भी तो नहीँ जुड़ सकता इसके बगैर।
लेकिन बानी की समझ में यह बात नहीँ आती।उसकी समझ में नहीँ आती, यह बात। इसलिए आज मैने घर छोड़ दिया। अब मै बानी के साथ नहीँ रहूंगा,कहीं और चला जाऊंगा, बानी के साथ नहीँ रहूंगा,नहीँ रहूंगा।जिंदगी भर मैने बानी का दिल दुखाने का कोई काम नहीँ किया। और गरीब रहकर जितना जलील हो सकता था,उतना जलील भी हुआ। दूसरे  नहीँ जानते लेकिन मैं जानता हूं कि इस फुटपाथ पर जग जग कितनी राते काटी हैं । इसकी मिट्टी में मेरी मजबूरियों के बेहिसाब आंसू शामिल हैं..माला अब मैं गरीब नहीँ रहना चाहता..मैने पैसा बनाने की एक सूरत ढूँढ निकाली है,और मैने बहुत अच्छा किया है। एक दिन आएगा कि सब मान जाएंगे कि मैने बहुत अच्छा किया।

माला नही चाहती थी कि नोशू की नासमझी से भाई-भाई का रिश्ता खराब हो..यही कह सकती हूं कि ऐसा न हो तो अच्छा है,फिर भी कौन जाने क्या होने वाला  है।

नोशू पैसे वाला आदमी बन गया था, वो एक आलीशान बंगला खरीद लेता है..वो उस घर में दाखिल होता है...पुरानी बात, बीता हुआ कल  बेकग्राउंड संगीत के साथ चलने लगा ' देख लेना नोशू अपने बानी मास्टर के लिए इतना बड़ा महल बनाएगा,इतना बड़ा महल बनाएगा कि हर दूसरे दिन बानी मास्टर को ढूंढना पड़ेगा कि कहां खो गए..।

जाहिर था कि नोशू को आज अपने भाई की बहुत याद आ रही थी। उसकी कही बातें दिल मे गूंज रही... तुम चले आओ बानी,तुम सचमुच चले आओ बानी,अपने नोशू के पास चले आओ,उस दुनिया को भी अपने साथ ले आओ जिसका मेरे दिल से,मेरी आत्मा से बहुत गहरा सम्बंध है,बानी।

उधर बानी की नौकरी जाती रही.. जिंदगी ईमानदार बानी का इम्तिहान ले रही थी, जिस तरह खुदा अपने अजीज बंदों का लिया करता है। वो परेशान ज़रूर था लेकिन टूटा नहीं।

देखिए बानी का हौसला...भगवान अगर है तो सबकुछ ठीक कर देगा, नहीँ है तो खुद ठीक कर लेंगे।लेकिन मीना मुश्किल घड़ी में पति का साथ देने बजाय मायके चली जाती है.क्योंकि उसे अपने सुख से काम था । बहुत दिनो से किराया ना चुकाने कारण बानी मास्टर सड़क पर आ गए।

एक दिन नोशू मोटर कार से अपनी उसी बस्ती  मे आया।अगल बगल के लोग उस पर कमेन्ट करने लगे...चार पैसे क्या आ गए तो भाई को छोड़ दिया।

परिवार -समाज के  तिरस्कार को  आदमी जयादा दिन बर्दाश्त कर नहीं सकता. लेकिन समाज का दबाव उसी आदमी को राह पर ला सकेगी,जिसे  उसकी परवाह हो. नोशू थोड़े देर के लिए बुरा आदमी ज़रूर था, लेकिन उसका किरदार नहीं मरा था..माला से उसकी यह बातचीत गौर करें..

लोगो की  बातों से उसके दिल को चोट नहीँ पहुंचती ? माला यह भी जानना चाहती थी कि उसके पास रुपया कहां से आता है ?
चोट खाने की आदत कुछ पुरानी सी हो गई है,माला ! आजकल मैं अपने दिमाग से काम लिया करता हूं।जिस दुनिया और जिस समाज मे हम आप रहते हैं, वहां पैसे की इज्जत करना जरूरी है,उससे मुहब्बत करना जरूरी है। यह जानना कोई जरूरी नहीँ कि पैसा कहां से और क्यों कर आता है...वाकई नोशू एक कड़वी हकीकत को कह रहा।
लेकिन माला जानना चाहती थी कि नोशू ने बानी जैसे भाई का साथ क्यों छोड़ दिया ?मैने कालेबाजार का धंधा शुरू किया है। बानी को इससे नफरत थी,इसलिए मुझे उससे अलग होना पड़ा।इस बात से माला को दुख हुआ. उसकी समझ में यही आया कि नोशू को अपनों से ज्यादा पैसा प्यारा है।आप भी यही सोचने लगी है क्या ? सचमुच... उसके बाद कुछ बाकी नहीं रहा, वैसे भी कालेबाजार का धंधा चोरी,जुए से काम बुरा नहीँ, लोग ठीक कहते है कि मै बहुत बुरा आदमी हूं, मै वाकई बहुत बुरा आदमी हूं। नोशू की कालेबाजार की दुनिया से माला भी मुंह मोड़ लेती है। बानी पहले से ही उससे बातचीत बंद कर चुका था..नोशू से उसके अपने पराए हुए जा रहे थे.भरी दुनिया में रुपए वाला होकर भी उससे  अपने ही किनारा कर रहे..अब बानी को ही देखें। 
बता सकते हो बानी, मैने तुम्हारा क्या छीन लिया ?मेरी दौलत ऐसी दौलत नहीँ, जिसको तू छीन सकेगा। मेरी दौलत मेरा दिल है। मेरा आदमी होना मेरी दौलत है, और यह कालेबाजार से नहीँ आई, चार दिन की छांव नहीँ है,समझे। जा..जा चला जा यहां से..मुझको काले दिल वालों से बात नहीँ करनी..यह कहकर उसने नोशू से मुंह मोड़ लिया।
 गरीबी और मुफलिसी से भागकर मैने पनाह क्यों ली ? मैने इतना बड़ा गुनाह क्यों किया ? मुहल्ले वालों की नफरत,माला की नफरत और तुम्हारी नफरत कुछ नहीँ है,बानी। कोई ऐसी ठोकर लगाओ कि भेजा फ़टकर बाहर निकल आए..और दुनिया वालो को पता चल जाए कि मैने क्या गुनाह किया! बानी की बात सुनिए समझ सकेंगे कि नोशू से क्या बड़ी भूल हुई थी..

हर वो आदमी जो मजबूरो की लाशों पर अपना महल खड़ा करेगा,ठोकर ही खाएगा। यह मेरे दिल की आवाज़ है,जिसको तू नहीँ सुन सकेगा। इसलिए कि अब तू आदमी नहीँ रहा। गरीबों के बच्चे जब भूखो मर रहे थे तो तू इनके हिस्से का अनाज बेच बेचकर अपने खजाने भर रहा था,उस वक्त तेरा प्यार कहां था ? जा चला जा,हमारे पास आना होगा तो पुराना नोशू बन के आना।

नोशू को बानी के पास,अतीत मे लौटने के लिए त्याग करना था..ग़म की इस घड़ी में उसे कैफे की डांसर सुमन का साथ मिला.बानी  और माला के ठुकराए जाने बाद वो दुनिया मे एकदम सा अकेला पड़ गया।

उसे  एक दोस्त की ज़रूरत थी ,जिससे अपनी सब बाते कह सके... मुझको आज ऐसा मालूम होता है कि जैसे इस दुनिया अकेला हूं और यहां मेरा कोई नहीँ है.बिल्कुल ऐसा मालूम होता है मुझको।सुमन का मानना था कि रूपया पास हो तो आदमी सबकुछ खरीद सकता है !

नोशू अपना सबकुछ देने को तैयार था.. यह रूपया पैसा अपने लिए थोड़े ही जमा कर रहा हूं ! यह सब लोग इतनी सी बात समझते क्यों नहीँ है ? इतनी सी बात इनकी समझ कयों नहीँ आती, सुमन ? इस मुफलिसी से,इस जिल्लत से घबराते क्यों नहीँ ?इस गरीबी से डरते क्यों नहीँ हैं ? जिसमे दिन रात,सुबह शाम गलते -सड़ते रहते हैं.इतनी सी बात इन लोगो की समझ क्यों नहीँ आती ? क्या हुआ इन सबको ? 
व्यापार ने रुपया ज़रूर दिया लेकिन उससे इंसानियत का एहसास छीन लिया था, जिस फुटपाथ को कभी दिल मे बसाए फिरा करता था..भूल से उसी का बड़ा दुश्मन बन बैठा।

अपनी भूल को सुधारने नोशू वापस एक दिन अपने पुराने अख़बार 'धरती ' पर आया..उसमे  हृदय परिवर्तन हो चुका था। वो फ़िर से अखबार के लिए लिखना चाहता था...घोष बाबू नए नाम से फिर से लिखना शुरु करने का इरादा है।

लेकिन नए नाम से लिखने की क्या ज़रूरत थी  ? नोशू के इस जवाब का रूह से बहुत गहरा नाता था। आर्थिक युग में यह बातें बेमानी सी नज़र आएंगी, लेकिन ज़रा गौर करें...जब जेब खाली होती है, तो इंसान सीना तान के चलता है। जब सर पे दौलत का बोझ लद जाता है, तो गर्दन झुक जाती है। इंसान  बुजदिल हो जाता है। 
पैसे के धंधे में ऐसा ही होता है...जब दस मरते हैं तो एक जीता है। नोशू कालाबाजार के लोगों के खिलाफ लिखने लगा, उसकी जान खतरे में जान कर अखबार के सहयोगी घोष उसे लिखना बंद करने कि सलाह देते हैं। जवाब काबिले गौर।
जाने तो बहुतों की खतरे मैं हैं..शहर में बीमारी फैल रही है,और कालेबाज़ार वालों ने दवाईयों को बंद कर रखा है.जैसे -2 लोग मरेंगे, दवाइयों के दाम ऊंचे होंगे। इसलिए लिखना ही होगा. जाहिर था कि नोशू को बेकसूर लोगों की जान की फिक्र ज्यादा थी।
अस्पताल में मरीजों की तादाद बढ़ रही थी, बानी मास्टर भी अस्पताल में भर्ती हैं। उनकी हालत दिन गुजरने साथ बिगड़ती जा रही थी।

महामारी  की चपेट में आकर बिहारी बाबू की पहले ही मौत हो चुकी थी. उधर दवा का व्यापरी रामबाबू से दवा रीलिज करने का आग्रह करता है।ज्यादा मुनाफा पाने के लालच में सेठ बेशुमार बेकसूर लोगों की जान का दुश्मन बना हुआ था..

...मरने दो,मरना जीना तो किस्मत का खेल है..हम व्यापारी लोग हैं, अगर चार दिन बाद मुनाफा ज्यादा मिल सकता है,तो आज क्यों बेचे ? लारियों में दवाइयों को भरवा  कर रातों रात गंदे नाले में फेंकवा दिया।  इंसानियत के ऊपर मुनाफा,व्यापर हावी था।
उधर बानी मास्टर मर गए..नोशू को इसकी ख़बर रजवा से मिली..व्यापार एवम मुनाफा खोरी,कालाबाजारी ने कई इंसानों की जान ले ली। नोशू से उसका अजीज भाई छीन गया..दौलत की अंधी भूख में उसने बानी की जान ले ली थी. फुटपाथ अपने तकदीर पर मातम ना मनाए तो क्या करे ?  हाशिए के दुख की इंतेहा नहीं. बाज़ार क्या कभी  इंसान की कीमत समझ सकेगा ?



(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 2 अक्टूबर 1983 को पटना (बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म समीक्षाएं
संप्रति :  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन।

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गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

नाईगीरी करते हुए बने साहित्य के डॉक्टर

रांची में है अशरफ हुसैन का सैलून, उर्दू कहानीकारों पर की पी-एच. डी






 


















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से



कावे-कावे सख्त जानी, हाय तन्हाई न पूछ
सुब्ह करना, शाम का लाना है जू-ए-शीर का

(सुबह से शाम तक फरहाद की तरह पहाड़ को काट कर नहर निकालने की तरह जिदंगी बीत रही है, मेरे दर्द और अकेलेपन की हालत मत पूछो)। अशरफ हुसैन ग्राहक की हजामत बनाते हुए जब उसके पूछने पर गालिब का यह शेर सुनाते हैं, तो उनकी आंखें आईना बन जाती हैं। जिसमें उनकी जद्दोजेहद को पढ़ा जा सकता है। उनका संघर्ष इस मिसाल को स्थापित करता है कि ईमानदारी और मेहनत के बल पर ही आप लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। दरअसल अशरफ रांची मेन रोड की फुटपाथ पर 1987 से नाई की दुकान चला रहे हैं। उनके जिम्मे उनके बच्चों के साथ दिवंगत भाई के बच्चों की जिम्मेवारी भी है। लेकिन विपरीत स्थितियों को उन्होंने अपने हौसले के बूते परास्त कर दिया है। नाईगीरी करते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। चार साल पहले उन्होंने रांची विवि से उर्दू साहित्य में पी-एच डी भी कर लिया। उनके शोध्य का विषय था, झारखंड के उर्दू अफसानानिगारों का तुलनात्मक अध्ययन। इनदिनों वे डी. लिट की तैयारी में लगे हुए हैं।

पिता की मौत के बाद संभाली दुकान

मेन रोड में अशरफ के पिता का सैलून था। लेकिन बाद में आय कम होने लगी, तो उन्होंने उर्दू लाइब्रेरी के पास दुकान शिफ्ट कर ली। लेकिन 1987 में जब अशरफ ने मैट्रिक पास किया, पिता का देहांत हो गया। उसी साल अतिक्रमण हटाओ अभियान के तेहत प्रशासन ने दुकान तोड़ दिया। इसके बाद से उर्दू लाइब्रेरी की दीवार पर आईना टांग कर फुटपाथ पर ही अशरफ ग्राहकों की सेवा कर रहे हैं। दूसरों की हजामत बनाते हुए उन्होंने इंटर, बीए, एम और पी-एच. डी की डिग्री हासिल की। जबकि इस बीच उनके मंझले भाई का 2010 में निधन हो गया। भतीजों की शिक्षा-दीक्षा का दायित्व भी यह बखूबी निभा रहे हैं।

महिला लेखिकाओं पर किताब प्रकाशित

गालिब और इकबाल के शेर अशरफ को भले याद हों, लेकिन उनकी हसरत शायर नहीं, लेखक और आलोचक बनने की है। पी-एच. डी करते हुए उन्होंने झारखंड की उर्दू कथाकरों पर पुस्तक लिखने का विचार किया। इसका डॉ. गुलाम रब्बानी और सरवर साजिद ने समर्थन किया। उनकी हौसला अफजाई पर अशरफ की "झारखंड की नुमाइंदा ख्वातीन अफसानानिगार' शीर्षक किताब प्रकाशित हुई। यह सूबे की चार अहम महिला अफसानिगारों पर केंद्रित है। इसमें सबूही तारीक, शीरीं नियाजी, कहकशां परवीन और अनवरी बेगम की चुनिंदा कहानियां और उनपर अशरफ की आलोचनात्मक टिप्पणी संगृहित है।


दैनिक भास्कर के में 7 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित

(इसके बाद अंजुमन इस्लामिया के पदाधिकारियों ने अशरफ हुसैन को मौलाना आजाद कॉलेज में पढ़ाने का आमंत्रण दिया। अशरफ ने कॉलेज में क्लास लेना शुरू कर दिया है। फिलहाल उनकी तदर्थ नियुक्ति हुई है, प्रबंधन ने स्थायी करने का आश्वासन दिया है। भावुक लहजे में कहते हैं कि भास्कर और अंजुमन के प्रति वे आभारी हैं।)




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