बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

तिल-तिल आस्था, रोम-रोम राममय


 रांची में हर्ष-आस्था का रंग 


फोटो : माणिक बोस




सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

वही "नवमी तिथि मधुमास पुनीता' यानी चैत्र महीना की नौवीं तारीख। मौसम भी मध्यान्ह में वही "शीतल मंद सुरभि बह बाऊ।' हर्ष-उल्लास की बानगी भी वही, बस तब अयोध्या नगरी थी, शुक्रवार को हमारी रांची। जिसके हर घर-आंगन, गली-चौबारे और सड़कें-चौक रामलला के जन्मोत्सव के आनंद में आकंठ डूबे थे। आस्था और उमंग का अद्भुत ज्वार किसी भाटे की तरह रांचीवासियों को सराबोर किए रहा। श्रद्धा जब गांव-शहर तक प्रकाश की तरह बिखरी, तो हर चेहरा दीप्त और झिलमिल हुआ। वहीं आंखों में पनियल मिठास लिए माताओं ने रामलला के भेषधारे अपने बच्चों का कौशल्या समान बलैया लिया। नन्हे कदम चहकने ही नहीं, फुदकने लगे। उस पिता की छाती सबसे बड़ी पताका से भी चौड़ी हुई, जिसके कंधे पर बालक हनुमान मंद-मंद मुस्कुराए जा रहे थे।
चलिए बात शहर की ढाई सौ वर्ष प्राचीन तपोवन मंदिर से करते हैं। क्योंकि बिना इसके दर्शन किए रामनवी की पूजा-अर्चना पूरी नहीं होती। जब पहली बार 1929 में कृष्णा साहू की अगुवाई में राजधानी में शोभायात्रा निकली थी, तो उसके अखाड़े भी यहीं पहुंचे थे। पौ फटने के बाद शंखनाद और मंत्रोच्चार के बीच सबसे पहली पूजा यहीं हुई। इसके बाद सजे-सजाए शहर के दूसरे मंदिरों में भी श्रद्धालुओं ने माथा टेका। इसके बाद "भए प्रकट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी' के मंगल गीतों के मध्य महावीरी अखाड़े शहर के कोन-कोने से निकलने लगे। वहीं नेत्रों के माध्यम से हृदय में घर करती जातीं ढेरों झांकियों ने अयोध्याकाल की उन स्मृतियों को जीवंत किया, जिनका होना उर्दू कवि इकबाल के अनुसार "हिंदुस्तां को नाज' (गर्व) से भर देता है। इनमें भोले बाबा, श्रीराम, लक्ष्मण और मां सीता बने नन्हे-मुन्नों का ठुमकना मुख्यमंत्री से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री तक को आशीष देने पर विवश कर गया।

गफ्फार के परिवार कीे बनाई अधिकतर पताकाएं फहरातीं दिखीं, तो अलबर्ट एक्का चौक की बेला इंद्रधनुषी हो उठी। कहीं गेरुआ, कहीं लाल, कहीं पीली, कहीं सतरंजी, कहीं बैग्नी, कहीं गुलाबी, कहीं हरी, कहीं कत्थई पताकाएं। मोरहाबादी के घोल के छोटे-छोटे ध्वज सरसों के फूलाें जैसे जगमगाए, तो मंचों पर खड़े बड़े-बड़े लोग भी उसका स्पर्श करना नहीं चूके। पारंपरिक शस्त्राें-अस्त्रों से सुसज्जित टोलियां के करतबों की प्रतीक्षा में छतों, मंचों, फुटपाथों पर श्रद्धालु थे ही कि उनकी आंखें चौंधिया गईं। अरे ये क्या? 35 तल के मंदिर बुर्ज पर घ्वज भगवा। अद्भुत। रांची महावीर मंडल की पताका कुछ ऐसी थी ही। इसके सम्मोहन को मनोकामना समिति, चडरी और श्रीरामसेना के गगनचुंबी ध्वज ने और बढ़ाया। जबकि गगन भी भक्ति में लीन रामभक्तों को सूर्य की उग्रता से बादलों से बचाता रहा।

भक्तों का समूह पंक्तिबद्ध होकर जब भजन करने लगे, "श्रीरामजानकी बैठे हैं मेरे सीने में' तभी आकाश से पुष्पवर्षा (हेलिकॉप्टर से) होने लगी। महिलाएं, बच्चे इसके बाद गुलाल उड़ाते ग्लाइडर देखने उमड़े, तो महावीर अखाड़े के रामभक्त कार्यकर्ताओं ने पुलिस कर्मियों के संग सैलाब को अनुशासित किया। नियंत्रित किया, तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम की परहित चिंतन परंपरा साकार हुई। मेन रोड से लेकर राजेंद्र चौक तक स्थान-स्थान पर लगे स्वागत शिविरों में तैनात युवाओं ने भगवनश्रीराम के सदाचार को चरीतार्थ किया। संध्या हौले-हौले रात्रि में परवर्तित क्या हुई, रामनवी दीपवली में बदल गई। रंग-बिरंगियों रौशनियों में मटकते- ठुमकते, गाते-गुनगुनाते रामभक्तों की रेल कहीं छुक-छुक, कहीं राजधानी बन तपोवन पहुंची। लेकिन जब इन्होंने विराम लिया, तो ड्रोन कैमरे भी लाखों की भीड़ को कैद करने में नाकाम रहे। मध्यरात्रि तक ढोल-बैंजों की संगीत लहरियां युवा करतबबाजों को झुमाती रहीं। देर रात्रि तक ये क्रम चला। फिर शनै: शनै: अखाड़े अपने-अपने गंतव्य को प्रस्थान कर गए।

दैनिक भास्कर के रांची अंक में 16 अप्रैल को प्रकाशित



read more...

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

शहीद तंज़ील के ख़ानदान की बिटिया जब बोली....

तंज़ील अहमद काश तुम लौट आते !
















सीमा आरिफ़ की क़लम से

तारीख़ 3 अप्रैल। रात 12 बज कर 40 मिनट। तारीकियों की आग़ोश से फायरिंग की आवाज़। जो खामोशियों का सीना चीरती हुई जब मेरे गावं सहसपुर (बिजनौर) तक पहुँचती है, तो उस वक़्त दिल्ली से सहसपुर आए हुए मेरे भाई, अम्मा जाग रहे होते हैं। अम्मा, भाई से कहती है, इतनी रात को किस की बारात आई है।इससे पहले कि भाई कोई जवाब दे पाते, अचानक बाहर से कोई आकर कहता है, तंज़ील के बच्चे अभी कार से रोते हुए निकले हैं, सुना है उन्हें ( तंजील ) गोली मार दी गई है!  ये ख़बर पूरे गांव पर बिजली बन कर डराती है। जो पौ फटने तक गांव के हर घर-आंगन को अश्कबार कर जाती है।

एनआईए के उपाधीक्षक मोहम्मद तंज़ील को बाइक पर सवार दो व्यक्तियों ने उस वक़्त गोलियों बरसा कर हमेशा के लिए खामोश कर दिया, जिस समय वह अपनी भांजी को विदा कर के वापस अपने घर दिल्ली आ रहे थे। हमलावर उन पर 24 गोलियां बरसाते हैं और उनकी पत्नी भी उस हमले में गम्भीर रूप से घायल होती हैं। तंजील मौक़ा--वारदात पर ही मालिक--हक़ीक़ी से जा मिलते हैं जबकि उनकी पत्नी इस मज़मून के तहरीर किये जाने तक अस्पताल में ज़िंदगी की जंग लड़ रही हैं। काफी देर तक उनके दो मासूम बच्चे मदद के लिए चीखते-चिल्लाते रहते हैं। पीछे से उनके बड़े भाई की गाडी पहुँचती हैं। सामने की सीट पर रक्तरंजीत छोटे भाई की लाश। तड़पती हुई बहु। घबराए डरे सहमे बच्चे। कोई भी होश खो बैठे। लेकिन उन्होंने किसी तरह खुद को सम्भाला। एक ज़िंदगी तो बचाई जा सकती है इस उम्मीद के साथ डॉक्टर की तलाश में निकलते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस मौके पर जब पहुंचती है, तब तक पूरे क़स्बे में उथलपुथल मच चुकी होती है। पुलिस की चौकी करीब होने का भी कोई फायदा इस अफसर के परिवार को नहीं मिल मिल पाता है और हमलावर फरार होने में कामयाब हो जाते हैं।

मैं अपने इस जांबाज ईमानदार पुलिस अफसर की निर्मम हत्या पर नि:शब्द हूँ। और आज तीसरे दिन गुजर जाने के बाद भी उनकी अफसोसनाक मौत को ज़ेहन से निकाल नहीं पा रही। उसके पीछे उनसे मेरी ज़ाती पहचान, रिश्ता, एक गाँव, एक मोहल्ले के होने का सबब हो सकता है। लेकिन दुनिया का हर सच्चा इंसान इस दर्दनाक हादसे से बेचैन है। मेरे होश सँभालने के बाद सहसपुर में दो बार घर आए थे। एक बारी अपनी शादी की दावत देने के वास्ते आये थे शायद और दूसरी बार अम्मी से मुलाक़ात के लिए। एनआईए में रहकर उन्होंने कई अहम केसों में अहम भूमिका निभाई थी। इस समय पठानकोट हमले की भारतीय जांच दल के हिस्सा थे। गाँव में सब लोगो को सिर्फ इतना भर मालूम था कि वह बीएसएफ़ में हैं। उनकी वालिद की आमदनी उतनी नहीं थी कि वह अपने दोनों लड़कों को किसी महंगे स्कूल में तालीम दिला सकते.. तंज़ील अहमद और उनके बड़े भाई ने दिल्ली आकर अपने बलबूते कॉलेज में दाखिला लिया। अपने पैरों पर खड़े होने के लिए खुद ज़मीन बनाई। सपनों को पूरा करने के लिए आस्मां बनाया। अपनी ईमादारी, काबिलियत और मेहनत के बल पर उन्हें एनआईए का उपाधीक्षक नियुक्त किया गया था। खबरें आई हैं कि उर्दू फ़ारसी पर पकड़ मज़बूत होने के बायस वो पाकिस्तानी दहशतगर्दों के कोड वर्ड समझ उनके मंसूबो को भाप जाते थे। जिससे आतंकवादियों को पकड़ने में उनकी ख़ास भूमिका रहती थी।

लेकिन अफ़सोस कि इस भ्रष्ट तंत्र में एक ईमानदार अफसर, एक ज़हीन इंसान को सम्भलने तक का मौका नहीं दिया गया और उसकी आवाज़ हमेशा के लिए खामोश कर दी गई। तंजीम अहमद ने देश के सिस्टम में रहकर जो क़ुरबानी दी है क्या उनका कोई वजूद नहीं था? क्या देश की प्रशासनिक व्यवस्था इतनी लचर है कि एक जांबाज़ अधिकारी इतनी इतनी आसानी से मौत की नींद सुला दिया जाए।
अब तक गृह मंत्रलय से किसी का कोई बयान नहीं आया है। सरकार की तरफ से कोई भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होता है। फ़र्ज़ी टवीट को अंतिम सत्य मान कर देश को पठानकोट आतंकी हमले के संबंध में गुमराह करने वाले गृह मंत्री उस केस की जांच कर रहे एक ईमानदार अधिकारी की नृशंस हत्या पर खामोश क्यों हैं??

मरहूम तंज़ील किसके लिए खतरा थे ? किसकी पूर्वाग्रही नीतियों के खुलने का डर था जो उनकी शहादत से छिप जाएगा ?? ऐसा माना जा रहा है और इसमें कुछ गलत भी नहीं है कि तंजील अहमद की शहादत ने शहीद हेमंत करकरे की शहादत की याद दिला दी है। जब उनके साथ इस देश ने विजय सालस्कर और नारायण आप्टे के रूप में दो और जांबाज़ सपूतों को खोया था। शहीद हेमंत करकरे किनकी आँखों की किरकिरी बन चुके थे ये वो लोग बेहतर जानते हैं, जो देश की राजनीतिक सामाजिक स्थिति पर गम्भीर नज़र रखते हैं.

इस घटना के गर्भ से कई सवाल पैदा होते हैं:
क्या उनके परिवार के अलावा अन्य कुछ लोग भी जानते थे कि वो कितने दिन के अवकाश पर है?
वह अपनी छुटि्टयाँ खत्म करने के बाद वापस दिल्ली कब आनेवाले हैं?
क्या तंज़ील अहमद के पास ऐसे सबूत थे जिससे वह कुछ उजागर कर सकते थे?
क्या तंज़ील अहमद अपनी टीम के उस बयान से असहमत थे जिसमें उन्होंने पाकिस्तान से आकर पठानकोट आतंकी हमले में पकिस्तान के हाथ होने से इनकार किया था?
क्या इसे मात्र संयोग माना जाए कि पाकिस्तान से आए जांच दल ने इस्लामाबाद लौटकर पठानकोट आतंकी वारदात में अपने देश की किसी भी संलिप्प्ता से इनकार कर दिया और इधर केस की जांच कर रहे एक जांबाज़ ईमानदार अधिकारी को ही रास्ते से हटा दिया गया...!!!


यह हत्या एक पूर्ण साज़िश के तहत अंजाम दी गई लगती है। अफ़सोस इस बात का भी है कि शहीद तंज़ील अहमद आपका ताल्लुक़ उस मज़हब से है, जिसे लोग आतंकवाद का धर्म समझते हैं। वर्ना यह राजनेता आपको इतने आराम से क़ब्र में सोने नहीं देते। आपकी शहादत से इनको तिनके भर भी फायदा नहीं। क्योंकि आप राष्ट्र की सामूहिक चेतना को संतुष्ट केवल बेगुनाह जेलों में रहकर ही कर सकते हैं या फांसी चढ़ कर। शहादत दे कर तो हरगिज़ नहीं। कोई यह भी पूछ सकता है कि मरते वक्त आपने भारत माता की जय की थी कि नहीं। कोई कल्मा शहादत भी पूछ बैठे।
तंज़ील साहब आपने मादर--वतन के लिए जो किया उसकी कीमत केजरीवाल सरकार ने एक करोड़ लगा दी है। आपकी कर्तव्यनिष्ठा का इतना ही मोल मिल पाएगा आपको। आपके मासूम बच्चों को सीने से लगाना तो उन्हें भी गवारा नहीं हुआ, जिन्होंने शाहदत की कीमत लगा कर एक परंपरा निभाई है। लोग धर्म की अफीम चाट कर किसी निर्दोष को घर में घुस कर मार देते हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर अदालतों की चहारदीवारों के अंदर कानून को रौंद दिया जाता है वहाँ देश की सेवा में शहीद होने वाले जांबाज़ की पत्नी को सही समय पर इलाज मुहय्या नहीं हो पाता। कई अस्प्ताल इलाज करने से इंकार कर देते हैं।





(रचनाकार परिचय:
जन्म : 10 दिसंबर 1985 को सहसपुर, बिजनौर में।
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास कॉम की उपाधि।
सृजन : कविताएं और कहानियां। छिटपुट प्रकाशन।
संप्रति : दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन और अध्ययन
संपर्क : seema.arif1@gmail.com )




read more...

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

2015 अलविदा खुश आमदीद 2016

गुज़रे साल का सरसरी आकलन

 



















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


उजियारा कभी, तो कभी घुप्प अंधेरा। बात जब भी होगी, तो सवेरे की होगी, क्योंकि रौशनी में हर वो चीज दिख जाती है, जिसे आप देखना चाहें या न चाहें। पिछले दिसंबर में हम 2015 का सूरज देख रहे थे। जिसके सफर के साथ हमने कई मंजिलें तय कीं। इसमें सियासत की कलाबाजियां थीं, तो विकास का दौड़ता रथ भी। जगह-जगह बनते खून के बादल थे, तो उस बारिश से बचने के लिए गंगा-जमनी संस्कृति की बरसों पुरानी हमारे पास छतरी भी थी। माइक से जगह-जगह असिहष्णुता के प्रचारक थे, तो मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना गाने वाली टोलियां भी थीं। इनमें कलमकार थे, तो फनकार भी। कल-कारखानों के मजदूर थे, तो आम अवाम भी। इस दौरान मुल्क की करीब सभी जबानों में लाखों किताबें आईं। उनमें इतिहास, भूगोल, समाज और साहित्य समेत कई अनछुए विषय हमारे सामने आए। राष्ट्रीय और अंतररराष्ट्रीय इनामों से लेखकों और शायरों को नवाजा गया। लेकिन कहीं-कहीं सांप्रदायिकता की आग की लपटों ने उनके संवेदनशील मन को प्रभावित किया। कईयों ने भावुकता में आकर बरसों पहले मिले इनामों-एकराम को लौटाने का एलान किया। वहीं असिहष्णुता के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन हुए। यह दिगर है कि इसमें नामवर न हुए। न कोई मनव्वर हो सका। रानाई अपनी जगह कायम रही। इसका असर यह हुआ कि सरकार को भी सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़े कदम उठाने पड़े। हालांकि इसमें मुल्क की इल्मो-मोहब्ब्त का कंट्रीब्यूशन सबसे ज्यादा रहा।


बिस्मिल अजीमाबादी की मशहूर गजल सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, की नेक नियत आजादी की जंग के वक्त हर हिंदुस्तानी के दिल में जोर मारा करती थी। इसमें उर्दू के सहाफी और अखबार भी थे। लेकिन आज उर्दू सहाफियों की हालत बदतर है। हालांकि रोजनामों और हफ्तारोजा अखबारों की कमी नहीं। पर उसमें खूनजिगर एक करने वाले परेशान हाल हैं। इस साल उर्दू पत्रकारों ने कई शहरों में कॉन्फ्रेंस और सेमिनार कर अपने दर्द को सरेआम किया।

इधर, दिल्ली से लकर रांची और पटना तक कई बुक फेयर लगे। जो मुल्क में तहजीबी और अदबी फिजा बरकरार रखने के बायस बने। तालीमी बेदारी का कारवां भी स्कूली बच्चो से लेकर युनिवर्सीटियों में लोगों के जेहन का मरकज बना। डिजिटल इंडिया की चमक गांवों में भी इस साल पहुंची। राजस्थान के रेगिस्तान हों या झारखंड के सारंडा। नौजवानों में इल्मो-हुनर की हरियाली फैली। वहीं वजीरेआजम नरेंद्र मोदी के सफाई मिशन का सिला यह हुआ कि लोग सड़कों पर कूड़ा-कचरा फेंकने से परहेज करने लगे हैं। शहर की स्लम बस्तियों और गांवों में हाजत के लिए अब औरतों और बुजुर्गों को झाड़ या पेड़ के झुरमुटों या सूरज ढलने का इंतजार खत्म हुआ। सरकार ने जगह-जगह पब्लिक टॉयलेट बनवाने शुरू किए हैं। औरतों के लिए बैंकों में खाते खुलवाए जा रहे हैं, यह कदम भी आने वाले दिनों में सुनहरी सुबह की तरफ गामजन होगा। औरतों को लकर मर्दों का नजरिया आज भी दकियानूसी है। वजह जो भी रही हो, उनका जिस्मानी इस्तहसाल खूब बढ़ा। रेप की खबरें साल भर सुर्खिंयां बनती रहीं। लेकिन जाते-जाते 2015 ने इस सिलसिले में सख्त कानून दे दिए। अब ऐसे मामले में 16 साल तक की उम्र सजा के लिए तय कर दी गई। साल की खुशखबर यह भी रही कि भारत के मंगलयान का सफर जारी है ही, चंद्रयान 2 को भी कामयाबी मिली। सेमी बुलेट ट्रेन का ट्रायल हुआ, कामयाब रहा। कुछ बड़े शहरों में ग्रीन कॉरीडोर जैसी पहल मरीजों के लिए ऑक्सीजन बनी। दरअसल इमरजेंसी केसों में मरीजों को वक्त पर अस्पताल पहुंचाने में अक्सर रोड की रश ट्रैफिक जानलेवा होती है। लेकिन कुछ शहरों में एक सायरन के बाद लोगों ने एंबुलेंस को जाने के लिए ट्रैप्िक रोकने की शुरुआत की। इससे कई लोगों की जानें बचीं। कई खतरनाक ऑपरेशन वक्त पर हो सके।


हालांकि गुजरे साल में ऐसी शख्यियतें भी हमसे बिछुड़ गईं। जिनका होना, हिंदुस्तानियत की शिनाख्त थी। डॉ. अबुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम जिन्हें मिसाइल मैन का लकब मिला, नहीं रहे। वे मुल्क के सदर भी रहे। लेकिन अवामी सदर के नाते उन्हें शोहरत मिली। वहीं आम आदमी को पहचान देने वाले और कॉमनमैन को हीरो बनाने वाले कार्टूनिस्ट रसिपुरम कृष्णस्वामी अय्यर लक्ष्मण (आर.के. लक्ष्मण) साल की शुरुआत में ही हमसे जुदा हो गए। उनके कार्टून ने भारत की दुनिया में अलग पहचान बनाई। आम इंसान की बात चली है, तो मदर टेरेसा का जिक्र जरूरी समझता हूं। उनके ही गरीब-मजदूर बेसहारा बच्चों को सहारा देने वाली मिशनरीज ऑफ चैरिटी की चीफ सिस्टर निर्मला जोशी का इंतकाल भी इसी साल हो गया। आउटलुक के बानी शोहरतयाफ्ता सहाफी विनोद मेहता की रहलत भी मुल्क की अमनो-सलामती में एक झटका की मानिंद है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी रहे अमीर--शरीअत मौलाना सैयद निजामुद्दीन भी आखिरी सफर पर कूच कर गए। उनकी कमी बरसों तक उनके चाहने वाले महसूस करते रहेंगे।


सड़क और रेल हादसों में कई जानें हलाक हुईं। लेकिन आइंदा इनमें कमी आए इसके लिए सरकार ने कई प्लान बनाए। अब रेलवे एक तयशुदा अवकात के साथ जीरो हादसा मिशन शुरू करेगा।इसका मकसद हादसों को टालना और मौतों की तादाद को रोकना है। इसके लिए रेलवे को हाइटेक किया जाएगा। इन खुशनुमा खबरों के दरम्यान कइ्र सूबों में कुर्सियां बदलती रहीं, सुबह-शाम जलसे-जुलूस होते रहे। आम आदमी लुटता रहा, खास जेबें भरती रहीं। हाईवे बने, तो कई सड़कें गउ़ढों में तब्दील भी हुईं। कारों ने कहीं फर्राटे भरे, तो कहीं गाड़ियां रह-रहकर उछलती भी रहीं। भ्रष्टाचार की तोंद तंदरुस्त होती रही, तो वहीं कइयों को इसके इल्जाम में जेलों की चक्कियां भी पीसनी पड़ रही हैं।

खिलाड़ी देश का नाज़ होते हैं। दुनिया के कोने-कोने में जाकर मुल्क का नाम रोशन करते हैं। इस साल भी टेनिस सितारा सानिया मिर्जा और बैडमिंटन स्टार शइना नेहवाल ने इस मिथ को मटियामेट किया कि लड़कियां पीछे रहती हैं। सानिया ने ग्रैंड स्लैम, तो शाइना ने पहली मर्तबा टॉप पर पहुंची। शानदार प्रदर्शन के लिये टेनिस स्टार सानिया मिर्जा को खेल का सबसे बड़ा सम्मान मुल्क के सदर ने दिया। हॉकी एशिया कप (जूनियर) में भारत ने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को 6-2 से हराकर खिताब अपने नाम किया।


बुजुर्गवार कह गए हैं, बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेय। 2015 की बिदाई पर आप हाथ हिलाएं या तालियां बजाएं। पर खोया-पाया का हिसाब न लगाएं। जो बुरा हुआ, उसे भूल जाएं। जो अच्छा हुआ, उसे ताकत बनाएं। कुछ सीख लें, तो कुछ सीख दें। नए साल का इस्तकबाल करें। नया सूरज आपके लिए कई सौगातें लेकर आ रहा है। जल्द ही शहर से गांवों तक 24 घंटे बिजली मिलने लगेगी। वहीं इस पॉवर का इस्तेमाल तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन में आप करेंगे।

नेक तमन्नाओं से भरी अपनी इस दुआईया नज्म के साथ आपसे इजाजत चाहूंगा:


सब की फरियाद हो
गांव शाद-बाद हो
इरादा चट्‌टान हो
खुला आसमान हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


हर होठ पे गुलाब हो
पके आम सा शबाब हो
खूबसूरत मकान हो
मुट्‌ठी में जहान हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


हर गाल पे गुलाल हो
रिश्ता न महाल हो
मां का ख्वाब हो
आंगन शादाब हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।

कोयल का साज़ हो
सब की आवाज़ हो

मसला न सवाल हो
हर हाथ में कुदाल हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।

नदी की रवानी हो
न कभी बदगुमानी हो
वक्त न होलनाक हो
हर सोच ताबांक हो।


जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


रांची आकशवाणी से यह मक़ाला 25 दिसंबर की सुबह 9:30 बजे प्रसारित हुआ।







read more...

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

सत्ता से ज़्यादा बाज़ार कर रहा लेखकों को प्रभावित





  













कथाकार गौरीनाथ से संवाद व्हाया सैयद शहरोज़ क़मर



हर काल में हर लेखक या कवि तेवरवाला नहीं हुआ है। अव्यवस्था और विपरीतताओं को लेकर आक्रमकता की तलाश हर रचनाकार में ढूंढना सही नहीं होगा। कबीर और गालिब युग में एक ही होता है। हर दौर में गोदान नहीं लिखा जा सकता। हां यह जरूर है कि समय का दबाव हर काल में रहा है, लेकिन सृजन कभी मंद नहीं पड़ा। आज निस्संदेह बाजार साहित्यकारों को प्रभावित कर रहा है। कारपोरेट संस्कृति से अछूता नहीं है। बाजार और लेखकों के तेवर के सवाल पर ये बातें मैथिली-हिंदी के सुपरिचित कथाकार गौरीनाथ ने कही। वे विद्यापति स्मृति पर्व समारोह में शिरकत करने रांची आए हुए थे। जहां मैथिली मंच झारखंड ने उन्हें विदेह सम्मान से नवाजा। भास्कर से खास संवाद में गौरीनाथ कहते हैं कि सत्ता से ज्यादा बाजारतंत्र लेखकों को प्रभावित कर रहा है। उसके शरीर और मन को बदल रहा है। लेकिन लेखन पूरी तरह शिथिल नहीं हुआ है।

जबतक लौकिक परंपरा, विद्यापति तबतक

मैथिली कवि विद्यापति की प्रासंगिकता पर गौरीनाथ बोले, महज भक्तिकालीन कवि कहकर, उनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। हिंदी बेल्ट में लोकसंस्कृति के बहाने कृषि आधारित समाज व्यवस्था की वकालत वह बहुत पहले कर गए थे। वे अपनी कविता में भगवान शंकर से कहते हैं, त्रिशूल को तोड़कर फल बनाएं और खेती करें। विद्यापति के प्रेमगीत जनकंठों में हैं। जन व्यवहार में उनके गीतों की उपादेयता है। जीवन की लौकिक परंपरा जब तक रहेगी, विद्यापति प्रासांगिक रहेंगे।

शहरों की अपेक्षा भयावह ढंग से बदल रहे गांव

बात बाजार की चली, तो गोदान के बहाने हम गांव भी पहुंचे। संप्रति दिल्ली में रह रहे मूलत: गांव के गौरीनाथ कहते हैं, सिर्फ शहर ही नहीं बदल रहे, गांवों में स्थिति और बदतर है। गांव भयावह ढंग से बदल रहे हैं। नैतिकता और अपनत्व का वहां लोप हो रहा है। भाई, भाई का हिस्सा हड़प रहा है। शहर से अधिक अराजकता वहां है। अपराध और हिंसा का ग्राफ शिखर पर है। उपभोगतावादी अपसंस्कृति अपनी समग्रता में गांव-जवार में पैठ जमा रही है, जिससे उसकी चौपाल और पंचायत से लेकर रसोई और आंगन भी प्रभावित है।

प्रवासियों में भाषा-संस्कृति को लेकर ज्यादा ललक

बाबा नागार्जुन मैथिली में यात्री नाम से विख्यात हैं। गौरीनाथ भी अनलकांत उपनाम से मैथिली में लिखते हैं। पर उनका मानना है कि भाषा और संस्कृति को लेकर प्रवासियों में ललक अधिक है। पटना के सम्मेलन में भीड़ भले कम दिखे, लेकिन हैदराबाद, गोहाटी, दिल्ली या रांची में आयोजित किसी भी समारोह मैथिली समाज काफी तादाद में जुटता है। मैथिली में गौरी हरिमोहन झा के बाद यात्री, ललित और राजकमल को प्रगतिशील परंपरा का वाहक समझते हैं। मौजूदा समय पत्रिका अंतिका की भूमिका उनकी दृष्टि में महत्वपूर्ण है।

हिंदी बया के साथ मैथिली पत्रिका अंतिका का संपादन

हिंदी अकादमी, दिल्ली, भारतीय भाषा परिषद, कोलकता का युवा पुरस्कार समेत कई पुरस्कारों से अलंकृत गौरीनाथ का जन्म वर्ष 1969 में मार्च की किसी तारीख में जनपद सुपौल (बिहार) के कालिकापुर गांव में हुआ। 1991 . से निरंतर कहानियां और वैचारिक लेखन। नाच के बाहर और मानुस मशहूर कहानी संग्रह। मैथिली उपन्यास दाग के लिए उन्हें विदेह सम्मान मिला है। विभिन्न अखबारों में नौकरी। करीब दशक भर हंस' के सहायक संपादक रहे। संप्रति हिंदी बया और मैथिली त्रैमासिक अंतिका के साथ अंतिका प्रकाशन का संपादन-संचालन।

भास्कर रांची के 26 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित




read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)