बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 21 जुलाई 2014

पंच को राहत देती फ़िलस्तीन में गूंजती मासूमों की चीख़















फ़राह शकेब की क़लम से

अपने ही देश में और अपनी ही मातृभूमि पर अजनबी और बेगानों की तरह रहने की तकलीफ आप शायद तब तक नहीं समझ सकते जब तक स्वयं आप दर्द की उन गलियों से गुज़रे न हों. अगर इस दर्द का जीवंत रूप देखना हो तो फ़िलस्तीन की तरफ एक बार नज़र उठाइये. छह दशकों से अधिक का समय बीत चुका है. 1948 में ब्रिटेन अमेरिका और कुछ अन्य यूरोपीय देशों की साम्राज्यवादी पूंजीवादी शक्तियों ने सत्ता और दौलत अहंकार के नशे में चूर हो कर अरब शहंशाहों की खामोश हिमायत के साथ ज्यूश ( यहूद ) को जबरन पूरी दुनिया से जमा कर के अरब की सरज़मीं पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा कर बसा दिया. उस भू भाग को इस्राईल का नाम दिया गया.उस समय फ़िलस्तीन की कुल जनसंख्या नौ दस लाख के आसपास थी. इनमें से सात लाख से अधिक फ़िलस्तीनियों को उनके घर ज़मीन से बेदखल किया गया. आज भी उस समय के तक़रीबन पचास हज़ार लोग फ़िलस्तीन में मौजूद हैं. उसके बाद विगत 65 सालों से अधिक समय से अपनी ही धरती पर अत्याचार और ज़ुल्म का शिकार हो रहे हैं. जिसका सबसे बड़ा कारण शहर येरूशलम पर इस्राइलियों का कब्ज़ा है. येरूशलम यहूदी और ईसाई धर्मावलम्बियों का भी आस्था का केंद्र है. फ़िलस्तीनियों के द्वारा न केवल स्वतंत्र फ़िलस्तीन का अस्तित्व मायने रखता है बल्कि येरुशलम में मस्जिद-ए-अक़सा की हिफाज़त भी वो अपना दायित्व समझते हैं.

आज फ़िलस्तीन पर अवैध इस्राईली क़ब्ज़े के बाद वहां की तीसरी चौथी पीढ़ियां आसमान से बरसती मौत की छत्रछाया में ज़िन्दगी के कई बसंतों को देखते हुए जवान हो रही हैं. आज हर माँ अपने बच्चे को सबसे पहला सबक यही देती है की तू फ़िलस्तीनी है. फ़िलस्तीन तेरा वतन है. तुझे इसकी की इस्राइलियों से मुक्ति के नाम पर अपनी जान क़ुर्बान करनी है. माँ के पढ़ाये इस सबक का ही असर है कि तमाम विपरीत परिस्तिथियों के बाद भी फ़िलस्तीन के नागरिकों के लिए हर रात के बाद सुबह होती है और वो सुबह अपने उद्देश्य की दिशा में उन्हें एक नयी ऊर्जा और हौसला दिया करती है.


 9/11 के हमलों के बाद से अमेरिका स्वयं संस्कृतियों के टकराव और वार ओन टेरर के नाम मुस्लिम देशों से सलेबी जंग में व्यस्त है, तो इस्राईल अपने अमेरिका के संरक्षण में ग्रेटर इस्राईल  के अपने नापाक मंसूबों को अमली जामा पहनाने की कोशिश में लगा है. लेकिन गाज़ा पट्टी इस दिशा में सबसे बड़ी रुकावट है. फ़िलस्तीन की तीन चौथाई भूमि पर क़ब्ज़ा करने के बाद बाकी के हिस्सों पर भी उसका अधिपत्य किसी प्रकार हो जाए अब उसकी यही कोशिश है. अलग बात है कि विगत कुछ वर्षों से दुनिया भर में फ़िलस्तीनियों के प्रति सहानुभूति बढ़ रही है. हर वर्ष फ़िलस्तीन की स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना के लिए पिछले तीस साल से 30 मार्च को आयोजित होने वाले अर्ज़ दिवस का दायरा अब लेबनान शाम मिस्र की सीमाओं से निकल कर योरोपीय और एशियाई देशों तक भी पहुँच चुका है. यह इस बात की ज़मानत है कि दुनिया भर में इस्राईल और उसकी गुंडागर्दी के विरुद्ध जनसमर्थन और असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है.
 शेरे फ़िलस्तीन की संज्ञा पाने वाले यासिर अराफ़ात की संदिग्ध मौत के बाद स्वतंत्रता का परचम उनके द्वारा स्थापित संगठन अलफ़तह के हाथों से निकल कर खालिद मशअल और इस्माईल हानिया के नेतृत्व में 1987 में शेख अहमद यासीन द्वारा स्थापित संगठन हमास के हाथों में आ गया है. हमास ने स्थानीय चुनाव में अपनी कुशल रणनीति की बदौलत सबसे बड़ी कामयाबी सन 2006 में हासिल की थी लेकिन कुछ स्थानीय मुद्दों पर अलफ़तह और अन्य स्थाई संगठनों के साथ उसका मतभेद हो गया. जिस कारण फ़िलस्तीन में कुछ समय के लिए गृहयुद्ध हो गया था. इनके आपसी टकराव का इस्राईल ने पूरा पूरा फायदा उठाने का प्रयास किया. ग्रेटर इस्राईल एवं मस्जिद -ए-अक़सा पर हैकल सुलैमानी ( यहूदियों का पूजा स्थल ) निर्माण की दिशा में प्रयास तेज़ कर दिया.
दुनिया के सबसे बड़े स्वयंभू दादा अमेरिका के संरक्षण में हमास को उकसाने के लिए बमबारी की. 6 August 2006 को फ़िलस्तीन लेजिस्लेटिव काउन्सिल के स्पीकर डॉक्टर अज़ीज़ विवेक को इस्राईल के द्वारा उस बमबारी के विरुद्ध एक निंदनीय प्रस्ताव पारित करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया और वास्तव में उसे गिरफ्तारी नहीं अपहरण कहा जा सकता है क्यूंकि वो बिलकुल ग़ैर कानूनी और नाजायज़ थी. इस्राईल को आशा थी की हमास की तरफ से हिंसक जवाबी कार्रवाई होगी और दुनिया के सामने उसे स्वयं को रक्षात्मक कार्रवाई करने का मौक़ा मिलेगा लेकिन उसकी उमीदों के विपरीत फ़िलस्तीन ने वैश्विक स्तर पर अपनी कुशल विदेशनीति और कूटनीति के साथ अपने लिए जनसमर्थन को व्यापक करने की दिशा में क़दम बढ़ाये. अपनी मंशा के विपरीत फ़िलस्तीनियों की खामोशी से इस्राइलियों को किसी ऐसी स्तिथि की आशंका होने लगी, जो उसके लिए नकारात्मक होती जा रही थी और अपने उसी झुंझलाहट में 2008 2009 में उसने फ़िलस्तीनियों की ज़मीन को जीव विज्ञान की प्रयोगशाला समझ कर एक ज़हरीले रसायन का परीक्षण किया. जिसके परिणामस्वरूप हज़ारों फ़िलस्तीनी हलाक हुए. 

 दुनिया में फ़िलस्तीनियों के हिमायतियों का दायरा बढ़ रहा है. संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका और इस्राईल कोशिशों के बावजूद उसके समर्थक देशों की संख्या बढ़ रही है. इस्राईल से संबंधित किसी मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ में वोटिंग होने पर फ़िलस्तीन को मिलने वाली वोटों की संख्या सैकड़ों में होती है तो इस्राईल को मिले मत तीस चालीस से अधिक नहीं होते. पूरी दुनिया में अमेरिका और इस्राईल की साम्राज्यवादी और पूंजीवादी नीतियों के विरुद्ध विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं और अब तक स्तिथि यहाँ तक हो चुकी है की खुद अमेरिका और इस्राईल की धरती पर फ़िलस्तीन समर्थकों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है. वहाँ अपने ही शासकों के विरुद्ध जनमानस में असंतोष पनप रहा है. दो वर्ष पहले CIA की ख़ुफ़िया रिपोर्ट में ये रहस्योद्घाटन हो चुका है कि इस्राईल का अवैध अस्तित्व अब और अधिक दिनों तक टिकने वाला नहीं है. इस रिपोर्ट पर खुद अमेरिका के पूर्व राजनायिक कार हेनरी कसेंजर ने भी विश्वसनीयता की मुहर लगाईं है और उसी रिपोर्ट के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय राजनितिक विश्लेषक क्यूंन पार्ट ने भी प्रेस टीवी की आधिकारिक वेबसाइट पर ऐसी ही लिखित टिप्पणी की है कि जिस रफ़्तार के साथ अमेरिका में यहूदियों के विरुद्ध वातवरण तैयार हो रहा है और अमेरिकियों के अधिकारों की यहूदी हितों की रक्षा नाम पर अनदेखी की जा रही है. उससे जो असंतोष अमेरिका वासियों के मन में घर कर रहा है वो अमेरिका के अंदर यहूदी लॉबी को और अधिक दिनों तक बर्दाश्त नहीं करेंगे.


अपने विरुद्ध बनते हुए इस नकारात्मक वातवरण से इस्राईल बौखलाया हुआ है. दुनिया के सामने खुद को पीड़ित और मज़लूम साबित करने के लिए मक्कारी और फरेब के साथ नित नई नई साज़िशें और हरकतों के साथ फ़िलस्तीन को हिंसात्मक कार्रवाई के लिए उकसाता रहता है. नवम्बर 2012 में भी इस्राईल ने ऐसे ही छेड़खानी कर हमास को कार्रवाई के लिए मजबूर किया और तब हमास ने ईरान द्वारा उपलब्ध करवाये गए अलफज्ऱ -5 रॉकेट के साथ इस्राइलियों को खदेड़ा था. उसके बाद से इस्राइलियों द्वारा कई अवसरों पर हमास को उकसाने के लिए हरकत की गयी कभी गाज़ा पट्टी में किसी फ़िलस्तीनी नौजवान को गाडी चेक पॉइंट के करीब गलत जगह खड़ी करने के लिए गोली मार दी गयी कभी फ़िदा मजीद नाम के नौजवान को तेज़ रफ़्तार गाडी चलाने के लिए मार दिया गया. जब इन घटनाओं के विरुद्ध लेबनान और शाम में प्रदर्शन हुए तो प्रतिशोधात्मक कार्रवाई में हमास के ठिकानों पर मिसाइल दागे गए. कभी रोम सागर में फ़िलस्तीनियों के जहाज़ को रोक कर उसकी तलाशी ली गयी और कारण ये बताया गया कि इन जहाज़ों में ईरान द्वारा फ़िलस्तीन को हथियार और गोला बारूद भिजवाये जा रहे हैं.

आज इस वक़्त इस्राईल की बौखलाहट केवल इसलिए चरम सीमा पर है कि अब फ़िलस्तीन के दो विभिन्न ग्रुपों  हमास एवं अलफ़तह ने हाथ मिला लिया है. इसी से घबराकर इस्राईल ने अपने तीन नागरिकों के हमास द्वारा अपहरण का इलज़ाम लगा कर फ़िलस्तीन पर हमला कर दिया है. पहले तो उसने सर्च ऑपरेशन चला कर हज़ारों फ़िलस्तीनियों को गिरफ्तार किया। औरतों के साथ घर में घुस कर इस्राईली फौजियों ने बदसुलूकी की और पांच नौजवानों को गोली मार दी और उसके बाद फिर गाज़ा पट्टी पर मिसाईली हमले शुरू कर दिए।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस अपहरण के सिलसिले में इस्राईल से प्रमाण मांगे हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेश को नकारते हुए फलस्तीन पर मौत बरसाने के अपने अतिप्रिय काम में सह्यूनियों नरपिशाच लश्कर मग्न हो चूका है न तो उसे 2012 में मिस्र के सालसि में होने वाले शान्ति समझौते का लिहाज़ है और न ही वैश्विक कानून का. इस्राईल अपनी हठधर्मी के साथ वैश्विक समुदाय संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद को खुले आम चुनौती दे रहा है.

अब तक 4 सौ से अधीक फ़िलस्तीनी नागरिक मारे जा चुके हैं. हज़ारों घर तबाह हो चुके हैं और पूरी दुनिया खामोश तमाशाई बनी बैठी है. इस वक़्त सबसे अधिक उदासीनता संयुक्त राष्ट्र संघ ने दिखाई है. संघ अब अप्रत्यक्ष रूप से पूंजीवादी साम्राज्य वादी शक्तियों के हितों की पूर्ति के लिए काम कर रहा है.लेकिन मानवाधिकार का परचम उठाने वालों के कानों में अब तक क्या उन मासूम फ़िलस्तीनी बच्चों की चीखें नहीं पहुंची. क्या इराक़ लेबनान मिस्र सीरिया यमन तेनवीस इत्यादि जैसे देशों में बर्बादी के किस्से नहीं पहुँच रहे हैं? क्या अरब देशों के शहंशाहों और सऊदी हुक्मरानों को अपनी ऐय्याशी से फुर्सत नहीं कि वो लहू होती सरज़मीं पर चीखती हुई इंसानियत के नज़ारे देख सकें ?? जब बच्चों औरतों बूढ़ों पर इस्राईल की मिसाइल गरज रही हैं तो उसी वक़्त मिस्र के राष्ट्रपति के साथ विशेष विमान में सऊदी बादशाह कौन सी बातचीत कर रहे हैं ये भी दुनिया जानना चाहती है...???

(लेखक परिचय:
 जन्म: 1 जनवरी 1981 को  मुंगेर ( बिहार ) में
 शिक्षा: मगध यूनिवर्सिटी बोधगया से एमबीए ( जारी )
 सृजन: कुछ ब्लॉग और पोर्टल पर समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन
 संप्रति: अनहद से संबद्ध
 संपर्क: mfshakeb@gmail.com)

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रविवार, 20 जुलाई 2014

वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश पानी



नई पौध












 सरोध्या यादव की क़लम से

काश ये दुनिया मेरा कैनवास होता

मैं एक पेन्टर हूँ
अपनी कल्पना को कैनवास पर उतारती हूँ
मन के भाव कुछ टेढ़ी-मेढ़ी लाइनों और रंगो से
कोरे कागज़ पर सपना सवारती हूँ

काश ये दुनिया मेरा कैनवास होता
मेरा ब्रश उसमें भी कोई नई कलाकारी करता
रंग-बिरंगे प्यादों को एक खूबसूरत से दृश्य में ढालता
सुंदर रंगो को चुन उसे और  बनाता मनमोहक
फ़िर उस पेंटिंग को फ्रेम में क़ैद कर अपनी वॉल पर मैं सजाती

2.
लहू अब जम  सा गया है
वक्त भी थम सा गया है
ज़िंदगी  से है मौत सस्ती
डराती है ये वीरान बस्ती

दोबारा बचपन चाहिए

बस थोड़ा सा खुलापन चाहिए
दोबारा मुझे अपना बचपन चाहिए

वो सुख में हंसी तो,  आँसू दुःख चाहिए
वो बेफिक्री का आलम चाहिए
वो गुड्डा- गुड्डी का खेल
वो छुक- छुक करती थी रेल
वो कागज़ की नाव
वो पानी ही ठांव
तितलियों को देख उछलना
आइसक्रीम को मन मचलना
वो रंग-बिरंगे गुब्बारे फुलाना
चंदा मामा का संग सुहाना

वो दादी- नानी की कहानी
वो छन से बरस्ता पानी
वो खिलखिलाता चेहरा
तुतलाहट का घन बसेरा
लाड़ को झूठ- मुठ का रोना
माँ की गोद में सोना
रोज़ अपना घर बनाना
दीदी को आने न देना

AB से बढ़ कर बीए में है जा पहुंचे
अब आसमान छूता मकान चाहिए
तब सखियों का रोना था कितना अपना
अब हरेक को अपना मक़ाम चाहिए

नहीां चाहिए हमको नहीं चाहिए
दौलत और  शौहरत नहीं चाहिए
बस थोड़ा सा खुलापन चाहिए
दोबारा मुझे अपना बचपन चाहिए



(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 12 नवंबर 1990 को
शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा सिकंदराबाद के केन्द्रीय विद्यालय तिरुमालागिरी से| उसके बाद लोयला अकादमी डिग्री व पीजी.  कॉलेज से बीए. मास कम्यूनिकेशन डिग्री|
सृजन: बड़ी बहन संध्या यादव के साथ मिल कर लिखा गया उपन्यास  "आसमान को और फेलाने दो" प्रकशित
संप्रति: हैदराबाद में रहकर कनेक्शनस (Konnections) नामक PR एजेंसी में वरिष्ठ अकाउंट ऐज़ेक्यूटिव/ Sr. Account  Executive
संपर्क: sarodhya.u.d12@gmail.com)

 

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रविवार, 13 जुलाई 2014

अभाव में दम तोड़ता नन्हा फुटबॉलर जागो

झारखंड के सिंहभूम में फुटबॉल की बन सकती है नर्सरी  

फोटो: मुन्ना झा










मुन्ना कुमार झा की क़लम से 

जोगो उन बेशकीमती प्रतिभावान बच्चों में से है, जो गरीबी की मार झेलते हुए भी फुटबॉल दम लगा कर खेलता है। बिना किसी जूते के नंगे पैर. उसकी करिश्माई दौड़ के आगे शायद ब्राजील के पेले और अर्जेंटीना के माराडोना भी परास्त हो जाएं। सात साल का जोगो बिना किसी ख़ास डाइट के चट्टान की तरह फुटबॉल से जुगलबंदी करता है और जीत भी जाता है। जोगो को पानी, भात,  नमक के साथ हरा मिर्च खाना पसंद है। उसने सेब भले कभी नहीं चखा, पर जंगल के मौसमी फल उसके लिए उससे कम क़तई नहीं। जामुन,  जंगली आम,  तुंत,  महुआ जोगों की ताकत का राज है।      


सात साल का जोगो अपने घर के पास वाले मुरूम मिटटी के मैदान में अपने तीस और दोस्तों के साथ फुटबॉल खेल रहा है। बिना किसी फुटबॉली कायदे-कानून के सरपट बॉल लेकर भागता जोगो उन अरबों की आबादी वाले देश में से एक है, जो फुटबॉल में जीता है। अपनी उम्र से ज्यादा भारी वजनी फुटबॉल को लेकर भागते जोगो को आप देख कर शायद चौंक जाएंगे,  हो सकता है थोड़ी देर के लिए स्तब्ध भी जाएंगे और फिर अपने देश के नेताओं को कोस भी देंगे। इसलिए कि जोगो जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के होते हुए भी भारत फुटबॉल में आज भी निचले पायदानों में कहीं खड़ा है। बिना किसी सुविधा प्रशिक्षण, बिना किसी न्यूट्रेशन और ख़ास डाइट के उसकी तेजी और मूवमेंट करिश्माई है।

झारखण्ड उन ऐसे गिने चुने राज्यों में से एक है जहाँ फुटबॉल और हॉकी ही खेला जाता है. यहां के ग्रामीण इलाके में आज भी क्रिकेट के राजा धोनी का राज नहीं चलता बल्कि हज़ारों मील  दूर बैठे माराडोना और पेले राज करते हैं। संसाधनहीन इन आदिवासी बच्चों की फुटबॉल को लेकर दीवानगी देखते बनती है। झुण्ड में इकठ्ठा होकर खड़े ये बच्चे 2 रूपया 5 रुपया  जमा करके पास के हाट से 150 का फुटबॉल खरीद लाये हैं। पुराना फूटबाल का ब्लाडर बार-बार खेल में दुविधा उत्पन्न कर रहा था। फुटबॉल से हवा निकलने की बीमारी से निजात पाने के लिए इन बच्चों ने फुटबॉल खरीदा है।

ग़रीबी बनी बाधा, कैसे बनें पेले या भूटिया
झुण्ड में खड़े उन तीस पैंतीस बच्चों में से एक बच्चा कहता है कि हम जंगल से आम और जामुन तोड़े हैं. तोड़ने के बाद घाटी में गाड़ी से आने-जाने वाले लोगों को बेचे हैं. उसी से पैसा आया तो माँ-बाबा को दिए थे। फिर माँ- बाबा ने 5 रूपया फुटबॉल खरीदने के लिए दिया है.  इनमें से 99 फीसदी बच्चे बीपीएल यानी अति गरीब रेखा के नीचे गुजर बसर करने वाले परिवार से ताल्लुक़ रखते है। इनके परिवार और इनकी आजीविका जंगल पर टिकी हुई है. जंगल के मौसमी फलों और पत्तों के भरोसे जीवन चलाने वाले इन साधारण आदिवासी परिवार के पास ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी बदौलत वो अपने बच्चों को ऐसी सुविधा दे सकें ताकि  वे भी बन सकें पेले या भूटिया। 


धीरे-धीरे ख़त्म होते हॉकी और फुटबॉल
आदिवासियों के फुटबॉल और हॉकी का राज्य पिछले एक दशक में धोनी और क्रिकेट का राज्य बन गया है। शहर से लेकर गांव तक में क्रिकेट का दबाव बढ़ गया है। पैसे और राजनीतिक गठजोड़ की जुगलबंदी ने यहाँ के प्राकृतिक खेल को ही खतरे में डाल दिया है. यहाँ उन ग्रामीण इलाकों में पनपने वाले खेल जो बिना पैड, ग्लूबस, बैट, और बॉल के खेला जाता था, अब हाशिये पर है. धीरे-धीरे फुटबॉल और हॉकी ख़त्म होते जा रहे है.


बदल रहा मिज़ाज, क्रिकेट का होता क़ायम राज  
सालाना जोड़ा खस्सी फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन कराने वाले जेराइ बताते हैं कि, पिछले कुछ सालों में फुटबाल और हॉकी दोनों कम हुआ है. पहले तो पूरा गांव फुटबाल और हॉकी ही खेलता था. लेकिन पिछले सालों में अब गांव के आसपास में क्रिकेट का भी चलन बढ़ा है. शहर में ज्यादा खेल का मैदान नहीं होने की वजह से गांव से सटे शहरी लोगों का झुण्ड आजकल यहाँ के मैदानों में क्रिकेट का आयोजन करने लगा है. जिसकी वजह से भी हमलोग के गांव के लड़के भी क्रिकेट के पीछे भाग रहे हैं. फुटबॉल काम हो रहा है. लोग कहते हैं कि क्रिकेट से पैसा ज्यादा बनता है और नौकरी भी बहुत आसानी से मिल जाती है. आजकल रेलवे भी तो क्रिकेट से ज्यादे लोग को नौकरी में लेता है.  छोटी से छोटी कंपनी की भी क्रिकेट टीम है. इसलिए भी बच्चे नौकरी की वजह से क्रिकेट की तरफ भाग रहे हैं. आजकल यहाँ के नेता लोग भी क्रिकेट का टूर्नामेंट ज्यादा कराते हैं.
 क्रिकेट को ज्यादा सपोर्ट मिलता है. पहले वाली बात अब नहीं रही.


(लेखक-परिचय:
जन्म: 17 सितम्बर , 1987 को चाईबासा (झारखण्ड) में
शिक्षा: कोल्हान विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा
सृजन: कई पत्र-पत्रिकाओं में जल-जंगल-जमीन एवं पर्यावरण के मुद्दे पर लेखन
संप्रति: पर्यावरण से जुड़े मुद्दे पर शोध कार्य एवं देश भर के आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी।
सम्पर्क: jhamunna@gmail.com)
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शनिवार, 12 जुलाई 2014

इजराइल की बेशर्म हठ खुद उसकी ज़ुबानी

 तुम मेरा कुछ भी न बिगाड़ पाओगे 




 
फोटो गूगल साभार













 शहरोज़ की क़लम से


मेरे बच्चों को तपती भट्ठियों में डाल दिया गया. उसकी मुस्कान अचानक चीखों में बदल जाती हैं, मैं चलते-चलते रुक जाता हूँ. मेरी बेटियों और बहनों की लुटी इस्मत। हमारे लाखों भाइयों को गैस चैंबर में बिलबिलाने को छोड़ दिया गया. आख़िर हम अपने ही घर-आँगन से धकिया दिए गए. यह बाबा आदम का ही वसीला रहा कि तुमने मुझे मेरे लाव-लश्कर के साथ अपनाया। अपने घर-आँगन में शरण दी. मेरे खिलखिलाते बच्चों को उड़ान भरने को खुला आसमान दिया। यह 29 नवम्बर 1947 की बात है. लेकिन पता नहीं,  तुम्हारे बच्चे का हंसना-खिलखिलाना मुझे अचानक बुरा लगने लगा. 5 मई 1948 को हमने अपने इजराइल राष्ट्र की घोषणा कर दी. हमने धीरे-धीरे तुम्हारी धरती फ़िलस्तीन पर अपना आशियाना फैलाना शुरू कर दिया। तुम्हें  पैर सिकोड़ने पर मजबूर कर दिया। तुम्हारी हालत इस शेर की शिनाख्त हुई:
 

ख़ुदा ने  क़ब्र में भी इतनी कम दी है  जगह
पावं फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है!   


अब मुझे तुम्हारे बच्चों के साथ रक्तिम-होली में बड़ा मज़ा आता है. तुम्हारी युवा बेटियों के वक्ष को हबकने और चूसने के बाद उसकी हत्या करना हम नहीं भूलते। अब तुम क्या करोगे? तुमने विरोध करना शुरू कर दिया, कुछ अरब मुल्कों ने तुम्हारा नाम-निहादी साथ दिया तो ज़रूर, लेकिन चौधरी जी के किचेन-कैबिनेट तक मेरी पहुँच का लाभ तो मिलना ही था. 1967 में महज़ तीन दिन के  हिंसक-श्रम से हमने गाज़ा पट्टी, पश्चिमी किनारा और सिनाई पेनिसुला पर क़ब्ज़ा कर लिया। हमने तुम्हें आतंकवादी घोषित कर दिया।
दरअसल विश्व के मेधा पर हमारा अधिपत्य हो चुका था. वहीँ दुनिया को हमने ढेरों वस्तुएं उपभोग के लिए दी. सभी शक्तिशाली मुल्कों के अहम निर्णय में हमारी दख़ल हो गयी. इसके लिए हमने वही तरीक़े अपनाने आरम्भ कर दिए जिसका इस्तेमाल हिटलर ने हमें बहिष्कृत करने के लिए किया था. हम चाहते थे और हैं भी कि तुम उस बड़े भाई की तरह सारी जागीर मुझे सौप दो. मेरी डांट-डपट को स्नेहिल छोटे भाई के समान सहन करो. आखिर इब्राहिम हम दोनों के अब्बा हैं. टोपी। दाढ़ी। ख़तना। हमारी साझी परंपरा है. एक रात जब बाबा आदम ने ख्वाब में कहा तो 1 अप्रेल 1992 को सिनाई पट्टी से हम सुबह हट गए. अगले वर्ष 30 अगस्त 1993 को तुम्हें सीमित फ़िलिस्तीनी स्वशासन की इजाज़त दे दी. वादा भी सियासी कर दिया, गाज़ा और वेस्ट भी तुम्हें दूंगा।

तुमने इसे सच ही समझ लिया। तुम आज़ाद देश का सपना देखने लगे. 1996 में हमारा दक्षिण पंथी नेतानयाहु  सत्ता में आया तो गरज पड़ा, अलग फ़िलिस्तीन देश कभी स्वीकार नहीं। अब क्या है कि तुम्हारा सर उठाकार चलना मुझे तनिक भी सुहाता नहीं। हमने अपने ही खलनायक से यह सीखा है कि झूठ को सौ बार बोलो तो सच हो जाएगा। हमने चौधरी जी को भी यही टिप्स दी है. देखो उन्होने कहा, इराक़ में रासायनिक हथियार है, दुनिया ने मान लिया। ताज़ा मामला इराक़ का ही, अहले हदीस के ख़रीदे लड़ाकुओं को सुन्नी आतंकवादी कहा, सब ने माना। वरना बिना चौधरी जी की मदद के यह क़रीब दो हज़ार लड़ाकू इराक़ की तीन लाख सेना के आगे टिक पाते। 

खैर! मैं मुद्दे पर आऊं अब नयी नस्ल नहीं जानती कि  तुमने मुझे शरण दी थी. यह जानती है कि तुम आतंकवादी हो. मेरे महान देश के लोकतंत्र और शांति व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा ख़तरा हो! इसलिए हम पौधे को ही जला-भून कर ख़त्म करना चाहते हैं. तुम्हें अपने अय्याश अरबों से उम्मीद है, जिनकी फुलझड़ी रह-रह कर तुम छोड़ते रहते हो. हम उसे स्कड बताकर संसार को बताते हैं। घबराओ नहीं ! इराक़ के तीन टुकड़े होने तक हम तुम्हारे नाक में दम करते रहेंगे। कोई भी ताक़त तुम्हारे ख़िलाफ हिंसक कार्रवाई करने से हमें नहीं रोक सकती।

अब क्या है कि विश्व में बड़े-बड़े विचारक हमने ही दिए हैं, सो उनका मान भी ज़रूरी है. तुम्हारे बच्चों के लिए रोटियां देता रहूँगा, कुछ दिनों तक अमन की रैलियां अपुन साथ-साथ निकलंेगे। यह भूल जाओ कि वेस्ट बैंक, गाज़ा पट्टी से जेरुसलम तक तुम्हारा राज्य होगा ! मानवाधिकार की रट मत लगाओ। दुनिया अंधी और बहरी हो चुकी है. चौधरी जी का यह कमाल है. और तुम्हारे अरब उन्हीं के रहमो-करम पर सांस लेते हैं.   

दुनिया चाहे तो मेरे उत्पाद का बहिष्कार कर मेरी आर्थिक कमर लुंज कर सकती है. लेकिन बिना जॉनसन एंड जॉनसन के तुम्हारे बच्चे गोरे तो हो सकते नहीं। हग्गीज़ नहीं लाओगे बच्चे तुम्हारी पत्नी के  कपडे रोज़ ही नापाक करेंगे और उनका बर्थ डे किट-कैट के अधूरा ही माना जाएगा।जैसे बिना कोको कोला के तुम्हारा इफ़्तार और बिना नेस्ले के तुम्हारी सेहरी ना-मुकम्मल है. क्या आज बिना मैक डोनाल्ड के तुम बड़े शहर की कल्पना कर सकते हो!  ऐसी ढेरों चीज़ें हैं जो बनाते तो हम हैं, लेकिन उसे खरीद ती सारी दुनिया है। हालाँकि एक शायर तुम्हें कहता है: 

ये बात कहने की ऐ लोगों! एहतियाज नहीं
की बे-हिसी के मर्ज़ का कोई इलाज नहीं
जबीं-ऐ-वक्त प लिखा है साफ़ लफ्जों में
वो लोग मुर्दा हैं करते जो एहतिजाज नहीं 

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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)