बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

ब्लास्ट का दोषी साबित होने पर कर दूंगा भाई का क़त्ल

फ़ोटो : मीर वसीम

एक विचारधारा  ने कैसे बदल दिया रंग-रोगन करने वाले मज़दूर का रंग

पटना ब्लास्ट के चार आरोपियों के गाँव हेड कोचा सिठियो से

धुर्वा से लोदमा जानेवाली सड़क सोमवार को बेहद खामोश थी। जगह-जगह समूह में युवा व बुजुर्ग जरूर खड़े मिले। पर किसी भी अनजान चेहरे को देख वह आपस में सिमट जाते। आंखों में बेचारगी और खौफ। उनकी आंखें इम्तियाज, तौफीक, तारीक और नुमान के प्रति उनके आक्रोश को बयां कर रही थी। लोदमा-कर्रा सड़क से दक्षिण की ओर कच्ची सड़क पर हेटकोचा है। आम लोग इसे नीचा मोहल्ला कहते हैं। सड़क के अंत में बने टी प्वाइंट के बायीं ओर सौ साल पुरानी मस्जिद है। यहां के इमाम हाफिज शौकत अली कहते हैं, 'इन लड़कों ने मजहब के साथ हमारे गांव को भी बदनाम कर दिया। खुदा जाने उन्हें रास्ते से भटकाने वाले कौन सा इस्लाम पढ़ाते हैं।'  दरअसल उनका इशारा एक कट्टरवादी विचारधारा की ओर था। जिसकी पुष्टि सरना स्थल के पास पान गुमटी पर खड़े युवाओं ने भी की।
एचईसी में मजदूर नसीम कहते हैं, चार सालों से इन लड़कों का मिलना-जुलना अहले हदीस के लोगों से था। वे अक्सर हमारी धार्मिक परंपरा-व्यवहार के विरोध में बातें करते। गांव में दो मस्जिद है, इनमें अधिकतर लोग देवबंदी स्कूल को मानने वाले हैं। कुछ लोग  बरेलवी विचारधारा के हैं। लेकिन इन लड़कों को कोई तीसरी विचारधारा के लोग प्रभावित करने में लगे थे। करीब तीन साल पहले जब गांव में बड़ा जलसा हुआ, तो मुख्य वक्ता मौलाना ताहिर गयावी से इन लोगों का वाद-विवाद भी हुआ था। जिसपर गांव के लोगों ने इम्तियाज की पिटाई भी की थी।
इन चारों लड़कों से गांववालों ने बातचीत बंद कर दी थी। वहीं उनके घरवाले भी उनसे कटे-कटे से रहने लगे। यहां तक के, जब सड़क दुघर्टना मे मारे गए संझले बेटे के इंश्योरेंस और दूसरे बेटों के पैसे से एचईसी से रिटायर्ड मो. कमालउद्दीन ने दो मंजिला मकान बनवाया, तो इम्तियाज को अलग कमरा दे दिया गया। कम उम्र का लड़का तौफिक इम्तियाज का ही सगा भतीजा है। गांव के स्कूल में ही आठवीं में पढ़ रहा है। अतीउलाह का कम उम्र बेटा तारीक और सुल्तान अंसारी का लड़का नुमान भी इनके गिरोह में शामिल हो गया।
कहने को इनमें से कुछ मकानों में रंग-रोगन, तो कुछ बिजली मिस्त्री का काम करते। लेकिन इनके दिलों-दिमाग को कोई और ही रंग रहा था। लेकिन घर व गांववाले समझते रहे कि यह लड़के उनकी अपेक्षा अरबी व उर्दू अधिक जानते हैं। इसलिए संभव है, धर्म की अधिक जानकारी रखते हों। कुछ लोगों ने उस कट्टरवादी विचारधारा के लोगों पर मासिक ढाई हजार रुपए देकर इन लड़कों को बिगाडऩे का आरोप भी लगाया। गांव के ज्यादातर लोगों से हुई बातचीत के बाद इस आशंका को बल मिलता हैं कि कहीं ये विचारधारा रांची में जिहाद के नाम पर युवाओं की एक नई बेल तो तैयार नहीं कर रही?

ग्राम प्रधान शंकर कच्छप कहते हैं कि उनके गांव में आदिवासी व मुसलमानों की लगभग बराबर आबादी है। लेकिन आज तक इनके बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। फरार तारीक के बड़े भाई मौलाना तौफीक आलम मस्जिद कमेटी के सेके्रट्री हैं। वह कुछ भले न बोले। पर उनके ही भाई तौहीद आलम ने कहा, अगर सच में उनका भाई दोषी निकला, तो वे लोग उसे मार डालेगे। सदर हाजी हसन अली की चुप्पी भी इन लड़कों के कारण हुई गांव व कौम की शर्मिंदगी बता रही थी जबकि इम्तियाज के घर पर मातमी सन्नाटा था। समाजिक कार्यकर्ता साजिद अंसारी का कहना है कि गांव के लोग अब उस विचाधारा के लोगों को गांव में घुसने ही नहीं देंगे। उनकी बात का खुर्शीद अंसारी ने भी समर्थन किया।

भास्कर के लिए लिखा गया 29 अक्टूबर 2013 के अंक में सम्पादित अंश प्रकाशित   

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शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

अज़ीज़ नाज़ां की क़व्वाली आपने सुनी ही है, पढ़िए उनकी संगिनी की ग़ज़लें



 








मुमताज़ नाज़ां की आठ ग़ज़ल


1.
हवा ए सर्द से चिंगारियां अक्सर निकाली हैं
 मेरे महबूब की यारो अदाएं भी निराली हैं

चलो देखें हक़ीक़त रंग इन में कैसे भरती है
तसव्वर में हज़ारों हम ने तस्वीरें बना ली हैं

मोहब्बत का दफीना जाने किस जानिब है पोशीदा
 हज़ारों बार हम ने दिल की जागीरें खंगाली हैं

कहाँ रक्खें इन्हें इस चोर क़िस्मत से बचा कर अब
गुज़रते वक़्त से दो चार जो ख़ुशियाँ चुरा ली हैं

परस्तिश आँधियों की अब हर इक सूरत ज़रूरी है
 तमन्नाओं की फिर इक बार जो शम'एं जला ली हैं

हवा भी आ न पाए अब कभी इस ओर माज़ी की
 कि अपने दिल के चारों सिम्त दीवारें उठा ली हैं

बड़ा चर्चा है रहमत का तो देखें अब अता क्या हो
 मुक़द्दर साज़ के दर पर तमन्नाएं सवाली हैं

ज़रा सा चूक जाते हम तो ये हस्ती बिखर जाती
 बड़े मोहतात हो कर हम ने ये किरचें संभाली हैं

उम्मीदें हम को बहलाती रहीं लेकिन यही सच है
 अभी तक तार है दामन अभी तक हाथ खाली हैं

गिला 'मुमताज़ ' अब क्यूँ है कि फ़ितने सर उठाते हैं
 जहाँ में हम ने ही नफरत की बुनियादें भी डाली हैं

2.

हवस हर लम्हा बढती जाती है अब ग़म फनाओं की
 बहारों के लहू से प्यास बुझती है खिज़ाओं की

मेरी गुफ़्तार की क़ीमत चुकानी तो पड़ी मुझ को
 खमोशी भी तो तेरी मुस्तहक़ ठहरी सज़ाओं की

कोई आवाज़ अब कानों में दाख़िल ही नहीं होती
 समा 'अत अब तलक तालिब है तेरी ही सदाओं की

मुक़द्दर की ये तारीकी सफ़र ये तेरी यादों का
 चमक उठती हैं राहें रौशनी से ज़ख़्मी पाओं की

मरज़ ये लादवा है, अब क़ज़ा के साथ जाएगा
मरीज़~ए~जिंदगी को अब ज़रुरत है दुआओं की

मैं हूँ मायूस राहों से तो राहें सर~ब~सजदा हैं
 के मंजिल चूमती है धूल बढ़ के मेरे पाओं की

कड़कती धूप को हम ने किया है सायबाँ अपना
किसे होगी ज़रुरत ऐ शजर अब तेरी छाओं की

हमें 'मुमताज़ ' अब रास आ गई आखिर ये महरूमी
 नज़र अब हम उतारा करते हैं अपनी बलाओं की

3.

मैं जीने का बहाना चाहती हूँ
तुम्हें तुम से चुराना चाहती हूँ

ज़रा यादो मुझे तनहा भी छोडो
 मैं दो पल मुस्कराना चाहती हूँ

ये गर्दिश ही निभा पाई न मुझ से
 मैं इस से भी निभाना चाहती हूँ

ये दौलत ज़िन्दगी की रायगाँ है
 मैं अब इस को लुटाना चाहती हूँ

तराशी जाती है क़िस्मत मुझे
और मैं वो पैकर पुराना चाहती हूँ

बसा है काबा-ए-दिल में जो अब भी
 वो बुत मैं अब गिराना चाहती हूँ

ज़रा कुछ ख्वाब तो तामीर कर लूं
 मैं इक बस्ती बसाना चाहती हूँ

घडी भर की भी राहत के लिए मैं
 हर इक क़ीमत चुकाना चाहती हूँ

हूँ वाकिफ तो सभी चालों से लेकिन
 मैं तुम से मात खाना चाहती हूँ

मिटाती है मुझे क़िस्मत की रेखा
 और इस को मैं मिटाना चाहती हूँ

जो बिखरी है अभी 'मुमताज़ ' हर सू
 उसे महवर पे लाना चाहती हूँ

4.

मेरे महबूब, मेरे दोस्त, मेरी जान-ए-ग़ज़ल
दो क़दम राह-ए-मोहब्बत में मेरे साथ भी चल

दो घड़ी बैठ मेरे पास, कि मैं पढ़ लूँ ज़रा
तेरी पेशानी प् लिक्खा है मेरी ज़ीस्त का हल

एक उम्मीद प् उलझे हैं हर इक पेच से हम
 हौसला खोल ही देगा कभी तक़दीर के बल

वक़्त की गर्द छुपा देती है हर एक निशाँ
संग पर खींची लकीरें रहें कितनी भी अटल

टूटे ख़्वाबों की ख़लिश जान भी ले लेती है
ख़्वाब दिखला के मुझे ऐ दिल-ए-बेताब न छल

जी नहीं पाता है इंसान कभी बरसों में
ज़िन्दगी करने को काफ़ी है कभी एक ही पल

नूर और नार का मैं रोज़ तमाशा देखूं
खूँ चकां शम्स को तारीक फ़िज़ा जाए निगल

मार डाले न कहीं तुझ को ये तन्हाई का ज़हर
 दिल के वीरान अंधेरों से कभी यार निकल

नौहा ख्वाँ क्यूँ हुए "मुमताज़" सभी मुर्दा ख़याल
 मदफन-ए-दिल में अजब कैसा ये हंगाम था कल

5.

एक गुनह बस छोटा सा, इक लगज़िश नीम गुलाबी
दिल पर दस्तक देती है इक ख़्वाहिश नीम गुलाबी

लम्हा-लम्हा पिघली जाती है हसरत आवारा
 दहके दो अंगारों की वो ताबिश नीम गुलाबी

पल भर में पैवस्त हुई है दिल के निहाँ ख़ानों में
बोझल-बोझल पलकों की इक जुम्बिश नीम गुलाबी

लूट लिया बहका कर मेरी राहत का सरमाया
दिल ने नज़रों से मि कर की साज़िश नीम गुलाबी

सुलगा जाए जिस्म का संदल, महके फ़ज़ा बातिन की
 जलती है अब रूह तलक इक आतिश नीम गुलाबी

भीग गया जज़्बात का जंगल, फूट पड़ी हरियाली
बरसों बाद गिरी दिल पर ये बारिश नीम गुलाबी

रोग है या आसेब है ये, कोई तो बताए मुझ को
रह-रह के होती है क्यूँ इक लर्ज़िश नीम गुलाबी

हम भी दौलतमंद हुए, दिल ने भी ख़ज़ाना पाया
 वो दे कर "मुमताज़" गया इक बख़शिश नीम गुलाबी

6.

गुनाहों से मुकरता जा रहा है
ज़मीर इंसाँ का मरता जा रहा है

ये मुझ में कौन है जो चुपके-चुपके
 जुनूँ के पर कतरता जा रहा है

ये अच्छा है, जिसे देखो, हमीं पर
हर इक इल्ज़ाम धरता जा रहा है

जुनूँ की हद ये कैसी है कि अब ये
हर इक हद से गुज़रता जा रहा है

उतरता शम्स भी फ़नकार है क्या
 उफ़क़ पर रंग भरता जा रहा है

तो अब "मुमताज़" भी है मसलेहतख़्वाँ
 ये दरिया अब उतरता जा रहा है

7.

फ़र्श से अफ़लाक तक पहुंची है रुसवाई मेरी
 जाने क्यूँ बेचैन रक्खे सब को दानाई मेरी

कोई साया भी पड़े मुझ पर तो दम घुटता है
अब मुझ को तन्हा एक पल छोड़े न तनहाई मेरी

जिस जगह मैं हूँ, वहाँ कोई नज़र आता नहीं
 क़ैद मुझ को रात दिन रखती है यकताई मेरी

कोई क्या समझे मेरे दिल की तहों के ज़ाविए
ख़ुद मुझे कब नापनी आई है गहराई मेरी

वक़्त आया तो किसी दीवार का साया न था
 हाँ, यही दुनिया रही बरसों, तमाशाई मेरी

उस का वादा था दुआ मक़बूल करने का मगर
 मांगती हूँ, तो नहीं होती है सुनवाई मेरी

रास्ता लंबा है, मंज़िल का निशां कोई नहीं
 चलने दे लेकिन न मुझ को आबलापाई मेरी

आज भी "मुमताज़" मुझ को वो ज़माना याद है
 जब हुआ करती थी अंजुम से शनासाई मेरी

8.

है एक सा सब का लहू फिर क्या है ये मेरा-तेरा
हिन्दू तेरे, मुस्लिम तेरे, काशी तेरी, काबा तेरा

बैठे हुए हैं आज तक, तू ने जहाँ छोड़ा हमें
हम पर रहे इल्ज़ाम क्यूँ, रस्ता नहीं देखा तेरा

जीने का फ़न, मरने की ख़ू, सौ हसरतें टूटी हुईं
 क्या-क्या हमें तू ने दिया, एहसान है क्या-क्या तेरा

फिर इम्तेहाँ का वक़्त है, साइल है तू दर पर मेरे
 उलफ़त का फिर रख लूँ भरम, ला तोड़ दूँ कासा तेरा

ये रब्त भी अक्सर रहा तेरे-मेरे जज़्बात में
 आँखें नहीं भीगीं मेरी, दामन नहीं सूखा तेरा

जलती हुई बाद-ए-सबा, भीगी हुईं परछाइयाँ
 ऐ सुबह-ए-ग़म, कुछ तो बता, क्यूँ रंग है काला तेरा

शोला-सा इक लपका था कल शब की सियाही में कहीं
 "कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा "

तन्हा रही 'मुमताज़' कब मैं ज़िन्दगी की राह में
 अब तक मेरे हमराह है, तेरी महक, साया तेरा

(रचनाकार -परिचय :
जन्म: 11 अप्रेल सन 1964 को कानपुर के  एक ब्राह्मण खानदान में हुई
शिक्षा:  बीएससी, अदीब कामिल और मोअल्लिम का तरबियती कोर्स
सृजन:   उर्दू -हिंदी के कई पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़लें । एक संकलन भी प्रकाशित।  ग़ज़लों का एक एल्बम भी आ  चुका है।  दो फिल्मों में भी गीत लिखे, जिस में एक कुवैत में बनी और रिलीज़ हुई, और एक रिलीज़ न हो सकी।
ब्लॉग:   परवाज़
संप्रति:  कुछ अरसा तक लखनऊ दूरदर्शन में  एनाउंसर और  मुंबई में  अमरीकन फ़र्म में प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर रहीं। फिलवक्त  स्वतंत्र लेखन 
संपर्क: naza.mumtaz@yahoo.com)
    

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बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

हिंदी साहित्य को जाति व धर्म से निकलना होगा














फ्रैंक हुज़ूर @ शहरोज़




रांची के सेंट जेवियर कॉलेज के छात्र रहे मनोज कुमार  अब फ्रैंक हुज़ूर बन चुके हैं। लंदन में इनके लेखन के दीवानों की कमी नहीं हैं। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान पर लिखी उनकी किताब 'इमरान वर्सेस इमरान: द अनटोल्ड स्टोरी' बेस्टसेलर हो चुकी है। पिछले वर्ष आई 'इमरान खान द फाइटर' भी अंग्रेजी जगत में खूब चर्चा में रही। यह युवा लेखक कभी 'हिटलर इन लव विद मडोना' नाटक के कारण विवादों में आया था। इन दिनों पोर्न सिनेमा पर केंद्रित अंग्रेजी व हिंदी में हिंदी युग्म  से आई उनकी औपन्यासिक कृति 'सोहो : जिस्म से रूह तक का सफर' ने शोहरत की नई बुलंदी तय की है। इधर फोन पर उनसे लंबी बातचीत हुई। कहा कि रांची शहर उन्हें खूब याद आता है। सेंट जेवियर जैसा कॉलेज कैंपस उन्होंने कहीं नहीं देखा।

छह महीने के थे कि मां गुजर गईं: मां की गोद महज छह माह नसीब हुई। उसके बाद उनका देहांत हो गया। मां के ममत्व से छुटपन से ही वंचित रहा। इमरान वाली पहली किताब मां को ही समर्पित की है। पटना में रह रहे पिता से सालों साल मुलाकात नहीं हो पाती है। इधर के पांच वर्षों में मैं मुंबई, दिल्ली, लाहौर व लंदन में डोलता रहा हूं। पिता लेखक बनने के फैसले से असंतुष्ट थे। वह मुझे आईएस या आईपीएस देखना चाहते थे। लेकिन अब मेरे लेखन की अहमियत को समझने लगे हैं।

रांची में हुआ मैच्योर: 92 में पहली बार कविता लिखी, उसे याद करते हुए। शुरुआत से ही अभिव्यक्ति का माध्यम अंग्रेजी रहा।मनोज खान के नाम से इंग्लिश में कविताएँ  पत्र-पत्रिकाओं में शाया हुई। लेकिन मुझे लगा कि अंदर में एक लेखक सांस ले रहा है, उसे तवज्जो देना चाहिए। जेवियर की रिच लाइब्रेरी ने मेरे मानस को गहरे तक प्रभावित किया। मैंने जमकर यहां की दुर्लभ किताबों का फायदा उठाया। सच कहूं, तो मेरा स्टंडर्ड यहीं मैच्योर हुआ।

हिटलर इन लव विद मैडोना पर मिली धमकियां: मेरे नाटक 'हिटलर इन लव विद मैडोना' को काफी पसंद किया गया। पर उसपर विवाद भी  हुआ। मेरे पुतले जलाए गए।  पुस्तक तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित कर दी गयी।  दरअसल मैंने देश में मौजूद धार्मिक कट्टरता को दिखाने की कोशिश की थी। इस कट्टरता के पीछे एक राजनीतिक दल का हाथ रहा है। न सिर्फ मुझे बल्कि नाटक के कलाकारों को भी उस दल के कार्यकर्ताओं ने धमकियां दीं।

इमरान ही क्यों:  बचपन से क्रिकेट का दीवाना रहा हूं। इमरान की जिंदगी ने प्रभावित किया। सियासत में आने के बाद भी आम जन के प्रति उनके सरोकारों को देख मैं चकित हुआ। दर्जनों बार इमरान व जेमिना से मिलने के लिए लंदन और पाकिस्तान के चक्कर लगाए। चार सौ पेज की फाल्कन एंड फाल्कन, लंदन से छपी ' इमरान वर्सेस इमरान' में इमरान की जिंदगी के बहाने पाक की वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक स्थितियों का भी चित्रण है। इसके उर्दू संस्करण की रिकार्ड बिक्री हुई। हिंदी में जल्द ही आने वाली है।

झारखंड पर भी लिखेंगे: सपा प्रमुख मुलायम सिंह पर लिखने का मन बना चुके हैं फ्रैंक। बिहार व झारखंड पर कहते हैं कि यहां विकास का जितना प्रचार है, हकीकत उतना नहीं। हां! बदलाव जरूर आया है। लेकिन विकास की सही तस्वीर बननी बाकी है। झारखंड व बिहार की बदहाली पर खूब ध्यान जाता है। बेचैनी भी होती है। कल के दिनों में इनपर भी जरूर लिखूंगा।

हिंदी के वाल्तेयर राजेंद्र यादव: उर्दू शायर फैज अहमद फैज बेहद पसंद हैं। हिंदी लेखकों में राजेंद्र यादव का लेखन खूब भाता है। राजेंद्र जी हिंदी के वाल्तेयर हैं। लेकिन अंग्रेजी साहित्य में गालिब की वुस्अत यानी विस्तार और फैलाव है। इंद्रधनुषी रंग है उसमें। ऑस्कर वाइल्ड और मार्कोज जैसा कल्पनाशील और धाकड़ रचनाकार हिंदी में नहीं हुआ। हिंदी समाज धर्म और जाति जैसे फिजुल बातों में बंटकर लेखन का बंटाधार कर रहा है। कुछ अपवाद सभी जगह हैं, उनमें एक हैं, राजेंद्र यादव।

खुशवंत का हास्य पसंद: मिड नाइट चिल्ड्रेन में सलमान रुश्दी की प्रतिभा तो दिखती है, पर सटैनिक वर्सेस में आकर वह डगमगा जाते हैं। अरुंधति राय निसंदेह गंभीर लेखक हैं। उनके लेखन व संघर्ष दोनों का मैं कायल और प्रशंसक हूं। खुशवंत सिंह भारतीय अंग्रेजी लेखन के अहम स्तंभ हैं। उनके हास्य-व्यंग्य  का जवाब नहीं। चेतन भगत चमकते हुए भारत की तस्वीर दिखा रहे हैं। कैफे और कॉल सेंटर की जमात उनके पाठकों में है। जबकि समूचा देश इंडिया और भारत में बंटा हुआ है। महज दो फीसदी लोग उस चमकते चेहरे में शामिल हैं।



 फ्रैंक हुजूर : परिचय
जन्म: 21 जनवरी 1977 को बक्सर (बिहार) में
शिक्षा: सेंट जेवियर कॉलेज रांची व दिल्ली से
सृजन : नाटक 'हिटलर इन लव विद मडोना, बायोग्राफी 'इमरान वर्सेस इमरान: द अनटोल्ड स्टोरी, 'इमरान खान द फाइटर और औपन्यासिक कृति 'सोहा:जिस्म से रूह तक का सफर
संप्रति: स्वतंत्र लेखन
संपर्क:  frankhuzur@gmail.com 

(चर्चित युवा लेखक फ्रैंक हुज़ूर  से शहरोज़ की बातचीत भास्कर के झारखंड संस्करणों में 23 अक्टूबर 2013 के अंक में प्रकाशित )   







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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

दंतेवाड़ा के दौर में














अदनान कफ़ील की क़लम से


 दूर क्षितिज के पार

उदित हुआ है अंतर्मन में सहसा एक विचार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा, दूर क्षितिज के पार
निर्मम धागों से अब तक है, गुथी हुई यह काया
भाग रहा हूँ कब से जाने, फिर भी हूँ भरमाया
समय पाश से बच न पाया, घोर अँधेरा छाया
चिंतन करता,मंथन करता,क्या खोया क्या पाया
अनुत्तरित प्रश्नों को तुझसे अब भी है दरकार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा दूर क्षितिज के पार.
छवि तो तेरी अब भी है, अंतर्मन की गहराई में
मसल गयीं हैं खिलने से पहले कलियाँ अमराई में
दुनिया से बेग़ाने बच्चे खेल रहे मैदानों में
ख़ुद भी यूँ ही दिख जाता हूँ चेहरे से अनजानों में
जीवन मदिरा जिसने पी ली, क्यूँ जाता मैख़ानों में
टीस मारती अब भी बातें, मन के विस्तृत वीरानों में
नहीं कोई है सच्चा प्रेमी, नहीं कोई है यार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा, दूर क्षितिज के पार.
 स्मृतियाँ

इक भींनी ख़ुश्बू यादों की, अंतर में घुसती जाती है
उषा की मोहक लाली-सी, मन-नभ पे छिटती जाती है.
इक शून्य व्याप्त हो जाता है, मन मानों पर पा जाता है
गुज़रे लम्हों के जंगल में, मानो खोता-सा जाता है.
मन विकल-विकल हो जाता है, वह क्षण ज्वलंत हो जाता है
स्मृतियाँ कोमल स्वप्नों-सी, नयनों में बंधती जाती हैं.
अम्मा! अम्मा! चिल्लाता है, लय टूट-टूट भर्राता है
वह स्वर अनंत तक जाता है,' औ फिर थक के गिर जाता है.


 मेरी उदासी

तुम फुर्सत के क्षणों में मेरे आस-पास हो
मैं जब भी यादों के फूल चुनता हूँ
तुम ख़ुश्बू बन कर घुल जाती हो.
जब भी कोहरे से ढकी राहों पर
अकेला चलता हूँ
तुम्हें अपनी लड़खड़ाहटों में
महसूस करता हूँ.
जब भी किसी पत्थर पर बैठ कर
अपनी धड़कनों को सुनता हूँ
तुम कानों में कोई
निराशा का गीत
गुनगुना जाती हो.
मैं हमेशा तुमसे दूर भागता हूँ
पर तुम सामने प्रकट हो
मानो
मेरी खिल्ली उड़ाती हो.
आखिर तुम मुझसे
इतनी आसक्त क्यूँ हो ?
जो तुम मेरी
कलम की स्याही तक में घुल गयी ?
ऐ मेरी उदासी-
जवाब दो !

बर्बरता और ईसा

प्रिये !
आज ये हृदय
अति व्याकुल है
'औ सदियों से खड़ी
ये हांड-मांस की प्रतिमा
जर्जर हो चुकी है
संसृति की इस
बर्बरता से.
प्रिय ! मेरा रक्त
जो शायद अब भी लाल है
रिस रहा है
संभवतः
मुक्ति की अभिलाषा में .
पैबंद लगे मेरे वस्त्रों से
सड़े मांस की
बू आती है
और नीच भेड़िये
मेरा रक्त पी रहे हैं.
क्या इस दंतेवाड़ा के दौर में
मेरा अस्तित्व संभव है?
और कितनी सदियों तक
मैं आहार बनता रहूँगा
इन वहशी दरिंदों का ?
और आख़िर कब तक
मरियम जनती रहेगी
एक नए ईसा को ?
कब तब
कील ठोंके जायेंगे
मेरे इस वजूद में ?
कब तक ?
आखिर कब तक ?
लेकिन शायद
ये इस बात से अनभिज्ञ हैं
कि मेरी
उत्कट जिजीविषा
और मेरे
बाग़ी तेवर
कभी ठन्डे नहीं पड़ सकते.
यूँ ही ईसा
पैदा होता रहेगा
चाहे हर बार उसे
सूली ही क्यूँ न चढ़ना पड़े.

आवाज़
  
मैं तो आवाज़ था,
गूंजता ही रहा,
तुम दबाते रहे ,
हर घड़ी टेटुआ,
तुम सताते रहे ,
पर मिटा न सके,
मैं निकलता रहा ,
इक अमिट स्रोत से,
तेरी हर चोट पे.
तुम कुचलते रहे ,
मैं उभरता रहा,
तुम सितम पे सितम ,
मुझपे ढाते रहे,
लब को सिलते रहे,
अश्क ढलते रहे.
मैं बदलता रहा ,
हर घड़ी रूप को,
तुम तो अनपढ़ रहे ,
मुझको पढ़ न सके,
मेरी चुप्पी में भी ,
एक हुंकार थी ,
मुझमें वो आग थी ,
जो जला देती है,
नींव ऊँचे महल की ,
हिला देती है,
मुझमें वो राग है ,
मुझमें वो साज़ है,
जो जगा देती है ,
इक नया हौसला,
और बना देती है,
इक बड़ा क़ाफ़िला,
एक स्वर ही तो हूँ ,
देखने में मगर,
पर अजब चीज़ हूँ ,
तुम समझ न सके.

माफ़ करना
  
ऐ उर्वशी !!
आज तुम मेरी आँखों में
न देखो
और न मुझसे अपनी मासूम
स्वप्नों की दुनिया में
प्रविष्ट होने का आग्रह
करो.
और न मुझसे
किसी गीत की आशा रखो.

तुम सोच रही होगी
आज मुझे ये क्या हो गया ?
हाँ, मुझे कुछ हो-सा गया है
आज मेरे सुर खो गए हैं
मेरे साज़ भग्न हैं
जहाँ मेरे स्वप्नों की बस्ती थी
वहां अब बस राख
और धुआं है.
मेरी आँखों में विभीषिका के
मंज़र हैं
मत देखो मेरी तरफ
शायद डर जाओगी
इन स्थिर नयनों में
डरावने दृश्य अंकित हैं-
कोई स्त्री चीत्कार और
रोदन कर रही है
तो कोई बच्चा भूख से व्याकुल
स्थिर तर नयनों से
न जाने क्या सोच रहा है ?
जहाँ कोई तथाकथित रक्षक
भक्षक का नंगा भेस लिए
अपने शिकार की टोह में
घूम  रहा है.
तुम इन आँखों में
निरीह बेचारों को भी
देख सकती हो
जो एक मकड़-जाल में
उलझे
सहायता की गुहार
लगा रहे हैं.
यहाँ तुम उन मासूमों को भी
पाओगी जिन्हें
हक के बदले गोली देकर
हमेशा के लिए
सुला दिया गया
या कारे की तारीकियों में
फेंक दिया गया
असभ्य और जंगली कह कर.
तुम यहाँ उन बेबस माओं
को भी देख सकती हो
जिनके बेक़सूर चिरागों को
दहशतगर्द कह कर
हमेशा के लिए बुझा दिया गया.
तुम कुछ ऐसे भी दृश्य
देख सकती हो जो
अत्यंत धुधले हो चुके हैं
शायद उनपर समय की
गर्द बैठ गयी है.
क्या गीता,कुरान और
गुरु-ग्रन्थ की आयतें
नष्ट हो गयीं ?
क्या बुद्ध की शिक्षाएं
अपने अर्थ खो चुकीं ?
मालूम होता है उन्हें
दीमकों ने चाट लिया है
फिर बचा ही क्या है
यहाँ ?
मैं नहीं जानता
कहो प्रिये !
मैं कैसे इस कड़वे यथार्थ को
भूल कर
स्वप्नों में विचरण करूँ ?
कैसे प्रणय के गीत रचूं ?

अंतिम फैसला

हमारी मेहनत हमारे गहने हैं,
हम अपना श्रम बेचते हैं,
अपनी आत्मा नहीं,
और तुम क्या लगा पाओगे हमारी कीमत?
तुम हमें अपना हक़ नहीं देते,
क्योंकि तुम डरते हो,
तुम डरते हो हम निहत्थों से,
तुम मुफ्त खाने वाले हो,
तुम हमें लाठी और,
बन्दूक की नोक पे,
रखते हो-
लेकिन याद रक्खो,
हम अगर असलहे उठायें,
तो हम दमन नहीं,
फैसला करेंगे.
  
अँधेरा और चिंगारी

मैं कुछ भी नहीं था
हाँ,शायद कुछ भी नहीं
मेरी बातें साफ़ और
सपाट थीं
बिलकुल बारिश से धुले
आकाश की तरह
जिन्हें तुम अतिबौद्धिक
दार्शनिक,उन्मादी,सनकी
न जाने क्या क्या नाम देते थे.
मेरा आक्रोश कोई
क्षणिक उत्तेजना,कत्तई नहीं थी
मैं तो उन वर्षों तक की
दबी,कुचली भावनाओं की
एक प्रतिध्वनि मात्र था
मैं तो भोर की ठंडी हवा
के एक झोंके की तरह था
एक नई सुबह की
एक हलकी-सी लकीर भर था
हाँ,मैं कोई रौशनी का चिराग
नहीं था
मैं तो एक चिंगारी मात्र था
जिसे अँधेरा हर वक़्त
खा जाने की जुगत में
लगा रहता है
लेकिन मुझे अपने तुच्छ
होने का
ज़रा भी दुःख नहीं था
क्योंकि मैं फिर भी
अँधेरे से लाख गुना
बेहतर था.
  

मौत के सौदागर
 

ऐ मौत के सौदागरों !
मैं तुम्हें खूब पहचानता हूँ
वो जो तुम्हारे तोपों,बमों और मिसाइलों
को देख कर
तालियाँ पीटते हैं उन्हें भी
खूब जानता हूँ
तुम्हारा ये घिनौना प्रदर्शन
मुझे अखरता है
क्योंकि मैं तुम्हारी खेंची लकीरों को
नहीं मानता
तुम्हारे बटवारे को नहीं मानता
तुम्हारे ओछे और निकृष्ट
राष्ट्रवाद को नहीं मानता
क्योंकि वो इंसानियत के खिलाफ है
सारी खराबियों की जड़ है
वो विध्वंसकारी है
हमें उनकी कोई दरकार नहीं
तुम रक्षक की खाल में
छिपे भेड़िये हो
वक़्त आने दो जनरल !
हम अपने परचम
तुम्हारे सीनों में गाड़ेंगे
और
तुम्हारे ये हथियार,गोले, बारूद
तुम्हारी कब्र में......



(कवि-परिचय:
 जन्म: ज़िला-बलिया, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में जुलाई  30, 1994
संप्रति: अभी दिल्ली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस आनर्स में स्नातक की पढाई कर रहे
सृजन: बचपन से ही शायरी और कविता का शौक़, छिटपुट प्रकाशन 
संपर्क: thisadnan@gmail.com)

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