बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

बेबस समय की शहतीर सी चुभन

नौ वर्षीय बड़े साहबजादे आएश लबीब की कंप्यूटर पेंटिंग्स, जब वो 6 साल के थे 



यह बहुत बाद का समय था। पोखरण में महात्मा बुद्ध के मुस्कुराने और अयोध्या से राम के दूसरे बनवास के भी बहुत बाद। विश्व महा पंचायत के कथित मुखिया की दबंगई के स्थानीय क्लोनों को बाज़ार ने नायक बनाने के लिए अपनी सारी ताक़त झोंक दी थी। उसके खल को बूझते हुए हम थे और नहीं भी थे। खून की होली के रास में मूर्छित हमारा वजूद उसके होने और न होने के द्वन्द में विचलित था। लेकिन रूह की यह बेचैनी दिमाग के सम्मुख घुटने टेक चुकी थी। दिमाग था कि जो मित्र की नौ साल की बिटिया को भी स्त्री समझ उसके मासूम उरोजों की गोलाईयों से तुष्ट होता था। वहीं हम थे कि कानून की शिथिलता का स्यापा कर रहे थे। मंदिरों और मस्जिदों की प्रार्थनाएं और इबादतें उत्पाद में ढलकर पैकेज हो चुकी थीं। धर्म पुरातत्व का विषय था। जिसकी क़ब्रों से निकला भूत हमारी नृशंसता से कांपता वापस चला जाता। धर्मांधता का आतंक उस नायक का पेशा था। दलाली को कमीशन कहने के इस दौर में झूठों की विवशता थी। यह रंगा सियार थे। जंगल से शहर की ओर भागे शेर को मुखिया बनाने की क़वायद में तल्लीन थे। यहां धर्म की नहीं जातीय सर्वनाश की गुर्राहट थी। रंगा सियार सच की बारिश से अनजान थे। दरअसल वो धीरे-धीरे रँगे गए थे। इतना कि अपने होने का भ्रम कभी-कभार शौचालय में पल भर को लोप होता। लेकिन चातुर्य की क्रूरता से पंगु थे। जातीय हिंसा उन्हें ऊर्जा देने लगी थी। ऐसा वे खुलेआम आम कहते। विरोधी समुदाय के होश ठिकाने लगाने के लिए नरसंहार से सहमत थे। सहमत उनकी ज़ुबान तेंदुए सा लपलपा रही थी। हिटलर का नया इतिहास हिमालय की गोद में अकार पा रहा था। उसके गुणगान में कवि-लेखक-पत्रकार की टोलियाँ इसे क्रांति कहने में छाती फुलाए भोंपू थीं। मनुष्य किसी अंध कूप मे धेकेल दिए गए थे। पर उनका तेज था कि जब कभी इन भोंपुओं को निर्वस्त्र कर देता। यह थे कि अंधकार को आवरण समझ बैठे थे। वो इतिहास को भूल चुके थे कि कोई भी नस्ल तमाम रक्तिम उबाल के बाद भी पूरी तरह ख़त्म नहीं हो गयी। ( रात कुछ सहयोगियों से हुए संवाद के बाद‡ परसों ही महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती है )

पेड़ों को काटने की प्रतियोगिता दर असल धरा के गर्भ में छुपे अकूत भंडार को लूटने की थी। जबकि उसका प्रायश्चित गमलों में उगा बोनसाई कर पाने में असमर्थ था। जंगलों से सिर्फ परिंदे ही नहीं इंसान को भी शहरी शेरों ने निवाला बनाना शुरू कर दिया था। ज़बान क्रांतिकारियों की भी बंद थी या वे मूक बधिर होने का ढोंग कर रहे थे!Î

तब विश्व का एक धुर्व ख़त्म हो चुका था। उसके शिराज़े बिखेरने में दूसरे धुर्व की सशक्त दख़ल थी। उसकी यही कुटिलता अन्य क़द्दावर मुल्कों के लिए घातक बनती जा रही थी। उसने दुन्या को अमीर-ग़रीब की बजाय सभ्यताओं के संघर्ष में बदलने की कोशिश की। वो किंचित सफल रहा था। उसके झूठ और अन्याय के विरुद्ध बोलने वाले का अंत उसका लक्ष्य था। अपनी हिंसक फ़ितरत को वैध ठहराने के लिए वो लोकतंत्र और विश्व शांति का ढकोसला करता। सब अपनी बारी के इंतज़ार में थे। अनजान होने का दंभ उनकी कायर सहमति में था। दूध पिलाने के बाद दहशत का सांप जब डसने लगा तो सभ्यता संघर्ष का तर्क उसके हर दुष्कर्म को ढांपने में सक्षम रहा। इधर एक शहंशाही मुल्क तेल से छनती पकोड़ियों को खाने की अय्याशी में मस्त। सच तो यह था कि विश्वव्यापी डॉन हथियारों के साथ तेल का एकक्षत्र कारोबार चाहता था। उसे शाही मुल्क में लोकतंत्र की याद कभी न आती। और वो शाही मुल्क था कि अय्याशी को छुपाने के लिए धर्म के नाम पर हिंसा करने वालों को अर्थ देकर अपना आवरण तलाशता था।
विचारों के अंत की महज़ घोषणा नहीं, उसके खात्मे के साम, दाम, दंड व् भेद सारी तिकड़में थीं। खाओ पियो, मस्त रहो @ ईमानदारी पुस्तकों में अच्छी लगती हैं! खाने-पीने, सजने-संवरने और घूमने-टहलने के लिए तरह-तरह के साहित्य मौजूद थे। पत्र-पत्रिकाओं और दृश्य-भोपुओं में दरबारी गवैय्ये कवि बनकर इसका प्रचार करते। हर दिन किसी के नाम निश्चित था। संबंधों की शुचिता और उसकी आंतरिक तारतम्यता का ग्राफ बाज़ार तय करते। हर वर्ग और समाज के लिए नए-नए भगवान भी अवतरित हो चुके थे। यह साधु-संत अब कंदराओं में नहीं, रंगीन आलीशान पर्दों पर विराजमान रहते। इनमें से कुछ का कारोबार अरबों-खरबों का था। ज़माना वही है, जब ग़रीब मुल्कों की बेटियाँ अचानक विश्व सुन्दरी होने लगी थीं।
अब हर ओर सुंदरता का बोलबाला था। हॉट और सेक्सी होना सौन्दर्य का पर्याय हो चुका था। स्त्रियों की आज़ादी सिर्फ़ मनपसंद वाशिंग मशीन खरीदने में थी। आक़ा को हमारे गाँव-जवार की सड़कें जर्जर कर रही थीं। वो तुरंत दयालु हो गए! चौडी-लंबी सड़कों का जाल बिछ चुका था। इस जाल में हम समा चुके थे। अब हर पंचायत-अखड़ा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद सहज उपलब्ध थे। अब पंचायतें आधुनिक हो चुकी थीं। वहीं पुरा कालीन भी उतना ही। प्रेमियों का धड़ सर से अलग करना उनका गर्व था। उनके फ़तवे किसी मदरसे से अधिक मारक थे। किसी के सामाजिक बहिष्कार करने के फ़ैसले आउट आफ़ फ़ैशन थे। सामुदायिक हिंसा से उनका तेज बढ़ता था। इधर, विश्व का कथित मुखिया व सबसे विकसित देश में लाखों सरकारी कर्मी नौकरी से हटा दिए गए थे।

दरअसल वो सशंकित था। पहले से ही। तमाम संधियों को दरकिनार कर उसे दूर देशों के नागरिकों की चिंता दुबला किये जा रही थी। सो उसने इंसानी धर्म का पालन करते हुए कई मुल्कों में जंग को प्रेरित करना शुरू किया। उससे पहले मिटटी के किलों को गिराकर पहाड़ी मुल्क में उसके बम वर्षक विमान रोटियाँ गिरा चुके थे। यह वो ठिकाना था जहां कभी उसके गुर्रिला ट्रेनिंग दिया करते थे। ऐसा इसलिए कि उसके पडोसी की लाल नाक उसे चिढ़ाती थी। आखिर उसकी नाक तोड़ दी गयी। लेकिन जिससे तुडवाई वो मित्र से अचानक शत्रु हो गया। इस कथित शत्रु को इल्हाम हो गया कि वो तो जन्नत से भेजा गया है। वो भेज गया तो था नहीं सो वहाँ के सहिफ़े लाना भूल गया था। उधर उस शाही मुल्क को भी जन्नत लुभाने लगा था। ( इल्हाम= आकाशवाणी, सहिफ़े =ईश्वरीय सन्देश)
और हम थे कि एक भ्रम पर जान लुटाये थे। हर संकट के लिए अतीत के पन्नों पर जाकर  रुक जाते। ज़र्द वर्क़ था कि हमें ज़र्दे के नशे में क़ैद कर लेता। इसका जूनून भी अपने अतिरेक में एक तरह की हिंसा को ही जन्म देता था।

(फ़ेसबुक उवाच 30 सितंबर से एक अक्टूबर के बीच)





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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

शम्भु यादव की कविताएँ


















 नौ साल का रामरतन
गुल्ली पर टुल लगाने की उम्र में
मैदानों को दौड़-दौड़ थका देने की उम्र में
स्कूल में पहाड़े सुनाते वक्त
सबसे तेज हो सकती थी उसकी आवाज 

अपने गांव से कोसो दूर
दिल्ली की एक दूकान पर
गोल-गोल बिलता बचपन
नौ साल का रामरतन
 
आग उगलती भट्ठियां 
वह मट्ठियां बेलता
मालिक की घुड़की है-
‘सुन बे ओए बिहारी ’  
एक मासूम मन है गलता

कुछ नन्हें सुख है
परिवार की भूख में उलझे ।

बाजार की लगभग हर दूकान पर बने ऐसे दृश्य में
एक लेबर इन्सपेक्टर घूम रहा है लगातार
अपने बच्चों के लिए मिठाई मांगता 
बच्चों से मजदूरी करवाने के एवज़ में अपना इनाम।


वे संभालते दुनिया

दिन भर कमरा खाली रहता है
शाम को अपना दरवाज़ा खोल हो जाता है आबाद

चौदह-बाय्-दस का वह कमरा
उसके हिस्से में आठ जन हैं

स्टोव पर पक रहा है हँसी-ठहाका
थकान की जकड़न से मुक्त साँसें
आँखों में आँखों का झाँकना
सुखद इच्छाओं का तेज़ प्रवाह
बाँगड़ जीवन पर फैलना चाहता

गाँव की कई याद कई तहें
इस कमरे में
उन तहों को ऊपर नीचे करते वे आठ जन
बतियाते हुए गपियाते हुए
अपनी आदतों में
अपनी नींद में
अपने सपनों में

रिश्तों की गरमाहट लिए सुबह में
उन्हें फिर छितर जाना हैं इधर-उधर

वे संभालते दुनिया..............


 ‘क्लोज-अप’ हसीना के चमकते दाँत से इतर
 

 वहाँ पनपीले मुख पर अट्टहास
‘क्लोज-अप’ हसीना के चमकते दाँत

यहाँ करोड़ों का संताप
सदियों से कार्यरत हथौड़े की ‘ठक-ठक’
सभ्यता के निर्माण परोधा व्यस्त।

यहाँ जीवन कोल्हू में पिला
हाट-बाज़ार बिका
ख्वाब एक बसेरे भर का
आत्मा में वेदना

वहाँ शरीरी अटरिया पर गमकता है तेल
माया का विलास खे़ल
आनंद का तिकड़म
चाँदी की आत्मा सोने का खोल।

वहाँ उज्जवल-कलश लुभावन
‘उन्नति के भव्य दीप यही’
भ्रामक शोर प्रसारित प्रचारित

सत्ता के गलियारे में
केंचुल छोड़ता इंद्रजालिक व्यापारी

यहाँ अधलिखे उपन्यास का क्षोभ
जिसके केन्द्रीय संवेदन में तीखी पुकार
मनुष्य के बेहतर जीवन की

सुबह की लहरों में गेहूँ की बालों पर
ओस की चमकदार बूंदें
मिट्टी की सौंध यहाँ।

एक उदास स्वर

दवाइयों के सहारे
बीमारी के डर से तो बच जाऊँगा
परन्तु कैसे बचा पाऊँगा इस शहर को
खंजर के खौफ से
बम के विस्फोट से

कोई भी घड़ी दे सकती है धोखा
जीवन के किसी भी क्षण पर
बेमुरौवत आरी चल सकती है
कभी भी उजड़ सकता है बागवां

किसी महाकाव्य का दौर नहीं है यह

अपूर्ण भाव में
सूरज का संवारक रूप कहाँ!?

किस अग्नि में तपकर शुद्ध होगी घोषणाएं

पिछड़े जाते है तेज अंधड़ में
आँखों में भर रही है किरकिरी

व्याकुल है पीली घास
आस लिए मन में
हरी-भरी हो जाने को

दुख सूखे ठूंठ पर गड़ा कीला
जो कुछ भी सुख है
उस पर जमी है
थकान की झाई

 बहरूपिया

केंचुल उतार गया सांप 
और दबा भी नहीं
पहले से ज्यादा चमका है निखर

अपनी पूंछ को घूमा
तीन सौ साठ डिग्री वाली चौकड़ी मार बैठा है
तरह तरह से अपने फन को लहराता
दिखता है प्रफुल्ल

‘नाग का काटा पानी भी नहीं मांगता’
अपने चरित्र की इस विषेशता को अर्थ देने में लगा
हज़म करता निरीह कीड़ों-मकोड़ों को

गदगद है धर्म के कटोरे में दुग्धपान से 

व्यवस्था की बीन-धुन पर
दिखावे का सदभावना नाच
अपने ही मोह में धुत्त बहरूपिया।

सौदागर-कलन्दर

महानगर में फैली है भूल-भूलैया सड़कें
सड़कों पर भठयारा सा आदमी
आदमी में फैले हैं सपनें
सपनों पर काला जादू छुमन्तर।

पृथ्वी का यह छोर या वह छोर
मनुष्य की इच्छाओं की खाद-बीज-पौध
सब कुछ काले जादू की गुफा अन्दर

गुफा का अधिश सौदागर कलन्दर।

शहर के बीचो-बीच बसा लूटियन जोन
लूटियन में शाही बिराजा है सुप्रीमों कलन्दर

स्काचॅ की मस्ती में
इंटरनेट पर पोर्नो देखना
उसका प्रिय शगल।
 
(कवि-परिचय:
जन्म :     11 मार्च 1965  को जिला महेन्द्रगढ़ (हरियाणा ) के गाँव बड़कौदा में
शिक्षा :     प्राथमिक शिक्षा गाँव में, उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविधालय से हिंदी में  स्नातकोत्तर
सृजन  :  एक कविता संग्रह  ' नया एक आख्यान' (2013 ) प्रकाशित
                विभिन्न पत्रिकाओं और इंटरनेट  ब्लाग्स पर कविताएं
संप्रति: दिल्ली में व्यवसाय व रहकर स्वतन्त्र लेखन
 संपर्क :    shambhuyadav65@gmail.com)





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मंगलवार, 24 सितंबर 2013

मुस्लिम दोस्तों से एक अदना गुज़ारिश





















मस्जिद तो बना दी शब भर में, ईमान की हालत ठीक नहीं


तुझसे मेरी शर्ट कम सफेद क्यों! टशन का मामला है साहब ! आप खुद देख लीजिये घरों में गहरी तारीकी (अंधकार) है, लेकिन मस्जिद में दिए रौशन किये जा रहे हैं। बात महज़ चराग़ की नहीं। महंगे फ़ानूस और क़ालीनों से मस्जिदों को सजाया जाने लगा है। फर्श पर क़ीमती पत्थर और टाइल्स। बदहाल मुसलमानों के मेहनत-पसीने से क़ायम  मस्जिदों और दरगाहों की छटा, क्या आपको विचलित नहीं करती।  मुसलमानों की बेकली पर सिर्फ सजदे में  सर रगड़ने से कुछ नहीं होगा। कुछ सोचिये! मस्जिद नुमाइश की जगह नहीं। उन पैसों से आप तालीमी मीनार बुलंद कर सकते हैं। मदरसों में आधुनिक शिक्षा का नज़्म कर सकते हैं। सरकार का रोना कब तक कीजिएगा। कब तक इस सियासी दल से उस दल के गोद में उचकते रहियेगा! अब कोई मौलाना आज़ाद नहीं है कि जामा मस्जिद के मेंबर से वलवला अंगेज़ तक़रीर करे। मुल्क और ईमान का वास्ता दे।  उसके आंसुओं का  वजू  आपको पिघला दे। तुमने शादियों को एक कारोबार बना डाला। दहेज़ के बढ़ते नासूर तुम्हारी बेटियों को बुढा बना रहे हैं। वहीं इस मौक़े की फिज़ूल खर्ची। हुज़ूर ने भी बेटी को जहेज़ दिया था। यह हदीस आपके कुकर्मों को ढंक नहीं सकती। वहीं कई मुददे पर आपकी सांप्रदायिक सोच आप ही के पैरों पर कुल्हाड़ी मारती है। तुलसी का पौधा आप देश के हर गांव-क़स्बे के आँगन और शहरों की बालकोनियों में पाएंगे। कितना गुणकारी पौधा। हमारे अधिकांश भाई इसके प्रति श्रद्धा रखते हैं। लेकिन आपने शायद ही इसे किसी मुस्लिम के घर इस पौधे को देखा होगा। हम उसके गुणकारी लाभ से इसलिए वंचित हैं कि हिन्दू उसकी पूजा करते हैं, हमारा उससे क्या लेना-देना? बरादर !

आप को बता दूं कि इस्लामी मान्यता अनुसार  हजरत आदम बेआबरू होकर परवर दिगार के कूचे से निकले, तो जन्नत से अपने साथ कुछ खास पौधे भी लेते चले। इनमें एक तुलसी का भी पौधा था। और अब अधिकतर इतिहासकर एक मत हैं कि आदम हिंदुस्तान की धरती पर उतरे थे। यहाँ हिंदुस्तान से आशय भारत उपमहाद्वीप से है, जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बर्मा, श्रीलंका, बागला देश, नेपाल और भारत आदि देश हैं।

आपकी हदीस कहती है कि दरया का पानी सबसे पाक है। उसकी हिफाज़त करें। जल संरक्षण की भी ताकीद है। हुजूर कह गए, ख्वाह वजू ही क्यों न कर रहे हो और दरया किनारे क्यों न हो, पानी कम से कम खर्च करो! साथियों ! बोलो तो ज़रा तुमने अपने गाँव, कस्बे और शहर की नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या किया। गंगा और यमुना तुम्हारी भी उतनी ही है। कितनी मस्जिदें, दरगाहें, दर्सगाहें इनके किनारे हैं, इनकी आब्यारी पाते हैं। पड़ोसी के घर से गर धुआं उठता  न दिखे तो तुरंत उसकी खोज-खबर करो। उसके यहाँ खाना पहुँचाओ। पडोसी आपका किसी भी मज़हब का हो। यह भी हदीस ही कहती है।

एक बार एक व्यक्ति हुज़ूर के पास आया। शिकायत की कि कोई गैर-मुस्लिम उसे नाहक़ सता रहा है। जब तफ्तीश हुई तो दोषी मुसलमान निकला। पैगम्बर बहुत नाराज़ हुए। कहा, मैं अल्लाह के सामने उस गैर-मुस्लिम के पक्ष में खड़ा रहूँगा। यह बताने का वाहिद मकसद है कि अपने पड़ोसियों से नेक व्यवहार कीजिये। ऐसी हरकत मत कीजिये जिससे किसी को परेशानी हो। किसी का दिल तोडना भी गुनाह है। 

शायद यही सबब रहा होगा कि पहले मुग़ल बादशाह बाबर ने हुमायूँ को वसीयत में यह बात बगौर लिखी: ' हिन्दुस्तान के हिन्दू गाय की पूजा करते हैं, गौ कशी पर पाबंदी रखना। '

 दोस्तों ! आप खुद बढ़कर क्यों नहीं एक भाई की श्रद्धा की खातिर गौ कशी पर बंदिश लगाने की मांग सरकार से करते हैं। आप इसका गोश्त नहीं खायेंगे तो मर नहीं जायेंगे। न ही मरने के बाद जहन्नम में चले जायेंगे। इसका खाना सवाब क़तई नहीं।  इससे बीमारी ज़रूर फैलती है।

 हज़रत उमर ने भी गोश्त ज्यादा खाने से मन फ़रमाया था। उन्होंने इसकी मिसाल शराब से की थी कि नशे की तरह ही इसकी लत होती है। हुजुर भी  इससे परहेज़ करते थे। उन्हें तो लौकी की सब्जी और दाल बहुत पसंद थी।   
जानवर पालना आपके पैगम्बरों का शौक़ रहा है। पालिए।  इसके ढूध, मक्खन और घी का सेवन कर सेहत-बाग़ कीजिये। याद रखिये, जो क़ौम खुद को समय के साथ नहीं बदलती तो गर्त में समां जाती है।


यहाँ भी पढ़ सकते हैं


  
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सोमवार, 23 सितंबर 2013

सर्वधर्म समभाव वाया राजनीति @ नमो

मुज़फ्फ़र नगर फ़साद : दंगे में ख़ाक -राख हुए अपने घर को ताकता एक मासूम साभार इंडियन एक्सप्रेस

संदर्भ अनंतमूर्ति

समय अब ज्यादा क्रूर है। संकट गहरे हैं। बोलने की आज़ादी पर पहरे हमेशा रहे हैं। लेकिन देश में लोकतंत्र की गहरी जड़ों को डिगा पाना बेहद मुश्किल रहा। अब उसके ही बहाने उसे ही समूल नष्ट करने की कोशिशें तेज़ हैं। जबकि मित्रो! वाद-विवाद ही संवाद का वाहक रहा है। इसमें कुतर्क की गुंजाइश नहीं रहती। वैचारिक मतभेद हमेशा रहे हैं, रहेंगे। लेकिन तब कोई गाली-गलौज पर उतर नहीं आता था। देश के एक प्रतिष्ठित लेखक जवानी में नेहरु की आलोचना करते रहे। कुछ बड़े हुए तो इंदिरा उनके ज़द में रहीं। कभी उनके विरुद्ध अमर्यादित बर्ताव किसी ने नहीं किया। अब जबकि धुर दक्षिण पंथी एक नेता और उसके समर्थकों के सपने के पूरे हो जाने की स्थिति आने पर लेखक ने देश छोड़ देने की बात कही तो एक लम्पट तबका उनकी माँ-बहन करने में वीरता समझने लगा। दरअसल उनके ज़ेहन में हिटलर का जर्मनी रहा होगा। जब कई लेखक देश छोड़ कर चले गए थे। प्रतिकार का अपना ढंग है। क्या हम विश्व के उस नादिरशाही या हिटल शाही दौर में तो नहीं लौट रहे? क्या मोदियाबिंद अब डेंगू की तरह फैल रहा है। कि जिसमें सिर्फ एक ही रंग नज़र आता है।

मित्रो ! आप जिस राज्य में विकास का ढिंढोरा पीट रहे हैं। ज़रा उसके आगे-पीछे भी नज़र घुमा लीजिये। अभी कुछ दिन पहले "Times of India" ने ख़बर दी कि निवेशकों के लिए उड़ीसा बेहतर राज्य साबित हो रहा, वहीं गुजरात लगातार नीचे जा रहा है। सर्वाधिक प्रति व्यक्ति आय में हरियाणा एक नंबर पर है। सबसे अधिक नौकरियों में आन्ध्र प्रदेश है। इधर अपने बिहार ने 2006-2010 की ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 10.9 प्रतिशत की दर से विकास किया जबकि गुजरात की दर 9.3 प्रतिशत रही। इस दौरान सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि हरियाणा, महाराष्ट्र और उड़ीसा भी विकास दर में गुजरात से आगे निकल गया।

दोस्तो! कभी एक अफसर ने कहा था की इंदिरा ही भारत हैं और भारत ही इंदिरा, तो उसकी भी खूब आलोचना हुई थी। लेकिन इंदिरा के चाहने वाले विरोधियों की मुखालिफ़त हिंसक ढंग से नहीं करते थे। आज ऐसा माहौल निर्मित किया जा रहा है कि आप मुझे मानिए, वरना आप देशद्रोही! मित्र ! यह नहीं चल सकता। आप बसद शौक़ किसी का समर्थन कर सकते हैं। ज़रूर कीजिये। लेकिन दुसरे को भी कहने का स्पेस दीजिये। आप मुल्क की बात छोड़िये गुजरात में भी 49 फ़ीसदी वोट इस विस चुनाव में भाजपा को कम मिला था। तो क्या आप उस आवाज़ को कुचल देंगे।
गुजरात नरसंहार की निंदा समूचे विश्व में हुई थी। सिक्ख विरोधी दंगे भी सिहरन पैदा कर देते हैं। मैं कांग्रेसी नहीं हूँ। लेकिन इत्ता जानता हूँ कि उसके लिए कांग्रेस नेताओं ने कई बार माफ़ी-तलाफ़ी की। अब मुज़फ्फर नगर। यहाँ भी उसी हिंसक मानसिकता ने खेल खेला, जो गुजरात और दिल्ली वाया भिवंडी @ मुंबई अराजक रहा है। दोस्तों ! यह ज़ेहनियत तालिबानी हो या संघी। धर्म की सियासत करने वाले यह तथाकथित हमारे सूरमा आम जन का भला यही करेंगे कि खून की बारिश के बाद रोटियाँ बांटने चले आयेंगे। भूल जाएंगे कि बादल का निर्माण उन्होंने ही किया था। आप लोकतंत्र का सम्मान करें !

आओ कि देश की प्राचीन वसुधैव कुटुम्बकम परंपरा आवाज़ देती है। आओ कि कबीर, तुलसी, बुल्ले शाह के नग्मे गूँज रहे हैं। वही तुलसी जिन्होंने कहा था, मांग के खईबो मसीद (मस्जिद ) में सोइबो! वही बुल्ले शाह जो बिस्मिल्लाह कह कर होली खेलने का एलान करते हैं। आओ हम उस नरेन्द्र के विवेक का स्मरण-व्यवहार करें, जो बाद में स्वामी विवेकनद बना। उसने कहा था, वेदान्ती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर के संयोग से जो धर्म खड़ा होगा,वही भारत की आशा है।



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