बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

रंज से इस कदर याराना हुआ @ QUICK बंदी

 

 

 

 

 

 

कमलेश सिंह की कलम  से 

Fear, Oh Dear!

मैं तो बस आप ही से डरता हूँ.
मैं कहाँ कब किसी से डरता हूँ.

मेरी दुनिया है रोशनाई में,
इसलिए रौशनी से डरता हूँ  

बहर-ए-आंसू हूँ बदौलत तेरी,
तेरी दरियादिली से डरता हूँ.

जब तेरा अक्स याद आता है,
मैं बहुत सादगी से डरता हूँ.

रंज से इस कदर याराना हुआ,
मिले तो अब खुशी से डरता हूँ.

मौत से डर नहीं ज़रा भी मुझे,
हाँ, इस जिंदगी से डरता हूँ.

जाने पहचाने थे हाथ औ खंजर,
कहता था अजनबी से डरता हूँ!

वस्ल की बात पर ख़मोशी भली,
हाँ से भी, और नहीं से डरता हूँ!

वो इक रात की गफ़लत ही थी,
मैं क्यूँ फिर चांदनी से डरता हूँ!

ये क्या किया कि आसमां वाले,
मैं तुम्हारी ज़मीं से डरता हूँ!

ग़म का बारूद छुपा सीने में,
फिर इक शोलाजबीं से डरता हूँ!

तेरे रुखसार पे एक नई गज़ल,
जो लिखी है उसी से डरता हूँ!

साँस गिनती की ही बची है मगर,
घर में तेरी कमी से डरता हूँ.

तुम्हारी याद के सहराओं में,
हर घड़ी तिश्नगी से डरता हूँ!

दिल लगाने का शौक है तुमको,
और मैं दिल्लगी से डरता हूँ!

साक़िया चश्म-ए-करम कायम रख,
होश में भी तुम्हीं से डरता हूँ!

जब से सब हो गए ईमां वाले,
मैं हर एक आदमी से डरता हूँ.
का किसी से कहें, काकिसि खुद ही,
हूँ काकिसि और काकिसि से डरता हूँ! 
रोशनाई: Darkness बहर: Ocean अक्स: Countenance रंज: Sorrow सहरा: Desert तिश्नगी: Thirst ईमां: faith काकिसि: तखल्लुस | کاکسی: تخللس Pen name
| खिर्द: Samajh | तिश्नालबी: parched lips | चारागर: Doctor | आज़ुर्दगी: being unwell
——————————————

Cut it!

हमको तुमने दुश्मन जाना, छोड़ो यार!
तुमको कौनसा था याराना, छोड़ो यार!
हो सकता है होना ही इक सपना हो,
जो था वो था भी या था ना छोड़ो यार!
लाख कहा पर पाल लिया आस्तीनों में,
उन साँपों को दूध पिलाना छोड़ो यार!
किसने कहा था रह-ए-इश्क आसां होगी,
बीच रास्ते स्यापा पाना छोड़ो यार!
अहद-ए-मुहब्बत अहल-ए-वफ़ा की बाते हैं,
भैंस के आगे बीन बजाना छोड़ो यार!
खुद को तो तुम रत्ती भर ना बदल सके,
बदलेगा क्या खाक ज़माना, छोड़ो यार!
कतरे-कतरे से तुम हमरे वाकिफ़ हो,
महफ़िल में हमसे कतराना छोड़ो यार!
रौनक-ए-बज़्म-ए-रिन्दां थी चश्म-ए-साकी,
बिन उसके क्या है मयखाना, छोड़ो यार!
पैंसठ साल से राह तकत है इक बुढ़िया,
वादों से उसको बहलाना छोड़ो यार!
चाहें भी तो कैसे भूलें ज़ख़्म सभी,
तुम तो उनपर नमक लगाना छोड़ो यार!
आँख-लगे को रात जगाना छोड़ो यार,
सपनों में यूं आना जाना छोड़ो यार!
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Triveni & a postscript

हर एक बात मेरी जिंदगी की तुमसे है
वो एक रात मेरी ज़िंदगी की तुमसे है
बाकी सब दिन तो इंतज़ार के थे 

अब कोई रास्ता बचा ही नहीं
जिधर देखो बस पानी ही पानी
इस तलातुम में खुदा क्या नाखुदा भी नहीं 
तुम थे तो चट्टानों से भी लड़ जाता था
तुम थे तो तूफानों से भी लड़ जाता था
आज खुद से भी सामना नहीं होता 

फिर वही रात तो आने से रही
लगी ये आँख ज़माने से रही
शमा बुझा दो, हमको अब सो जाने दो
_____
अमेरिका में बवंडर आया तो बिजली चली गई,
हमारे गाँव में बिजली आये तो बवंडर आ जाए!
~~

Dussehra. Ten taunts

एक हम नहीं थे काबिल तुम्हारे,
उस पे इतने थे बिस्मिल तुम्हारे!
दो घड़ी और रुकते तो हम भी,
देख लेते हद्द-ए-कामिल तुम्हारे!
तीन हर्फों का जुमला बस सच्चा,
बाकी किस्से हैं बातिल तुम्हारे!
चार दिन की है ये जिंदगानी,
इसमें दो दिन हैं शामिल तुम्हारे!
पांच ऊँगलियाँ डूबी हों घी में,
मुंह में शक्कर हो कातिल तुम्हारे
छः हाथ की ज़मीं ही तो मांगूं,
बाकी सेहरा-ओ-साहिल तुम्हारे!
सात सुर से बनी मौसिकी भी,
कुछ नहीं है मुकाबिल तुम्हारे!
आठ पहरों में रहते हो तुम ही,
रात, दिन भी हैं माइल तुम्हारे!
नौ लखा हार ना दे सके हम,
कर दिया नाम ये दिल तुम्हारे!
दस ये गिनती के हैं मेरे मसले,
बन गए जो मसाइल तुम्हारे!

Raavan


पेट को रोटी,
तन को कपड़ा,
सिर को छत,
बच्चों की शिक्षा अनवरत,
वादे,
यही हैं जो ४७ में हुए,
जो १४ में होंगे!
सबको बिजली,
सबको पानी,
सबको गैस,
गरीबी, बेरोज़गारी हटाओ,
मलेरिया भगाओ,
विदेशी हाथ काटो,
मजदूरों में ज़मीन बांटो,
देश की अखंडता,
संविधान की संप्रभुता,
जय जवान, जय किसान,
और वही पाकिस्तान,
नारे,
यही हैं जो ४७ में लगे,
जो १४ में लगेंगे!
आरक्षण, सुशासन,
शोषण, कुपोषण,
मरता जवान,
मरते किसान,
भ्रष्टाचार, कदाचार,
पूँजीवाद, समाजवाद,
अपराध, उत्पीड़न,
सांप्रदायिक सद्भाव,
चीज़ों के बढ़ते भाव,
मुद्दे,
वही हैं जो ४७ में थे,
यही हैं जो १४ में होंगे
रावण,
४७ में जलाया था,
आज जल रहा है,
१४ में भी जलाएंगे,
रावण वही है,
रावण जलता नहीं है!

(परिचय :
वरिष्ठ पत्रकार . शौक़िया शायरी . हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में
जन्म : बिहार के भितिया, बांका में, 13 जनवरी को, साल 1973
शिक्षा : स्नातक व पत्रकारिता में डिप्लोमा
सृजन : प्रचुर लिखा, प्रकाशन व प्रसारण 
सम्प्रति: दैनिक भास्कर में स्टेट हेड
संपर्क:kamlesh.singh@gmail.com)

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रविवार, 4 नवंबर 2012

अदालत भी उगलदान है....

क़मर सादीपुरी की कलम से 





 














 1.
ये निजाम क्या निजाम है।
न ज़मीन है, न मकान है।

झूठा, चोर, बेईमान है।
कोहराम है, कोहराम है।

सच को मिलती है सज़ा
अदालत भी  उगलदान  है।

दिल किस क़दर है बावफा
तुझे इल्म है, न गुमान है।

तेरा रुख हुआ,  बेसबब
अब रूह ही गुलदान है।

बोझ तो  है  यूँ क़मर
सजदे में हुआ इंसान है।

2.

ज़िंदगी में एक आया है।
लेकिन बेवक्त आया है।

हम उसे कह नहीं सकते,
जो मेरा ही हमसाया है।

रूह की बात लोग करते हैं,
जिस्म क्यों आड़े आया है।

उनके हंसने की अदा है मासूम,
हमें ये ज़ुल्म बहुत भाया है।

उन्हें  बारिश का पता हो शायद,
हमने तो छत भी नहीं ढाला है।

उसके सोने का गुमाँ हो जबकि
उसी ने नींद को चुराया है।

कौन उस्ताद ग़ज़ल कहता है,
ये तो तुकबंदी का सखियारा है।

( फ़ेसबुक पर कमेंट की शक्ल में चीज़ें उतरती गयी हैं।)

चित्र गूगल से साभार


रचनाकार परिचय






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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

बदलती रहेगी तो बहती रहेगी हिंदी


हिंदी के संवेदनशील जानकार चाहिए


 




















सैयद शहरोज़ क़मर की कलम से


समय के साथ संस्कृति, समाज और भाषा में बदलाव आता है। परंपरा यही है। लेकिन कुछ लोगों की जिद इन परिवर्तनों पर नाहक  नाक  भौं सिकोड़ लेती है। अपने अनूठे संस्मरणों के लिए मशहूर लेखक  कांति कुमार जैन का लेख -इधर हिंदी नई चाल में ढल रही है- पढ़ा जाना चाहिए। लेख का अंत वह इस पक्ति से करते हैं, हमें आज हिंदी के शुद्धतावादी दीवाने नहीं, हिंदी के संवेदनशील जानकार चाहिए। वह लिखते हैं, अंग्रेजी में हर दस साल बाद शब्द कोशों के  नये संस्करण प्रकाशित करने की परंपरा है। वैयाकरणों, समाजशास्त्रियों, मीडिया विशेषज्ञों, पत्रकारों, मनोवैज्ञानिंको का  एक दल निरंतर अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की टोह लेता रहता है। यही कारण है कि  पंडित, आत्मा, कच्छा, झुग्गी, समोसा, दोसा, योग जैसे शब्द अंग्रेजी के  शब्द कोशों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी में कोई शुद्ध अंग्रेजी की बात नहीं करता। संप्रेषणीय अंग्रेजी की, अच्छी अंग्रेजी की बात करता है। अंग्रेजी भाषा की विश्व व्यापी ग्राह्यता का यही कारण है कि वह निरंतर नये शब्दों का स्वागत करने में संकोच नहीं करती। हाल ही में आक्सफोड एडवांस्ड लर्न्र्स डिक्शनरी का नया संस्करण जारी हुआ है। इसमें विश्व की विभिन्न भाषाओं के  करीब तीन हजार शब्द शामिल ·िकये गये हैं। बंदोबस्त, बनिया, जंगली, गोदाम जैसे ठेठ भारतीय भाषाओं के शब्द हैं, पर वे अंग्रेजी के शब्दकोश में हैं क्योंिक  अंग्रेजी भाषी उनका प्रयोग करते हैं।

दरअसल किसी भाषा का  विकास उसके बोलने या लिखने वालों पर निर्भर करता है। अगर उनका ध्यान रखा जाता है, तो निश्चय ही ऐसी भाषा सरल, सहज और बोधगम्य बनती है। अंग्रेजी में ग्रीक, लैटिन, फ्रांसीसी और अरबी के शब्द मौजूद हैं। अब उसके नए कोश में चीनी, जापानी और हिंदी आदि दूसरे भाषायी समाज के शब्द भी शामिल किए गए हैं। वहीं अरबी वालों ने तुर्की, यूनानी, फारसी और इबरानी आदि के शब्द लिए। ऐसा नहीं कि हिंदी को  दूसरी भाषा से बैर हो। हिंदी और उर्दू का जन्म ही समान स्थितियों और काल की देन है। जाहिर है, बाद में अलग अलग पहचानी गई इन जबानों में तुर्की, अरबी, अंग्रेजी, फारसी, अवधी, बुंदेली, बांग्ला, संस्कृत आदि देशी विदेशी शब्दों की भरमार है। लेकिन बाद में हिंदी के शुद्धतावादियों ने धीरे धीरे बाहरी शब्दों से परहेज करना शुरू किया। तत्सम का प्रयोग आम हुआ। न ही तत्सम और न ही अन्य भाषायी शब्दों का इस्तेमाल गलत है। गलत है, ऐसे शब्दों को प्रचलन में जबरदस्ती लाने की  कोशिश करना। हां! यदि चलन में शब्द हैं, तो उसे आत्मसात करना जरूरी है। लेखक, कवियों और अब टीवी चैनलों व फिल्मों में प्रयुक्त शब्दों को स्वीकार करने में हिंदी का विकास ही है। जैसे, प्रेमचंद ने गोधुली शब्द का इस्तेमाल किया तो लोगों ने सहज लिया। पंजाबी शब्द कुड़माई कहानी उसने कहा था के  कारण कितना खूबसूरत बना। संजय दत्त की  फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में आया गांधीगीरी शब्द हर की जबान पर चढ़ गया। अरुण कमल ने अपनी कविता में चुक्कू मुक्कू लिखा, तो उसका इस्तेमाल करने में किसी को  कोई गुरेज नहीं हुआ। सुधीश पचौरी जब न्यूज चैनलों के लिए खबरिया लिखने लगे, तो पहले परहेज किया गया। लेकिन बाद में उसकी सहर्ष स्वीकृति मिल गई।
हिंदी और उर्दू के शब्दों को परस्पर जबानों से अलग करने की बहुधा कोशिशें की गईं। लेकिन हुआ उल्टा ही। आम लोगों के बीच गजलों, गानों और फिल्मों से उसे दुगुनी चाल से बढ़त मिली। आदि लेखकों में शुमार भारतेंदु हरिश्चंद्र के बकौल हिंदी नई चाल में ढलती गई। उर्दू और अंग्रेजी के शब्द शर्बत में चीनी की तरह घुल चुके हैं। तभी तो मिठास है। हिंदी में करीब 1 लाख, 37 हजार शब्द दूसरी भाषा के हैं। यह अब हमारी विरासत है।
दूसरी भाषा से आए शब्दों की कुछ मिसालें देखिए:
फल, मिठाई संबंधी: अनार, अंगूर, अंजीर या इंजीर, आलूबुखारा, कद्दू, किशमिश, नाशपाती, खरबूजा, तरबूज, सेब, बादाम, पिस्ता, अखरोट, हलवा, रसगुल्ला, कलाकंद, बिरयानी और कबाब आदि।
शृंगार संबंधी: साबुन, आईना, शीशा, इत्र आदि।
पत्र संबंधी: पता, खत, लिफाफा, डाकिया, मुहर, कलमबंद, कलम, दवात, कागज, पोस्ट ऑफिस, डाक खाना, आदि।
व्यवसाय संबंधी: दुकान, कारोबार, कारीगर, बिजनेस, शेयर, मार्केट, दर्जी, बावर्ची, हलवाई आदि।
धर्म संबंधी: ईमान, बेईमान, कफऩ, जनाज़ा, खुदा, मज़ार आदि।
बीमार संबंधी: बीमार, डॉक्टर, अस्पताल, हॉस्पीटल, नर्स, दवा, हकीम, सर्दी ज़ुकाम, बुखार, पेचीश, हैज़ा आदि
परिधान: पोशाक, कमीज, शर्ट, पैंट, आस्तीन, जेब, दामन, पाजामा, शलवार, जींस, दस्ताना आदि।
कानून व शासन संबंधी: चपरासी, वकील, सरकार, सिपाही, जवान, दारोगा, चौकीदार, जमादार, अदालत, सज़ा, मुजरिम, कैद, जेल आदि।

वहीं हिंदी में आए उर्दू के उपसर्ग व प्रत्यय के कुछ नमूने:

हर, बदनाम, बदसूरत, बदबू, बदमाश, बदरंग, बदहवास। गैरवाजिब, गैरजिम्मेवार, गैरजिम्मेदार, गैर हाजिर। बिलानागा। दादागिरी, गांधीगिरी, उठाईगिरी। आदमख़ोर, घूसखोर, रिश्वतखोर। असरदार, उहदेदार, चौकीदार, थानेदार। घड़ीसाज़, रंगसाज़।
इसके अलावा अनगिनत उर्दू शब्दों ने हिंदी शब्दकोश को समृद्ध बनाया है। आनंद नारायण मुल्ला का शेर बरबस याद आता है:

उर्दू और हिंदी में फर्क सिर्फ़ है इतना
हम देखते हैं ख्वाब, वह देखते हैं सपना।

प्रेमचंद आज भी चाव से पढे जाते हैं। उन्हें क्लासिक का दर्जा हासिल है। वहीं बोधगम्यता की बात चली तो, राजेंद्र यादव का सारा आकाश, श्रीलाल शुक्ल का रागदरबारी, धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता, सुरेंद्र वर्मा का मुझे चांद चाहिए, शानी का कालाजल और अब्दुल बिस्मिल्लाह का झीनी झीनी बिनी चदरिया का तुरंत ही स्मरण होता है। इन उपन्यासों की लाखों प्रतियां अब तक बिक चुकीं। आज भी लोग इसे पढऩा पसंद करते हैं। इसलिए कि इसकी भाषा बहुत ही सहज व सरल है। वहीं नामवर सिंह की किताब दूसरी परंपरा की खोज आलोचना जैसे सूखे विषय के बावजूद भाषायी प्रवाह के  कारण पढ़ी जाती है। रवींद्र कालिया की संस्मरणात्मक  पुस्तक  गालिब छुटी शराब खूब पढ़ी गई। जबकि काशीनाथ सिंह की काशी का अस्सी कम नहीं पढ़ी गई। लेकिन अस्सी में तत्सम अधिक पढऩे को मिला। वहीं गालिब....में ठेठ हिंदुस्तानी का लहजा परवान चढ़ा। इस शब्द पर अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध याद आए। उन्होंने किसी के कहने पर उपन्यास लिखा था, ठेठ हिंदी का ठाट। जिसमें हिंदी के ठाठ को बरकरार रखने का प्रयास किया गया था। लेकिन हरिऔध जी खुद ही असमंजस में थे।  30-3-1899 में उपन्यास की भूमिका में वह लिखते हैं, लखनऊ के प्रसिद्ध कवि इंशा अल्लाह खां की बनाई कहानी ठेठ हिंदी है। जो मेरा यह विचार ठीक है, और मैं भूलता नहीं हूँ, तो कहा जा सकता है कि मेरा ठेठ हिंदी का ठाट नामक  यह उपन्यास ठेठ हिंदी का दूसरा ग्रन्थ है।.........
भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र की बनाई हिंदी भाषा नाम की पुस्तिका है, उसमें जो उन्होंने नंबर 3 की शुद्ध हिंदी का नमूना दिया है, वही ठेठ हिंदी है। शुद्ध और ठेठ शब्द का अर्थ लगभग एक ही है। वह नमूना यह है:

पर मेरे प्रीतम अब तक घर न आये, क्या उस देश में बरसात नहीं होती, या किसी सौत के फंदे में पड़ गये, कि इधर की सुध ही भूल गये। कहां तो वह प्यार की बातें कहां एक संग ऐसा भूल जाना कि चिट्ठी  भी न भिजवाना, हा! मैं कहां जाऊं कैसी करूं, मेरी तो ऐसी कोई मुंहबोली, सहेली भी नहीं कि उससे दुखड़ा रो सुनाऊं, कुछ इधर-उधर की बातों ही से जी बहलाऊं ।

इन कतिपय पंक्तियों पर दृष्टि देने से जान पड़ता है कि जितने शब्द इन में आये हैं, वह सब प्राय: अपभ्रंश संस्कृत शब्द हैं, प्रीतम शब्द भी शुद्ध संस्कृत शब्द प्रियतम का अपभ्रंश है। विदेशी भाषा का कोई शब्द वाक्य भर में नहीं है, हां! कि शब्द फारसी है, जो इस वाक्य में आ गया है, पर यह किसी विवाद के सम्मुख न उपस्थित होने के कारण, असावधानी से प्रयुक्त हो गया है।

करीब डेढ़ सौ साल पहले भारतेंदु हरिश्चंद ने लेख लिखा था, हिंदी नई चाल में ढली । उसका चलना आज भी जारी है। रहना भी चाहिए।



हिंदी दिवस पर 14 सितम्बर 2012,  भास्कर के विशेष अंक में संपादित अंश प्रकाशित
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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

रांची फिल्म फेस्टिवल में झारखंडी फिल्मों से सौतेलापन!



झारखंड के लिए नहीं है सुहाना सफ़र 

















 कुंदन कुमार चौधरी की कलम से

झारखंड बनने के 11 साल बाद पहली बार फिल्म फेस्टिवल 'सुहाना सफर का  आयोजन 12 से 15 सितंबर तक  रांची में किया जा रहा है। इस बात से झारखंड ·े फिल्मकार खुश थे और लंबे जद्दोजहद के बाद झारखंड और यहां की  क्षेत्रीय फिल्मों के लिए इसे सुनहरा अवसर मान रहे थे। तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी यहां के फिल्मकारों ने बगैर किसी सहायता के अपने बूते तीन राष्ट्रीय और दर्जनों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते। लेकिन इस फिल्म फेस्टिवल में ठेठ झारखंडी मिटटी के सोंधेपन को  पूरी तरह नजरअंदाज किया गया. झारखंड की प्रतिनिधि फिल्में शामिल ही नहीं की गयी हैं. । 21 फिल्मों में मात्र तीन झारखंडी फिल्मों एक नागपुरी, एक  संथाली और एक खोरठा का प्रदर्शन हो रहा है, वह भी मॉर्निंग शो में.  20-25 सालों से यहां काम कर रहे फिल्मकार अपने को उपेक्षित मान रहे हैं।

नागपुरी फिल्मों को उपेक्षित किया गया
झारखंड में सबसे ज्यादा नागपुरी फिल्में बनती हैं। 1992 से अब तक सौ के करीब नागपुरी फिल्में बन चुकी हैं। यहां के तमाम बड़े सिनेमाघर इन फिल्मों को अपने यहां नहीं दिखाते, इसके बावजूद कई फिल्मों ने खूब मुनाफा कमाया। श्रीप्रकाश की नागपुरी फिल्म 'बाहा को बर्लिन में ब्लैक इंटरनेशनल अवार्ड मिला। लेकिन इस फिल्म फेस्टिवल में मात्र एक नागपुरी फिल्म 'सजना अनाड़ी दिखाई जा रही है। फिल्म का समय भी मॉर्निंग शो रखा गया है, जब अमूमन ·म लोग फिल्म देखने घर से आते हैं। रांची में नागपुरी फिल्मों का  बड़ा दर्शक वर्ग है। हिंदी फिल्मों का 1000 सीट वाले सुजाता हॉल में प्रदर्शन हो रहा है, वहीं तीनों क्षेत्रीय फिल्मों का मिनीप्लेक्स में, जिसमें 100 के करीब सीट हैं। नागपुरी फिल्म निर्देशक श्रीप्रकाश कहते हैं,झारखंड की प्रतिनिधि फिल्में इस फिल्म समारोह में दिखाई जानी चाहिए। फीचर फिल्म के साथ डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी दिखानी चाहिए। तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद यहां के फिल्मकारों ने तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। दर्जनों नेशनल-इंटरनेशनल अवार्डों पर कब्जा जमाया, लेकिन इस फिल्म फेस्टिवल में एक भी ऐसी फिल्में नहीं दिखाई जा रही है, इससे यहां के फिल्मकार अपने को छला महसूस कर रहे हैं।

तमिल-ओडिय़ा की जगह यहां की फिल्में दिखाई जानी चाहिए
झॉलीवुड में लंबे समय से जुड़े मनोज चंचल कहते हैं कि झारखंड में फिल्म फेस्टिवल हो रहा है, तो यहां की प्रतिनिधि फिल्मों पर फोकस करना चाहिए। तमिल, ओडिय़ा, बंगाली, पंजाबी आदि फिल्में पहले से ही अपने प्रदेशों में अच्छी स्थिति में हैं, उन्हें यहां दिखाकर या बढ़ावा देकर क्या फायदा। आज झॉलीवुड कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। यहां की फिल्मों से जुड़े लोग पलायन कर रहे हैं, इस फेस्टिवल में यहां की फिल्मों को ज्यादा से ज्यादा दिखाकर यहां के फिल्मकारों में सकारात्मक संदेश दिया जा सकता था। 

डॉक्यूमेंट्री की अहमियत समझनी चाहिए
झारखंड के फिल्मकारों द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्में नेशनल-इंटरनेशनल स्तर पर न सिर्फ सराही गईं, बल्कि दर्जनों अवार्डों पर भी कब्जा जमाया। प्रसिद्ध फिल्मकार मेघनाथ कहते हैं कि अब लोगों को  डॉक्यूमेंट्री की अहमियत समझनी चाहिए। जितने भी बड़े फिल्म फेस्टिवल होते हैं, सभी में फीचर फिल्मों के साथ डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन भी होता है। यहां दर्जनों ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का  निर्माण हुआ है, जिसमें झारखंड की सोंधी खुशबू नजर आती है। इनका प्रदर्शन फिल्म फेस्टिवल में किया जाना चाहिए।


लेखक-परिचय:
जन्म : 13 फरवरी, 1977
शिक्षा : बीएससी, बीजे
करीब 12 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय.
सम्प्रति: दैनिक  भास्कर, रांची  में फीचर एडिटर
संपर्क: kundankcc @gmail .com
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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)