बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 14 दिसंबर 2014

नीलेश रघुवंशी को मिला शैलप्रिया स्मृति सम्मान



















बहुमुखी सृजनशीलता के लिए मशहूर युवा कवयित्री व लेखिका नीलेश रघुवंशी को रविवार को रांची में दूसरे शैलप्रिया स्मृति सम्मान से अलंकृत किया गया। वन सभागार, डोरंडा में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि ख्यात लेखिका अलका सरावगी ने उन्हें मान पत्र से नवाज़ा। उन्हें पंद्रह हजार रुपए की राशि पुरस्कार स्वरूप भेंट की। गौरतलब है कि रांची की प्रतिभावान कवयित्री शैलप्रिया का 1 दिसंबर 1994, को महज 48 साल की उम्र में कैंसर से जूझते हुए निधन हो गया था। गत वर्ष उनके परिजनों ने शैलप्रिया स्मृति न्यास का गठन किया। पहला शैलप्रिया सम्मान निर्मला पुतुल को दिया गया था। शैलप्रिया के पुत्र व कवि-पत्रकार प्रियदर्शन ने कहा कि शैलप्रिया के सरोकारों से लैस नीलेश रघुवंशी जीवन की भट्ठी से निकली हुई रचनाकार हैं। हाशिये के लोगों के पक्ष में उनकी रचना खड़ी होती है। शैलप्रिया के छोटे  बेटे व कवि-पत्रकार  अनुराग अन्वेषी ने मान पत्र पढ़कर सुनाया। लेखकीय वक्तव्य में नीलेश ने सोचना आैर होना, हाय दइया, हुट जाएं, पिता की स्मृति में, सांकल, बेखटके और खेल का मैदान शीर्षक कविताओं का पाठ किया। अंतिम कविता में उन्होंने कहा, मैं बेखटके जीना चाहती हूं। आदिवासी लेखक और न्यास के सदस्य महादेव टोप्पो ने कहा कि भविष्य में अन्य भाषाओं में भी  स्त्री लेखन को सम्मानित किया जाएगा। अध्यक्षता सुख्यात उपन्यासकार मनमोहन पाठक ने की, वहीं पहले सत्र का संचालन सुशील अंकन ने किया।

महिला लेखन का बदलता परिदृश्य
दूसरे सत्र में समकालीन महिला लेखन का बदलता परिदृश्य विषय पर हिस्सा लेते हुए रविभूषण ने कहा कि इंदिरा गांधी जबकि बरसों तक प्रधानमंत्री रहीं, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद स्त्री लेखन ज्यादा सामने आया। इसमें हंस और राजेंद्र यादव की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हंस ने दलित और महिला लेखन को प्रमुखता दी। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में स्त्री लेखन अधिक मुखर हुआ। महिलाओं ने कई विधाओं में अभिव्यक्त करना शुरू किया। प्रियदर्शन बोले कि परंपरा व आधुनिकता दोनों स्त्री विरोधी हैं। परंपरा घर में बंद कर, तो आधुनिकता बाजार में खड़ा कर स्त्री को मारना चाहती है। कलिकथा बायपास जैसे अपने चर्चित उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार पा चुकीं अलका सरावगी ने लेखन स्त्री या पुरुष नहीं होता। स्त्री लेखन के नाम से कहीं हमारा एक घेटो तो नहीं बनाया जा रहा है। ठीक है कि स्त्री कई स्तरों पर शोषित है। लेकिन स्त्री सिर्फ स्त्री जीवन पर ही क्यों लिखे। वह इससे इतर संसार पर क्यों न लिखे। नीलेश ने महिला लेखन को अलग खांचे में देखे जाने से इंकार किया। कहा कि गांवों में स्त्रियों को आजादी मिल रही है, वहीं साहित्य में संघर्ष जारी है। राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष व लेखिका महुआ माजी ने अपने दोनों उपन्यास के मार्फत अपनी बात शुरू की। कहा कि उन्होंने पुरुष पात्रों के माधम से स्त्री जीवन को दिखाने की कोशिश की है। हालांकि उन्होंने जानबूझकर नहीं किया, लेकिन उनके स्त्री किरदार शोषित नहीं, बल्कि पुरुष को प्रताड़ित करते हैं।

शैलप्रिया की बिटिया की किताब हुई  लोकार्पित

अंतिम सत्र में अनामिका प्रिया की आलोचना पुस्तक हिंदी का कथा साहित्य और झारखंड लोकार्पित की गई। इसका प्रकाशन क्राउन बुक ने किया है। इस पर रांची विवि के प्रो. मिथिलेश ने बोलते हुए कहा कि यह किताब हिंदी साहित्य के कई अनजाने तथ्य सामने लाती है। । मौके पर विद्याभूषण, हरेराम त्रिपाठी चेतन, अशोक प्रियदर्शी, बालेंदु शेखर तिवारी, डॉ. माया प्रसाद, शैलेश पंडित, दिलीप तेतरवे, कलावंती, डॉ. भारती कश्यप, एमजेड खान, कामेश्वर श्रीवास्तव निरंकुश, रश्मी शर्मा, शिल्पी, अालोका, सुनील भाटिया, जसिंता और प्रशांत गौरव आदि ढेरों साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

नीलेश की रचना यात्रा काफी विपुल और बहुमुखी: निर्णायक मंडल
 इस सम्मान के निर्णायक मंडल में रविभूषण, महादेव टोप्पो और प्रियदर्शन शामिल थे। इन्होने  कहा  है, ‘नब्बे के दशक में अपनी कविताओं से हिंदी के युवा लेखन में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाली कवयित्री नीलेश रघुवंशी की रचना यात्रा पिछले दो दशकों में काफी विपुल और बहुमुखी रही है। इसी दौर में भूमंडलीकरण के चौतरफ़ा हमले में जो घर, जो समाज, जो कस्बे अपनी चूलों से उख़ड़ रहे हैं, उन्हें नीलेश रघुवंशी का साहित्य जैसे फिर से बसाता है। जनपक्षधरता उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता भर नहीं, उनकी रचना का स्वभाव है जो उनके जीवन से निकली है। कमजोर लोगों की हांफती हुई आवाज़ें उनकी कलम में नई हैसियत हासिल करती हैं। 2012 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘एक कस्बे के नोट्स’ के साथ उनके लेखकीय व्यक्तित्व का एक और समृद्ध पक्ष सामने आया है। समकालीन हिंदी संसार में यह औपन्यासिक कृति अलग से रेखांकित किए जाने योग्य है जिसमें एक कस्बे के भीतर बेटियों से भरे एक मेहनतकश घर की कहानी अपनी पूरी गरिमा के साथ खुलती है। कहना न होगा कि इस पूरे रचना संसार में स्त्री-दृष्टि सक्रिय है जो बेहद संवेदनशील और सभ्यतामुखी है।‘


नीलेश : इक नज़र
जन्म: 4 अगस्त 1969, गंज बासौदा (म.प्र.)
सृजन: घर-निकासी, पानी का स्वाद, अंतिम पंक्ति में (कविता संग्रह ), एक कस्बे के नोट्स (उपन्यास),  छूटी हुई जगह (स्त्री कविता पर नाट्य आलेख), अभी ना होगा मेरा अंत  (निराला पर नाट्य आलेख), ए क्रिएटिव लीजेंड (सैयद हैदर रजा एवं ब. व. कारंत पर नाट्य आलेख), एलिस इन वंडरलैंड,  डॉन क्विगजोट,  झाँसी की रानी (बाल नाटक )
सम्मान: भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, आर्य स्मृति साहित्य सम्मान, दुष्यंत कुमार स्मृति सम्मान, केदार सम्मान, शीला स्मृति पुरस्कार, युवा लेखन पुरस्कार (भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता), डीडी अवार्ड 2003 और 2004
संप्रति: भोपाल दूरदर्शन से सम्बद्ध 

भास्कर के  15 दिसंबर 2014 के अंक में संपादित अंश प्रकाशित

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