बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 7 अगस्त 2011

श्रद्धा जैन की भीगी ग़ज़लें



















 1
मुझसे इतना भी हौसला न हुआ
जब बुरा बन गया, भला न हुआ

ज़ख्म के फूल अब भी ताज़ा हैं
दूर होकर भी फासला न हुआ

तेरी आहट क़दम-क़दम पर थी
ज़िंदगी में कभी खला न हुआ

होने वाली है कोई अनहोनी
वक़्त पर एक फ़ैसला न हुआ

रेज़ा-रेज़ा बिखर गए सपने
लोग कहते हैं मसअला न हुआ

हादसा होते सबने देखा पर
कोई उलझन से मुब्तला न हुआ
2.
जैसे होती थी किसी दौर में, हैवानों में
बेसकूनी है वही आज के इंसानों में

जल्द उकताते हैं हर चीज़ से, हर मंजिल से
ये परिंदों की सी आदत भी है दीवानों में

उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे, कह कर
नाम लिखवा लिया अब हमने भी नादानों में

जिस्म दुनिया में भी जन्नत के मज़े लेता रहा
रूह इक उम्र भटकती रही वीरानों में

उसकी मेहमान नवाजी की अदाएं देखीं
हम भी सकुचाए से बैठे रहे बेगानों में

नाम, सूरत तो हैं पानी पे लिखी तहरीरें
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में

झूठ का ज़हर समाअत से उतर जाएगा
बूंद सच्चाई की उतरे तो मेरे कानों में

जो भी होना है वो निश्चित है, अटल है ‘श्रद्धा’
क्यूँ न कश्ती को उतारे कभी तूफानों में
3.
नज़र में ख़्वाब नए रात भर सजाते हुए
तमाम रात कटी तुमको गुनगुनाते हुए

तुम्हारी बात, तुम्हारे ख़याल में गुमसुम
सभी ने देख लिया हमको मुस्कराते हुए

फ़ज़ा में देर तलक साँस के शरारे थे
कहा है कान में कुछ उसने पास आते हुए

हरेक नक्श तमन्ना का हो गया उजला
तेरा है लम्स कि जुगनू हैं जगमगाते हुए

दिल-ओ-निगाह की साजिश जो कामयाब हुई
हमें भी आया मज़ा फिर फरेब खाते हुए

बुरा कहो कि भला पर यही हक़ीकत है
पड़े हैं पाँव में छाले वफ़ा निभाते हुए
4.
जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी

भुखमरी, क़ैद, गरीबी कभी तन्हाई, घुटन
सच की इससे भी जियादा कहाँ कीमत होगी

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी

नाज़ सूरत पे, कभी धन पे, कभी रुतबे पर
ख़त्म कब लोगों की आखिर ये जहालत होगी

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी

कविता कोश के पाँच वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में  प्रथम कविता कोश सम्मान से आज  7 अगस्त को जयपुर में श्रद्धा जैन को भी अलंकृत किया जाना है.हमज़बान की ओर से उन्हें अनगिनत मुबारकबाद.

परिचय :जन्म : ८ नवम्बर,१९७७] विदिशा, मध्यप्रदेश  में
शिक्षा: रसायन  में स्नातकोत्तर
सृजन: गजलों का शतक
सम्प्रति: ग्लोबल इंटर नेशनल स्कूल, सिंगापूर में हिन्दी का अध्यापन
संपर्क: shrddha8@gmail.com
ब्लॉग : भीगी ग़ज़लें  
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बुधवार, 27 जुलाई 2011

२५ वर्षों से निकाल रहा धोबी हस्तलिखित अख़बार















मुक्तिबोध का मेहतर गौरी शंकर रजक 



गुंजेश दुमका से 






सब जानते हैं कि झारखंड भारत गणराज्य का एक राज्य है। उनमें कुछ जानते होंगे कि दुमका इस राज्य की उपराजधानी है। लेकिन ज़्यादातर लोगों को यह पता नहीं होगा कि दुमका बस स्टेंड से पोखरा चौंक जाने वाली सड़क पर कुछ दूर चलने पर बाईं जानिब एक दुर्गा स्थान है और वहाँ से कुछ फ़र्लांग और आगे बढ़ने पर दाईं तरफ एक सड़क जाती है जिला कारागार के ठीक बगल-बगल से। उस सड़क पर आगे जा कर एक बाईं तरफ डायोग्नोस्टिक भवन है और थोड़ा और आगे जाने पर पोर्स्ट्मार्टम घर।

खैर, शहर के बारे में यह सब जानकारी तो आपको गूगल मैप से भी मिल सकती है। जो जानकारी आपको गूगल मैप से नहीं मिलनी है वह है झारखंड के एक अनोखे खबरची गौरी शंकर रजक के बारे में। ज़रा सोचिए, आपको बताया जाय कि एक ऐसा आदमी है जो हाथों से हर हफ्ते एक अख़बार निकालता है और ऐसा वह पिछले 25 वर्षों से कर रहा है। कि वह मुक्तिबोध का मेहतर है और पेशे से धोबी है। फिर आप निकल पढ़ते हैं उससे मिलने ऊपर वाले रास्ते पर। नीली छतरी टांगें, बनियान पैजमा पहने, कुर्ते को कंधे पर रखे, कई और लोगों कि तरह एक शख्स भी सामने से गुज़र जाता है। आप बताए गए पते बी. आर. लांड्री. पर पहुँचते हैं, पुछते हैं कि क्या यहीं वो रहते हैं जो हाथ से लिख कर हर हफ्ते अखबार निकालते हैं, “ऊ अभिये कोटा निकला है ऊ देखिये तो छाता लेकर जा रहा है न, वही लिखता है” आप पीछे मूढ कर देखते है वही है। वही है !! आप उसके पीछे भागते हैं, चाचा आप ही हैं जो हाथ से लिखकर अख़बार निकालते हैं, चमकदार आँखें आपको देखती हैं, गौरी शंकर रजक की चमकदार आँखें। जेम्स आगस्टस हिक्की की आँखें भी क्या ऐसे ही चमकदार रही होंगी? पहली बात जो गौरी शंकर जी आजकल आपसे कहेंगे वह यह कि 15 अगस्त से वह साप्ताहिक अख़बार का प्रिंटेड एडिशन निकालने वाले हैं।

आप अगर गौरी शंकर जी के साथ किरोसिन तेल लेने के लिए कोटा (जन वितरण प्रणाली, के तहत ज़रूरत के सामान देने वाली दुकान) गए होते तो आपको पता होता कि कोटा बंद रहने के कारण उन्हें तेल नहीं मिला और फिर बाद में यह भी पता चतला कि उन्हें यह पता नहीं कि कोटा कब खुलता है कब बंद हो जाता है।



हमको तो जो कोई नहीं छापता है, आदमी लोग का दुख, समस्या वही हमको दिखता है हम उसी को लिखते हैं।“

कैसे मन हुआ की लिखा जाय?

-       “एक बार एक आदमी के साथ डीसी के पास गए उसको वृद्धा पेंशन दिलाना था, सब के पास जा कर थक गया था बुड़ा आदमी, 86 का बात है, डीसी भी उल्टा जबाब दे दिया। फिर हम पुछे की ऐसा काहे तो डीसी हमसे बोला की तुम कौन है, जाओ कुछ नहीं मिलेगा तभिये लगा की अपना कुछ ताकत होना चाहिए। तब से लिख रहे हैं.....”


  अख़बार आंदोलन हो गया दीन दलित



1986 में आंदोलन नाम से अख़बार शुरू कर वृद्धा पेंशन योग्य उम्मीदवारों के लिए जो आंदोलन शुरू किया वह आज भी जारी है। 1996 गौरी शंकर के लिए खास रहा दिल्ली तक उनके आंदोलन की गूंज पहुंची, और उन्हें राष्ट्रपति के. आर. नारायनन ने सम्मानित किया। तब ही उनके आखबर को पंजीकृत करने की बात भी हुई और आंदोलन का नाम बादल कर दीन दलित हो गया।     

अख़बार का नाम ज़रूर बदला हो पर सरोकार नहीं बदले हैं। दलितों वंचितों के लिए आज भी गौरी शंकर रजक ही एक पत्रकार हैं जो उनकी बात ऊपर तक पहुंचा पाते हैं। “आजकल बीपीएल कार्ड में बड़ी धांधली हो रहा है उसके बारे में लिखना है... उपरे इतना भ्रष्टाचार है की नीचे कर्मचारी लोग को कोई डर ही नहीं है.... ऊपर ठीक करना होगा पैसा गरीब के लिए आता है और अफसर लोग टीवी फ्रिज खरीदता है मेला देखता है” यह है गौरी शकर रजक की मूल चिंता।



65 वर्षीय गौरी 25 वर्षों के इस सफर में अख़बार पर 5लाख 12 हज़ार चार सौ रुपये खर्च कर चुके हैं। इस मई उन्होने जिला अधिकारी के पास अर्जी दी है की खर्चे का कुछ हिस्सा अगर सरकार की तरफ से मिल जाय तो अख़बार की प्रिंटेड एडिशन निकालने में सहायता मिल जाय। शुबू सोरेन के दिवंगत पुत्र दुर्गा सोरेन ने वादा किया था एक प्रेस ही खोलेंगे उनके लिए, पर अब वही नहीं रहे। एक छोटी मोटी लांड्री से अपनी जीविका चलाने वाले गौरी हर माह बारह सौ रुपये अखबार में खर्च करते हैं। उन्होने दलित समाज में चेतना जागृत करने और उन्हें संगठित करने के लिए एक संघ भी बनाया है- निर्धन दलित समाज संघ। 


सामाजिक न्याय पर आधारित और कानून से संबधित किताबों को पढ़ने वाले इस खबरची ने अख़बार के आलवे भी आतंकवाद और परिवार नियोजन जैसे विषयों पर लंबे लेख लिख रखे हैं और उन्हें प्रकाशक की तलाश है। गौरी शंकर जब अखबारों को दिखाते हैं तो भले ही वर्तनी की बेशुमार गलतियाँ आपको खटके पर ज़रा सोचिए जिस आदमी ने पूरे सामाजिक व्याकरण को पलटने का जिम्मा उठाया लिया हो, वह वर्तनी की फिक्र क्यों करेगा भला।

चलते-चलते उनसे पूछ बैठा शुबू सोरेन के बारे में क्या सोचते हैं आप? “बीजेपी के भरोसे है अब तो, पहले अपना दिमाग से काम करता था तो ठीक था, अब जो, जो बोलता है वही करता, इसलिए तो मोल कम हो गया है उसका, दिल्ली से पैसा मांगता है तो उसको मिलता नहीं है, पहले ऐसा नहीं था”।

गौरी शंकर रजक से मुलाक़ात किसी इतिहास से मुलाक़ात नहीं है, वह वर्तमान है, खालिस वर्तमान। गौरी शंकर से मुलाक़ात उस समझ से मुलाक़ात है जिसके तहत पत्रकारिता एक जज़्बा है।






















इस पोस्ट की चर्चा तेताला, कुछ ख़ास  और ब्लाग ख़बरें पर भी







लेखक-परिचय: बिहार-झारखंड के किसी अनाम से गाँव में -09/07/1989 को जन्मे इस टटके पत्रकार [ गुन्जेश कुमार मिश्रा ] ने जमशेदपुर से वाणिज्य में स्नातक कर महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से एम. ए. जनसंचार अभी किया हैं. उनसे gunjeshkcc@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
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स्खलित होता समाज -- अपने ही हाथों में

-->












गुन्जेश की कवितायें


 (1)
ज्ञान, शांति, मैत्री
हमारे दौर के
सबसे प्रतिष्ठित शब्द हैं........
इतने प्रतिष्ठित शब्द कि
ये हमें प्रतिष्ठित कर सकते थे!!
थे?
हाँ, थे!!!!!!!
ज्ञान अब --तथ्य है,
शांति     --प्रतिबन्ध
मैत्री    --चाटुकारिता
और हम अपने समय के सबसे बड़े
शोर.........

 (2)

उसके आवाज़ में
भारीपन था,
स्वर में गहराई,
विचारों में स्पष्टता ,
समय ने
आवाज़, स्वर, और विचार को
अगवा कर लिया
बचा रह गया
भारीपन ----व्यक्तित्व  का
गहराई ----संबंधों में
स्पष्टता ---अधिकारों की..........

 (3)

आज लिखी जाएँगी
जम कर कुछ पंक्तियाँ,
पंक्तियाँ प्रेम पगी
बहुत रस भरी पंक्तियाँ,
नहीं.....
कोई इन्कलाब नहीं हुआ......
सिंहासन भी ज्यूँ का त्यूं है ...
भाई, जंग तो अभी शुरू ही नहीं हुई, तुम जीतने की बात करते हो???
फिर भी चूंकि बहुत-बहुत नकारात्मक नहीं  होना चाहिए
इसलिए लिखी जा रही हैं पंक्तियाँ,
दो शब्द आस-पास रखे गए हैं --
जैसे कैमरे के सामने दो जिस्म ......
जिसे देख कर रत है पूरा समय हस्तमैथुन में
लिखी जाएँगी पंक्तियाँ इसलिए कि
स्खलित हो जाये पूरा समाज -- अपने ही हाथों में
कि रजा को अब और प्रजा की ज़रूरत  नहीं.....

-->(4)

एक होती है कविता की भाषा
और एक भाषा
की कविता
ठीक वैसे ही
जैसे
होती है
राजनीति की 'शिक्षा'
और
'
शिक्षा'
की राजनीति ......

***********************************************
परिचय:
बिहार-झारखंड के किसी अनाम से गाँव में -09/07/1989 को जन्मे इस टटके कवि-कथाकार [
--> गुन्जेश कुमार मिश्रा ] ने जमशेदपुर से वाणिज्य में स्नातक किया.सम्प्रति महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,  वर्धा में एम. ए. जनसंचार के छात्र हैं.परिकथा में इनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई जिसे हमने भी साभार हमज़बान में प्रस्तुत किया था.खबर है कि उसी पत्रिका के ताज़े अंक में उनकी दूसरी कहानी भी शाया हुई है.उन्हें मुबारक बाद!!
कविता के बारे कोई राय देना नहीं चाहता..वो खुद मुखर हैं.यूँ गुन्जेश स्वीकार करते हैं कि जितना समय वह पाठ्य-पुस्तकों को देते हैं,उस से कम साहित्यिक पुस्तकों को नहीं देते!उनका विश्वास है : संसार में जो भी बड़ा से बड़ा बदलाव हुआ है, उसके पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गंभीर लेखन की भूमिका अवश्य रही है. ..माडरेटर
 


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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

आतंक के विरुद्ध जिहाद!
















देश के लिए कुर्बान मुजाहिदीनों को सलाम!
पाठक चौंक रहे होंगे । मैं क्या बेवकूफाना हरकत कर रहा हूँ.सच मानिए देश में हुई अब तक की तमाम आतंकी घटनाओं में  उनसे जूझते हुए,  लड़ते हुए जामे-शहादत पी जानेवाले वो तमाम जांबाज़ मुल्क के सिपाही, अफसर और आम नागरिक ही मेरी नज़र में सबसे बड़े मुजाहिदीन हैं।
मुजाहिदीन अर्थात जिहद, प्रतिकार, संघर्ष करनेवाला
ऐसा संघर्ष जो आतंक, अन्याय,असत्य,ज़ुल्म और अत्यचार के विरुद्ध हो। ऐसे मकसद के लिए जद्दोजिहद जिसका ईमान इंसान की जान बचाना और ज़मीन पर अमनो-अमन कायम करना हो।
अबुलकलाम आजाद, भगत सिंह, अशफाक, रामप्रसाद, विद्यार्थी,नेहरू, सुभाष जैसे अनगिनत लोग हुए जिन्होंने अंग्रेजों से मुल्क को आज़ादी दिलाने के लिए जिहाद किया.और आज इतिहास उन्हें मुजाहिदे-आज़ादी कहता है।


२३/११ को भी  मुंबई में शहीद हमारे देशवासियों ने विदेशियों की नापाक साजिश से मुक्त कराने के लिए जिहद किया और शहीद तो हुए लेकिन उन्हों ने ये विश्व को दिखा दिया की तिरंगा झुकनेवाला नहीं है।इस १३ को जो हुआ.जिसने भी किया.हर ओर से घोर भर्त्सनाएँ हो रही हैं. केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि धमाकों के लिए फ़िलहाल किसी एक गुट को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अम्रीका और पाकिस्तान पोषित मानसिकताएं बेहद चतुराई के साथ आम भारतीय युवाओं को बरगला कर उनसे धर्म और मज़हब के नाम पर ऐसे खूनी कारनामे करवा रही हैं.

लेकिन समूची इंसानियत को बंदूक की नोक पर नचाने का सपना देखने वाले इस्लाम समेत किसी भी धर्म-सभ्यता में मुजाहिदीन नहीं कहे जा सकते।

वे आतंकवादी हैं, उग्रवादी हैं, दहशतगर्द हैं।
उन्होंने कठोर से कठोर सज़ा मिलनी चाहिए।
उन्हें मज़हब और धर्म का इस्तेमाल करने की इजाज़त किसी भी कीमत पर नहीं मिलनी चाहिए.इस्लाम ऐसे दहशतगर्दों के लिए कठोरतम सज़ा की हिमायत करता है.मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के कारण इस्लाम की थोड़ी-बहुत जो समझ, और संस्कार ने जो तमीज दी है , उसके आधार पर मैं सबसे पहले मुसलामानों से अपील करता हूँ की आप आगे आयें और इस्लाम को बदनाम करनेवाले इन दहशतगर्दों के विरुद्ध जिहाद करें.अपने सभी संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए, पूरी शक्ती के साथ आतंकवादियों का मुकाबला कीजिये,आतंकवाद की कमर तोड़ दीजिये.आपके प्यारे नबी की हदीस है ; वतनपरस्ती ॥ अपने वतन की तरफ़ बुरी नज़र से देखने की कोई हिमाक़त करे तो उसकी आँख फोड़ दीजिये।

जिहाद वो नहीं जैसा नाम-निहादी कर रहे हैं बल्कि उनके ख़िलाफ़ खड़े होना जिहाद है।
इस्लाम में जिहाद
बे-ईमानी के विरुद्ध ईमानदारी के लिए संघर्ष।
असत्य के विरुद्ध सत्य के लिए संघर्ष।
अत्याचार, ज़ुल्म, खून-खराबा और अन्याय के विरुद्ध सद्भाव, प्रेम, अमन और न्याय के लिए संघर्ष।
अब कुरान क्या कहती है:
...जो तुम पर हाथ उठाए , तुम भी उसी तरह उस पर हाथ उठा सकते हो,अलबत्ता ईश्वर से डरते रहो और यह जान रखो कि ईश्वर उन्हीं लोगों के साथ ही जो उसकी सीमाओं के उलंघन से बचते हैं।
२:१९४
....उन लोगों से लड़ो,जो तुमसे लड़ते हैं, परन्तु ज्यादती न करो।अल्लाह ज्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता.
२:१९०
....और यदि तुम बदला लो तो बस उतना ही ले लो जितनी तुम पर ज्यादती की गयी हो. किन्तु यदि तुम सबर से काम लो तो निश्चय ही धैर्य वालों के लिए यह अधीक अच्छा है।
१६:२६
शान्ति, सलामती इस्लाम की पहचान रही है.जभी आप एक-दूसरे से मिलने पर अस्सलाम अल्लैकुम यानी इश्वर की आप पर सलामती हो , कहते हैं.आप कुरान की ये आयत जानते ही हैं:
जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सभी इंसानों को जीवनदान दिया।
५:३२


मुंबई के हादसे पर इंसानियत आपसे सवाल करती है.यूँ देश के तमाम मुस्लिम संस्थाओं, इमामों और उल्माओं ने घटना की कठोर निंदा के साथ दोषियों को सख्त से सख्त सज़ा की मांग की है.समय-समय पर एक मुस्लिम संघठन आतंकवाद-विरोधी जलसा वर्ष-भर से जगह-जगह आयोजित करता रहा है.किसी संगठन ने कभी अमन-मार्च भी निकालाथा .लेकिन महज़ निंदा और जलसे जुलुस से अब कुछ नहीं होने वाला अब ज़रूरत खुलकर आतंकवादियों का मुकाबला करने की है.पास-पड़ोस में पनप रही ऐसी किसी भी तरह की मानसिकता को ख़त्म करने की.सरकार और पुलिस को सहयोग करने की.संसार के सामने प्रमुख चुनौतियों में से एक है आतंकवाद!जिसका समूल नाश बेहद ज़रूरी है॥ वसुधैव कुटुंब बकम .ये हमारी विरासत है।
और पगैम्बर मुहम्मद की ये हदीस हमारा ईमान :
सम्पूर्ण स्रष्टि इश्वर का परिवार है.अतःइश्वर को सबसे प्रिय वो है जो उसके परिवार के साथ अच्छा व्यव्हार करे।


भाई आवेश ने इसे नेटवर्क 6 पर भी पेस्ट किया है.यहाँ भी पढ़ सकते हैं.
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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)