बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 12 मार्च 2013

जगन्नाथ ने लिखा था पाक का पहला क़ौमी तराना

जगन्नाथ आज़ाद (5दिसंबर 1918-24 जुलाई 2004)

 

 

 

 

 

 

 

जिन्ना की ख्वाहिश 

पर लिखा 

 

हुसैन कच्छी की क़लम से

वर्ष 2004 में उर्दू के मशहूर शायर जगन्नाथ आज़ाद के इंतक़ाल के बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान के साहित्यिक जगत में एक नयी बहस का आगाज़  हुआ कि दिवंगत शायर ने पाकिस्तान का पहला क़ौमी  तराना (राष्ट्र गीत) लिखा था।  तराना उन्होंने क़ायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना की ख्वाहिश पर लिखा था। 24 जुलाई, 2004 को जगन्नाथ आज़ाद  की मौत हुई। उसके  बाद उनकी जिंदगी में किया गया एक इंटरव्यू सामने आया, तो यह बात जाहिर हुई. उस वक्त तक बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी थी.
आजाद कहते हैं कि जब पूरा उपमहाद्वीप बंटवारे से पहले की फसाद की लपेट में था, मैं लाहौर में रहता था और एक साहित्यिक पत्रिका से जुड़ा था. मेरे तमाम रिश्तेदार हिंदुस्तान जा चुके थे, मेरे लिए लाहौर छोड़ना बहुत तकलीफ देनेवाली बात थी. लिहाजा, मैंने लाहौर में ही ठहरने का फैसला किया.
दोस्तों ने मेरी हिफाजत का जिम्मा लेते हुए मुझे पर लाहौर में ही रहने के लिए जोर दिया. नौ अगस्त,1947 की सुबह रेडियो लाहौर में काम करनेवाले मेरे एक दोस्त ने मुझे तक यह पैगाम पहुंचाया कि कायदे आजम चाहते हैं कि पाकिस्तान का कौमी तराना उर्दू का बड़ा जानकार कोई हिंदू लिखे और इसके लिए उन्होंने आपका नाम तय किया है.

मुझे इतनी जल्द यह काम करना मुश्किल लगा, तो मेरे दोस्त ने मुझे कायल रहने के लिए कहा कि यह प्रस्ताव मुल्क की सबसे बड़ी शख्सीयत की जानिब से है, इसलिए इनकार न करें.
मैंने हामी भर ली. हालांकि, मैंने यह भी कहा कि इस वक्त लाहौर में मौलाना ताजवर नजीबाबादी, सैयद आबिद अली आबिद, सूफी गुलाम मुस्तफा तबस्सुम, अब्दुल मजीद सालिक, हफीज जालंधरी जैसी बड़ी हस्तियों सहित फैज अहमद फैज जैसे मुझसे सीनियर शायर हजरात की मौजूदगी में यह तराना मुझसे ही क्यों लिखवाना चाहते हैं, तो उन्होंने बताया कि कायदे आजम की यही ख्वाहिश है.
खैर, मैंने कम वक्त में एक तराना लिख कर उनके हवाले करके जिन्ना साहब की खिदमत में रवाना कर दिया, जिन्होंने उसे पसंद करके अपनी मंजूरी दे दी. इसे पहली बार रेडियो पाकिस्तान कराची में गाया गया, जो उन दिनों देश की राजधानी थी.
मैं बंटवारे के दिनों में लाहौर में ही था कि पंजाब के दोनों हिस्सों में हालात हद से ज्यादा खराब होते चले गये. मेरे दोस्तों ने मन के साथ मुझसे दरख्वास्त की कि अब मुझे हिंदुस्तान हिजरत कर जाना चाहिए, क्योंकि इन हालात में मेरी हिफाजत में वे असमर्थ महसूस कर रहे हैं. दोस्तों के मशविरे पर मैंने अमल किया और हिंदुस्तान चला आया!
जो तराना आजाद ने तैयार किया था, वह डेढ़ बरस तक पाकिस्तान के कौमी तराने के तौर पर प्रसारित होता रहा. कुछ लोगों का कहना है कि यही तराना 1954 तक इस्तेमाल में रहा, बाद में हफीज जालंधरी का तराना मंजूर होकर पाकिस्तान का कौमी तराना बन गया.
जिन्ना के इंतकाल के बाद से ही एक नये तराने की तहरीक शुरू हुई और अनेक शायरों के तरानों को जांचने परखने के बाद आखिर 1954 में हफीज जालंधरी का तराना मंजूर किया गया, जो अब पाकिस्तान का कौमी तराना है. जगन्नाथ आजाद और उनके तराने के समर्थन में 13 अगस्त, 2006 को पाकिस्तान के अंगरेजी अखबार डान (DAWN) में यौमे आजादी के एक दिन पहले मेहरीन एफ अली का लेख A Tune to die for शीर्षक से छपा था.
अपने लेख में मेहरीन लिखती हैं कि आजादी के पांच दिन पहले कायदे आजम ने लाहौर में रह रहे जगन्नाथ आजाद नाम के हिंदू जो उर्दू के शायर थे, को पाकिस्तान का कौमी तराना लिखने का प्रस्ताव दिया था और जो कायदे आजम की मंजूरी के बाद रेडियो पाकिस्तान से प्रसारित होता रहा.
तीन मई, 2009 को पाकिस्तान के एक दानिश्वर जहीर किदवई ने Wind mills नामी अपनी वेबसाइट में दर्ज किया कि आजादी के वक्त उनकी उम्र सात बरस की थी और उन्हें रेडियो पाकिस्तान से जगन्नाथ आजाद का लिखा तराना सुना जाना याद है. जहीर किदवई को तराने में शुरू की लाइनें ही याद हैं.
पांच जून को आदिल अंजुम ने अपनी वेबसाइट pakistaniat.com पर ब्लॉग कर इस विषय पर तफसील से लिखा है. आदिल अंजुम ने जगन्नाथ की जिंदगी पर रोशनी डाली है. ब्लॉग में जगन्नाथ की आवाज की रिकॉर्डिंग को शामिल करने से आदिल अंजुम की वेबसाइट को बहुत शोहरत मिली और फिर पाकिस्तान की सरकारी एयरलाइन पीआइए की मैगजान (पत्रिका) ‘हमसफर’ - (जुलाई-अगस्त 2009) में खुशबू अजीज का एक रिपोर्टनुमा लेख pride of pakistan छपा, जिसमें खुशबू ने इतिहास में कहीं गुम हो रहे इस वाकया को उजागर किया है.
हमसफर का यह अंक लाहौर-कराची उड़ान के दौरान जानी-मानी महिला पत्रकार बीना सरवर की नजर से गुजरा, जिन्होंने अखबार डान सहित दूसरी वेबसाइटों पर अपने ब्लॉग में आजाद के तराने को पाकिस्तान का पहला कौमी तराना बताया. अखबार डान में Archive में जाकर 19 सितंबर, 2009 को छपे उनके लेख Another Time Another Anthem को देख लीजिए.


ऐ सर ज़मीन-ए-पाक  

ज़र्रे-ज़र्रे  हैं आज सितारे से ताबनाक 

रौशन है कहकशां से कहीं आज तेरी ख़ाक 

तुन्दीये हासिदां पे है ग़ालिब तेरा सिवाक
दामन वो सिलगया हैं जो था मुद्दतों से चाक

ऐ सर ज़मीन-ए-पाक  
अब अपने अज्म को है नया रास्ता पसंद
अपना वतन हैं आज जमाने में सरबुलंद
पहुंचा सकेगा इसको न कोई भी अब गजंद
अब हमको देखते हैं अतारो यो या समाक

ऐ सर ज़मीन-ए-पाक  
उतरा है इम्तिहां में वतन आज, कामयाब
अब हुर्रियत की जुल्फ नहीं महवे पेचो ताब
दौलत है अपने मुल्क की बेहद्दों बेहिसाब
मगरिब से हमको खौफ न मशरिक से हमको बाक

ऐ सर ज़मीन-ए-पाक  
अपने वतन का आज बदलने लगा निजाम
अपने वतन में आज नहीं है कोई गुलाम
अपना वतन है राहे तरक्की पे तेजगाम
अब इत्र बेज हैं हवाएं थीं जहरनाक

((प्रभात ख़बर  के लिए लिखा गया))

(लेखक-परिचय:
जन्म: 19 जुलाई 1949, झारखंड के रांची में
ज्ञान: उर्दू, हिंदी, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी ज़बानों के अलावा अदब इतिहास, संस्कृति के जानकार
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर कविता, व्यंग्य प्रकाशित। साथ ही खोजी रपट
संपर्क: +919334420618 )
 

 

 

 


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रविवार, 10 मार्च 2013

खनकती हुई धूप में, जहाँ दिल है मेरा



 
 
 
 
 
 
 
पंखुरी सिन्हा की क़लम से

आख़िरी अट्टहास 


अब वह आगे बैठी,
टेलीविज़न के,
हँस रही है,
एक हँसी,
एक बेहद राजनीतिक हँसी,
करती हुई दिन का हिसाब,
जैसे लिखती हुई उसपर अपना नाम,
हंसती हुई दिन का आखिरी अट्टहास,
दिन की आखिरी हंसी,
हर दिन हो जैसे उठा पटक,
हर दिन एक अभियान,
नहीं हो कोई सम्मिलित हंसी,
कोई सचमुच साथ का ठहाका,
और उसे इज़ाज़त नहीं लेनी हो,
बैठकर टेलीविज़न के आगे राजनीती करने के लिए,
किसी से,
हों उसके कुछ बहुत पैत्रिक अधिकार,
उस पितृसत्ता में,
जिसमे कार्यरत वह,
जिसका हिस्सा वह,
इज़ाज़त नहीं लेनी हो उसे,
किसी से,
राजनीती करने के लिए,
टेलीविज़न के आगे,
घर में काम करने वाली,
नौकरानी की तरह,
जो बैठती है घंटों,
टेलीविज़न के आगे,
और उठ नहीं पाती,
नहीं कहती,
मालिक के दिए खाली समय को,
और लोग भी नहीं कहते,
लेने वाले,
देने वाले,
रिश्वत खाने वाले,
खिलाने वाले,
और वो जिनसे ले लिया जाता है,
बहुत कुछ,
दर किनार कर हक उनका,
और वो नहीं कह पाते,
पता भी नहीं होता उन्हें,
उनके हक दरकिनार कर दिए जाए हैं,
सिर की एक हामी के साथ,
मीठी मुस्कुराहटों के साथ,
बातों के बीच, ठहाकों के बीच।
 
 
चौराहा

उस
खनकती हुई धूप में,
जहाँ दिल है मेरा,
और जख्मी भी,
इतना निरंतर है वार उनका,
सबका, हर किसी का,
चौराहा इतना खूबसूरत,
कि जान दी जा सकती थी,
अब भी दी जा सकती है,
अगर यही मंज़ूर तुम्हे,
अगर जान ही मेरी चाहते हो तुम,
तो उस चौराहे पे मारना मुझे,
मेरे घर से निकलकर,
पड़ने वाली पहली लाल बत्ती का चौराहा,
सब कुछ शुरू होता है वहां से।

मेरी पश्तो

मुझे तो बिल्कुल नहीं आती पश्तो,
न डोगरी, न कुमाऊँनी,
न गढ़वाली,
मुझे तो बिल्कुल नहीं आता,
पहाड़ चढ़ना,
कोई इल्म नहीं मुझे ढलान का भी,
न गुफाओं का, न कन्दराओं का,
वो लोग जो पाठ्यक्रम से ज्यादा जानते हों,
हिन्दुकुश और काराकोरम का भूगोल,
वो बता सकते हैं, खैबर और गोलन के रास्ते,
ऊंचाई कंचनजंघा की, शिवालिक की तराईयाँ,
और बता सकते हैं, एक से दूसरी जगह पहुँचने के तरीके,
उस एक से दूसरी जगह,
जिनके बीच सरहद पड़ती हो।

सियासी एक आवाज़

सियासी एक आवाज़
अगर आपसे ऐसी कुछ मांगें करती हो,
कि क़त्ल करना पड़े,
आपको अपना हर प्रेमी,
हर प्रेम,
और प्रेमी के होने का हर मंसूबा,
कुछ ऐसे नामांकन हों,
आपका प्रेमी बनते ही,
गुप्तचर सेवा में उसका,
आप ही पर नज़र रखने के लिए,
बताने के लिए तमाम घरेलू आदतें आपकी,
तो कैसे मुखातिब हुआ जाये,
इस सियासत से?
कब और कहाँ?
कैसे पेश की जाये बात अपनी?

(परिचय:
जन्म:18 जून 1975
शिक्षा:एमए, इतिहास, सनी बफैलो, पीजी डिप्लोमा, पत्रकारिता, पुणे, बीए, हानर्स, इतिहास,   इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
अध्यवसाय:  कुछ वर्ष प्रिंट व टीवी पत्रकारिता
सृजन: हंस, वागर्थ, पहल, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम, वसुधा, साक्षात्कार, आदि पत्र-पत्रिकाओं और वेब पोर्टल में रचनायें।
'कोई भी दिन' और 'क़िस्सा-ए-कोहिनूर', कहानी-संग्रह, ज्ञानपीठ से प्रकाशित। कविता-संग्रह 'ककहरा', शीघ्र प्रकाश्य,
सम्मान: 'कोई भी दिन', को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान, 'कोबरा: गॉड ऐट मर्सी', डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यूजीसी, फिल्म महोत्सव में, सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला। 'एक नया मौन, एक नया उद्घोष', कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार के अलावा 1993 में, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान.
सम्प्रति:‘डिअर सुज़ाना’ शीर्षक कविता-संग्रह के साथ, अंग्रेज़ी तथा हिंदी में, कई कविताओं पर काम, न्यू यॉर्क स्थित, व्हाइट पाइन प्रेस की 2013 कविता प्रतियोगिता के लिए, 'प्रिजन टॉकीज़',
शीर्षक पाण्डुलिपि प्रेषित, पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम।
संपर्क:
sinhapankhuri412@yahoo.ca)




 
 
 

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शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

आओ! आज नई कविता लिखें













 मानसी मिश्रा की क़लम से


1.
आओ!
आज नई कविता लिखें
सूरज चाँद की उपमाओं से परे
जो नाचे भूख की परिधि पर
गोलगोल घूमकर केंद्र पर आये
अर्धवृत्ताकार चेहरों को घूरे
उन्हें चिढाये, मुह बिचकाए।

एक रात जागी कविता नहीं
नींद में चलती कविता लिखें.

न हो लघु- दीर्घ संधियाँ तो क्या
अलंकारों को भरमाये, लजाये।

नदी संग बहती कविता नहीं
समंदर पर तैरती कविता लिखें
आओ!
आज नयी कविता लिखें.

2.


ज़िन्दगी
तू एक अदालत
मैं मुवक्किल
कितने बरस हो गए
एक मुक़दमा डाला था।
तू देती है
तारीख पर तारीख
नहीं होती सुनवाई
कब तक इन्साफ की बाट जोहूँ
तूने तराजू में लटका दिया है
एक तरफ मेरा दिल
दूसरे में दो आँखे
दिल भारी पड़ता है
तो आँखे भर आती हैं
आँखे रिसती हैं तो
दिल मचल पड़ता है.. और
तू कानून का हवाला देकर
फिर लौटा देती है खाली हाथ।

3.

तुम देखना एक दिन..
जब सारी रवायतें दम तोड़ देंगी
तो ! जी उठेगा प्यार
और जी उठेंगे हम-तुम
जी उठेंगे वो, जिन्हें
जबरन सुला दिया है।
न पत्थर मुंह चिढ़ायेंगे
न इंसान पथरायेंगे
न ज़िन्दगी सुनसान होगी
न मौत आसान होगी
बस आसान होगा सांस लेना
खुलकर हँसना, हँसते जाना
रूठना-मनाना, मुस्कराना
..और चलते जाना।

4.
तुम्हारी क़लम
मेरा नाम
न लिख सकी
तो क्या!!..
तुम्हारा नाम
शुरू मुझसे
ख़त्म
मुझसे है।

क्यूँ लगता है
तुम्हारे अल्फाजो में
ज़िक्र मेरा है
तुम्हारे लहजे में
रंग मेरा है..
तुम्हारे लफ्जों में
हैं मानी ज़िन्दगी के।

तुम जिंदा शायर हो
मेरे ज़ेहन में सही
ज़िंदा हो मुझमे.
मेरी ज़िन्दगी तक.

5.

मेरी लड़ाई किसके खिलाफ है
आधी रात के सन्नाटे
या मुर्दा सपनो से।
जिंदा चेहरों से है या
मेरे ही अपनों से।
फिर लगा शायद लड़ाई
ज़ंग लगी दीवार से है
धोखे या प्यार से है
या उन पहरों से है
जहां घुटी है मुस्कान
जैसे शीशे का मकान
लड़ाई, तुमसे भी तो है
इन आँखों की नमी से ...
तुम्हारी हरेक कमी से .
हाँ, मानती हूँ मैं कि..
बस खुद से लड़ नहीं पाई
तभी किसी मोर्चे पर
जमकर अड़ नहीं पाई।


6.

दफ़न आवाज़ और,
दिल की घुटन से पैदा शोर
मैं ही तो हूँ!
दिल, दिमाग और,
हर पल तुम्हारे चारों ओर,
मैं ही तो हूँ !
जगा ख्वाब और,
भीगी भीगी पलकों की कोर,
मैं ही तो हूँ!
घना जंगल और,
अपनी धुन में नाचता मोर,
मैं ही तो हूँ!
ये सुर्ख चेहरा और,
तुम्हारी रग-रग, पोर-पोर,
मैं ही तो हूँ!!

7.
..अकेला प्रेम।।
इन दिनों,
एक फुफकारते नाग सा
मणि तलाश रहा है
जिसे वो
एक अप्सरा के माथे पर
जड़कर भूला था,
आजकल
वो टटोलता है
हर माथा,
खोजता है वही
चमकदार
अनमोल मणि
कभी
ज्ञान के सम्मोहन से
कभी रूप
कभी बुद्धि से
कभी अनजान
कभी दीवाना बनके
लगाता है हज़ार बोलियाँ
पहुंचता है
औरतों के माथे तक
अफ़सोस....
ये वो अप्सरा नहीं
जो माथे पर
प्रेममणि मढ़कर
भाग रही है
खुद को बचाने के लिए
बाज़ार के जौहरियों से.....
औरत जात जो ठहरी।।।
(अकेला प्रेम।।। ....सौ बोलियाँ।।।। ...हज़ार तराजू ।।।)

अंदाज़ शायराना ज़रा-ज़रा

मैंने दर्द लिखना चाहा

सामने उबलती नदी आ गयी।
याद लिख्जने लगे, तो उसका पानी

आन्क्ल्हों में छल-छल करने लगा।
जबकि दिल सहरा ही रहा!
.....
मैं  ख्याल बनकर तेरे ज़ेहन में चस्पाँ हूँ

खुरदुरी सतह पे कभी इश्तहार नहीं लगते!
.....

रोज़ आते हो तुम यादों का तलातुम लेकर
आंसुओं के बाँध से टकराकर चले जाते हो!
साथ बैठो तो कभी, कि समझौता  करें
रोज़ के खेल से तुम कैसे बहल जाते हो!
.......



नैनों के बाँध बड़े कच्चे
दो पल में ढलने वाले हैं।
आओ पहलू में बैठो तुम
हम कुछ तो कहने  वाले हैं!
......
फिर रात की रानी महकी है।
कोई आग पुरानी दहकी है।
कुछ आज तो खुल कर बोलेंगे
जो गुमसुम रहने वाले हैं।
हर एक सलीक़ा छोडो भी
बातों का रुख मोड़ो भी
बस आंसू बहने वाले हैं!



(कवि-परिचय:
जन्म: 31 मार्च को कानपुर में।
शिक्षा: प्रारम्भिक पढ़ाई घाटमपुर कस्बे से। स्त्री-अध्ययन में स्नातकोत्तर, लखनऊ विवि से।
           मॉस कॉम भी।
सृजन: अखबारों के लिए प्रचुर लिखा। कई विशेष रपट के लिए मिली पहचान।
सम्प्रति: दैनिक हिन्दुस्तान के मेरठ संस्करण में। 
संपर्क:mansimeets@rediffmail.com)











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रविवार, 13 जनवरी 2013

हुगली किनारे विवेक का आनंद

फोटो:संदीप नाग
बेलुर मठ का रंग अजूबा 

सैयद शहरोज़ कमर की क़लम से

हुगली में सूरज डूब रहा है। उसकी ज़र्दी  ने स्नेहा  चौधरी की सांवली  रंगत को और  सुनहरा बना  दिया है। स्नेहा स्वामी विवेकानंद के कमरे के सामने ध्यान मग्न है। यह ज़र्दी उनके बिस्तर की चादर पर भी पसरी है। सिरहाने तकिये के सहारे टिकी स्वामी की तस्वीर को टुक देखती स्नेहा की श्रद्धा और उल्लास को दायें-बांये गुलदान में सजे ताज़ा फूल मोअत्तर कर देते हैं। यह खुशबू दुनिया के सारे युवाओं को यहाँ खींच लाती है। स्नेहा गुहावटी से हैं। डॉ कविता और दिनेश वर्मा देहरादून से आये हैं। वहीँ एनिमेशन फ़िल्म बनाने वाले अबीर धनबाद से।

इस भवन में सदी के महापुरुष स्वामी विवेकानंद 1898 से अपनी अंतिम समाधि 4 जुलाई 1902 तक रहे। भवन के सामने आम्र-वृक्ष के नीचे आगंतुकों से मिलते थे।  महज़ एक खाट  ही उनका आसन  होता था। इस पेड़ को अभी ईंट के तीन स्तंभ ने संभाले रखा है। यह दरख्त तुरंत युवा नरेन के विशाल व्यक्तित्व की तरह  उभरता है। और विश्व के युवाओं को अच्छादित कर देता है। जबकि यह तीन पिलर स्वामी के परिवर्तन कारी  विचारों को रौशन। इसकी दमक बेल्लुर मठ द्वार खुलने के इंतज़ार में खड़ी नौजवानों की असंख्य भीड़ में साफ़ दीखती है। उठो, जागो और तब तक रुको नहीं, जब तक तुम्हीं मजिल न मिल जाए। उनके इसी त्रिदृष्टि ने देस-दुनिया के युवाओं के चेहरे-मोहरे बदल दिए।
स्नेहा दिल्ली विवि से मॉस कॉम कर रही हैं, उन्हें स्वामी जी का यह कथन हर समय प्रेरित करता है,अपने आप में विशवास करो, जो खुद को नहीं जानता वो ही नास्तिक है।
डॉ कविता दून में मेडिकल प्रैक्टिस करती हैं, कहती हैं, विवेकानंद कहते थे: असफलताओं की चिंता मत करो।यह होना है, लेकिन जीवन का सौन्दर्य यही तो है। स्वामी के हवाले से बोलती हैं, जीवन में संघर्ष नहीं तो बेकार है। कामयाबी तभी मिलती है। इसी सूत्र ने विपरीत हालातों में भी उन्हें हतोत्साहित नहीं किया। उनकी पढाई के सामने आर्थिक  अडचनें पार होती गयीं। वहीँ, धनबाद के अबीर कहते हैं, उन्होंने स्वामी की एक बात गांठ बाँध ली है। वो कभी कमजोरी की चिंता नहीं करते। हमेशा शक्ति का विचार करते हैं। 
उत्सव सेनगुप्ता खड़गपुर से आये हैं। रामकृष्ण परमहंस के प्राचीन मंदिर की सीढियां उतरते हुए, उनके पग में विश्वस्त तेज है। इस मंदिर में परमहंस ने 1899 तक पूजा की। यहीं शारदा देवी और विवेकानंद ने भी धुनी रमाई थी। उत्सव विवेकानंद को दोहराते हैं, स्नायु को मज़बूत बनाओ। अपने पैर पर खड़े होने में ही कल्याण है।
हुगली किनारे दो नाव आकर रूकती है। वहीँ मुख्य द्वार से फिर एक रेला अध्यात्म की चाह में मठ परिसर में प्रवेश करता है। यह लहर सिर्फ हुगली की नहीं है, न ही महज़ धर्म का प्रवाह है। यहाँ आने वाले गुरु-शिष्य परम्परा के एतिहासिक उदाहरण को नमन करने आये हैं।  मुख्य मठ में पूजा शुरू हो गयी है। सुबह पहली पूजा में स्थानीय भक्त होते हैं। लेकिन अब तो पंजाब, बिहार और केरल के लोग भी हैं। इससे पहले माँ शारदा और ओम के मंदिर में मत्था टेकना श्रद्धालु नहीं भूलते। 
मोनिशा मंडल, बीए को गिला है कि  युवाओ के आदर्श विवेकानंद को समुचित ढंग से न समझा गया, न ही प्रचारित किया गया। उन्होंने कहा कि स्वामी ने दलित संस्कृति-समाज को अहमियत दी। वे हर चीज़ को तर्क की कसौटी से परखते थे। मोनिशा भी मिथ्या आचरणों और आडम्बरों का विरोध करती हैं। आसनसोल की शर्मिष्ठा घोष बीकॉम में हैं। उनके लिए विवेकानंद रोल मोडल हैं। कहती हैं, करो अपने मन की। अपनी इच्छा की। शनिवार की सुबह यहाँ स्कूली बच्चों का जमावडा  होगा। परिसर के अन्दर सड़कों की मरम्मत की जा रही है। संग्रहालय के बाहर इसके सबब भीड़ है। रांची के ऋषभ को किसी तरह जगह मिल गयी है। वो हर वर्ष यहाँ आते हैं। उन्होंने विवेकानंद को पढ़ा ही नहीं, गुना भी है। इसका प्रभाव उनकी शिष्टता में साफ़ झिलमिलाता है। बी-टेक के छात्र ऋषभ आनंद को स्वामी का विदेश में दिया पहला व्याख्यान शब्दश: याद है। प्रियंका शाह भी बी-टेक कर रही हैं। सिलीगुड़ी में रहती हैं। उन्हें स्वामी जी की गुरु निष्ठा यहाँ खींच लाती है। उन्हीं के शहर के नावेशेंदु पाल ने कुछ साहित्य खरीदा है। कहते हैं कि देश को जानने के लिए ज़रूरी है। (बेलुर मठ से )

युवा दिवस पर दैनिक भास्कर के सभी संस्करणों में प्रकाशित 12.01.13


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