बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 10 जून 2012

आओ तनिक नाटक से प्रेम करें

ऐसा नहीं कह सकते कि थिएटर दम तोड़ रहा






 
















विभा रानी
सैयद शहरोज़ कमर से संवाद

लेखक किसी किरदार को जीता है..उसे किसी चित्रकार सा कागज़ ए कैनवास पर उतारता है..लेकिन लेखक ही उस किरदार को अपने अभिनय में डूबती आँखों जीवंत कर दे ...कली सी मुस्कान दे..पहली बारिश सा भिगो दे..प्राय:ऐसे रचनाकार इतिहास में मिलते हैं.लेकिन हिंदी व मैथिली में स्थापित विभा रानी ऐसी ही नाट्यकर्मी और लेखक हैं. एकपात्रीय नाटकों को उन्होंने नई ज़िंदगी अता की है. संजीव कुमार को तो वक्फा मिलता होगा ..कई रीटेक हुआ होगा..लेकिन एक ही मंच पर समानांतर बच्चा, युवा और बुज़ुर्ग की अदायगी.आप विभा के अभिनय को देख कर उंगली दबा लेंगे दांतों में...झारखंडी साहित्य संस्कृति अखडा की दावत पर ६ जून को उन्होंने रांची में बुच्ची दाई का मंचन किया. दूसरी दोपहर अखडा के दफ्तर में उनसे मिलना होता है..बिना किसी औपचारिकता के बात तरतीब पर आती है. आइये उनसे बतियाते हैं.

रंगमंच की शुरुआत
स्कूली दिनों से ही। तब पांचवी या छठवीं में रही होगी। मां स्कूल हेडमास्टर थीं। सन 1969 में महात्मा गांधी की सौवी जयंती मनाई जा रही थी। स्कूल में हो रहे नाटक में मैं हिस्सा लेना चाहती थी। मां ने मना कर दिया। आखिर मेरी जिद के आगे वह मान गईं। जब मैं एक सिपाही की भूमिका में मंच पर आई, तो अपना संवाद ही भूल गई।  मां ने पीछे से कहा, तो हड़बड़ी में अपना डॉयलाग बोल पाई। तब एकांत और और भीड़ में बोलने का अंतर समझ में आया। दर्शकों का सामना इतना आसान नहीं, जितना अपन समझते थे। इस सीख के बल पर इंटर में दस लड़कियों के साथ कई कार्यक्रम किया। जब एमए में आई। दरभंगा रेडियो के लिए कई नाटक किया। कई कार्यक्रम किये। बड़े मंच पर सन 1986 में पहली बार राजाराम मोहन पुस्तकालय, कोलकाता में नाटक का मंचन किया। शिवमूर्ति की कहानी कसाईबाड़ा का यह नाट्य रूपांतर था। खूब पसंद किया लोगों ने। उसके अगले ही वर्ष 1987 में मशहूर नाटककार एमएस विकल के दिल्ली नाट्योत्सव में हिस्सा लिया। दुलारीबाई , सावधान पुरुरवा, पोस्टर, कसाईबाड़ा आदि नाटकों में अभिनय किया। उन्हीं की टेली फिल्म चिट्ठी में काम किया। फिर एक्टिव रंगमंच से पारिवारिक कारणों से किनारे रही। वर्ष 2007 में पुन: एक्टिव थिएटर में आई। मुंबई में मिस्टर जिन्ना नाटक किया। इसमें फातिमा जिन्ना की भूमिका निभाई।

एकपात्रीय नाटक की ओर झुकाव
मुंबई में नाटकों के कई रंग हैं। ज्यादातर कमर्शियल नाटक होते हैं वहां। उसमें कंटेंट नहीं होता। कुछ फिल्मी नाम होते हैं। टिकट बिक जाती है। एकपात्रीय नाटक भी हो रहे हैं, लेकिन अच्छे नहीं। मेनस्ट्रीम में नहीं हैं। मैं इंटर में सबसे पहेल एकपात्रीय नाटक कर चुकी थी। उसकी कहानी एक ऐसी लड़की की थी, जो शादी में अपने घारवालों से दहेज की मांग करती है। मुंबई में मैंने इसे आंदोलन के रूप में शुरू किया। लाइफ ए नॉट अ ड्रीम। यह मेरा पहला मोनो प्ले था। फिनलैंड में इसे करना था। अंग्रेजी में लिखा और वहीं 2007 में अंग्रेजी में मंचन किया। मुंबई में भी चार शो इसके अंग्रेजी में ही किए। हिंदी में इसे रायपुर के फेस्ट में 2008 में किया। उसके बाद सिलसिला चल पड़ा। मुंबई के काला घोड़ा कला मंच के लिए हर साल एक मोनो प्ले कर रही हूं। बालिका भ्रूण हत्या पर 2009 में बालचंदा, 2010 में बिंब-प्रतिबिंब, 2011 में मैं कृष्णा कृष्ण की और इस वर्ष रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी पर आधारित भिखारिन का मंचन किया।

रंगमंच की मौजूदा स्थिति
गांव, कस्बे और शहरों में भी लोग सक्रिय हैं। अपने अपने स्तर से रंगमंच कर रहे हैं। आप ऐसा नहीं कह सकते कि थिएटर दम तोड़ रहा है। यह स्थिति संतुष्ट करती है। हां! यह जरूर कह सकते हैं कि रंगमंच को वैसी स्वीकृति अभी नहीं मिली, जैसी और देशों में है। थिएटर को प्रश्रय नहीं दिया जाता है। उसे प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। कई सुविधाएं मिलती भी हैं, तो इसका लाभ महज बड़ लोग ही उठा पाते हैं।

कैदियों के बीच
कई ऐसे कैदी हैं। जिन पर आरोप साबित नहीं हुआ है। वे जेल में बंद इसलिए हैं कि कोई उनका केस लडऩे वाला नहीं होता। कई महिलाएं हैं अपने छोटे बच्चों के साथ। मेंने 2003 से उनके बीच काम करना शुरू किया। बेहद सकारात्मक असर मिला। उनके बीच साहित्य, कला और रंगमंच की बातें की। उन्हीं के साथ मिलकर नाटक किए। उनसे कहानी कविता लिखवाई। पेंटिग्स करवाई। मुंबई के कल्याण, थाणे, भायखला और पुणे के यरवदा आदि जेलों में वर्कशाप भी किया। बहुत अच्छा अनुभव मिला।

सामाजिक बदलाव में रंगमंच
रंगमंच ऐसा टूल है जो व्यक्ति को बदलता है। व्यक्ति समाजिक प्राणी ही है। वह बदलता है, तो समाज में उसका असर होता है। दूसरे लोग भी बदलने का प्रयास करते हैं। यह परिवर्ततन सकारात्मक है, तो स्वाभाविक है, उसका व्यापक असर पड़ता है।

पहला नाटक कब लिखा
सन 1996 97 का सन रहा होगा। दूसरा आदमी, दूसरी औरत। इसका मंचन मुंबई में किया।

संतोष कहां, साहित्य या रंगमंच ?
दोनों का सुख अलग है। लेकिन सच कहूं तो निश्चित ही रंगमंच में मुझे अधिक तसल्ली मिलती है। यहां आप हजारों लोगों से एक ही समय रूबरू होते हैं। अपनी बात पहुंचाते हैं। उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत ही मिल जाती है। इसका सामाजिक प्रभाव पड़ता है।

लेखन पहले मैथिली में या हिंदी में
कहानी हो या नाटक। दोनो भाषाओं में अलग अलग लिखती हूं। बुच्चीदाई पहले मैथिली  में ही लिखा। अंतिका में छपा था। बाद में
इसका हिंदी रूपांतरण नवनीत में प्रकाशित हुआ।

नया नाटक
'आओ तनिक प्रेम करें' लिखा है। इसका मंचन अगस्त में हिसार में करने जा रही हूं। इसकी कहानी दो ऐसे पति पत्नी की है, जिनकी उम्र अब साठ पर पहुंची है। पति को अब सालता आता है कि प्रेम का अनुभव उसे तो हुआ ही नहीं।

नई किताब
'कर्फ्यू में दंगा' नामक कथा संग्रह अभी रेमाधव से छपकर आया है।

यह बातचीत भास्कर के लिए की गयी


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शनिवार, 9 जून 2012

कितना अपना क्रांतिकारी योद्धा बिरसा का अबुआ दिशुम

यूँ उड़तीं धरती आबा के सपनों की किरचियाँ 

फोटो गूगल से साभार





















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

उन्नीसवीं सदी के  अंत में झारखंड के पहाड़ी इलाके में एक  क्रांतिकारी  युवा ने अपने राज का बिगुल फूंक  दिया था। अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडु जना (अपना राज आ गया, महारानी का राज खत्म हो गया)। उसे अपने वचन पर दृढ़ विश्वास था। सूरज सा भरोसा कि हमारी रोशनी हर अंधकार को दूर कर देगी। उसके  शौर्य,  साहस और संगठन बल उसकी ईमानादारी की तरह ही अटल थे। उसके  जादुई व्यक्तित्व में समूचा इलाका झिलमिलाने लगा। खुशियों में जंगलों में हरियाली छाई। उनकी झरनों सी सांगीतिक  वाणी पर लोग जुड़ते गए। कारवां बढ़ता गया। अंग्रेजी सेना के साथ कई मुकाबले हुए। विदेशी हुक्मरानों के दांत खट्टे हुए। उसे धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया। महज 25 साल की उम्र में यह रणबांकुरा रांची जेल में 9 जून 1900 को शहीद हो गया। इस बांके  बहादुर नौजवान का नाम बिरसा मुंडा था। उन्हें धरती आबा यानी भगवान  का दर्जा मिला। लेकिन इस भगवान कहे पर हमने चलना गवारा न किया। उनके ही सपनों को साकार करने के लिए झारखंड बना। लेकिन हम उनकी बातों पर कितना अमल कर पाए। सरसरी दृष्टि भी दी जाए तो परिणाम शून्य ही आता है।

धरती आबा ने कहा था

1. ईली अलोपे नुआ।
(हडिय़ा का नशा मत करो।)
2. सोबेन जीव ओते हसा बीर कंदर सेवाईपे

(जीव जंतु, जल, जंगल, जमीन की सेवा करो।)

3. होयो दु:दुगर हिजुतना रहड़ी को छोपाएपे

(समाज पर मुसीबत आनेवाली है, संघर्ष के लिए तैयार हो जाओ।)

4. हेंदे रमड़ा केचे केचे, पुंडी रमड़ा केचे

(काले गोरे सभी दुश्मनों की पहचान कर उनका मुकाबला करो।)

शराब के  कारोबार में इजाफा
कहा जाता है कि हडिय़ा का सेवन आदिवासियों में आम है। कुछ लोग इसे उनकी संस्कृति  का एक अंग ही मान बैठे हैं। लेकिन धरती आबा को हडिया़ से बहुत चिढ़ थी। उन्होंने स्पष्ट इसके सेवन की मनाही की । कहा, ईली अलोपे नुआ (हडिय़ा का नशा मत करो)। लेकिन हर गांव, शहर और राजधानी तक में नशा का बाजार लगा है। नए राज्य के बनने के बाद शराब की दुकानों की संख्या सुरसा की भांति बढ़ गईं। हडिया की जगह अंग्रेजी शराब ने ले ली। इसके नतीजे में कई सड़क  हादसे, हत्या, मारपीट और छेड़छाड़ की घटनाएं आम हो गईं।

क्या गीतों में सुनेंगे कोयल की कूक
कौओं और गौरयों का  कलरव अब दुलर्भ हो गया है। कोयल की  कूक भी अब गीतों में सुनी जा सकेगी। ऐसी कल्पना करना कोई कोरी भी नहीं । ऐसा इसलिए कि जंगल ही नहीं रहे। जीव जंतुओं के आशियाने को ही उजाड़ा जा रहा हो, तो वे कहां जाएं। कइयों ने कहीं और ठौर ली। वहीं कुछ घर के बिछोह में दम तोड़ गए। दूसरों के प्राण प्रदूषण ने पखेरु कर दिए। नदियों के सूखने से कई जीव जंतुओं की जान गई। सिर्फ दामोदर और उसके आसपास पनपीं जीव जंतुओं की 100 तरह की प्रजातियां प्रदूषण का ग्रास बन गईं।

सूख रही हैं नदियां, 60 प्रतिशत कंठ प्यासे
इन दिनों दामोदर को बचाने के लिए आंदोलन किये जा रहे हैं। इस नदी का महत्व इसके  नाम से ही सप्ष्ट है। दामुदा का परिवर्तित रूप ही दामोदर है। दामु का अर्थ है पवित्र और दा का जल। लेकिन हम इसकी पवित्रता को कितना बचा पाए। इस नदी में हर रोज 21 लाख घन मीटर जहरीला पानी बहाया जा रहा है। प्रदेश की लगभग सभी नदियां या तो सूख गई हैं या नाले में बदल चुकी हैं। स्वर्ण रेखा, कोयल, कांची, हरमू और दामोदर जैसी नदियां इतिहास भले न बनी हों, लेकिन उस ओर बढ़ अवश्य रही हैं। कई गांवों में लोगों को तीन से चार किमी दूर पानी के लिए चिलचिलाती धूप का सफर करना पड़ता है। महज 40 फीसदी जनता को ही पीने का पानी नसीब है। यह सरकारी आंकड़ा है। दूसरे शब्दों में अपन कह सकते हैं कि 60 प्रतिशत कंठ प्यासे हैं। ऐसा इसलिए कि झरने, नदियों को हम बचा नहीं पाए। उसका अतिरिक्त दोहन किया। अब गला तर करने के लिए चंद बूंद को विवश हैं।

1 हजार हेक्टेयर जंगल सूना, सारंडा में सूरज अब सुबह आता है
सारंडा का मतलब सौ जंगल। लेकिन सौ जंगलों का सारंडा भी अब नाम भर का रह गया है। पहले यहां सूरज की  किरणें दोपहर बाद ही पहुंच पाती थीं। लेकिन अब इसका आगमन सुबह ही हो जाता है। औद्योगिकरण ने भी इसके सुखाड़ बनने में भूमिका निभाई है। सारंडा के 40 प्रतिशत भाग में उत्खनन हो रहा है। दलमा के भकुलाकोचा, भाटिन, लोहरदगा, पलामू, गुमला के ढेरों घने जंगलों में अब पौ जल्दी ही फट जाती है। हाल में ही चुट्टुपाली घाटी से हरे पेड़ गायब हो गए। धरती आबा प्रकृति प्रेमी थे। उन्हें भान था कि जिंदगी की बहार के लिए हरियाली कितनी महत्व की है। सरकारी सूत्रों को ही माने लें तो 1 हजार हेक्टेयर जंगल का समूल नाश हो चुका है।

65 लाख हो गए जमीन से बेदखल
झारखंड में आदिवासी जमीन बचाने के लिए छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 मौजूद है। लेकिन उसके पालन का  हश्र यह है कि अब तक 65.5 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। वहीं 30 लाख ने पलायन किया। जिसमें खनन के  कारण 12.5 लाख, कारखानों के कारण 25.5 लाख, बांध 26.4 और अन्य कारणों से अपनी जमीन से 11 लाख लोग बेघर हुए। 70 प्रतिशत का पुनर्वास नहीं हो सका है। अगर पूर्व शिक्षा मंत्री व विधायक बंधु तिर्की की बात मानें तो सिर्फ राजधानी में ही हर रोज दस लोग अपनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं। जबकि सरकार हमारी है। जमीन की रक्षा के  कानून हमारे हैं। भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की  वार्षिक रिपोर्ट 2004 05 के मुताबिक देश में आदिवासी भूमि अंतरण के मामले झारखंड सबसे आगे है। राज्य में आदिवासी भूमि अंतरण के 1,04, 894 एकड़ जमीन से संबंधित 86, 229 मामले दर्ज किये गए। अभी ऐसे मामले प्रदेश में विशेष रेगयूलेशन एसएलआर कोर्ट में 12739 लंबित हैं।

दैनिक भास्कर, के झारखंड के सभी संस्करणों में ९ जून, २०१२ को प्रकाशित. पेज 13



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बुधवार, 30 मई 2012

टूट कर तो पास था जीत कर बिख़र गया



पंजाब का दो काव्य आबा 







 









 देविंदर सिंह जोहल की क़लम से

1
एक पल ग़ुफ़ा में

तेरी आंखों से
पानी किस बात पे निकला
कुछ पता ना चला

ना तू ग़मगीन थी
न हालात नमकीन थे
बस मै बोल रहा था
या शायद
मेरा अपनापन खुल रहा था
किसी ग़ुफ़ा के दरवाज़े जैसा

दरीचे पे सूर्य का पहरा था
भीतर बुझ चुके दीप की महक थी
या लौ पे जल रहे मास की दुर्गंध
यकायक तेरी आवाज़ में
न जाने कहां से क्या आया
तेरॊ उंगलियाँ छुपा रही थी
या शायद सहला रही थी
आखों की सतह पे आए मोती
उसी एक पल में
तेरा हाथ
मेरे हाथ तक कैसे आया
बस पता ही न चला
बक्त का बह पल शायद
ग़ुफ़ा के गुम्बद में बंद था

मेरी आंख
तेरी आखों में कैसे उतर गई

शायद किसी पल का भी वकफ़ा नहीं था
मौसम का मिज़ाज एक तरफ़ा नहीं था
तू नदी नहीं थी
मैं पानी कैसे हो गया
तेरे होंठ कुछ कुछ खुले
जुबान शायद ज़रा सा लर्ज़ी
मेरी धड़कन तक आवाज़ आई
प्रेम जैसा कोई लफ्ज़ था या नहीं था
अहसास की इबारत थी

उसी पल दरवज़े पे थी
ताज़ा अतीत की दस्तक 
वक्त के गुम्बद से मै यकायक बाहर था
अपनी हथेली पे
नमी के शिलालेख़ थे
------------
2
मौत की सौगात

मुझे याद से निजात दे
सकूं की एक रात दे
मैं हूं हादसों में जी रहा
मुझे मौत की सौगात दे

बदन में रूप क्या मिला
करूप दिल से हो गया
मुझे रंग भी बेरंग दे
मुझे जात भी कुजात दे

मुझे मंज़िलों का हुलास ना
मुझे रास्तों की प्यास है
लबों को नमीं की चाह नहीं
मेरी रूह को प्रभात दे

इधर भी मैं उधर भी हूं
तुझी का ही मैं घर भी हूं
रहूं पास ही जाना कहां
तू अहद की बस बात दे

मैं टूट कर तो पास था
मैं जीत कर बिख़र गया
मुझी से मुझ को छीन ले
मुझी से मुझ को मात दे
----------


पत्रकार विदुषी ऋतु कलसी के प्रति हम आभारी हैं. जिनकी बदौलत  हमें जोहल साहब जैसे बुजुर्गवार सुगढ़ कवि और उनकी इतनी अच्छी कविता मिली.अनुवाद ऋतु का ही. वह कहती हैं: देविंदर जोहल एक सवेदनशील कवि हैं उनकी कविताएं रिश्तों के नाज़ुक अहसासों को खुबसूरत लफ़्ज़ों में अभिव्यक्त करती हैं
(कवि-परिचय
जन्‍म: 13 अप्रैल १९५७
सृजन: पंजाबी की पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन। कविता संकलन के प्रकाशन की तैयारी।
सम्प्रति: आल इंडिया रेडियो जालंधर में प्रोग्राम एग्‍जीक्‍यूटिव पद पर कार्यरत।)




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शनिवार, 5 मई 2012

अरुंधति राय ने दुनिया के सामने बदशक्ल भारत दिखलाया

अच्छा है कि हिंदी में कोई अरुंधति राय नहीं है



















 अजय तिवारी

(सैयद शहरोज़ कमर से संवाद)

डॉ. रामविलास शर्मा जैसे शिखर सामाजिक, सांस्कृतिक और आलोचक का  नवीनतम पाठ प्रस्तुत करने का आपको  श्रेय दिया जाता है।
मुझे ऐसा कोई भ्रम नहीं। जब मैं सन 71 में लेखन साहित्य में सक्रीय हुआ, रामविलास जी आलोचक  के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी, जिस बात को सही समझना उसे निर्भीकता पूर्वक  कहना। इस कारण शुरुआत में वह विवादों के केंद्र  में रहे। लेकिन  आपात्तकाल के  बाद साहित्यकारों की नई पीढ़ी ने डॉ. शर्मा के महत्व को  समझा। तब पूंजीवादी प्रतिष्ठानों से लाभ उठाने वालों और श्रमिक  जनता से हमदर्दी रखने वालों के  बीच सांस्कृतिक फासला अधिक  उजागर हुआ। इसमें एक पक्ष डॉ. शर्मा विरोधियों का था। शंभूनाथ, रविभूषण, कर्मेंदु शिशिर और प्रगति सक्सेना जैसे  समकालीन आलोचक  उनके महत्व को  स्वीकार करते हैं। अवसरवादी किस्म  के लोग उनके  विरोधी रहे। उनकी स्थापनाओं की मुखालिफत करते रहे। इस प्रसंग को  सामाजक व राजनीतिक  पृष्ठभूमि में देखना व समझना चाहिए।

देश के  कई महत्वपूर्ण कवि लेखको की जन्मशती मनाई जा रही है, लेकिन सिर्फ फोकस अज्ञेय पर ही अधिक क्यों?
अज्ञेय महत्वपूर्ण कवि हैं। इसमें संदेह नहीं। केशवदास भी महत्वपूर्ण कवि हैं। लेकिन  कबीर, जायसी, तुलसी और केशव में अंतर है। जिनके लिए कबीर व तुलसी महत्वपूर्ण थे, केशव उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं। यही बात अज्ञेय, नागार्जुन व केदार के बारे में समझनी चाहिए। अचानक अज्ञेय को  लेकर बहुत से विचारकों में आत्मग्लानि की भावना जाग उठी है। वे भूल सुधार करते हुए अज्ञेय को अतिरंजित महत्व दे रहे हैं। लेकिन वे नहीं बताते कि भावी जन सांस्कृतिक  विकास में अज्ञेय किस रूप में सहायता करेंगे। समाज को बदलने का लक्ष्य वामपंथी बुद्धिजीवियों के सामने भी नहीं बचा है। इसलिए वे अज्ञेय को  अधिक  महत्व दे रहे हैं। मैं कामना करता हूं कि ये लोग कल नागार्जुन और केदार का नाम लेने में शर्मिंदगी न महसूस करें।

लेखकों व कवियों का दक्षिणपंथियों के मंच पर जाना, उनके हाथों सम्मानित होना, कितना सही है।( सन्दर्भ: मंगलेश डबराल का राकेश सिन्हा के आयोजन में शिरकत और गत वर्ष उदय प्रकाश का कुख्यात सांसद से गोरखपुर में सम्मान लेना.)
स्पष्ट कहूं तो पुरस्कार लेकर अपने विचारों को त्यागना अवसरवाद है। वहीं विरोधी मंच पर जाकर अपनी बात कहना गलत नहीं है।

कहा जाता है कि हिंदी लेखकों का जुडा़व जनता से नहीं है। हिंदी जगत में कोई अरुंधति राय नहीं है।
अच्छा है कि हिंदी में कोई अरुंधति राय नहीं है। उन्होंने यूरोपीय इच्छाओं के अनुकुल भारत की बदशक्ल तस्वीर दुनिया को दिखाई। उन्होंने कहीं न कहीं नक्सलियों का  ही समर्थन किया। मैं नक्सलियों की गतिविधियों को जन आंदोलन नहीं मान सकता। हां यह सही है कि हिंदी लेखक  कवि जमीन से, अपनी जड़ों से कट चुके हैं। जनता से उनका नाता टूट गया है। उनके नजरिये में जनता का हित नहीं है, तो हर बात हवाई होगी। सिर्फ सड़क  पर उतरना ही जनता के  साथ होना नहीं होता। आपकी  रचनाओं में आदिवासी, दलित, स्त्री और आम जन की कितनी पीड़ा और संवेदना है, यह अहम है। भारतीय समाज के हित की बात जहां होगी, मैं उसका समर्थन करूंगा।

इन दिनों कहानियों में भाषायी बत्तंगड़ अधिक देखने को आता है
जब कहानीकार जनता से कटे होंगे, तो वे बाजार का ध्यान आकर्षित करेंगे ही। इसलिए कहानी में विषय वस्तु की जगह वर्णन शैली प्रधान हो जाएगी। आज कहानियों में यह बात सबसे अधिक दिखाई देती है। इसे एक तरह का रीतिवाद समझना चाहिए। यही कारण है कि आरंभिक रचनाओं में ही सारी चमक दिखलाकर ये कहानीकार चुक जाते हैं। फिर ध्यानाकर्षण के लिए और अधिक  चमत्कृत भाषा का प्रयोग कर एक दुश्चक्र में उलझ जाते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकाँश युवा कथाकारों के यहां ऐसा है। पंकज मित्र, नीलाक्षी सिंह, राजू शर्मा इत्यादि कुछ अच्छे कथाकार भी हैं, जिनके यहां विषय वस्तु मानव संबंधों के अध्ययन से आती है।

मौजूदा समय लेखक संगठनों की भूमिका  किस तरह देखते हैं
दिलचस्प बात यह है कि दक्षिणपंथी पार्टियों के लेखक संगठन या तो हैं नहीं। और हैं, तो लेखकों में उसकी साख नहीं है। इसलिए लेखक संगठनों की चर्चा वामपंथी पार्टियों के के संदर्भ में होती है। पूंजीवादी संस्थाएं लेखकों  को बहुत से माध्यमों से अपने अनुकुल करती हैं। पुरस्कार, सेमिनार, फेलाशिप, विदेश यात्राएं, सांस्थानिक  सदस्यता आदि। व्यवस्था के बहुत से तरीके हैं। कभी वामपंथी संगठन जन आंदोलनों से लेखकों को जोड़ते थे। यही उनकी शक्ति थी और आकर्षण भी। आज वामपंथी पार्टियां जन आंदोलनों से दूर होकर पूंजीवादी दायरे में सिमट गई हैं। उनके लेखक संगठन भी बुनियादी जिम्मेदारियों से दूर हट गए हैं। जितना पतन वामपंथी सांस्कृतिक संगठनों का दिखाई देता है, वो निराशाजनक  तो है ही, सांस्कृतिक जीवन के लिए नुकसान देह भी है।

इसका संपादित अंश झारखंड के दैनिक भास्कर के संस्करणों में सम्पादकीय पेज न. १० में ४ मई, २०१२ ko प्रकाशित


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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)