बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 2 जून 2014

कविता का कुलदीप, ग़ज़ल की अंजुम



चार कविता : चार ग़ज़ल
 
अकेले में बहुत चीखा किये है ! समंदर रात में रोया किये है !!
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
कुलदीप अंजुम की क़लम से


गुनाहगार तो मैं भी हूँ

बदलाव वक़्त की ज़रुरत है
ज़िन्दगी ने यही सिखाया है
सब बदल गए
हवा, पानी, रुत औ' फ़िज़ाएँ
शायद बदल गया

अक्से गुनाह भी ....!
सुबह दफ्तर जाते वक़्त
एक वृद्धा देखी थी
ज़र्ज़र ,मलिन, धूसरित काया
माँस कहाँ ख़त्म
हड्डियाँ कहा शुरू ..
कुछ पता नहीं !
ज़िन्दगी से इस कदर अनमनापन
स्टेशन के एक कोने में
इतना बेबसपन...
मानो खुद के वजूद को ललकारती
इंसानियत को दुत्कारती
हर मुसाफिर को घूरती
जारी थी एक अबूझ सी खोज
ना जाने कब से

आखिर मदद के हाथ
इतनी आसानी से तो नहीं मिलते ...!
मैंने भी डाली
एक बरबस सी
ठंडी निगाह......
और फिर ज़िन्दगी ने
जोर का धक्का दिया

शाम को वक़्त जब कुछ ठहरा
तन्हाई ने दामन थमा
तो आंख शर्म से झुक गयी
ना जाने क्यूँ लगा
कि
गुनाहगार तो मैं भी हूँ
उस बेरहम खुदा के साथ.........!!

2.

हमेशा गुमसुम से रहने वाले
दूसरों के लिए लगभग झक्की
अजनबी और अपने कहे के प्रति
औसतन ईमानदार
कवि को
कब चाहिए होता है
कोई ज्ञानपीठ
कोई पद्म
यहाँ तक के कोई दीवान
या रिसाला
वो तो चाहता है
के कविता
सीधे उसके कोख से उतरकर
एक मुसलसल सफर में लग जाये !
सफ़र, एक ऐसा सफ़र
जिसकी शुरुआत ही
गली के
उस आखिरी कोने से हो !

जंग ज़िन्दगी से ...

इन्सान और जिंदगी
के बीच की जंग
शाश्वत और ऐतिहासिक है |
यदि केवल कर्म ही
इस प्रतिस्पर्धा का
आधार होता
तो सुनिश्चित सी थी
इन्सान की जीत ,
मगर इस जंग के
अपने कुछ एकतरफा
उसूल हैं ,
भूख, परिवार, परम्पराएं
मजबूरी, समाज, जिम्मेदारियां
खींच देती हैं
हौसलों के सामने
इक लक्ष्मण रेखा
और फिर कर्म
का फल भी तो
हमेशा नहीं मिलता ,
लटकती रहती है
भाग्य की तलवार |
दमतोड़ देते हैं हौसले
और घट जाती है
जीवटता के जीतने की
प्रत्याशा ||

सुनो ....

उदास क्यूँ हो तुम .....
एक उचटती नज़र डालो  जरा अपने इतिहास पर
तो जानोगे कि
तुमने रची है अनेक क्रांतियों की रूपरेखा ...
तोड़ चुके हो कई बार वक़्त का ठहराव
तुमने हमेशा पैदा किया है नया हौसला
बदली हैं इंसानी सोच और तोड़े हैं सोच के दायरे
तुम्हारे खून में है तोडना बंदिशें
और एक अल्हड़पन ......
व्यापक है बहुत तुम्हारा विस्तार
तुम फैले हो रूस  से लेकर लातिन अमरीका  तक
भारत से लेकर फ़्रांस और क्यूबा तक
और आजकल तुम मशहूर हो ट्यूनीशिया  से लेकर सीरिया तक
तुम बसे हो सुकरात से लेकर कन्फ्यूशियस तक
रूसो ,वाल्टेयर से मार्क्स तक
मार्टिन लूथर से लेकर गाँधी तक
ग़ालिब से लेकर लमही के प्रेमचंद तक .......

 
और सुनो
तुमने नहीं छोड़ा कभी भी मुझे एकाकी
चलते रहे हो साथ हमेशा कदम बकदम बतौर हमसाया
निराश  मत हो
मुझे यकीन है तुम
बदल दोगे दुनिया
अपनी आखिरी सर्द आह लेते लेते ......

.............

.........

...शब्द असहाय नहीं हो तुम !

 

1.
अब हो गयी है वक़्त की पहचान बग़ावत  !
मजबूरिओं में कर रहा इन्सान बग़ावत  !!

शुरुआत में अच्छा बुरा सब इल्म उसे है !
फिर बाद उसके सबसे है अनजान बग़ावत  !!

अंजाम से आगाज़ को देखा जो पलटकर !
क्या पूछिए कितनी हुई हैरान बग़ावत  !

देखो जरा समझो भी तो मौसम का तकाजा  !
ये क्या कि हर इक बात का उन्बान बग़ावत  !

परखो जरा उनको कभी बीमारे जुनूं तुम !
करते  रहे जो  आजतक ऐलान बग़ावत  !

2. 

जिन्दगी क्या अजब मुसीबत है !
हर घड़ी कुछ न कुछ ज़रुरत है !!

जब भी सोचो की बच गए अब के !
उसके अगले ही पल फज़ीहत है !

तुम इसे छोड़ने को कहते हो !
ये मेरी एक ही तो आदत है !

सच कहा पास कुछ नहीं मेरे !
बस मेरे नाम एक वसीयत है !!

 
3.

क्या अजब काम खैरख्वाही भी !
लूट के साथ रहनुमाई भी !! 

है पशेमाँ बहुत खुदा अबके !
लोग कोसें भी, दें दुहाई भी !!

हाकिमे वक़्त ने सुना ही नही !
वक़्त रोया, कसम उठाई भी !!

क़त्ल कर कर के थक गए अब वो !
खुश कहाँ शहर के दंगाई भी !!

और क्या चाहिए तुझे उससे !
होश है , साथ लबकुशाई भी !!

 
4.

रेत पे दुनिया बसाये बैठे हैं !
नुमाइशे ख्वाब सजाये बैठे हैं !!

जिंदगी से अनमना पन देखो !
ख्वाब से दिल लगाये बैठे हैं !!

मंजिलो तक कौन ले जाये मुझे !
रास्ते सब सर झुकाए बैठे हैं !!

गर्मी ऐ बाज़ार को तो देखिये !
सब मसीहा फड लगाये बैठे हैं !!

मेरी आँखों में ही खली अश्क हैं !
बाकि सब तो मुह घुमाये बैठे है !!

हसरतो ने आके आजिज़ जान दी !
फिर भी हम हिम्मत जुटाए बैठे हैं

(रचनाकार परिचय:
पूरा नाम: कुलदीप यादव 
जन्म : 25 नवंबर 1988 को फ़र्रुख़ाबाद में
शिक्षा: बीटेक
सृजन: कविता व ग़ज़ल
सम्प्रति: .दक्षिण अफ़्रीका में  सॉफ्टवेयर इंजिनियर
ब्लॉग : राही फिर अकेला है
संपर्क: Kuldeep.yadav@standardbank.co.za)


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4 comments: on "कविता का कुलदीप, ग़ज़ल की अंजुम "

रजनीश 'साहिल ने कहा…

यूँ तो कविता और ग़ज़ल दोनों ही विधाओं में कुलदीप 'अंजुम' अच्छा लिखते हैं. यहाँ प्रस्तुत ग़ज़लों के इतर भी उनके शेर पढ़े हैं, जो बहुत उम्दा हैं. पर इस प्रस्तुति में देखा जाये तो कविताएँ ग़ज़लों की तुलना में ज़्यादा असर छोड़ती हैं.

Ashok Kumar pandey ने कहा…

बढ़िया! रवानी ग़ज़लों सी कविता में भी है...बस थोड़ी सी मेहनत और ..

रश्मि शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़ि‍या लगा पढ़कर....शुभकामनाएं...

Asha Pandey ojha ने कहा…

सारी कवितायेँ बहुत कमाल , गजलें बेमिशाल.. संवेदनाएं जगती .. घटते जीवन मूल्यों .. दिशाहीन होती पीढ़ियों .. यानि जीवन के कई कई क्षणों को रचती कवितायेँ व ग़ज़लें .. बधाई कुलदीप जी को

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