बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

बदलती रहेगी तो बहती रहेगी हिंदी


हिंदी के संवेदनशील जानकार चाहिए


 




















सैयद शहरोज़ क़मर की कलम से


समय के साथ संस्कृति, समाज और भाषा में बदलाव आता है। परंपरा यही है। लेकिन कुछ लोगों की जिद इन परिवर्तनों पर नाहक  नाक  भौं सिकोड़ लेती है। अपने अनूठे संस्मरणों के लिए मशहूर लेखक  कांति कुमार जैन का लेख -इधर हिंदी नई चाल में ढल रही है- पढ़ा जाना चाहिए। लेख का अंत वह इस पक्ति से करते हैं, हमें आज हिंदी के शुद्धतावादी दीवाने नहीं, हिंदी के संवेदनशील जानकार चाहिए। वह लिखते हैं, अंग्रेजी में हर दस साल बाद शब्द कोशों के  नये संस्करण प्रकाशित करने की परंपरा है। वैयाकरणों, समाजशास्त्रियों, मीडिया विशेषज्ञों, पत्रकारों, मनोवैज्ञानिंको का  एक दल निरंतर अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की टोह लेता रहता है। यही कारण है कि  पंडित, आत्मा, कच्छा, झुग्गी, समोसा, दोसा, योग जैसे शब्द अंग्रेजी के  शब्द कोशों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी में कोई शुद्ध अंग्रेजी की बात नहीं करता। संप्रेषणीय अंग्रेजी की, अच्छी अंग्रेजी की बात करता है। अंग्रेजी भाषा की विश्व व्यापी ग्राह्यता का यही कारण है कि वह निरंतर नये शब्दों का स्वागत करने में संकोच नहीं करती। हाल ही में आक्सफोड एडवांस्ड लर्न्र्स डिक्शनरी का नया संस्करण जारी हुआ है। इसमें विश्व की विभिन्न भाषाओं के  करीब तीन हजार शब्द शामिल ·िकये गये हैं। बंदोबस्त, बनिया, जंगली, गोदाम जैसे ठेठ भारतीय भाषाओं के शब्द हैं, पर वे अंग्रेजी के शब्दकोश में हैं क्योंिक  अंग्रेजी भाषी उनका प्रयोग करते हैं।

दरअसल किसी भाषा का  विकास उसके बोलने या लिखने वालों पर निर्भर करता है। अगर उनका ध्यान रखा जाता है, तो निश्चय ही ऐसी भाषा सरल, सहज और बोधगम्य बनती है। अंग्रेजी में ग्रीक, लैटिन, फ्रांसीसी और अरबी के शब्द मौजूद हैं। अब उसके नए कोश में चीनी, जापानी और हिंदी आदि दूसरे भाषायी समाज के शब्द भी शामिल किए गए हैं। वहीं अरबी वालों ने तुर्की, यूनानी, फारसी और इबरानी आदि के शब्द लिए। ऐसा नहीं कि हिंदी को  दूसरी भाषा से बैर हो। हिंदी और उर्दू का जन्म ही समान स्थितियों और काल की देन है। जाहिर है, बाद में अलग अलग पहचानी गई इन जबानों में तुर्की, अरबी, अंग्रेजी, फारसी, अवधी, बुंदेली, बांग्ला, संस्कृत आदि देशी विदेशी शब्दों की भरमार है। लेकिन बाद में हिंदी के शुद्धतावादियों ने धीरे धीरे बाहरी शब्दों से परहेज करना शुरू किया। तत्सम का प्रयोग आम हुआ। न ही तत्सम और न ही अन्य भाषायी शब्दों का इस्तेमाल गलत है। गलत है, ऐसे शब्दों को प्रचलन में जबरदस्ती लाने की  कोशिश करना। हां! यदि चलन में शब्द हैं, तो उसे आत्मसात करना जरूरी है। लेखक, कवियों और अब टीवी चैनलों व फिल्मों में प्रयुक्त शब्दों को स्वीकार करने में हिंदी का विकास ही है। जैसे, प्रेमचंद ने गोधुली शब्द का इस्तेमाल किया तो लोगों ने सहज लिया। पंजाबी शब्द कुड़माई कहानी उसने कहा था के  कारण कितना खूबसूरत बना। संजय दत्त की  फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में आया गांधीगीरी शब्द हर की जबान पर चढ़ गया। अरुण कमल ने अपनी कविता में चुक्कू मुक्कू लिखा, तो उसका इस्तेमाल करने में किसी को  कोई गुरेज नहीं हुआ। सुधीश पचौरी जब न्यूज चैनलों के लिए खबरिया लिखने लगे, तो पहले परहेज किया गया। लेकिन बाद में उसकी सहर्ष स्वीकृति मिल गई।
हिंदी और उर्दू के शब्दों को परस्पर जबानों से अलग करने की बहुधा कोशिशें की गईं। लेकिन हुआ उल्टा ही। आम लोगों के बीच गजलों, गानों और फिल्मों से उसे दुगुनी चाल से बढ़त मिली। आदि लेखकों में शुमार भारतेंदु हरिश्चंद्र के बकौल हिंदी नई चाल में ढलती गई। उर्दू और अंग्रेजी के शब्द शर्बत में चीनी की तरह घुल चुके हैं। तभी तो मिठास है। हिंदी में करीब 1 लाख, 37 हजार शब्द दूसरी भाषा के हैं। यह अब हमारी विरासत है।
दूसरी भाषा से आए शब्दों की कुछ मिसालें देखिए:
फल, मिठाई संबंधी: अनार, अंगूर, अंजीर या इंजीर, आलूबुखारा, कद्दू, किशमिश, नाशपाती, खरबूजा, तरबूज, सेब, बादाम, पिस्ता, अखरोट, हलवा, रसगुल्ला, कलाकंद, बिरयानी और कबाब आदि।
शृंगार संबंधी: साबुन, आईना, शीशा, इत्र आदि।
पत्र संबंधी: पता, खत, लिफाफा, डाकिया, मुहर, कलमबंद, कलम, दवात, कागज, पोस्ट ऑफिस, डाक खाना, आदि।
व्यवसाय संबंधी: दुकान, कारोबार, कारीगर, बिजनेस, शेयर, मार्केट, दर्जी, बावर्ची, हलवाई आदि।
धर्म संबंधी: ईमान, बेईमान, कफऩ, जनाज़ा, खुदा, मज़ार आदि।
बीमार संबंधी: बीमार, डॉक्टर, अस्पताल, हॉस्पीटल, नर्स, दवा, हकीम, सर्दी ज़ुकाम, बुखार, पेचीश, हैज़ा आदि
परिधान: पोशाक, कमीज, शर्ट, पैंट, आस्तीन, जेब, दामन, पाजामा, शलवार, जींस, दस्ताना आदि।
कानून व शासन संबंधी: चपरासी, वकील, सरकार, सिपाही, जवान, दारोगा, चौकीदार, जमादार, अदालत, सज़ा, मुजरिम, कैद, जेल आदि।

वहीं हिंदी में आए उर्दू के उपसर्ग व प्रत्यय के कुछ नमूने:

हर, बदनाम, बदसूरत, बदबू, बदमाश, बदरंग, बदहवास। गैरवाजिब, गैरजिम्मेवार, गैरजिम्मेदार, गैर हाजिर। बिलानागा। दादागिरी, गांधीगिरी, उठाईगिरी। आदमख़ोर, घूसखोर, रिश्वतखोर। असरदार, उहदेदार, चौकीदार, थानेदार। घड़ीसाज़, रंगसाज़।
इसके अलावा अनगिनत उर्दू शब्दों ने हिंदी शब्दकोश को समृद्ध बनाया है। आनंद नारायण मुल्ला का शेर बरबस याद आता है:

उर्दू और हिंदी में फर्क सिर्फ़ है इतना
हम देखते हैं ख्वाब, वह देखते हैं सपना।

प्रेमचंद आज भी चाव से पढे जाते हैं। उन्हें क्लासिक का दर्जा हासिल है। वहीं बोधगम्यता की बात चली तो, राजेंद्र यादव का सारा आकाश, श्रीलाल शुक्ल का रागदरबारी, धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता, सुरेंद्र वर्मा का मुझे चांद चाहिए, शानी का कालाजल और अब्दुल बिस्मिल्लाह का झीनी झीनी बिनी चदरिया का तुरंत ही स्मरण होता है। इन उपन्यासों की लाखों प्रतियां अब तक बिक चुकीं। आज भी लोग इसे पढऩा पसंद करते हैं। इसलिए कि इसकी भाषा बहुत ही सहज व सरल है। वहीं नामवर सिंह की किताब दूसरी परंपरा की खोज आलोचना जैसे सूखे विषय के बावजूद भाषायी प्रवाह के  कारण पढ़ी जाती है। रवींद्र कालिया की संस्मरणात्मक  पुस्तक  गालिब छुटी शराब खूब पढ़ी गई। जबकि काशीनाथ सिंह की काशी का अस्सी कम नहीं पढ़ी गई। लेकिन अस्सी में तत्सम अधिक पढऩे को मिला। वहीं गालिब....में ठेठ हिंदुस्तानी का लहजा परवान चढ़ा। इस शब्द पर अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध याद आए। उन्होंने किसी के कहने पर उपन्यास लिखा था, ठेठ हिंदी का ठाट। जिसमें हिंदी के ठाठ को बरकरार रखने का प्रयास किया गया था। लेकिन हरिऔध जी खुद ही असमंजस में थे।  30-3-1899 में उपन्यास की भूमिका में वह लिखते हैं, लखनऊ के प्रसिद्ध कवि इंशा अल्लाह खां की बनाई कहानी ठेठ हिंदी है। जो मेरा यह विचार ठीक है, और मैं भूलता नहीं हूँ, तो कहा जा सकता है कि मेरा ठेठ हिंदी का ठाट नामक  यह उपन्यास ठेठ हिंदी का दूसरा ग्रन्थ है।.........
भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र की बनाई हिंदी भाषा नाम की पुस्तिका है, उसमें जो उन्होंने नंबर 3 की शुद्ध हिंदी का नमूना दिया है, वही ठेठ हिंदी है। शुद्ध और ठेठ शब्द का अर्थ लगभग एक ही है। वह नमूना यह है:

पर मेरे प्रीतम अब तक घर न आये, क्या उस देश में बरसात नहीं होती, या किसी सौत के फंदे में पड़ गये, कि इधर की सुध ही भूल गये। कहां तो वह प्यार की बातें कहां एक संग ऐसा भूल जाना कि चिट्ठी  भी न भिजवाना, हा! मैं कहां जाऊं कैसी करूं, मेरी तो ऐसी कोई मुंहबोली, सहेली भी नहीं कि उससे दुखड़ा रो सुनाऊं, कुछ इधर-उधर की बातों ही से जी बहलाऊं ।

इन कतिपय पंक्तियों पर दृष्टि देने से जान पड़ता है कि जितने शब्द इन में आये हैं, वह सब प्राय: अपभ्रंश संस्कृत शब्द हैं, प्रीतम शब्द भी शुद्ध संस्कृत शब्द प्रियतम का अपभ्रंश है। विदेशी भाषा का कोई शब्द वाक्य भर में नहीं है, हां! कि शब्द फारसी है, जो इस वाक्य में आ गया है, पर यह किसी विवाद के सम्मुख न उपस्थित होने के कारण, असावधानी से प्रयुक्त हो गया है।

करीब डेढ़ सौ साल पहले भारतेंदु हरिश्चंद ने लेख लिखा था, हिंदी नई चाल में ढली । उसका चलना आज भी जारी है। रहना भी चाहिए।



हिंदी दिवस पर 14 सितम्बर 2012,  भास्कर के विशेष अंक में संपादित अंश प्रकाशित
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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

रांची फिल्म फेस्टिवल में झारखंडी फिल्मों से सौतेलापन!



झारखंड के लिए नहीं है सुहाना सफ़र 

















 कुंदन कुमार चौधरी की कलम से

झारखंड बनने के 11 साल बाद पहली बार फिल्म फेस्टिवल 'सुहाना सफर का  आयोजन 12 से 15 सितंबर तक  रांची में किया जा रहा है। इस बात से झारखंड ·े फिल्मकार खुश थे और लंबे जद्दोजहद के बाद झारखंड और यहां की  क्षेत्रीय फिल्मों के लिए इसे सुनहरा अवसर मान रहे थे। तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी यहां के फिल्मकारों ने बगैर किसी सहायता के अपने बूते तीन राष्ट्रीय और दर्जनों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते। लेकिन इस फिल्म फेस्टिवल में ठेठ झारखंडी मिटटी के सोंधेपन को  पूरी तरह नजरअंदाज किया गया. झारखंड की प्रतिनिधि फिल्में शामिल ही नहीं की गयी हैं. । 21 फिल्मों में मात्र तीन झारखंडी फिल्मों एक नागपुरी, एक  संथाली और एक खोरठा का प्रदर्शन हो रहा है, वह भी मॉर्निंग शो में.  20-25 सालों से यहां काम कर रहे फिल्मकार अपने को उपेक्षित मान रहे हैं।

नागपुरी फिल्मों को उपेक्षित किया गया
झारखंड में सबसे ज्यादा नागपुरी फिल्में बनती हैं। 1992 से अब तक सौ के करीब नागपुरी फिल्में बन चुकी हैं। यहां के तमाम बड़े सिनेमाघर इन फिल्मों को अपने यहां नहीं दिखाते, इसके बावजूद कई फिल्मों ने खूब मुनाफा कमाया। श्रीप्रकाश की नागपुरी फिल्म 'बाहा को बर्लिन में ब्लैक इंटरनेशनल अवार्ड मिला। लेकिन इस फिल्म फेस्टिवल में मात्र एक नागपुरी फिल्म 'सजना अनाड़ी दिखाई जा रही है। फिल्म का समय भी मॉर्निंग शो रखा गया है, जब अमूमन ·म लोग फिल्म देखने घर से आते हैं। रांची में नागपुरी फिल्मों का  बड़ा दर्शक वर्ग है। हिंदी फिल्मों का 1000 सीट वाले सुजाता हॉल में प्रदर्शन हो रहा है, वहीं तीनों क्षेत्रीय फिल्मों का मिनीप्लेक्स में, जिसमें 100 के करीब सीट हैं। नागपुरी फिल्म निर्देशक श्रीप्रकाश कहते हैं,झारखंड की प्रतिनिधि फिल्में इस फिल्म समारोह में दिखाई जानी चाहिए। फीचर फिल्म के साथ डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी दिखानी चाहिए। तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद यहां के फिल्मकारों ने तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। दर्जनों नेशनल-इंटरनेशनल अवार्डों पर कब्जा जमाया, लेकिन इस फिल्म फेस्टिवल में एक भी ऐसी फिल्में नहीं दिखाई जा रही है, इससे यहां के फिल्मकार अपने को छला महसूस कर रहे हैं।

तमिल-ओडिय़ा की जगह यहां की फिल्में दिखाई जानी चाहिए
झॉलीवुड में लंबे समय से जुड़े मनोज चंचल कहते हैं कि झारखंड में फिल्म फेस्टिवल हो रहा है, तो यहां की प्रतिनिधि फिल्मों पर फोकस करना चाहिए। तमिल, ओडिय़ा, बंगाली, पंजाबी आदि फिल्में पहले से ही अपने प्रदेशों में अच्छी स्थिति में हैं, उन्हें यहां दिखाकर या बढ़ावा देकर क्या फायदा। आज झॉलीवुड कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। यहां की फिल्मों से जुड़े लोग पलायन कर रहे हैं, इस फेस्टिवल में यहां की फिल्मों को ज्यादा से ज्यादा दिखाकर यहां के फिल्मकारों में सकारात्मक संदेश दिया जा सकता था। 

डॉक्यूमेंट्री की अहमियत समझनी चाहिए
झारखंड के फिल्मकारों द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्में नेशनल-इंटरनेशनल स्तर पर न सिर्फ सराही गईं, बल्कि दर्जनों अवार्डों पर भी कब्जा जमाया। प्रसिद्ध फिल्मकार मेघनाथ कहते हैं कि अब लोगों को  डॉक्यूमेंट्री की अहमियत समझनी चाहिए। जितने भी बड़े फिल्म फेस्टिवल होते हैं, सभी में फीचर फिल्मों के साथ डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन भी होता है। यहां दर्जनों ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का  निर्माण हुआ है, जिसमें झारखंड की सोंधी खुशबू नजर आती है। इनका प्रदर्शन फिल्म फेस्टिवल में किया जाना चाहिए।


लेखक-परिचय:
जन्म : 13 फरवरी, 1977
शिक्षा : बीएससी, बीजे
करीब 12 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय.
सम्प्रति: दैनिक  भास्कर, रांची  में फीचर एडिटर
संपर्क: kundankcc @gmail .com
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रविवार, 24 जून 2012

क़लम की मजदूरी करने वाला निपनिया का किसान उर्फ़ अरुण प्रकाश



हर फ़िक्र को धुएं में उडाता चला गया....




























सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

सितम्बर की कोई तारीख. साल २००८.रायपुर को मैं अलविदा कर चुका था. देशबंधु के प्रबंधन से ऊब थी, वहीँ दिल्ली आकर कुछ अलग कर गुजरने का ज्वार रह-रह कर उबल रहा था. 'भासा' के राजेश व उसके साथियो की तरह दिल्ली अपन भी फतह करना चाहते थे. दोपहर ढल आई थी. पंडित जी (कथादेश के संपादक हरिनारायण जी) कनाट प्लेस के दफ्तर गए थे. उनके एक अफसर मित्र की पत्नी ज्योतिष की पत्रिका निकालती थीं. जिसका दफ्तर एक बड़ी इमारत में था. वहीँ कथादेश को एक कोना नसीब हो गया था. दोपहर बाद पंडित जी वहीँ चले जाते. पन्त जी (लक्ष्मी प्रसाद पन्त , सम्प्रति भास्कर जयपुर में सम्पादक) ने कथादेश को बाय कर दिया था. विश्वनाथ त्रिपाठी की बदौलत मार्फ़त विष्णु चन्द्र शर्मा  जी उनकी जगह मैंने ले ली थी. खैर! दस्तक हुई दरवाज़े पर!  दिलशाद गार्डेन का सूना पहर. मैंने झांकर देखा. लहीम शहीम एक शख्स  बाहर खडा है. सरों पर हलकी सुफैदी ..बदन पर लंबा सा कुर्ता और पाजामा. भदेस सज्जन जान मैंने दरवाज़ा खोला. नमस्कार किया. शाइस्तगी  से लबरेज़ जवाब पाकर मेरी झुर-झुरी कम हुई.
आप नए आये हैं..
जी.....
कहाँ के हैं...
बिहार..
वहाँ कहाँ के..
..गया.
..अरे वाह! मैं बेगुसराय का एक किसान हूँ. कलम की मजदूरी करता हूँ.
 इस मासूमियत पर कौन न मर मिटे! हिचकते हुए नाम पूछ बैठा...अरुण प्रकाश! सुनते ही मैं खिल उठा. उनकी कुछ कहानियां,  उन जैसे ही किरदारों का कोलाज़ झिलमिलाने लगा. इस अनूठे लेखक से यह हमारा पहला साबका था. बाद में लोगों से उनके आत्मकेंद्रित रहने, बहुत कम खुलने.. की बात मैं आज तक नहीं हज़म कर पाया..उनकी अपनी सी लगती कहानियों का मैं दीवाना तो पहले से ही था. पहली मुलाक़ात ने लव इन फर्स्ट साईट सा जादुई असर किया था. जिसका यथार्थ मेरे लिए कभी कटु न रहा.

पहले अरुण जी, फिर भाई साहब उन्हें कहने लगा.वो कब मेरे भैया बन गए मुझे पता ही न चला. दिल्ली के इस दूसरे प्रवास में करीब दस बारह सालों तक कंक्रीट के जंगलों में मुझे बेतहाशा गुज़ारने पड़े. कभी कहीं ठौर मिली. कहीं चाँद गोद में भी आया. इस अवधि में अरुण जी से मिलना कई बार हुआ. महेश दर्पण जी के बाद मैंने उन्हें सबसे ज्यादा श्रम करते देखा. मुझे लगता है कि वह संभवत चार से पांच घंटे ही विश्राम ले पाते होंगे. सुबह उठ कर टहलने निकल जाते. इस प्रात:भ्रमण में उनके साथ रहते विश्वनाथ त्रिपाठी जी. युवा व्यंग्यकार रवींद्र पाण्डेय, उन्हीं की तरह दूसरे मसिजीवी रमेश आज़ाद आदि. सूरज के ज़रा परदे से निकल आते ही उनका घर आना होता. फिर हलके नाश्ते के बाद जो अपनी स्टडी( तब बालकोनी को ही घेर कर उन्होंने अपना अध्ययन कक्ष बना लिया था) में जाते. फिर लिखना,  लिखना और लिखना. कागजों पर जो उतरता जाता. उसमें किसी अहम किताब का अनुवाद होता. किसी सीरयल की पटकथा होती. संवाद होता..या नई कहानी का पुनर्लेखन.

ग़ज़ल का तगज्जुल

ग़ज़ल गो रामनारायण स्वामी( तब वो अन्क़ा नहीं हुए थे) के पहले ग़ज़ल संग्रह रौशनी की धुंध की चर्चा के लिए सादतपुर में महफ़िल जमी.  वीरेंद्र जी (जैन) के यहाँ हुई उस दोपहरी गोष्ठी में  स्वामी जी की गजलों पर आधार आलेख मैंने ही पढ़ा. सादतपुर के लेखकों के अलावा अरूण जी, जानकी प्रसाद जी, इंडिया टुडे वाले अशोक जी, विश्वनाथ जी, रमेश आज़ाद, कुबेर जी आदि ढेरों लोग थे. लेकिन अरुण जी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा, ग़ज़ल पर यदि शहरोज़ जी न कहते तो उसकी तगज्जुल न रहती. या खुदा! इतने बड़े बड़े दक्काक के रहते इन्हें क्या हुआ..जबकि हिंदी समाज में उर्दू के प्रमाणिक शख्स जानकी जी मौजूद हैं. अरूण जी ने जिस सहजता से मेरी बातों को सराहा, असहमति भी जतलाई. ऐसे लोग मुझे दिल्ली में कम ही मिले. बमुश्किल दो-चार नाम ऐसे स्मरण में हैं. सर्दी की एक दोपहर हम सभी कृषक जी की छत पर जमा हुए. यहाँ भी दिलशाद से अरूण जी, विश्वनाथ जी, रमेश आज़ाद पहुंचे.  मेरी 'अकाल और बच्ची' कविता उन्होंने दो बार सुनी. इस कविता में अकाल के इलाके से रोज़गार की तलाश में परिवार दिल्ली आया है. उस परिवार की बच्ची के बचपन को मैंने शब्द देने की कोशिश  की है. ये अकारण नहीं हुआ होगा. दिल्ली हो, कोलकता या मुंबई उनके साथ उनका गाँव निपनिया हर दम साथ रहा. उनकी कहानियों में भी यह ज़मीनी सोंधापन मिलता है. हिंदी में ऐसे कथाकार आज़ादी के बाद कम हुए,  जिन्होंने हाशिये के लोगों को अपना केंद्र बनाया हो. उनकी अधिकाँश कथाओं में घर से बेघर नयी जगह में आसरा तलाश करते लोगों की ज़िंदगी को उन्वान मिला है. भैया एक्सप्रेस हो, या मझदार,विषम राग हो या नहान, भासा आदि कहानियां गौरतलब हैं.

शेरघाटी पर उपन्यास लिखो
कथादेश के पहले युवांक में मेरी पहली कहानी 'पेंडोलम' छपी. मैं राजकमल में था. उनका फोन आया.
यार! कहानी भी लिखते हो..बताया ही नहीं कभी! 
जी..भैया ..
दूसरी लिखो तो बताना. यूँ इस कहानी को विस्तार दो. आप (तुम कहते कहते वो आप बोल जाते..) अपने घर- कस्बे शेरघाटी को केंद्र में रख कर एक उपन्यास प्लान कीजिये. मुस्लिम जीवन अब हिन्दी में न के बराबर आ रहे हैं. आपसे उम्मीदें हैं.
जी! कोशिश करूँगा..
लेकिन ग़म-ए-रोज़गार ने इतनी मोहलत ही न दी कि मैं उपन्यास कलम बंद करता. यूँ उन्होंने एक-दो बार याद भी कराया, 'शहरोज़ जी क्या हुआ..कुछ बात बनी.' मेरे नफी में सर हिलाने पर थोडा तुनक भी जाते..'पहचान सिर्फ एक कहानी से नहीं बनती..'

गया गया मिल गया
प्रेमचंद जी की जयन्ती पर हंस द्वारा सामयिक विषय पर कई सालों से गंभीर विमर्श का आयोजन होता आया है. राजेन्द्र जी जिसके कर्ताधर्ता हों, उस मजमे में भीड़ न जुटे. मैं उन दिनों रमणिका जी की पत्रिका युद्धरत आम आदमी से जुड़ा हुआ था. वहाँ से निकलते निकलते थोड़ा विलम्ब हो गया. जैसे ही राजेन्द्र भवन पहुंचा. संजय सहाय पर नज़र पडी तो मैं उधर ही लपक गया. उन्होंने दोनों हाथ फैला दिए. और हम यूँ मिले जैसे बिछुड़े हुए हों. मुद्दत बाद मिलना भी हो रहा था.
'गया गया मिल गया!' जानी पहचानी आवाज़ से हम अलग हुए. अरुण जी पास मुस्कुरा रहे थे. उनकी यही मुस्कान दूसरों की ज़िंदगी बख्शती रही. उनकी जीवटता से हम उर्जस्वित होते रहे. बाद में उनसे बहुत कम मिलना हुआ. दिनों बाद फोन पर बात हुई. लेकिन उन्होंने एहसास ही न होने दिया की वो बेहद अस्वस्थ हैं. जबकि गौरीनाथ से उनकी दिनों दिन बदतर होती तबियत का मुझे इल्म हो गया था.आज ढेरों कह रहे हैं कि काश  सिगरेट छूट जाती तो शायद उनकी उम्र ....



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सोमवार, 18 जून 2012

....... तो गायक होते सुरजीत पातर


 
 
 
 
 
 
 
सुरजीत पातर मार्फ़त ऋतु कलसी 



पाश के बाद पंजाबी कवि सुरजीत पातर सबसे ज्यादा पढ़े गए हैं. उनके लबो लहजे की ताजगी दायम है आज भी. जालंधर, पंजाब के एक गांव में १४ जनवरी 1944 को उनका जन्म हुआ। उनका पहला कविता संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हर्फ है। कविताओं की उनकी  दर्जनों किताबें हैं .साफगोई और बेबाकी के लिए मशहूर पातर की कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। पद्मश्री  के अलावा देस-दुनिया के कई सम्मानों से  उन्हें नवाज़ा जा चुका है.अँधेरे में सुलगती वर्णमाला के लिए 1993 का साहित्य अकादमी और २००९ में लफ़्ज़ों की दरगाह के लिए सरस्वती  सम्मान से वे समादृत हुए. युवा पत्रकार संजीव माथुर से एक संवाद  में उन्होंने  कहा  था : मैं कवि नहीं होता तो गायक होता.उन्हीं की बातें उन्हीं से जानिये:
मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा हूं उसकी फिजा में ही गुरुबानी रची-बसी है। इसीलिए मेरी कविता में आपको लोकधारा, गुरुबानी और भक्ति या सूफी धारा का सहज प्रभाव मिलेगा। दरअसल मेरे चिंतन और कर्म दोनों में जो है वह प्रमुखत: मैंने पंजाब की फिजा से ही ग्रहण किया। एक बात और जुड़ी है। वह यह कि मैं जब भी दुखी होता हूं तो लफ्जों की दरगाह में चला जाता हूं। इनकी दरगाह में मेरा दुख शक्ति और ज्ञान में ट्रांसफॉर्म हो जाता है। यह ट्रांसफॉर्ममेंशन मुझे एक बेहतर इंसान बनाने में मददगार होता है। ध्यान रखें कि कविता मानवता में सबसे गहरी आवाज है.मैं अक्सर कहता हूं कि संताप या दुख को गीत बना ले, चूंकि मेरी मुक्ति की एक राह तो है। अगर और नहीं दर कोई ये लफ्जों की दरगाह तो है। इसलिए लफ्जों की दरगाह मेरे लिए एक ऐसा दर है जो मुझे इंसा की मुक्ति की राह दिखता है। और जो दर मुक्ति की राह दिखाए वह उदासी को भी ताकत में तब्दील करने कर देता है। जिंदगी आत्मसजगता में है। शब्दों की गहराई में समा जाओ तो दुख छोटे पड़ जाएंगे। मैं कविता का प्यासा था। मैंने विश्व काव्य से लेकर भारतीय साहित्य तक में सभी को पढ़ा। लोर्का हो या ब्रेख्त। शुरुआत में मुझ पर बाबा बलवंत का खासा प्रभाव पड़ा। इनकी दो किताबों ने खासा बांधा था- बंदरगाह व सुगंधसमीर। मेरी शुरुआती कविताओं पर इनका प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पर मुझ पर हरभजन, सोहन सिंह मीशा, गालिब, इकबाल और धर्मवीर भारती का भी खासा प्रभाव रहा है। इसके अलावा शिव कुमार बटालवी और मोहन सिंह ने भी मुझे और मेरे लेखन को प्रेरित किया है। मैं राजनीति में कभी सीधे तौर पर सक्रिय नहीं रहा। जहां तक विचारधारा की बात है तो मैं साफ तौर पर मानता हूं कि लोकराज हो पर कल्याणकारी राज्य भी हो। इसीलिए मैंने लिखा है :
मुझमें से नेहरू भी बोलता है, माओ भी
कृष्ण भी बोलता है, कामू भी
वॉयस ऑफ अमेरिका भी, बीबीसी भी
मुझमें से बहुत कुछ बोलता है
नहीं बोलता तो सिर्फ मैं ही नहीं बोलता।
कविता को खोजते या रचते समय राजनीति, प्रकृति और आदम की बुनियादी इच्छाएं मेरी कविता में बुन जाती हैं। पर कविता में ये सचेतन नहीं आती है सहज-स्वाभविक हो तभी आती हैं। मैं खुद पर कोई विचारधारा लादता नहीं हूं। मैं कविता से विचारधारा नहीं करता हूं। मेरी प्रतिबद्धता इंसा और लोगों के साथ बनती है।

सुरजीत पातर की दो कविता

मेरे शब्दों

मेरे शब्दों
चलो छुट्टी करो, घर जाओ
शब्दकोशों में लौट जाओ

नारों में
भाषणों में
या बयानों मे मिलकर
जाओ, कर लो लीडरी की नौकरी

गर अभी भी बची है कोई नमी
तो माँओं , बहनों व बेटियों के
क्रन्दनों में मिलकर
उनके नयनों में डूबकर
जाओ खुदकुशी कर लो
गर बहुत ही तंग हो
तो और पीछे लौट जाओ
फिर से चीखें, चिंघाड़ें ललकारें बनो

वह जो मैंने एक दिन आपसे कहा था
हम लोग हर अँधेरी गली में
दीपकों की पंक्ति की तरह जगेंगे
हम लोग राहियों के सिरों पर
उड़ती शाखा की तरह रहेंगे
लोरियों में जुड़ेंगे

गीत बन कर मेलों की ओर चलेंगे
दियों की फोज बनकर
रात के वक्त लौटेंगे
तब मुझे क्या पता था
आँसू की धार से
तेज तलवार होगी

तब मुझे क्या पता था
कहने वाले
सुनने वाले
इस तरह पथराएँगे
शब्द निरर्थक से हो जाएँगे

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एक नदी

एक नदी आई
ऋषि के पास
दिशा माँगने

उस नदी को ऋषि की
प्यास ने पी लिया
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पंजाबी की चर्चित युवा कहानीकार ऋतु कलसी पिछले लगभग दस साल से विभिन्न समाचार पत्रों के लिए फ्रीलांसिंग कर रही हैं.आपका संक्षिप्त परिचय है:

शिक्षा : एस एम् डी आर एस डी कालेज, पठानकोट से स्नातक
सृजन:
पंजाबी की लगभग सभी स्तरीय पत्रिकाओं में कहानियां. दो पुस्तकें जल्द ही प्रकाश्य 
रुचि: अध्ययन, लेखन और नृत्य
सम्प्रति:जालंधर से
युवाओं की पत्रिका ‘जी-नैक्स’  का संपादन व प्रकाशन
ब्लॉग: पर्यावरण पर हरिप्रिया
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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)