बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 11 अगस्त 2014

दावेदारी फिर अनुरोध












रजनी त्यागी की कविताएं

तुम्हारी सदाशयता पर शक नहीं

तुमने कहा, सुरक्षा
लड़की ने सुना, क़ैद
क्या सचमुच तुमने सुरक्षा कहा
या सचमुच तुमने क़ैद कहा था
नहीं ! तुम्हारी सदाशयता पर शक ठीक नहीं
क्योंकि तुमने लड़की को धन भी कहा था
और वो भी पराया

फिर लड़की ने क्यों सुना क़ैद ?
शब्द उसके कानों तक पहुँच कर बदल कैसे गए?
या फिर वो ही बदल गई है?
लड़की बड़ी मुश्किल में है
जब से एक दिन उसने झाँक लिया
अनगिनत परिंदे उड़ते हैं उसके भीतर
पंख फड़फड़ाते और भी बड़ा आकाश चाहते हैं
लड़की इधर-उधर दौड़ती
हांफ-हांफ जाती है
इन्हें पकड़ने के लिए
बस में नहीं आते कम्बख़्त !
लड़की को चैन से बैठने नहीं देते
धन नहीं होने देते
एकदम ज़िंदा रखते हैं
पंखों की फड़फड़ाहट और इनकी चायं-चायं ने ही
ख़राब कर दिए हैं लड़की के कान
तुम्हारी सदाशयता पर शक ठीक नहीं!
तुम तो कहते हो 'सुरक्षा'
और लड़की सुनती है 'क़ैद '

8 मार्च : दावेदारी फिर अनुरोध

वैसे दिन तो सभी मेरे भी थे
पर दावेदारी के लिए एक दिन तो मिला
वैसे दावेदारी करना मेरे जीने का ढंग था ही नहीं कभी
मेरे जीने का ढंग तो प्रेम और मित्रता था
प्रेम का अनुवाद तुमने दासता किया
और दासों से कैसी मित्रता
चढ़ते गए तुम प्रभुता के पायदानों पर
मै क्योंकर रोकती
और पहुँच भी गए तुम सबसे ऊपर

सुनो, आज के दिन मैं तुमसे कहती हूँ
बहुत सन्नाटा है प्रभुता के शिखर पर
वहां का अकेलापन लील देगा तुम्हें
सुनो, वापस लौट चलो
ये कोई दावेदारी नहीं किसी दिन पर
मित्रता का अनुरोध है प्रेम भरा
क्योंकि मेरे जीने का ढंग प्रेम और मित्रता है

ऊर्जा की संभावना

तुम्हारे भौतिक जीवन में यदि मेरी कोई भूमिका होगी
तो मैं ज़रूर मिलूंगी तुम से ..एक दिन
क्योंकि प्रकृति का नियम है
जो विज्ञानियों ने खोज निकला है
पदार्थ के बनने को अणु करते हैं
इलेक्ट्रान का लेन-देन और जुड़ जाते हैं
तब तलक हमारी संवेदनाओं की ऊर्जाएं
मिलती रहेंगी स्वाभाविक बहाव में
क्योंकि ऊर्जा पदार्थ की मोहताज  नहीं होती.

आभार

रोज़ चली आती हो
बिना नाग़ा
नियम की बहुत पक्की
बहुत कर्मठ हो तुम
रास्ते हज़ार रोके कोई
हों कितने भी दरवाज़े बंद
अपनी मंज़िल पहुँच
जम ही जाती हो तुम
कई बार सोचा, नहीं दूँ ध्यान तुम पर,
पर तुम ज़िद्दी जमी हुई अपनी जगह
मुंह चिढ़ाती और भी जम जाती हो
दिलाती हो मुझे मेरा निक्क्मापन याद
धूल तुम्हें धन्यवाद् !!

जानती हूँ..तुम हो मेरे आस-पास

सुनहरे तिलिस्म का सागर है
दूर तक लहराता हुआ
असंख्य लहरें
व्यस्त हैं अपने रोज़मर्रा के कामों में
तूफ़ान और शान्ति दोनों को
एक साथ समेटे
इस किनारे बैठ जब छूती हूँ इन्हें
खरगोश सा स्नेह मेरी हथेलियों पर
आ फुदकता है
जानती हूँ किसी किनारे पर
तुम बैठे हो

रूह पर स्वामित्व कैसे हो

वो जो रौशन थी परिधि
वो नूर रूह का ही था
तुम घूमते रहे, उलझते रहे
परिधि से बारहा
वर्ना मुझ तक पहुँचने का रास्ता
कितना सीधा सा था
उस रास्ते में तुमको
अपने खो जाने का था शुबहा
सो परिधि पर ही चिन लिया
तुमने क़िला अधिपत्य का
मैं दे भी देती रूह को राजस्व में तुमको
मगर रूह के स्वामित्व का पट्टा कभी बना न था

लम्हों की प्रतिध्वनियां

साथ बिताये लम्हों की प्रतिध्वनियां
नई-नई व्याख्याएँ पेश करती हैं
उस दिन साथ बैठ कर खाते हुए
एक कौर मेरे मुंह के पास लाकर
तुमने निर्देश दिया, आ!
तुम्हारी उपस्थिति की तरंगों में सराबोर
तुम्हारी आँखों के तिलिस्म में डूबी मंत्रमुग्ध सी
एकदम यंत्रवत मैंने भी पालन किया
और मुझे छलते हुए तुमने
झट से कौर अपने मुंह में रख लिया था
ठगी हुई, आहत सी मैं हैरान हुई पहले
फिर तुम्हारी मज़बूत बाज़ू पर
ढेरों मुक्के बरसाए
और तुम हंस रहे थे बेसाख़्ता
मैं तो इसे प्रेम की
चुहलबाज़ी समझी थी
क्या इसी से मुझे समझ लेना था
कि दरअसल छल करना ही
तुम्हारा असल मिजाज़ है ..

गहरी जमी उदासी

कुछ इधर पड़ा है
कुछ उधर पड़ा है
मेरे भीतर का सब सामान तितर-बितर पड़ा है
उधर गिलास लुढका हुआ
कुछ घूंट जो उम्मीद थी उसमें
अब बह चली है फर्श पर
सपनों के बिस्तर पर हजारों सिलवटें हैं
अनधुले कपड़ों सा दर्द कुर्सी पर बिखरा
बिस्तर पर भी
मेज़ पर जमे बैठे हैं काम कई
टुकुर-टुकुर घूरते हैं
फर्श पर भी जम गया है कितना ही कूड़ा-कबाड़
कुछ चोटें हैं
कुछ गुस्सा है
बहुत सी खिन्नता है
मेरे भीतर का सब सामान-तितर बितर पड़ा है
म्मम्म..सोचती हूँ शुरुआत बुहारने से करूँ

स्थगित किये हुए दर्द

स्थगित किये हुए दर्द भी जागते हैं बारहा
किसी ज़रूरी काम के लिए लगाये रिमाइंडर की तरह
करते रहते हैं दावेदारी
स्थगित किये हुए दर्द भी डालते हैं असमंजस में बारहा
किसी क़ीमती याद से जुड़े क़ीमती सामान की तरह
जो टूट-फूट गया है
नहीं है किसी भी काम का
जिसे ना फेंकते बनता है ना रखते

स्‍थगित किए हुए दर्द ज्‍यादा कुछ कहते-सुनते नहीं
लेकिन वे बदलते रहते हैं
तुम्हारे जीवन की रंगत धीरे-धीरे
पायदान पर जमा होती धूल की तरह
जो बदलती रहती है उसका असल रंग
ग्रे से गहरा ग्रे, कत्‍थई से गहरा कत्‍थई, लाल से मैरून..


(रचनाकार-परिचय: 
जन्म:  26 नवंबर 1981 को दिल्ली में
शिक्षा:दिल्ली के आईपी कोलेज से इतिहास में एम. ए. और  IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा
सृजन: कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित 
संप्रति: दिल्ली में रहकर अनुवाद और और हिंदी साप्ताहिक आफ्टर ब्रेक के लिए लेखन
संपर्क: rajni2ok@gmail.com)  
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रविवार, 10 अगस्त 2014

स्त्री को लड़ाई खुद लड़नी होगी

कानून पीड़िता को सुरक्षा कम देता है, डराता है अधिक












फ़रहाना रियाज़ की क़लम से
 
टीवी चैनल्स और अखबारों पर नज़र डाली जाये तो आधे से ज़्यादा स्पेस महिला शोषण और अत्याचारों से भरे पड़े हैं | महिलाओं के साथ हो रहे इन हादसों को देख कर मन व्यथित है | कैसी विडंबना है कि नारी सशक्तीकरण  और नारी मुक्ति के जितने दावे किये जा रहे हैं, उतना ही नारी शोषण और अत्याचारों की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है | कहा जाता है कि नारी को शोषण और अत्याचार से मुक्त करना है, तो सब से पहले उसको शिक्षित करना होगा | शिक्षा का अर्थ सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं बल्कि जीवन के हर पहलु को समझना होगा जिससे कि वो अपने अधिकारों के लिए जागरूक हों | परन्तु मौजूदा हालत पर नज़र डालें तो पिछड़ी और अशिक्षित महिलाओं की बात तो दूर जो शिक्षित महिलाएं हैं, वे भी निजी से लेकर सार्वजनिक जीवन में, सरकारी और निजी सेवाओं में, खेल मीडिया और राजनीति जैसे क्षेत्रों में उत्पीड़न और शोषण का शिकार हैं |
सबसे अधिक चिंता की बात ये है कि जिन महिलाओं को समाज में महिलाओं के शोषण और अत्याचार के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया जाता है , वे स्वयं शोषण और उत्पीड़न का शिकार हैं | भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा सेवाओं में महिलाओं का शोषण और उत्पीड़न की घटनाएँ आये दिन सामने आती रहती हैं | देश में राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोग जैसी संस्थाओं को पर्याप्त अधिकार और संसाधन उपलब्ध कराए गये हैं, इसके बावजूद कई महिलाएं न्याय के लिए मुंह तकती सी रह जाती हैं | 

देश में इस तरह के शोषण और अत्याचार के ख़िलाफ़ कानून भी है परन्तु फिर भी क्या कारण है कि ऐसी घटनाओं में दिन–ब-दिन वृद्धि होती जा रही है? दरअसल इसके लिए शासन-प्रशासन का ग़ैरज़िम्मेदार रवय्या तो दोषी है ही, साथ में हमारा समाज और मानसिकता भी बेहद ज़िम्मेदार है | कमी हमारी व्यवस्था और सोच में भी है | क्योंकि अधिकतर ऐसी घटनाओं के बाद एक तरफ जहाँ कुछ राजनेताओं के ग़ैरज़िम्मेदार ब्यान अपराधियों के हौसले बुलंद करते हैं ,तो दूसरी तरफ हमारा समाज अपराधी को अपराधी न मानकर पीडिता को ही दोषी मान लेता है | जिसके कारण समाज और अदालत में होने वाली बदनामी और परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर अधिकतर ऐसे मामलों को दबा दिया जाता है | यदि कोई महिला अपने ऊपर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाती है, तो उसे डरा-धमका कर चुप करा दिया जाता है | पीड़िता के चरित्र पर ही सवाल खड़े किये जाते हैं. 
हमारा कानून पीड़िता को सुरक्षा कम देता है, भयभीत अधिक करता है | अपराधी अपने रसूख और पैसों के बल पर कानूनी शिकंजे से बच निकल जाता है | कानून में बच निकलने के रास्ते बकायदा मौजूद हैं | इस प्रकार की घटनाओं में वृद्धि का एक प्रमुख कारण ये भी है कि आज जिस तरह से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में महिला को किसी भी वस्तु और विज्ञापन के प्रचार और प्रसार के नाम पर देह प्रदर्शन के द्वारा एक भोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे समाज में महिलाओं के प्रति विकर्ष्ण पैदा होता है और गन्दी मानसिकता पनपती है | जिसके कारण बलात्कार अत्याचार और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याओं में वृद्धि हो रही है | और भी कई कारण है जैसे, लड़कियों को बचपन से ही दोयम दर्जे का समझना और मूल्य शिक्षा और अच्छे संस्कार का अभाव | यही वजह हैं कि इतने सामाजिक सुधार आन्दोलनों के बावजूद भी ये समस्या एक चुनौती पूर्ण समस्या बनती जा रही है | गंभीर समस्या होने के बाद भी हमारी सरकार इसे निरंतर अनदेखा कर रही है | 
कहते हैं कि जो बीत गया उसे बदला नहीं जा सकता लेकिन जो बदल सकता है, उसके बारे में सोचना आवश्यक है | इसलिए इस चुनौती पूर्ण समस्या के लिए किसी एक व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव समुदाय को आगे आना होगा | जो कमी हमारी व्यस्था और सोच में है, उसमे सुधार करना होगा तभी इस तरह की घटनाओं में कमी हो पायेगी | सर्वप्रथम तो जब भी ऐसी घटना घटती है तो इस अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ ज़रुर उठाई जाये क्योंकि अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना पीड़ित पक्ष की नैतिक ज़िम्मेदारी है | ऐसे मामलों में सम्बंधित महिला का नाम गोपनीय रखते हुए न्यायिक प्रकिया जल्दी शुरू की जानी चाहिए | क्योंकि न्यायिक प्रकिया जल्दी शुरू करने से पीड़ित पक्ष भावनात्मक रूप से मज़बूत होगा | समाज की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि पीड़िता को भावनात्मक सपोर्ट दी जाये, जिस से वो अपनी लड़ाई मज़बूती से लड़े| दूसरी ओर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में नारी की भूमिका में पर्याप्त सुधार करके ,पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण न करते हुए भोगवादी प्रवृति को समाप्त करके ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहाँ नारी को सम्मान की नज़र से देखा जाये | बालिकाओं को समानता का अधिकार देते हुए आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया जाये | आत्मरक्षा प्रशिक्षण को शिक्षा का एक अहम हिस्सा बनाया जाये | बच्चों को बचपन से ही ऐसे संस्कार दिए जाएँ जिस से कि वो स्त्री की इज्ज़त करना सीखे | 

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी | आर्थिक संबलता और आत्मनिर्भर होने के लिए सपनो को पूरा करते हुए , समाज में जो इंसानी भेड़िये घूम रहे हैं, उनको पहचान कर उनसे सावधान रहना होगा और साहस के साथ इनका सामना करते हुए ये बताना होगा कि नारी अबला नहीं है | यदि वो शोषण और अत्याचार के ख़िलाफ़ संघर्ष पर उतर आये तो दुनिया बदल सकती है | जब हम खुद अपनी लड़ाई लड़ेंगे तभी तो क़ानून और समाज हमारा साथ देगा , क्योंकि दुनिया में इंसानियत आज भी जिंदा है|                                                  
      

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 11 अप्रैल 1985 को मेरठ (उत्तर प्रदेश ) में
शिक्षा: बीए. (चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ )
सृजन: समसायिक विषयों पर इधर कुछ पोर्टल पर लेख
संप्रति: अध्ययन और स्वतंत्र लेखन
संपर्क: farhanariyaz.md@gmail.com)  

                                        
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गुरुवार, 7 अगस्त 2014

चटख़ धूप की दबीज़ चादर


 









मृदुला शुक्ला की कविताएं

पिता
चौतरफा दीवारें थी
भीतर घुप्प अँधेरा
एक खिड़की खुली

कुछ हवा आई
ढेर सारी रौशनी

तुम चौखट हो गए
आधे दीवार में धंसे से
आधे कब्जों में कसे से

ये जो उजाला है ना
खिडकियों के नाम है

चौखट तो अब भी
डटी है दीवारों के सामने
अंधेरों से लड़ती......

पिता तुम चौखट ही तो रहे हमेशा ..
ये जो तमाम उजाले हैं हमारे हिस्से के
ये मुझ तक पहुंचे ही हैं
तुम्हारे कंधो पर सवार होकर ...

मेरी कविताएँ

कविताएं मुझे मिलती हैं
चौराहों पर ,तिराहों पर
और अक्सर
दोराहों पर

संकरी पगडंडियों पर कविताएं
निकलती हैं
रगड़ते हुए मेरे कंधे से कन्धा
और डगमगा देती हैं मेरे पैर

इक्क्का दुक्का दिख ही जाती है
तहखानों में अंधेरो को दबोचे
उजालों से नहाए
महानगरों की पोश कोलोनियों में

पिछले दिनों गुजरते हुए गाँव के
साप्ताहिक बाज़ार में
उसने आकर मुझसे मिलाया अपना हाथ
और फिर झटके से गुज़र गयी
मुस्कुराते हुए ,दबा कर अपनी बायीं आँख

मेरे बेहद अकेले और उदास दिनों में
वो थाम कर घंटो तक
बैठती हैं मेरा हाथ
थपथपाती है मेरा कन्धा
अपनी आँखों में
सब कुछ ठीक हो जाने की आश्वस्ति लिए

सच तो ये है कि
कविताये मुझे घेर लेती हैं
पकड़ लेती हैं मेरा गिरेबान
सटाक ,सटाक पड़ती हैं मेरी पीठ पर
और छोड़ जाती हैं
गहरे नीले निशान .....

मेरी पीठ पर पड़े गहरे नीले निशान ही तो हैं  मेरी कविताएं


धृतराष्ट्र होना आसान है, गांधारी होने से

धृतराष्ट्र  होना आसान है गांधारी होने से
धूल धुएं और कुहासे से भरे मौसमों में
आसन होता है जीवन
जब सब धुंधला सा हो ,आप गढ़ पाते हैं
मनोनुकूल परिभाषाएं
अपने अननुभूत सत्यों के

सहज होता है कहना
ठंडा पड़ा सूरज किन्नरों के हाथ की थाली है
बजते हुए किसी पुत्र जन्मोत्सव पर

अपने चेहरे पर उग आये कांटो को
मान लेना खरोंच भर
पिछली हारी हुई लड़ाई का
सामने रखे आदमकद आइने

आईने में भी हम खुद को देख
पाते हैं इच्छानुसार
घटा बढ़ा कर
पीछे से आता प्रकाश का श्रोत भर

कठिन समय में हथियार डालते हुए
आप खुद को पाते हैं बेबस, लाचार
बदलने में दृश्य को,
आइना झूठ नहीं बोलता
वो समझता है पीछे से आती प्रकाश की भाषा मात्र

मैं कल्पना करती हूँ
एक दिन प्रकृति उतार ले सूर्य ,चन्द्रमा
प्रकाश के तमाम श्रोत आकाश से
और टांग दे उनकी जगह उनके धुंधले प्रतिबिम्ब

निःसंदेह धृतराष्ट्र होना आसान है, गांधारी होने से


उकताहटें हावी हैं प्रतिबद्धताओं पर

मेरे सपने नहीं रहते अब
मेरी आँखों में
वो प्रायः होते हैं
क्रूर गाडीवान की भूमिका में
हाथ में चाबुक लिए ,
नाक के कसे नकेल,
गाड़ी में जुते दोनों बैलों की भूमिका में
अकेली होती हूँ मैं

कभी वो कूद कर सवार हो जाते हैं
मेरे कंधो पर
अटपटे रास्तों पर सुनाते हैं कहानियां
अंत में कहानी को रूपांतरित कर एक प्रश्न में,
चस्पा कर एक प्रश्नवाचक चिह्न
उगते सूरज के मुहं पर
वे फिर से जा बैठते हैं
बूढ़े बरगद पर ,बेताल की तरह

वो मुझे प्रायः मिल जाते हैं
प्रकाश से सराबोर रास्तो पर
चुपचाप चलते
हाथों में उठाये जलती मोमबत्तियां
मशाल की तरह

अब जबकि,उकताहटें हावी है
प्रतिबद्धताओं पर
छद्म मौलिकता के इस विषम दौर में
मैं रोज भरती हूँ उनमे
समुद्री हरा ,आसमानी नीला
और गौरैया के पंखों का धूसर सलेटी रंग ,
चौराहों पर लगी हाइड्रोजन लैम्पों के
नीचे से गुजरते
वो खो देते हैं अपनी पहचान
और घर लौट आते हैं ,मुहं लटकाए
गिरह कट गए मुसाफिर से

मैं खुद को पाती हूँ
रंगमंच पर ठठा कर हँसते हुए विदूषक सा
जो आंसू पोछने के लिए
प्रतीक्षा करता है
यवनिकापात की

वो खुद को साथ नहीं लाती

रोज सुबह
जब वो घर से निकलती है
खुद को घर मैं छोड़ आती है
और साथ ले लेती है अपने
वो तमाम असबाब......................
जिनको साथ रहना चाहती है वो

वो ओढ़ लेती है अपनी
पिछली रात की नींद
जो कभी पूरी नहीं होती
दिन के सपनो की वजह से

उसके कंधो पर सवार होती हैं
वो लोरियां
जिन्हें सुनाने से पहले
नींद आ धमकती है
उसकी आँखों मैं

उसकी आँखों मैं बसे होते हैं
रूहानी मुस्कुराहट वाले दो दांत
जिनके निकलने की तकलीफ
तारी रहती है ,हर वक्त उसके दिल दिमाग पर

मैं रोज मिलता हूँ उससे
बस पर चढ़ते,उतरते

बस वो नहीं मिलती मुझसे
क्यूंकि वो खुद को साथ नहीं लाती

अस्पताल

अस्पताल में अपने बिस्तर पर
अकेले लेटे,आप पाते हैं
आपके पास पर्याप्त कारण नहीं है दुखी होना का ,
वंहा मौजूद लोगों के चेहरे पर नाचती भय की तेखाएँ
भारी पड़ जाती हैं आपके हर दुःख पर

आप देखते हैं डॉ का सफ़ेद चोंगा पहनना उसे
नहीं साबित कर देता धवल ह्रदय होना
अक्सर साबित करता है ,
उसकी रगों में बहते लाल रंग का सफ़ेद हो जाना

बेवजह मुस्कुराती नर्सों के पास
कोई वाजिब वजह नहीं होती मुस्कुराने की
आप पाते हैं कि.उनके मुस्कुराने का सम्बन्ध
उनकी किसी आंतरिक प्रसन्नता से नहीं
उनके चूल्हे के रोटी से है

विभिन्न प्रकार के कचरों के निस्तारण के लिए रखे
लाल ,पीले, काले डिब्बे
आपको अपने ही मस्तिष्क के
गुप्त तहखानों से लगते हैं

मृत्यु के कोलाहल से भरी इस इमारत में
जीवन आकांक्षा नहीं आशा होता
डॉ के आखिरी न में सर हिलाने तक

चपटी थैली नुमा बोतल में खूंटियों पर लटकता रक्त
अक्सर टिकट होता है
आगे की सवारी का, जीवन की रेलगाड़ी में

यंहा दफ़न होती हैं मृत आशाएं
लिपटी सफ़ेद चादरों में
मृतात्माओं की जगह ,
उनके प्रेत नहीं ठहरते यंहा
चल पड़ते हैं अपने रोते बिलखते परिजनों के पीछे

सधः प्रसव पीड़ा मुक्त माँ की मुस्कुराह्टें
उलट देती
पीड़ा के सारी पिछली ज्ञात परिभाषाएं

नवजातों के कोमल रुदन परास्त करते रहते हैं
तीक्ष्ण मृत्युगंधी विलापों को

विशवास की पराकाष्ठा ,उम्मीदों के तिलिस्म होते हैं
टूटी कसौटियों खंडित आस्थाओं के शवदाहगृह होते हैं... अस्पताल

वो कमरा
बहुत बेतरतीब है कामगारों की बस्ती सा ये कमरा ,
बंद पड़ी दीवाल घडी वक्त पूछती रहती है सबसे
वक्त बे वक्त
और हमेशा अपना सीना टटोल ढूँढा करती है
टिक टिक की आवाज

चिंता में रहती है तीन टांगो वाली डायनिंग टेबल
इस घर के लोग अब कुछ खाते क्यूँ नहीं
याद करती है पकवानों की खुशबु
और खो जाती है बिना रुके चलती पार्टियों के दौर में

गठ्ठर मैं बंधी किताबें हुलस कर बात करती हैं अक्सर
उन दिनों की पढ़ी जाती थी बड़े शौक से

इस कमरे में अक्सर कानाफूसी होती है
यंहा टेबल तीन पैर की तिपाया दो पैर का
कुर्सियां बिना हत्थे की क्यूँ हैं

जब भी चरमरा कर खुलता है दरवाजा
चौकन्नी हो जाती है जंग खाई सिलाई मशीन
शायद आज फिर कोई तेल डाल करेगा पुर्जे साफ़, ,
वो इतराती हुई सी गढ़ेगी कुछ नया सा

हैंडल टूटे मग अक्सर बाते करते हैं कॉफ़ी के
अलग अलग फ्लेवर के बारे में,

कभी कभी मुझे ये कमरा बस्ती से दूर किसी वृधाश्रम सा लगता है
जहाँ सब खोये होते हैं अपनी जवानी के दिनों में,
सब रहते हैं उदास,
धूल की एक मोटी चादर बड़े प्यार से
समेट कर रखती उन सबको अपने भीतर,
जैसे अवसाद समेटे रहता है बुजर्गों को

मकड़िया मुस्कुराती रहती हैं सुन कर इनकी बातें
बुनते हुए जाल इस छोर से उस छोर तक
बुनते हुए मच्छरदानियों सरीखा कुछ

(रचनाकार-परिचय :
जन्म: 11 अगस्त १९७० को प्रतापगढ़ में
शिक्षा:स्नातकोत्तर
सृजन: उम्मीदों के पाँव भारी हैं  कविता संग्रह प्रकाशित
संप्रति : शिक्षण, गाज़ियाबाद
संपर्क : : mridulashukla11@gmail.com)

 
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बुधवार, 6 अगस्त 2014

हवा में लहू की गंध है












शायक आलोक की कविताएं

1.

एक पेड़ जो बूढा हो गया है
आँधियों में जिसके उखड़ जाने का खतरा है
जो हवाओं में चिंयारता है काठ कठोर आवाज़ में
उस पेड़ के लिए लिखता हूँ मैं कविता
मेरी चिड़िया बेटी गुनगुनाती है उसे.

2.

विचारधारा को तुमने खून की तरह रखा
खून खौलता था
ठंडा होता था
जम जाता था खून
खून पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता था

जबकि यह सब बस कहने की बातें थीं

तुम्हें रखना था विचारधारा को पानी की तरह
खौला सकते थे पानी
ठंडा कर सकते थे
जमा कर बना सकते थे बर्फ
काम के जरुरी रंग भी मिला सकते थे. 

3.

तुम्हारे समय का घाव
मेरे समय पर बचा हुआ दाग है
दाग में है तुम्हारे घाव की स्मृति

तुम्हारी स्मृति बचाऊं या कुरेद
लौटा लाऊं तुम्हारा समय
तय करो पिता !

4.

मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए सादिया हसन
ये चाय इतनी गर्म कभी न थी
इसकी मिठास इतनी कम कभी न थी.

मैं सूंघता हूँ मुल्क की हवा में लहू की गंध है
कल मेरे कमरे पर आये लड़के ने पूछा मुझसे
कि क्रिया की प्रतिक्रिया में पेट फाड़ अजन्मे शिशु को मार देंगे क्या
बलात्कार के बाद लाशें फूंक जला देंगे क्या
हम दोनों फिर चुप रहे सादिया हसन
हमारी चाय रखी हुई ठंडी हो गई.

हम फूलों तितलियों शहद की बातें करते थे
हम हमारे दो अजनबी शहर की बातें करते थे
हम चाय पर जब भी मिलते थे
बदल लेते थे नजर चुरा हमारे चाय की ग्लास
पहली बार तुम्हारी जूठी चाय पी
तो तुमने हे राम कहा था
मेरा खुदा तुम्हारे हे राम पर मर मिटा था.

पर उस सुबह की चाय पर सबकुछ बदल गया सादिया हसन
एक और बार अपने असली रंग में दिखी
ये कौमें ..नस्लें .. यह मेरा तुम्हारा मादरे वतन
टी वी पर आग थी खून था लाशें थीं
उस दिन खरखराहट थी तुम्हारे फोन में आवाज़ में
तुमने चाय बनाने का बहाना कर फोन रख दिया.

मैं जानता हूँ उस दिन तुमने देर तक उबाली होगी चाय
मैंने कई दिन तक चाय नहीं पी सादिया हसन.

मैं तुम्हारे बदले से डरने लगा
क्रिया की प्रतिक्रिया पर अब क्या दोगी प्रतिक्रिया
इस गुजार में रोज मरने लगा
जब भी कभी हिम्मत से तुम्हें कॉल किया
बताया गया तुम चाय बनाने में व्यस्त हो
मैंने जब भी चाय पी आधी ग्लास तुम्हारे लिए छोड़ दी.

गुजरात ने हम दोनों को बदल दिया था सादिया हसन.

ठंडी हो गई ख़बरों के बीच तुम्हारी चिट्ठी मिली थी-
‘’ गुजरात बहुत दूर है यहाँ से
और वे मुझे मारने आये तो तुम्हारा नाम ले लूँगी
तुम्हें मारने आयें तो मेरे नाम के साथ कलमा पढ़ लेना
और मैं याद करुँगी तुम्हें शाम सुबह की चाय के वक़्त
तुम्हारे राम से डरती रहूंगी ताउम्र
मेरे अल्लाह पर ही मुझे अब कहाँ रहा यकीन ‘’

तुम्हारे निकाह की ख़बरों के बीच
फिर तुम गायब हो गई सादिया हसन
मैंने तुम्हारा नाम उसी लापता लिस्ट में जोड़ दिया
जिस लिस्ट में गुजरात की हजारों लापता सादियाओं समीनाओं के नाम थे
नाम थे दोसाला चार साल बारहसाला अब्दुलों अनवरों के.

हजारों चाय के ग्लास के साथ यह वक़्त गुजर गया.

मैं चाय के साथ अभी अखबार पढ़ रहा हूँ सादिया हसन
खबर है कि गुजरात अब दूर नहीं रहा
वह मुल्क के हर कोने तक पहुँच गया है
मेरे हाथ की चाय गर्म हो गई है
ये चाय इतनी गर्म कभी न थी
इसकी मिठास इतनी कम कभी न थी
सादिया हसन, मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए.

5.

प्रार्थना से हम करते हैं
तुम्हारे प्रति हमारे अविश्वास की संस्तुति
और रखते हैं आँखें बंद कि
हमारे समक्ष होने में प्रकट
तुम्हें खुली आँखों से भय न हो ईश्वर !

और हम हाथ इसलिए जोड़े रखते हैं कि
तुम हो नहीं
जो होते तो थामते हाथ
कि हमारे एक हाथ को देता है ढाढस
हमारा ही हाथ दूसरा.

6.

आर्मेनिया में गुलाब को क्या कहते हैं अना अनाहित
और क्या कहते हैं फूल पत्ती चाँद तितली चिड़िया को
छोड़ो कहो प्यार को क्या कहते हैं
और क्या कहते हैं लाल ताशअमल को.

सबसे पुराने चमड़े के जूते को क्या कहते हैं
क्या कहते हैं स्कर्ट को
अना अनाहित, क्या तुम स्कर्ट पहनती हो.

अपने उनतालीस वर्णक्रम से
मेरे बावन अक्षरों के संवाद को जवाब दो
कहो अना अनाहित
आर्मेनिया की लड़की को ब्याह के लिए कैसा वर चाहिए.

7.

तुम मेरी बात सुनो
मैं मेरा समय तुम्हें सौंपना चाहता हूँ
मेरे समय के कई मुंह हैं
इसने हर मुंह से काटना सीख लिया है
दुनिया के किसी रसायन शाला में नहीं बना अभी
इसकी काट का जहर
इसलिए तुम्हें इसे पालना सीखना होगा
सहलाने पुचकारने की कला आजमानी होगी.

मेरे पूर्वजों ने मुझे अपना समय सौंपा था
मैं तुम्हें मेरा समय सौंपना चाहता हूँ
सुनो मेरी बात.

सुनो सुनो
या एक और इंतजाम करो
हथियार तलाश करो
मेरे समय का मुंह कुचल मार दो इसे.

8.

चींटियों को यकीन है आएगी बारिश
कौवे को यकीन आएगा आने वाला
लड़की को यकीन है पत्थर देवता ढूंढ लायेंगे अच्छा घर वर
पंडित को यकीन कि मरेगी बिल्ली और बरसेगा सोना.

मछलियों को यकीन है कि तालाब में रहेगा साल भर पानी
बगुले को यकीन एक रोज चुग लूँगा मन भर मछलियाँ
केकड़े को यकीन वह बचेगा हर सूरत में

घर को यकीन है लौट आएगा प्रवासी
सिपाही को यकीन है जल्द ही बुला लेगा घर. 

सब यकीन में जी रहे हैं. 

मुझे यकीन है कि अब बदल गया है समय 
पुरानी बात रही नहीं 
यकीन पर भरोसे लायक रही नहीं दुनिया. 


(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 11.01.1983 बेगूसराय, बिहार में
शिक्षा : इतिहास और मनोविज्ञान में स्नातक, स्नातकोत्तर (हिंदी साहित्य)
सृजन: कुछ कविताएं समावर्तन रेखांकित, जनसत्ता, कथादेश, शुक्रवार वार्षिकी आदि में छपीं
पहली कहानी निकट पत्रिका में.
संप्रति : सन्मार्ग अखबार, पटना में पोलिटिकल फीचर एडिटर के रूप में कार्य. आलेख और कॉलम लिखे. कस्बाई न्यूज़ चैनल सिटी न्यूज़ में कुछ दिनों पत्रकारिता बाद फ़िलहाल दिल्ली में रहकर स्वतंत्र  लेखन और जीविका के लिए अनुवाद करते हैं.
संपर्क: shayak.alok.journo@gmail.com)   
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