बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

मुल्क के लाल कब तक रहें बदहाल !

















आज़ादी के संग्रामी व दुमका के पहले सांसद की विधवा के मार्फ़त 
























गुंजेश की क़लम से 


यह सरायदाहा गाँव है. यहीं आज़ादी के नामवर सिपाही लाल हेंब्रम उर्फ़ लाल बाबा  ने विदेशी दासता के क्रूर दस्तावेज़ को मटियामेट करने की कोशिश की थी, जिसकी उन्हें सज़ा भी मिली.लेकिन सत्ता से विद्रोह करने के खामियाजा से उनका  परिवार आज भी ज़ार-ज़ार है. महज़ सत्ता के चेहरे अपने हैं! अपनी सारी की तरह ही उनकी विधवा मोंगली देवी तार-तार हो चुकी ज़िंदगी को समेटने के अथक प्रयास में है. इस सिलसिले में 28 जुलाई को उसे मुख्यमंत्री से भी उस तोते की कहानी ही मिली.काम हो जाएगा! वह मिली तो भी किसी व्यक्तिगत हित के लिए नहीं उनकी मांग थी कि मुख्य सड़क से गाँव को जोड़ने वाली जगह कुसपहाड़ी मोड से सरायदाहा गाँव तक सम्पूर्ण सड़क का निर्माण हो, लाल बाबा के नाम से गाँव के बाहर तोरण द्वार बनाया जाय और स्कूल के पास वाली जगह पर गाँव के बच्चों के खेलने के लिए स्टेडियम का निर्माण किया जाय। आज अगर आपके मोहल्ले में आपके सांसद या विधायक या जिला परिषद के ही किसी नेता का घर हो तो आपको बिजली, पानी, सड़क की तकलीफ तो बिलकुल नहीं होगी, लेकिन शहर के पहले और सबसे कर्मयोगी सांसद के घर न तो सड़क पहुंची है, न ही गाँव में पानी और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था हो पाई है। 21 अगस्त भी गुज़र गया. लालबाबा की 37 वीं पुण्यतिथि थी.विधवा के आंसूं में सरकार की कलई पुनः: धुल गयी.
9 अगस्त 1942 को जब देश भर में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ था तो संथाल परगना जिले के मुख्यालय में भी अँग्रेजी सरकार का जबरदस्त विरोध हुआ था और मुख्यालय में कांग्रेसी झण्डा भी फहराया गया था, बाद में अँग्रेजी सरकार की फौज आंदोलनकारियों के नेता लाल हेंब्रम की तलाश में लग जाती है और पकड़ नहीं पाने पर उन्हें भगौड़ा घोषित कर देती है। लाल हेंब्रम भूमिगत होकर सरकार के खिलाफ आंदोलन जारी रखते हैं, लाल सेना का गठन करते हैं। आज भी लाल हेंब्रम को अँग्रेजी सरकार से लड़ते-भिड़ते संथाल आदिवासियों को संगठित कर आज़ादी मिलने तक अंग्रेजों के नाक में दम कर देने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है। आज़ादी के बाद 1952 पहले चुनाव में कांग्रेस लाल हेंब्रम को टिकट देती है, भारी मतों से जीतकर लाल हेंब्रम दुमका के पहले सांसद बनते हैं. पाँच साल के कार्यकाल के दौरान दौरान उन्होंने डिवीसी (दामोदर वैली कार्पोरेशन) को स्थापना करवाई । दुमका में संथाल परगना महाविदयालय और राजकीय पोलेटेनिक की स्थापना और दुमका और पश्चिम बंगाल सीमा पर स्थित मसांजोर डैम के  निर्माण में भी  उनका महत्वपूर्ण योगदान है। 16 करोड़ की लागत वाला यह डैम सिर्फ एक वर्ष में बन कर तैयार हो गया गया था।  









 






पहले सांसद के घर-गाँव में 

   
     
जब हम मोंगली देवी से मिलने के के लिए सरायदाहा गाँव के लिए निकले थे तो यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि सचमुच में यह एक पूर्व एवं प्रथम सांसद का गाँव है और गाँव में उनके घर को पहचानना और उसपर यकीन करना और भी ज़्यादा मुश्किल था। दुमका-रामपुरहाट सड़क पर दुमका से 15-17 किलोमीटर चलने के बाद आप कुसपहाड़ी मोड पहुँचते हैं और फिर वहाँ से दाईं तरफ मुड़ जाते हैं, एक ठीक- ठाक आरामदेह सड़क आपको सरायदेहा गाँव तक ले जाती है। शुरुआत में ही, 1964 में अपनी मृत्यु से 6-7 महीने पहले लाल बाबा कि और से बनवाया गया हाई- स्कूल आपको नज़र आता है आप खुश हो सकते हैं इस गाँव में इतना बड़ा स्कूल , सड़क अभी भी ठीक ठाक है। थोड़ा और आगे जाने पर आपको एक मिडिल स्कूल भी मिलेगाआगे बढ़ते हैं, दाईं तरफ़ एक मजार जैसा कुछ है, श्रुति हेंब्रम,(उम्र 12साल) को यहीं पर दफ़नाया गया था कुछ साल पहले जोंडिस से उसकी मृत्यु हो गई थी, यह इत्तेफाक है या कोई बुरा सच सड़क की बाईं तरफ़ ही स्वास्थ्य केंद्र है, स्वास्थ्य विभाग ने विज्ञापन लगा रखा है “कोंडम को अपनाएं, दो बच्चों में तीन साल का अंतर बनायें”। बच्चे ज़िंदा कैसे रहेंगे सरकार इसका कोई विज्ञापन क्यों नहीं बनाती? खैर, आरामदेह सड़क पर हम आगे बढ़ते हैं। और आखिर सड़क खत्म हो ही जाती है, सड़क के खत्म होते ही शुरू होता है लाल बाबा का घर। लाल बाबा को बचपन में देखने वाले लीताई हैंब्रम बताते हैं कि 2 साल पहले सड़क बनी है पर लाल बाबा का घर छोड़ दिया गया “पता नहीं काहे”। टूटी-फूटी सड़क के ठीक बगल में मिट्टी के दीवार पर खपरैल का छत, यही है लाल बाबा का घर। घर के मुख्य द्वार के ऊपर आपको, सचिन की हेलमेट की तरह, तीन रंगों की पट्टी नज़र आएगी, गुलाबी, सफ़ेद और हरा, मैं समझता हूँ यह तिरंगा बनाने की कोशिश रही होगी जो संसाधनों के कमी के कारण अधूरी रह गई।






















कम नहीं हैं जीवन के रंग

दिमाग में था की बाद में किसी से पूछूंगा कि यह तिरंगा बनाने की ही कोशिश हैं न ! पर गोबर से लिपे और चुने से पुते उस घर आँगन में जीवन के जिस रंग को मैंने महसूस किया वह उपेक्षा का रंग था। हमारे लिए कुर्सियाँ लगाई जाती है मोंगली देवी कासे के लोटे में हमारे लिए पानी लाती हैं और बड़े एहतराम से हमें पारंपरिक नमस्कार भी करती हैं। हम पानी-पानी हो जाते हैं, कुछ दिन पहले इन्हें ही हमारे जिला के उपायुक्त ने मंच से आदेश दे कर उतरवा दिया था। क्या व्यवस्था पर किसी का ऋण नहीं चढ़ता?  मोंगली देवी अब ऊंचा सुनती हैं, हिन्दी बोल नहीं पाती पर बिना बोले बिना समझाये वह बहुत कुछ बोल समझा जातीं हैं 6 महीने से सांसद को मिलने वाला उनका पेंशन बंद है, बैंक कहती है सबूत लाइये की आप लाल हेंब्रम की पत्नी है। संथाली में यह कहते हुए वह मुस्कुरा देती हैं। यही हसना-मुस्कुराना चुनौती है व्यवस्था के लिए।
महात्मा गांधी के भारत और पूर्व सांसद के गाँव के उपेक्षा की कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि यहाँ भी आपको वह सब कुछ देखने को मिल जायेगा जो आप किसी भी गाँव में देख सकते हैं। अनियमितताओं में समानता हमारी सरकारी योजनाओं की खासियत है। फिलहाल सरायदाहा में एक स्वास्थ्य उप केन्द्र बन रहा है योजना की कुल राशि दस लाख रुपये है। गोपी नाथ सोरेन, जो उस योजना के मुंशी है और गाँव के ही निवासी हैं बताते हैं कि इस्टिमेट तो चिमनी ईटा का है, पर चिमनी ईटा लगेगा तो काम कैसे होगा। इंजीनियर साहब को कहते हैं की ठीक माल नहीं आ रहा है तो बोलते हैं जो जो आ रहा है उसीमें काम करो। जादे बोलेंगे तो काम से निकाल देगा। योजना में काम करने वाले राजमिस्त्री नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं जिस तरह काम हो रहा है उसमें तो बिल्डिंग पाँच से सात लाख में बन जायेगा। हम बचे पैसों में उनके हिस्से के बारे में पुछते हैं वो हंस कर कहते हैं मिलता है पर जादे तो साहबे लोग के पाकेट में जाता है। यह सब बात करते हुए हम लालबाबा की समाधि पर पहुँच जाते हैं, यह समाधि उनके ही ज़मीन पर उनके अपने बेटे ने बनवाई है, मायावती याद आती हैं। कई बार इतिहास खुद को नहीं दुहराता। लालबाबा के परिवार ने नरेगा के अंतर्गत बनने वाले सिंचाई कुआं के लिए अपनी ज़मीन भी दी लेकिन अब सिंचाई कुआं का काम तीन महीने से अधूरा है, रुका है, खुला कुआँ किसी के लिए भी खतरनाक हो सकता है खैर इस गाँव में कोई प्रिंस नहीं रहता। 



















अब दस रुपये की भी साख नहीं!

लौटते हुए मोंगली जी चाय- बिस्कुट कराना चाहती हैं, हम थोड़े हड़बड़ी में हैं वह जल्दी से किसी को बिस्कुट लाने भेजती हैं। तब तक हम लीताई हैंब्रम से गाँव में डाक्टर की आवाजाही के बारे में पूछते हैं, लीताई हेंब्रम की अपनी समझदारी है “डाक्टर यहाँ काहे आयेगा, दुमका में रोगी देख के कमाता है यहाँ आयेगा तो उसको पैसा कौन देगा, आता है कभी-कभी ....”। चाय तैयार हो गई है चाय देते हुए मोंगली जी ने संथाली में जो कुछ कहा उसका आशय था “बिस्कुट लेने भेजे थे लेकिन डीलर बोला नोट ठीक नहीं है, लड़का को लौटा दिया”।
जिन लालबाबा के आवाहन पर कभी पूरा संथाल परगना अंग्रेजों के खिलाफ एक जुट हो गया था आज क्या उनके परिवार पर दस रुपये का भी भरोसा नहीं किया जा सकता।



इस व्यथा को आप तहलका के बिहार-झारखंड संस्करण, १५ सितम्बर ११ में भी पढ़ सकते हैं.


(लेखक परिचय 
जन्म: बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में ९ जुलाई १९८९ को
शिक्षा: वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर वर्धा से
सृजन: अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस  में लेख, रपट, कहानी, कविता
ब्लॉग: हारिल
संपर्क:gunjeshkcc@gmail.com

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सोमवार, 29 अगस्त 2011

केदारनाथ का ईद मुबारक











केदारनाथ अग्रवाल की कलम से


हमको,
तुमको,
एक-दूसरे की बाहों में
बँध जाने की
ईद मुबारक।

बँधे-बँधे,
रह एक वृंत पर,
खोल-खोल कर प्रिय पंखुरियाँ
कमल-कमल-सा
खिल जाने की,
रूप-रंग से मुसकाने की
हमको,
तुमको
ईद मुबारक।

और
जगत के
इस जीवन के
खारे पानी के सागर में
खिले कमल की नाव चलाने,
हँसी-खुशी से
तर जाने की,
हमको,
तुमको
ईद मुबारक।





















और
समर के
उन शूरों को
अनुबुझ ज्वाला की आशीषें,
बाहर बिजली की आशीषें
और हमारे दिल से निकली-
सूरज, चाँद,
सितारों वाली
हमदर्दी की प्यारी प्यारी
ईद मुबारक।

हमको,
तुमको
सब को अपनी
मीठी-मीठी
ईद-मुबारक।

रचनाकाल: २१-११-१९७१ 


हिंदी के इस अहम कवि का यह जन्मशती वर्ष है!
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सोमवार, 22 अगस्त 2011

कुरआन,मक्का, तिलिस्म और वसीयत














 बाबुषा कोहली की कवितायें  





















कुरआन की पहली आयत

"सब खूबियाँ 
अल्लाह को,
मालिक जो -
सारे जहां वालों का ;
सारी तारीफें 
तेरी ही हैं ! "
यही है न ,
कुरान  की ,
पहली आयत !
मेरे मौला,
मेरे मालिक -
तेरी ही तो हैं,
सब तारीफें !
गुज़ारिश है ,
एक छोटी-सी -
मानेगा तू?
ले -ले मेरी 
कमजोरियां;
तू अपने सर !
ले- ले मेरे 
गुनाह भी तू ,
अपने सर !
ले - ले मेरी 
ये संगदिली ;
तू अपने सर -
एकदम मेरे
बाप की तरह !
दे दे मुझे तू 
हुक्म ,
कि बदल दूँ 
 ये आयत !
क्या पता -
शायद ,
कुछ शर्म 
आ जाए मुझे !
शायद -
दुरुस्त हो जाऊं ,
मेरे मालिक !

 (मार्च २४,२०११)




















 मक्का 



वह राह -
नहीं जाती
'मक्क़ा' को -
लेकिन
पहुंचाती है
आख़िर में -
'मक्क़ा' ही !
 (अप्रैल 30 , 2011)

वसीयत
अपने पूरे होशो - हवास में
लिख रही हूँ आज मैं 
वसीयत अपनी !


मर जाऊं जब मैं 
खंगालना मेरे कमरे को
टटोलना हर एक चीज़ -


दे देना मेरे ख़्वाब
उन तमाम स्त्रियों को
जो किचन से बेडरूम
और बेडरूम से किचन की दौड़ाभागी में 
भूल चुकी हैं सालों पहले ख़्वाब देखना  !

बाँट देना मेरे ठहाके 
वृद्धाश्रम के उन बूढों में
रहते हैं जिनके बच्चे -
अमेरिका के जगमगाते शहरों में !

टेबल में मेरे देखना
कुछ रंग पड़े होंगे 
दे देना सारे रंग  -
उन जवानों की विधवाओं को
शहीद हो गए थे जो 
बॉर्डर पर लड़ते-लड़ते !

शोखी मेरी ,मस्ती मेरी
भर देना उनकी रग - रग में -
झुक गए कंधे जिनके
बस्ते के भारी बोझ से !


आंसू मेरे दे देना
तमाम शायरों को
हर बूँद से होगी ग़ज़ल पैदा
मेरा वादा  है !


मेरी गहरी नींद और भूख
दे देना 'अंबानियों' औ'  'मित्तलों' को 
बेचारे न चैन से सो पाते हैं
न चैन से खा पाते हैं !


मेरा मान , मेरी आबरू
उस वेश्या के नाम है -
बेचती है जिस्म जो
बेटी को पढ़ाने के लिए !

इस देश के एक-एक युवक को 
पकड़ के लगा देना 'इंजेक्शन'
मेरे आक्रोश का

पड़ेगी इसकी ज़रुरत
क्रान्ति के दिन उन्हें !


दीवानगी मेरी
हिस्से में है
उस सूफ़ी के
निकला है जो सब छोड़ कर ,
ख़ुदा की तलाश में ! 


बस !


बाक़ी बचे -
मेरी ईर्ष्या,
मेरा लालच ,
मेरा क्रोध ,
मेरे झूठ ,
मेरे दर्द -
तो -
ऐसा करना ;
उन्हें मेरे संग ही जला देना !

( मार्च ९,२०११)

तिलिस्म
मत ढूंढो मुझे शब्दों में
मैं मात्राओं में पूरी नहीं
व्याकरण के लिए चुनौती हूँ

न खोजो मुझे रागों में 
शास्त्रीय से दूर आवारा स्वर  हूँ
एक तिलिस्मी धुन हूँ
मेरे पैरों  की थाप
महज कदमताल नहीं
एक आदिम  जिप्सी नृत्य हूँ

अपने पैने नाखूनों को कुतर डालो
मेरी तलाश में मुझे मत नोचो
एक नदी जो सो रही है भीतर कहीं
उसे छूने की चाह में मुझे मत खोदो
मत चीरो फाड़ो 
कि मेरी नाभि से ही उगते हैं रहस्य

इस सुगंध को पीना ही मुझे पीना है
मुझे पा लेना मुट्ठी भर मिट्टी पाने के बराबर है
मुझमें खोना ही  अनंत आकाश को समेट लेना है

स्वप्न हूँ भ्रम हूँ मरीचिका मैं
सत्य हूँ सागर हूँ मैं अमृत ..












परिचय : बाबुशा लिखती हैं, बड़ी झिझक हो रही है . परिचय तो है ही नहीं मेरा ..सच मानिए इस बात को ..! भला एक आवारा रूह का क्या परिचय बनाया जाए ?
क्या परिचय दे दिया जाए ..मैं दो दिन यही बात सोचती रही और ख़लील जिब्रान लगातार याद आते रहे जो जीवन में एक ही बार ठिठके जब किसी ने पूछा कि तुम कौन हो ?
बड़ी मुश्किल !
सच में मेरी पात्रता नहीं है कि कुछ भी मेरे बारे में लिखा जाए.
आप चाहें तो कविताओं के नीचे सिर्फ़ 'बाबुषा कोहली' लिख सकते हैं .

विजय के सारे पदक एक दिन पानी में बह जायेंगे..
कुछ भाव गढ़े जो शब्दों में , वो ही बाक़ी रह जायेंगे..

(यह जानकारी  उनके फेसबुक प्रोफाइल से मिली:
जन्म: कटनी में ६ फरवरी , १९७९
शिक्षा: रानी दुर्गावती विश्विद्यालय से
सम्प्रति:  केन्द्रीव विद्यालय जबलपुर में अंग्रेजी अध्यापन
संपर्क:babusha@gmail.com
ब्लॉग:कुछ पन्ने और बारिस्ता )

 
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रविवार, 7 अगस्त 2011

श्रद्धा जैन की भीगी ग़ज़लें



















 1
मुझसे इतना भी हौसला न हुआ
जब बुरा बन गया, भला न हुआ

ज़ख्म के फूल अब भी ताज़ा हैं
दूर होकर भी फासला न हुआ

तेरी आहट क़दम-क़दम पर थी
ज़िंदगी में कभी खला न हुआ

होने वाली है कोई अनहोनी
वक़्त पर एक फ़ैसला न हुआ

रेज़ा-रेज़ा बिखर गए सपने
लोग कहते हैं मसअला न हुआ

हादसा होते सबने देखा पर
कोई उलझन से मुब्तला न हुआ
2.
जैसे होती थी किसी दौर में, हैवानों में
बेसकूनी है वही आज के इंसानों में

जल्द उकताते हैं हर चीज़ से, हर मंजिल से
ये परिंदों की सी आदत भी है दीवानों में

उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे, कह कर
नाम लिखवा लिया अब हमने भी नादानों में

जिस्म दुनिया में भी जन्नत के मज़े लेता रहा
रूह इक उम्र भटकती रही वीरानों में

उसकी मेहमान नवाजी की अदाएं देखीं
हम भी सकुचाए से बैठे रहे बेगानों में

नाम, सूरत तो हैं पानी पे लिखी तहरीरें
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में

झूठ का ज़हर समाअत से उतर जाएगा
बूंद सच्चाई की उतरे तो मेरे कानों में

जो भी होना है वो निश्चित है, अटल है ‘श्रद्धा’
क्यूँ न कश्ती को उतारे कभी तूफानों में
3.
नज़र में ख़्वाब नए रात भर सजाते हुए
तमाम रात कटी तुमको गुनगुनाते हुए

तुम्हारी बात, तुम्हारे ख़याल में गुमसुम
सभी ने देख लिया हमको मुस्कराते हुए

फ़ज़ा में देर तलक साँस के शरारे थे
कहा है कान में कुछ उसने पास आते हुए

हरेक नक्श तमन्ना का हो गया उजला
तेरा है लम्स कि जुगनू हैं जगमगाते हुए

दिल-ओ-निगाह की साजिश जो कामयाब हुई
हमें भी आया मज़ा फिर फरेब खाते हुए

बुरा कहो कि भला पर यही हक़ीकत है
पड़े हैं पाँव में छाले वफ़ा निभाते हुए
4.
जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी

भुखमरी, क़ैद, गरीबी कभी तन्हाई, घुटन
सच की इससे भी जियादा कहाँ कीमत होगी

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी

नाज़ सूरत पे, कभी धन पे, कभी रुतबे पर
ख़त्म कब लोगों की आखिर ये जहालत होगी

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी

कविता कोश के पाँच वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में  प्रथम कविता कोश सम्मान से आज  7 अगस्त को जयपुर में श्रद्धा जैन को भी अलंकृत किया जाना है.हमज़बान की ओर से उन्हें अनगिनत मुबारकबाद.

परिचय :जन्म : ८ नवम्बर,१९७७] विदिशा, मध्यप्रदेश  में
शिक्षा: रसायन  में स्नातकोत्तर
सृजन: गजलों का शतक
सम्प्रति: ग्लोबल इंटर नेशनल स्कूल, सिंगापूर में हिन्दी का अध्यापन
संपर्क: shrddha8@gmail.com
ब्लॉग : भीगी ग़ज़लें  
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