मंगलवार, 27 सितम्बर 2011

गुमनाम अर्थियों को मिला इंसानियत का कंधा













50 लावारिस शवों का खालिद ने किया एक साथदाह-संस्कार, पितृपक्ष में मिला मोक्ष
[अस्पताल की मोर्चरी में छह माह से पड़े थे] 





















पचास अंत्येष्टियां एक साथ हुईं, लेकिन रोनेवाला कोई नहीं। ये बदनसीब मृत आत्माएं उनकी थीं, जो अलग-अलग हादसों में मारे गए, लेकिन पहचाने नहीं गए। मोर्चरी जब इंसानों के पार्थिव शरीर से भर गई तो प्रशासन ने उनके दाह-संस्कार की इजाजत तो दी, पर सरकार का कोई नुमाइंदा नहीं आया। लेकिन मुर्दा कल्याण समिति, हजारीबाग के मोहम्मद खालिद ने इन आत्माओं को मोक्ष देने का पुण्य हासिल किया। वे किस मजहब के थे, कौन थे, कहां से आए थे, कैसे मौत आ गई, इन सवालों के बीच जब खालिद ने हिंदू रीति-रिवाज से चिताओं को मुखाग्नि दी, ऐसा लगा जैसे पितृपक्ष में इन आत्माओं को स्वर्ग में ठिकाना मिल गया हो। 
 
कैसे शुरू हुआ इनका अंतिम सफर 

शनिवार को सुबह ही मुर्दा कल्याण समिति की टीम हजारीबाग से रिम्स,रांचीपहुंच गई थी। जाति, धर्म और संप्रदाय के दायरे को लांघ कर मुर्दाघर में शवों को बाहर निकालने के लिए खालिद आगे आए। कटे-छंटे जिस्मों में रसायनिक लेप लगाया गया। उनके साथ थे विभु दा, इमरान खान, मो. निजाम, अशोक सिंह, विनोद कुमार सिंह और मो. रियाज आदि। सभी शवों को पैक किया गया। पांच एंबुलेंस पर 50 अनाम लाशों को लेकर जब टीम जुमार नदी पुल पर पहुंची, तो अंधियारे ने दस्तक देनी शुरू कर दी। बूंदाबांदी भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी, मानो आसमान रो रहा हो। लेकिन खालिद तो अलग ही मिट्टी के बने हैं। यहां विभु दा ट्रैक्टर के साथ पहले से तैयार थे। बारी-बारी से सभी पैके ट निकाल कर ट्रैक्टर पर लादे गए। खालिद ट्रैक्टर पर चढ़ गए। इमरान और अशोक आदि बारी-बारी से पैकेट पकड़ाने लगे। पुल से दायीं ओर एक किमी पर इनके लिए आठ बड़ी-बड़ी चिताएं सजाई गई थीं। वहां पहुंचकर सभी साथी ने सम्मानपूर्वक इन शवों को चिताओं पर लिटाया। खालिद टै्रक्टर से नीचे आए। चिताओं के निकट गए। मुखाग्नि के समय उनकी आंखें डबडबा आईं। चारों ओर धधकती ज्वाला। मृतात्माओं के तेज से दूर छिटकता अंधियारा। मुर्दा कल्याण समिति के सदस्य इस पुनीत काम से प्रसन्न थे कि चलो देर से ही सही मृत आत्माओं को मुकाम तो मिल गया।
 
मैं तो इंसानियत का इम्तिहान दे रहा हूं 

किसी हादसे के कारण मृत हुए परिजनों के शव से भी लोग कतराते हैं। ऐसे शवों का अंतिम संस्कार करने को कोई तैयार नहीं होता। अगर कोई वारिस नहीं हुआ तो ऐसी लाशों की बड़ी दुर्गति होती है। पहले मैं अकेले ही ऐसा करता रहा। एक दिन हजारीबाग में ही तापस दा से मुलाकात हो गई। वह भी अपने स्तर पर ऐसा ही कर रहे थे। सोलह साल पहले हम लोगों ने मिलकर शुरुआत की। अब कई साथी इस नेक काम में सामने आए हैं। ऐसा कर मैं खुद के इंसान होने के प्रयास में हूं। कहने दीजिए, मैं तो इंसानियत का इम्तिहान दे रहा हूं । हमें क्षोभ है तो सिर्फ रांची जिला प्रशासन से, जिसने इन शवों के अंतिम संस्कार करने के लिए ढाई महीने बाद अनुमति दी, वह भी ऐसे समय में जबकि बारिश हो रही है। लेकिन मैं अपने साथियों का शुक्रगुजार हूं कि इन्होंने हिम्मत न हारी। मैं आपके अखबार के माध्यम से सरकार से अनुरोध करना चाहता हूं कि हम यह क्यों भूल जाते हैं कि ये भी कभी जिंदा इंसान थे। गुमनामी के अंधेरे से निकालकर क्या इज्जत के साथ इनकी अंतिम विदाई नहीं की जानी चाहिए।  
मोहम्मद खालिद
प्रमुख, मुर्दा कल्याण समिति


जिम्मेदार कौन, सब मौन



असहाय अस्पताल

रिम्स के निदेशक तुलसी महतो का तर्क हैरान करनेवाला है। हो सकता है वे सच बोल रहे हों। कहते हैं, अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी हमारी नहीं है। कितने शवों का संस्कार हुआ, उन्हें कुछ पता नहीं। उन्हें यह भी पता नहीं कि मोर्चरी में अब कितने शव हैं।


पुलिस ने पल्ला झाड़ा 

 
शहर पुलिस अधीक्षक रंजीत कुमार प्रसाद कहते हैं, लावारिस लाशों का दाह- संस्कार करने की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं है। मेडिकल छात्रों की स्टडी के लिए ऐसे शव रिम्स में रखे जाते हैं। हमारा काम सुरक्षा देना है। आज पुलिस भेज दी गई थी। 


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3 comments: on "गुमनाम अर्थियों को मिला इंसानियत का कंधा"

नीरज गोस्वामी ने कहा…

KYA KAHUN...BOLTI BAND HO GAYI HAI

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मानवता का नाम रोशन हो गया।

kshama ने कहा…

Samajh me nahee aata kya kaha jaye....

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हम स्याही के हैं दुश्मन,
न सफेदी के दोस्त
हम तो आईना हैं ,
आईना दिखा देते हैं.

शायर क़सीम अख्तर की दुआ



हम क़लम हम ज़ुबान बन जाओ,

बन सको तो इन्सान बन जाओ.

तारीकी -ए- जहालत है हर सू,
नूर-ए-इल्म बनो, फैज़ान बन जाओ.

हालात -ए- जंग हों गर पैदा,
वतन-ए-अज़ीज़ का पासबान बन जाओ.

तय कर लो तरक्क़ी के मदारिज,
और बुलंदी -ए- आसमान बन जाओ.

कहलाने के वास्ते ही नहीं,
अमल से मुसल्लम ईमान बन जाओ.

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