बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 1 जून 2014

ऋतु दा या ऋतु दी मतलब ऋतुपर्णो घोष

रिश्तों की जटिलता का बारीक फ़िल्मकार 



 








ऋतु कलसी की क़लम से  


विज्ञापन की दुनिया से अपना कैरियर शुरू करने वाले ऋतुपर्णो घोष ने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल फ़िल्मों के निर्माण से की। वर्ष 1994 में बाल फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी' के निर्देशन से उन्हें शोहरत मिलने लगी थी। इसके बाद 'उनिशे एप्रिल' के लिए उन्हें 1995 में 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाज़ा गया था। यह फ़िल्म प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक इंगमार बर्गमन की 'ऑटम सोनाटा' से प्रेरित थी। इस फ़िल्म में ऋतुपर्णो घोष ने माँ-बेटी के तनावपूर्ण रिश्तों को बारीकी से रेखांकित किया था। एक कामकाजी महिला अपने व्यावसायिक कैरियर में सफल है, लेकिन अपनी पारिवारिक ज़िंदगी में वह असफल रहती है। इसका असर उसकी बेटी पर होता है और बेटी अपनी माँ से इस बात को लेकर नाराज है कि वह अपने व्यवसाय को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व देती है। इस फ़िल्म में अपर्णा सेन, देबश्री राय और प्रसन्नजीत चटर्जी ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म को सिने प्रेमियों ने खूब सराहा था। उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें 'ऋतु दा' के नाम से पुकारने लगे थे।

ऋतुपर्णो घोष को फ़िल्म मेकिंग की प्रेरणा अपने पिता सुनील घोष से ही मिली थी। सुनील डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर और पैंटर थे। ऋतुपर्णो  ने अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा 'साउथ पॉइंट हाईस्कूल' से प्राप्त की। उन्होंने अपनी अर्थशास्त्र की डिग्री 'जादवपुर यूनिवर्सिटी', कोलकाता से प्राप्त की थी। आगे चलकर अपने आधुनिक विचारों को उन्होंने फ़िल्मों के जरिये पेश किया और जल्दी ही अपनी पहचान एक ऐसे फ़िल्म मेकर के रूप में बना ली, जिसने 'भारतीय सिनेमा' को समृद्ध किया। अपनी फ़िल्मों के माध्यम से ऋतुपर्णो घोष ने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। सारे बड़े फ़िल्मी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए तुरंत राजी हो जाते थे, क्योंकि उनकी फ़िल्मों में काम करना गर्व की बात थी। रिश्तों की जटिलता और लीक से हट कर विषय उनकी फ़िल्मों की ख़ासियत होते थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी और इस भाषा में वे सहज महसूस करते थे। इसलिए अधिकतर फ़िल्में उन्होंने बांग्ला भाषा में ही बनाईं। फ़िल्म फेस्टिवल में सिनेमा देखने वाले दर्शक और ऑफबीट फ़िल्मों के शौकीन ऋतु दा की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

ऋतुपर्णो घोष लेखक और कवि भी थे. बंगाल के सबसे प्रभावशाली लोगों में उनकी गिनती होती थी.कुछ समीक्षकों का यह भी कहना था कि उन्होंने बंगाल के साहित्य और फिल्म शैली को दुनिया तक पहुँचा कर, सत्यजीत रे की विरासत को आगे बढ़ाया था. लेकिन उनकी असमय मौत के कुछ वर्षों पहले वह फिल्म निर्माता कम और एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) समुदाय के प्रतीक ज्यादा बन गए थे.
ऋतुपर्णो ने सार्वजनिक रूप से क्रॉसड्रेसिंग करके, मेकअप लगाकर, पगड़ी और खूबसूरत दुपट्टों का इस्तेमाल शुरू कर पूर्वाग्रहों को चुनौती दी. अपनी लैंगिकता को स्वीकार कर उन्हें एक अलग किस्म का प्रशंसक वर्ग मिला, लेकिन उनके करीबी लोगों ने उनसे कुछ दूरी भी बना ली, और उन्हें मिला एक अकेलापन, जिसे उन्होंने दुखी मन से स्वीकार भी किया.उनके बारे में अप्रिय चुटकुले बनने लगे. हालाँकि शीर्ष अभिनेत्रियाँ (राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद में) उनके साथ काम करने के लिए उतावली थीं, लेकिन फिल्म उद्योग में अंतर्निहित होमोफोबिया को समझते हुए वह इस बात को लेकर सतर्क थे कि वह मर्द कलाकारों के साथ कैसे बातचीत कर रहे हैं.
ऋतुपर्णो ने अर एकती प्रीमर गोल्पो, मैमोरिज़ इन मार्च और चित्रांगदा में उन्होंने अभिनय भी किया. उन्होंने स्त्री की तरह दिखने के लिए कुछ सर्जरियाँ करवाईं और हॉर्मोन थेरेपी का सहारा भी लिया. इन फिल्मों को बनाने और खुद को सबके निशाने पर रखा उनका व्यक्तित्व फीका और सावधानीपूर्ण हो चुका था, और वह पूरी तरह से स्वयं को अलग-थलग महसूस करने लगे थे. लेकिन वह जानते थे कि वह अपने सेलेब्रिटी हैसियत का इस्तेमाल एलजीबीटी समुदाय के लिए कर सकते हैं.














फैशन शो हो या फिर पुरस्कार समारोह, ऋतु महिलाओं की पोशाक में नज़र आते थे जिसके लिए वो कई बार मीडिया में चर्चा का पात्र भी बन जाते थे. बावजूद इसके वो बिना किसी झिझक या शर्म के महिलाओं के कपड़े पहनते थे और समलैंगिकता पर अपने विचार खुलकर व्यक्त करते थे.ऋतु की सहकलाकार रही दीप्ति नवल का कहना है अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर इतना सहज मैंने किसी को नहीं देखा. उसने मुझे बताया था कि एक बार अभिषेक बच्चन ने उसे ऋतु दा नहीं ऋतु दी कहा और ये बताते हुए उसकी आंखों में चमक थी.
--
( रचनाकार परिचय:
 जन्म: 9 सितंबर
शिक्षा : एस एम् डी आर एस डी कालेज, पठानकोट से स्नातक
सृजन:पंजाबी की लगभग सभी स्तरीय पत्रिकाओं में कहानियां. दो पुस्तकें जल्द ही प्रकाश्य
रुचि: अध्ययन, लेखन और नृत्य
सम्प्रति:जालंधर से फ़िल्म की पत्रिका ‘सिने वर्ल्ड ’ का संपादन व प्रकाशन
ब्लॉग: पर्यावरण पर हरिप्रिया
संपर्क:reetukalsi@gmail.com)

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शनिवार, 31 मई 2014

हाशिए का आदमी












दिलीप तेतरवे की कविताएँ

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जो रात का खिलौना
और दिन का
होता है चाकर
जिसका कोई पता नहीं होता
पर जो लापता भी नहीं होता
जिसका कोई परिचय नहीं होता
पर जिसका परिचय
बड़े बड़े लोग
बनाते और बिगाड़ते रहते हैं
और जो
हर नए परिचय में
ढल जाता है
और मरने से पहले जो
अपने सारे
परिचयों से
मुक्त हो जाता है
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

2.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जिसकी जांघों पर
असमय
जबरन
अनेक लाल फूल
खिला दिए जाते हैं
और जो आदमी
समझ भी नहीं पाता
अचानक उग आये फूलों को
और जब वह
उन्हें समझ पाता है
उससे समझने का अधिकार ही
छीन लिया जाता है
और जिसकी आत्मा पर
महात्मागण
करते हैं योग
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

3.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जिसके सपनों के ऊपर
लोग अपने सपने जड़ देते हैं
और जिसके रोते हांफते ह्रदय पर
लोग घाव बना देते हैं
और उस पर नमक
छिड़क देते हैं
और जिसकी दुखती रगों पर
लोग छेड़-छाड़ करने से
कभी बाज नहीं आते हैं
और जिसे लोग
अपना काम पूरा होते ही 
एक झटके में
बाहर का रास्ता दिखा देते हैं
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है     


निराशा के पद
1.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जो यह हिसाब नहीं रख पाता कि
कितनी बार उसकी साँसें फूलीं
कितनी बार उसकी आत्मा चीखी
कितनी बार उसका दिल दरका
कितनी बार उसके प्राण
कंठ में अंटके
और जिसे लोग परदे में
बेपर्दा करते हैं
और खुले में
कानी आँख से भी नहीं देखते
और जो
अपनी छोटी सी जिन्दगी में
अनेक बार मौत से सामना करते हुए
मिट्टी में मिल जाता है
और जिसकी मिट्टी पर
किसी के आंसू नहीं गिरते
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

2.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जो माँगता रहा है
जन्म के बाद से ही
रोटी या मौत
और जो
इन दोनों के लिए
धारण करता रहा है
असीम/आश्चर्यजनक सहनशीलता
किन्तु
अब जो चल पड़ा है
आकाश को पृथ्वी पर लाने
उसके अहंकार को/धोने/सुखाने/मिटाने
और जो बनाने जा रहा है
अब रोटी को
सब का अधिकार
और मौत को प्राकृतिक
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है


3.

 यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जो निर्दोष
हमेशा ढोता रहा है
आरोपों का पहाड़
घाघ अपराधियों के द्वारा
बनाया गया/आरोपों का पहाड़
और जो अब
आरोपों के पहाड़ को ख़ारिज कर
जा रहा है बनाने
आरोप-प्रत्यारोप से मुक्त संसार
और जो तोड़ रहा है/वह परम्परा
जिसमें/एक चोर
दूसरे चोर को
बताता रहा है डाकू
और जो सारे चोरों के लिए
बना रहा है सुधार-गृह
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है



 आशा के पद

1.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जो दूसरों की कथित दया पर
कथित दानवीरता पर
रहता रहा है निर्भर
किन्तु जो अब
स्व-रचित शब्द-कोश में
दया और दान के
उचित और सात्विक अर्थ को
जा रहा है अंकित करने
और जो
समस्त छलने वाले शब्दों के
अर्थ और उद्देश्य को
तर्क और कर्म का
देने जा रहा है आधार
और जो/सम्पूर्ण भ्रष्ट-शब्द-कोश का
करने जा रहा है संपादन
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है                                 

2.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जो बुनता है
सब के लिए कपड़े
और किया जाता रहा है मजबूर
निवस्त्र रहने के लिए
लेकिन
जिसने अब
बुनकरों के लिए
उनके तन ढंकने लिए
कपड़ा बुनना
सिलना
कर दिया है प्रारंभ
और जो
पुरानी वस्त्र-परंपरा को
अपनी वस्त्र-क्रांति से
कर रहा है समाप्त
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

3.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जिसे अब तक/कंगाल/असंस्कृत/अछूत
उचक्का/चोर आदि शब्दों से
किया जाता रहा है संबोधित
किन्तु अब जो
मंगल-दीप बन कर
है जल रहा
और कर रहा है
चिंतन-संशोधन
ऐसे शब्द-संबोधन करने वालों का.....
और जो कर रहा है दूर
समाज का मानसिक रोग
उसकी जड़ता/निष्ठुरता/कामुकता
बना कर हृदय-हृदय को संवेदनशील
और जो है जगा रहा
सुप्त-मन को
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

4.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जिसे बचपन में ही
चल गया था पता कि
उसे बचपन में ही हो जाना है बड़ा
ताकि वह/चुका सके
अपनी जिंदगी की कीमत
रोज पिस कर/रोज लुट कर
रोज मर कर
किन्तु जो अब/निकल पड़ा है
हर झुग्गी में
दीप जलाने/लक्ष्मी बुलाने
रंगोली रचने 
अन्न का थाल सजाने
सूखे होठों पर/लालिमा बिखेरने
और जो पहचान से वंचित हैं
उनको पहचान दिलाने
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है                                    

5.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जिससे लोग
बदलते रहते हैं रिश्ते
दिन में कुछ और
रात में कुछ और
लेकिन जो/अब अपना रिश्ता
पूरी दुनिया से
बना रहा है
बराबरी पर
और जिसके रिश्ते की बुनियाद का
सदियों बाद
आयी है मानवता
करने स्वागत
और जो हर लावारिस के जनक को
जा रहा है करने खड़ा
समाज में
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

6.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जो तपते-तपते
वाष्पिभूत हो गया
बादल बन गया
और उस बादल में अमृत भर गया
और अब वही अमृतमय बादल
निकल पड़ा है
दलितों, शोषितों और पीड़ितों पर
अमृत बरसाने
और जो
गरज-गरज कर
गा रहा है जागरण का गीत
और जिसका साथ दे रहे हैं/हजारों कंठ    
और जिसके साथ
अलमस्त है/झूम रहा है
आबादी का अस्सी प्रतिशत
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

                                  
7.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जिस पर रहा है समय
सदा प्रभावी/सदा शासक
घड़ी की हर टिक-टिक
जिसकी धड़कनों को
करती रही है और तेज और तेज
लेकिन/जिसने अब
पकड़ ली है वह गति
जो बहुत अधिक है/समय की गति से
और जो पाट रहा है हजारों साल का अंतराल
जिन हजारों साल में/हाशिए के आदमी
जकड़ दिए गए थे
अधार्मिक बंधनों में
निबंधित गरीबी और जिल्लत में
और जो अब
समाज को मुक्त करने जा रहा है
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

 8.

यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
जो है
बिल्लियों के उस समाज का
एक चूहा
जिस समाज में/चूहे की मौत होती है 
तो बिल्लियों का खेल होता है
लेकिन वही चूहा
अब लोहे के जाल को काट कर
अधिकार युक्त आदमी बन कर
चल पड़ा है
बिल्लियों को आदमी बनाने
उनकी उग्रता मिटाने
उनकी हिंसा मिटाने
उनकी नीचता मिटाने
और जो बिल्लियों को बताने चला है
कि चूहा भी क्रांति कर सकता है
यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

                                    

(कवि-परिचय-

जन्म: 5 फ़रवरी 1951
शिक्षा :
सृजन: रचनाएं: कहानी, नाटक, धारावाहिक नाटक, व्यंग्य आलेख, कविता, बाल कहानियां, बाल नाटक आदि विभिन्न पत्र प्रत्रिकाओं में प्रकाशित/आकाशवाणी, दूरदर्शन और गीत और नाटक विभाग द्वारा प्रसारित. एक काल खंड की यात्रा(व्यंग्य उपन्यास), हाशिए का आदमी और तुम बादल हो (काव्य), बिरसा की महागाथा(नाटक), सिंगिदई की गाथा(गीत नाटिका), बिरसा की अमर कहानी (काव्य), हमारे पुरखे (ऐतिहासिक कहानी), धारावाहिक नाटक: मैडम शा के अफ़साने, मन की खिड़की और किलकारी, 1857 के शहीद नीलाम्बर और पीताम्बर पुस्तके प्रकाशित
अन्य : आईआईएम, रांची के शैक्षणिक फिल्म, ‘बेयर फुट मैनेजर’ के लिए स्क्रिप्ट लेखन,
पुरस्कार: झारखण्ड रत्न-2008(साहित्य)
संप्रति:  रांची में रहकर अनवरत मासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन ।
संपर्क: diliptetarbe2009@gmail.com)
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बुधवार, 28 मई 2014

सुनो ! देश-दुनिया के नेताओं सुनो



चित्र गूगल कृपा

(प्रिय पाठकों ! विनम्र आग्रह है कि लेख को पूरा पढ़ें , तभी अपनी कोई राय बनाएं। आतंकवाद से हर देश और हर व्यक्ति प्रभावित है. इसको नष्ट करने के लिए सभी के ईमानदार साथ की ज़रूरत है. )




शहरोज़ की क़लम से

 "11 साल जेल में आतंकवादी बनकर जिस कोठरी में रहा, वह इस घर से बड़ी थी लेकिन वहां मैं एक ज़िंदा लाश था और सिर्फ़ इस उम्मीद पर ज़िंदा था कि जिस देश का मैं नागरिक हूं, उसका क़ानून पूरी तरह अंधा नहीं है और मुझे इन्साफ मिलेगा." यह कहना है आदम सुलेमान अजमेरी का जो 17 मई, 2014 को जेल से बाहर आए हैं. उन पर अक्षरधाम मंदिर हमले में शामिल  होने का आरोप था और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन पर लगे सभी आरोप ख़ारिज कर दिए और उन्हें बाइज़्ज़त रिहा कर दिया. उनके साथ इस मामले में इनके समेत छह लोग रिहा हुए  हैं. ग़ौरतलब है कि  24 सितंबर, 2002 को दो हमलावरों ने अक्षरधाम मंदिर के भीतर एके-56 राइफल से गोलियां बरसाकर 30 लोगों की जान ले ली थी, जबकि लगभग 80 को बुरी तरह ज़ख्मी हो गए थे.

अब सवाल क्या मौज़ूं नहीं कि दोषी को हम अब तक क्यों नहीं पकड़ सके. हमारा तंत्र इतना बौना क्यों हो गया. इधर,  पुलिस ने वाह-वाही बटोरने के चक्कर में इन लोगों की ताबड़ तोड़ गिरफ़्तारी की. और इन्हें प्रताड़ित कर इनसे जबरन अपने अनुकूल बयान ले लिए.  इन्हें लश्कर-ए-तय्यबा का खूंख्वार आतंकवादी घोषित कर दिया। इसके बाद शुरू हुई इन बेकसूरों के घर वालों की परेशानी। बच्चे को घर से बहार निकलना छूट गया. उनकी  पढ़ाई छूट गयी. माँ बिलखते-बिलखते चल  बसी.  अब जब देश की सर्वोच्च अदालत ने इन्हें बा इज़्ज़त रिहा कर दिया, तो इनकी प्रताड़ना,  मानहानि, रोज़गार छूटना, बच्चों की पढाई और इस दरम्यान अपनों की मौत इसका हर्जाना कौन देगा। ऐसे मामलों  में मीडिया वाले भी कम दोषी  नहीं हैं.   ऐसी ख़बरों को पुलिस के हवाले से नमक-मिर्च लगा लगाकर छापते हैं. रोज़ नए-से-नए खुलासे करने में टीवी एंकर अपनी गर्दनें फुलाते हैं. आरोपी को तुरंत ही आतंकवादी बना देना। जबकि यह पत्रकारीय मूल्यों के विरुद्ध है.
आतंक ने विश्व में लाखों निर्दोष बुज़ुर्ग, स्त्री और बच्चे, युवाओं को हलाक किया है. भारत और पाकिस्तान भी इसकी हिंसा से दो-चार है. भले, हमारा सुरक्षा अमला सही दोषियों को नहीं दबोच सका हो(अधिकतर मामले में ऐसे आरोपी कोर्ट से रिहा हो चुके हैं ). लेकिन नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति नवाज़ शरीफ़ ने जिस गर्मजोशी के साथ मुलाक़ात की. आतंकवाद के ख़ात्मे का संकल्प लिया। महाद्वीप  के दोनों दिग्गजों से यह गुज़ारिश है कि यह संकल्प धरा पर भी उतरे।

नवाज़ से गुज़ारिश
नवाज़ साहब! कोई बहाना मत कीजियेगा। सब जानते हैं कि भारतीय उप महाद्वीप में लश्कर-ए-तय्यबा और तालीबानी ग्रुप आतंक को अंजाम दे रहा है. पाक को अपने यहां के कैंप को ध्वस्त करना चाहिए। आपको अपने यहां लोकतंत्र को मज़बूत करना होगा ताकि सरकारी काम-काज में फ़ौजी दख़ल कम हो. क्योंकि कई बार ख़बरें मिली हैं कि कश्मीर के बहाने आपकी फ़ौज आतंकवादियों की मदद लेती है.  आतंकवाद को मटियामेट करने के बाद ही हम अच्छे पड़ोसी बन सकते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी विरासत साझा है.

 मोदी से आग्रह
मुल्क के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह है कि आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए बेहद ईमानदारी से प्रयास किये जाएँ। दहशतगर्दी फैलाने वालों को सख्त से सख्त सज़ा मिले। लेकिन सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि इसमें निर्दोष युवा बलि का बकरा न बने. यदि संदेह के आधार पर पुलिस किसी को हिरासत में ले या गिरफ़्तार करे तो मीडिया तुरंत उसे आतंकवादी या मास्टर माइंड बतलाने की हड़बड़ी न दिखाए।

 हम जैसे ढेरों लोग भारत-पाक की दोस्ती के हिमायती हैं. हमें आस है कि आप दोनों जल्द ही साझी रणनीति बनाकर आतंकवाद के बनते गढ़ों को ज़मींदोज़ कर  देंगे।  

अरब के शेख़ों कान तुम्हारे भी खुलें
संसार में इस्लाम के नाम पर जहाँ-जहाँ भी आपके कथित जिहादी खूंरेज़ी कर रहे हैं, उनमें सभी अहल-ए -हदीस विचारधारा के समर्थक हैं. यह कोई ढंकी-छुपी बात नहीं रह गयी कि आप अपने गुनाहों को ढंकने के लिए इनकी आर्थिक मदद करते हैं. आपके यह जिहादी हमारे पढ़ने वाले युवाओं को वर्गला कर जन्नत का ख्वाब दिखाते हैं. फिर उसके पासपोर्ट वीज़ा की शक्ल में उस मासूम की कमर में खुदकश बम बाँध देते हैं. इससे वह भले जन्नत में न जाते हों, लेकिन कई नस्लों को जहन्नुम के हवाले ज़रूर कर जाते हैं. तो शेख साहब! अब अय्याशी छोड़िये। तेल के कुंए  ज़्यादा दिन काम नहीं आएंगे। बच्चों को पढ़ाइये। हमारे बच्चों को भी पढ़ने दीजिये। इस्लाम की गलत व्याख्या कर फ़िज़ूल ख्वाब मत दिखाईये।

अंकल सैम कब होगी चौधराहट कम
अफगानिस्तान से रूस की दखल कम करने के लिए आपने अरब और पाकिस्तान के गुरगुओं की बदौलत दहशतगर्दों को जन्म दिया। उसे  खुराक देनी शुरू की. उसे हथियार देने के साथ ट्रेनिंग भी दी. अब जब रूसी फौजी अफगानिस्तान से चले गए तो वहाँ की बदहाली शुरू हो गयी. समाज कूपमंडूक होने लगा. हँसते बच्चे, खिलखिलाते युवाओं का स्कूल- कालेज जाना बंद हो गया. लडकियां क़ैद कर दी गयीं। आपके परवरिश से परवान चढ़े तालिबानी आपस में ही मरने-कटने लगे. जब आपने रसद बंद कर दी, पाक ने हमदर्दी, तो ज़ाहिर है, उसने आपको ही डसने को फन काढ़ लिया। ट्विन टावर नेस्ट नाबूद होने के बाद आपने मिटटी के बुर्ज़ों को ढहाना शुरू किया। अनगिनत बेक़सूर बमबारी के ग्रास बने. फिर लाशों को रोटियां खिलाने की क़वायद।
अंत में आपने लोकतंत्र के नाम पर हामिद करज़ई की कठपुतली सरकार बनवायी। खैर! क़िस्साकोताह यह है कि इराक़, लीबिया, वियतनाम और अफगानिस्तान में आपको लोकतंत्र की याद आती है. आपका मानवाधिकार अरब पहुँच कर क्यों सजदे करने लगता है. यहां एक वंश की बादशाहत आपकी नींद ख़राब क्यों नहीं करती। और आपकी खुफिया यह भी तो जानती है कि शिक्षा संस्थानों के नाम पर यहां के शेख इन आतंकवादियों को रक़म भी मुहैय्या कराते हैं. विश्व मुखिया बनने के लिए इन्साफ पसंद बनना होगा। ऐसी चौधराहट तुम्हारी ज़्यादा दिनों तक नहीं  चलने वाली, अभी भी चेत जाओ.       
    
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रविवार, 25 मई 2014

क्यों लिखूं मैं क्रांति भला?














सुचित की क़लम से 



  मेरा प्रेम, मेरी भावनाएं, मेरी अभिव्यक्ति

1.

क्यों लिखूं मैं क्रांति भला?
अपनी नर्म गर्म रजाई में प्रेम के कुनकुने स्वप्नों के बीच
मेरी दुनिया तो झील सी आँखों से नर्म होठों तक है

फुटपाथ वालों की ठण्ड मुझ तक नहीं पहुँचती
मेरे पास होता है मतलब भर पैसा हर पहली तारीख
मेरी दुनिया पीवीआर की फिल्मों और डोमिनोज के पिज़्ज़ा तक है
मैंने किसी का कुछ नहीं छीना
मुझे सड़क पर कूड़ा बीनते बच्चे नहीं दिखते
मेरी दुनिया मेरे बच्चों के मंहगे स्कूलों तक है.

क्यों लिखूं मैं क्रांति भला?

मेरी जिदगी हाई वे पर है.
मेरा प्रेम, मेरी भावनाएं, मेरी अभिव्यक्ति

 क्यूँ लिखूं मैं क्रांति भला ??

2.

उन प्यासे पलों में गूंजती तुम्हारी साँसों की सरगम..
मेरी रूह..क़तरा -क़तरा पीती है
ह्रदय और आत्मा के साथ.
जब सम्पूर्ण देह प्रेम की भाषा बोलने लगती है
बहुत पास आ कर हम
प्रेम में बहुत दूर निकल जाते हैं
‘मैं’ और ‘तुम’ हटा कर
सिर्फ ‘हम’ बचते हैं
लयबद्ध..निर्वाण को प्राप्त करते हम
धीरे-धीरे किसी और आयाम में चले जाते हैं
जीवन अपनी तीव्रतम गति में आ कर ही ठहर जाता है
उफ़..
उलझी साँसों में सब कितना उलझा उलझा है.
भाव भी,शब्द भी..शायद जीवन भी..
लेकिन यही उलझन सब सुलझा देगी.
शायद..

3.

वर्ण माला ..
उन्हें ‘क’ से ‘कलम’ पढने दो,
कहीं उन्होंने ’क’ से ‘क्रांति’ पढ़ ली..
तो वो ‘ख’ से ‘खरगोश’, ‘ख’ से ‘खतरा’ बन जायेंगे..
उनके ‘ग’ से ‘गर्दिश’ रहने दो..
कहीं वो ‘ग’ से ‘गरिमा’ पढ़ बैठे तो..
फरियादों के ‘घ’ से ‘घंटे’..जन चेतना के ‘घोष’ में न बदल जाएँ..

‘च’ से ‘चंचल’ रहने दो,कहीं ‘च’ से ‘चयन’ सीख लिया तो..
कहीं ‘छ’ की ‘छतरी’ तुम्हारी मान्यतायों को ‘छल’ न ले..
‘ज’ से ‘जड़’ रहने दो..
कहीं ‘ज’ से ‘जलना’ सीख लिया तो..
तुम्हारे ‘झ’ से ‘झूठ’..
हिल न जाएँ उनके ‘झंझावात’ से..

‘ट’ से ‘टलते’ रहने दो उन्हें..
कहीं ‘ट’ से ‘टक्कर’ सीख ली तो..
कहीं ‘ठ’ से तुम्हारे ‘ठहाके’,’ठ’ से ‘’ठहर’ न जाएँ..

बदलने मत देना यह वर्ण माला..
कहीं यह बदल गयी तो सब बदल न जाये..

4.

ऐसे थोड़े होता है..
प्यार कोई फेसबुकिया बहस थोड़े है..
मूड मौका देख कर..
हुयी हुयी न हुयी..
मैं, किसी प्रियजन द्वारा जबरदस्ती tag की तस्वीर नहीं..
जिसे खीझे मन से like करो..
न मैं बहुमत समर्थित पोस्ट पर असहमति का comment..
जिसे लोकतान्त्रिक मूल्यों के नाम पर..
अनमने भाव से appreciate करना पड़े तुम्हे..
मैं नहीं तुम्हारी profile pic या cover photo..
जो वक़्त के साथ बदल जाये..
मैं तो बस रहना चाहता हूँ..
तुम्हारे फेसबुक login का email..
छुपा..और अपरिहार्य..
तुम्हारे लिए..जब तुम्हे जरूरत हो मेरी..
बस इतना करना..log in id change मत करना ..

                      
5.

प्रेम..
मैंने कब रचा था तुम्हें..
इस स्थूल में सूक्ष्म का संचार तो तुम ही कर गए थे..
मेरी प्राण प्रतिष्ठा तुमने ही की थी..

मैंने नहीं दिए कभी कोई शब्द विन्यास..
नहीं रची कभी कोई कविता तुम पर..
अनुभूतियों के वाहक..
सब भावों के प्रणेता तुम ही तो तो थे..
सब शब्द तुम्हारे ही थे..

अपूर्ण स्वप्नों और अतृप्त इच्छायों के बीच..
अकल्पनीय,मधुरतम क्षणों के बीच..
तुम ही तो ..
यत्र तत्र सर्वत्र..

मैं हूँ ही कहाँ ..प्रेम..
संभवतः एक वाहक मात्र..
आभार तुम्हारा..
मेरे अस्तित्व में जीवन के संचार के लिए..

6.

एक टुकड़ा चांद..एक टुकड़ा नदी..
और कुछ चांदनी की बात..
एक टुकड़ा ख़ुशी..एक टुकड़ा गम..
और कुछ जिन्दगी की बात..
एक टुकड़ा मैं..एक टुकड़ा तुम..
और कुछ आशिकी की बात..
एक टुकड़ा वक़्त..एक टुकड़ा तकदीर..
और कुछ आवारगी की बात..
एक टुकड़ा वफ़ा..एक टुकड़ा तन्हाई..
और कुछ दीवानगी की बात..
एक टुकड़ा जमीं..एक टुकड़ा आसमाँ..
और कुछ तिश्नगी की बात..

7.

हाँ,दर्द होता है मुझे अभी भी..
और मानने में कोई शर्म भी नहीं..
दिल करता है तो थोडा रो लेता हूँ..
अधूरे सपनों में खो लेता हूँ..

मुझे इस दर्द को बहलाना नहीं है..
न सिद्धांतों के पीछे छुपाना है..
न दिव्य प्रेम का आवरण देना है..
न ही मैं इसे रचना की शक्ति बनाना चाहता हूँ..

मैं चाहता हूँ इसको स्वीकार करना..
इस से गुजरना ही सही लगता है..
मैं साधारण मानव हूँ और..
साधारण प्रेम करना चाहता हूँ..

अलौकिक प्रेम की चाह नहीं है मुझे..
मैं तुम्हे चाहता हूँ..
तुम्हारा साथ चाहता हूँ..
तुम्हारा स्पर्श भी..

तुम्हारी बातें सुननी हैं मुझे..
तुम्हारे हाथों को हाथ में लेना है..
तुम्हारी गोद में सर रख कर सोना भी चाहता हूँ..
तुम्हें बार बार परेशान करती उस एक लट को..
बार बार हटाना है मुझे..

मुझे चाहिए तुम्हारी हर रोक टोक..
तुम्हारा गुस्सा तुम्हारा रूठना..
और तुम्हे मनाना भी चाहता हूँ मैं..
चाहे बेसुरा गाना गा कर ही सही..

मुझे नहीं करना है कोई त्याग..
मुझे नहीं बनना है महान..
मैं साधारण मानव हूँ..
साधारण प्रेम चाहता हूँ..

8.

आओ कुछ बदलाव लाये
सूरज की तपिश कुछ कम करें

चाँद की चांदनी कुछ बढ़ाएं
आओ..कुछ बदलाव लायें.


हाथ बढ़ाएं तो पहुँच में हो

आसमां को इतना नजदीक लायें
हर आंसू पोंछ दें..हर चेहरे पे मुस्कान सजाएँ
आओ कुछ बदलाव लायें.


हर खेत में हरियाली हो

हर मेहनत में बरकत हो
छोटी छोटी खुशियों से हर जिन्दगी सजाएँ
आओ कुछ बदलाव लायें.


अन्याय का नाम मिटा दें

एक नयी दुनिया बनायें
फूलों के रंग संवारें ..चिड़ियों के साथ गायें
आओ कुछ बदलाव लायें


कुछ कुछ बचपना करें

कुछ कुछ बड़प्पन भुलाएँ
इन्सान से इन्सान के बीच का भेद मिटायें
आओ कुछ बदलाव लायें..







(कवि-परिचय:
जन्म: 7 दिसंबर 1981  को इलाहाबाद में
शिक्षा: 'आंग्ल भाषा' और 'राजनीती शास्त्र ' से कला स्नातक, रूहेलखंड विश्विद्यालय से
सृजन : 'स्त्री मुक्ति' की पत्रिका में दो कवितायेँ प्रकाशित
संप्रति :  इलाहाबाद में ही एक फार्मास्यूटिकल कम्पनी में रीजनल मैनेजर
अन्य: 'स्त्री मुक्ति संगठन' के सदस्य के रूप में विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय
संपर्क:suchhitkapoor@gmail.com )






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