बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 31 जुलाई 2013

वासवी पर लगा एक पुस्तक से सामग्री टीपने का आरोप

1957 की  पुस्तक  से 2008 में ली गयी  सामग्री
 
















झारखंड महिला आयोग  की  सदस्य हैं वासवी

वासवी बोस/ वासवी/ वासवी भगत और अब वासवी किडो। झारखंड के बौद्धिक व सामाजिक जगत का बेहद चर्चित नाम। कई संगठनों से जुडी रहीं वासवी सम्प्रति  झारखंड महिला आयोग  की  सदस्य हैं। यह चर्चित एकटीविस्ट किसी न किसी बहाने हमेशा सुर्ख़ियों में रहती हैं। ताज़ा मामला एक किताब से जुड़ा है।  उनपर एक  पुस्तक  से सामग्री टीपने का  आरोप लगा है। झारखंड लोक गीत-मुंडा लोक गीत शीर्षक  से इंस्टीट्यूट फ़ॉर  सोशल डेमोक्रेसी, दिल्ली  से दो खंडों में उनकी  पुस्तक सन 2008 में प्रकाशित हुई। साझी विरासत पुस्तिका सीरीज़ के तेहत इसका प्रकाशन हुआ था। इस पुस्तक  पर बतौर संचयन वासवी भगत का  नाम अंकित है। खबर है कि  इन संग्रहों  की  सारी सामग्री हूबहू अनुवाद समेत जगदीश त्रिगुणायत द्वारा संकलित पुस्तक  ‘बांसरी बज रही’ से ली गई। बस अनुक्रम की थोड़ा-बहुत उलट-फेर  है। हर खंड में कुल 33 -3 3 गीत हैं, सभी 'बांसुरी बज रही' से लिये गए हैं।   (त्रिगुणायत  की  यह पुस्तक  1957 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद ने  प्रकाशित की थी। महाकवि निराला, सुमित्रा नंदन पंत और बाबू शिवपूजन सहाय के वक्तव्यों से सजी इस पुस्तक  की  भूमिका  में त्रिगुणायत जी ने गीतों के संकलन, इसके  अनुवाद समेत प्रूफ-संशोधन तक के लिए  सहयोग के प्रति नाम के साथ  सभी का आभार व्यक्त किया है। वही लगभग ढाई सौ गीतों के इस वृहद् संग्रह के अंत में उन्होंने सहायक ग्रंथ सूची भी  है। जबकि  वासवी का  दोनों संग्रह 72-72 पृष्ट का  है। दोनों में  संपादकीय वरिष्ठ पत्रकार फ़ैसल अनुराग ने लिखा है। जिसमें उन्होंने  लिखा है - ‘वासवी ने इन गीतों का संग्रह एवं संचयन किया है।’ लेकिन कहीं भी मूल संग्रकर्ता और अनुवादक के  नाम का  उल्लेख नहीं है। न ही उनका आभार जतलाया गया है।  क्या ऐसा करना कहाँ तक जाइज़ है।

मैंने अब तक  पुस्तक नहीं देखीःवासवी
झारखंड लोक गीत-मुंडा लोक गीत  की संपादिका वासवी का इस संबंध  में कहना है कि उन्होंने अब तक  2008 में प्रकाशित अपना यह संकलन नहीं देखा है। गीतों का  संकलन मैंने त्रिगुणायत  जी के अलावा और भी संकलनकर्ताओं की  पुस्तकों से किया होगा। इसमें जरूरी नहीं कि हम तमाम लोगों का  आभार व्यक्त करें।

आरोप साबित होने पर होगी वापस : फ़ैसल  अनुराग

झारखंड लोक गीत-मुंडा लोक गीत में प्रका शित संपादकिय नोट के  लेखक फ़ैसल अनुराग कहते हैं कि संकलन कहीं से भी किया जा सकता है। अगर साबित हो जाता है कि जगदीश त्रिगुणायत  की  पुस्तक  से हूबहू सामग्री ली गई है, तो पुस्तक  वापस ले ली जाएगी। वासवी का यह कहना गलत है कि उन्हें पुस्तक नहीं मिली। उन को मैंने स्वयं ही संग्रह  की प्रतियां दी थीं।

पुस्तक वापस ले ली जाएगीः खुर्शीद अनवर

इंस्टीट्यूट फॉर  सोशल डेमोक्रेसी, दिल्ली  के  निदेशक खुर्शीद अनवर ने कहा है कि  उन्होंने  वासवी और फ़ैसल अनुराग से स्पष्टीकरण  मांगा है। जगदीश त्रिगुणायत  का सं•लन भी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से मंगवा रहा हूं। यदि आरोप सही हुए, तो उनका  संगठन माफ़ीनामे के  साथ पुस्तक़  वापस ले लेगा। उनका यह भी कहना है कि उन्हें सभी ज़बान नहीं आती है। ऐसे में कुछ अपने लोगों पर भरोसा तो किया ही जा सकता है।  

देखिये,  कौन-सा गीत त्रिगुणायत की पुस्तक के किस पेज से लिया गया है।


मुंडा लोकगीत -भाग-1 वासवी भगत ------- बांसरी बज रही - जगदीश त्रिगुणायत
------------------------------------------------------------------------------
गीत नं. 1/पेज नं 6-7 ------------- गीत नं. 299/पेज नं. 460-461
गीत नं. 2/पेज नं 8-9 ------------- गीत नं. 298/पेज नं. 458-459
गीत नं. 3/पेज नं 10-11 ----------- गीत नं. 277/पेज नं. 436-437
गीत नं. 4/पेज नं 12-13 ----------- गीत नं. 324/पेज नं. 488-489
गीत नं. 5/पेज नं 14-15 ----------- गीत नं. 308/पेज नं. 468-469
गीत नं. 6/पेज नं 16-17 ----------- गीत नं. 326/पेज नं. 488-489
गीत नं. 7/पेज नं 18-19 ----------- गीत नं. 327/पेज नं. 490-491
गीत नं. 8/पेज नं 20-21 ----------- गीत नं. 329/पेज नं. 492-493
गीत नं. 9/पेज नं 22-23 ----------- गीत नं. 330/पेज नं. 492-493
गीत नं. 10/पेज नं 24-25 ----------- गीत नं. 352/पेज नं. 510-511
गीत नं. 11/पेज नं 26-27 ----------- गीत नं. 351/पेज नं. 510-511
गीत नं. 12/पेज नं 28-29 ----------- गीत नं. 339/पेज नं. 500-501
गीत नं. 13/पेज नं 30-31 ----------- गीत नं. 334/पेज नं. 498-499
गीत नं. 14/पेज नं 32-33 ----------- गीत नं. 1/पेज नं. 68-69
गीत नं. 15/पेज नं 34-35 ----------- गीत नं. 3/पेज नं. 70-71
गीत नं. 16/पेज नं 36-37 ----------- गीत नं. 7/पेज नं. 74-75
गीत नं. 17/पेज नं 38-39 ----------- गीत नं. 9/पेज नं. 76-77
गीत नं. 18/पेज नं 40-41 ----------- गीत नं. 14/पेज नं. 82-83
गीत नं. 19/पेज नं 42-43 ----------- गीत नं. 15/पेज नं. 82-83
गीत नं. 20/पेज नं 44-45 ----------- गीत नं. 19/पेज नं. 86-87
गीत नं. 21/पेज नं 46-47 ----------- गीत नं. 24/पेज नं. 92-93
गीत नं. 22/पेज नं 48-49 ----------- गीत नं. 26/पेज नं. 94-95
गीत नं. 23/पेज नं 50-51 ----------- गीत नं. 29/पेज नं. 98-99
गीत नं. 24/पेज नं 52-53 ----------- गीत नं. 31/पेज नं. 100-101
गीत नं. 25/पेज नं 54-55 ----------- गीत नं. 33/पेज नं. 104-105
गीत नं. 26/पेज नं 56-57 ----------- गीत नं. 36/पेज नं. 108-109
गीत नं. 27/पेज नं 58-59 ----------- गीत नं. 38/पेज नं. 108-109
गीत नं. 28/पेज नं 60-61 ----------- गीत नं. 40/पेज नं. 110-111
गीत नं. 29/पेज नं 62-63 ----------- गीत नं. 49/पेज नं. 122-123
गीत नं. 30/पेज नं 64-65 ----------- गीत नं. 50/पेज नं. 122-123
गीत नं. 31/पेज नं 66-67 ----------- गीत नं. 51/पेज नं. 124-125
गीत नं. 32/पेज नं 68-69 ----------- गीत नं. 52/पेज नं. 126-127
गीत नं. 33/पेज नं 70-71 ----------- गीत नं. 55/पेज नं. 130-131
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गुरुवार, 25 जुलाई 2013

तीन कविताएँ : तीन रंग

                                                          














रोशनी मुरारका की क़लम से 



अब नहीं रहा वो बचपन

पैदा होते ही रोना-बिलखना,
उठना फिर गिरना, गिरकर संभलना,
याद आता है अक्सर,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
परीयों की कहानी, चंदा मामा की कविता पुरानी,
सपनों की दुनिया भी लगती थी प्यारी,
याद आती है रातें वो सारी,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
भागा-दौड़ी, मस्ती-ठिठोली और क्रिकेट की टोली,
पिचकारी भर-भर खेली मित्रों संग होली,
अब रह गई किस्सों में वो केवल,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
पापा की उंगली पकड़कर स्कूल जाना,
पढ़ना, लिखना, मौज-मनाना,
बीत गया वो सारा जमाना,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
रूठना-इतराना, दादा का वो मनाना-फुसलाना,
कंधों पर बैठ मेले दिखाना,
अब अपने में ही कैद हो गया मेरा ये जीवन,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
मामा के संग मजाक में लड़ना-झगड़ना,
सिनेमा में जाकर शोर मचाना,
याद आए ननिहाल वो अपना,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
चिंता और उम्र के बढ़ते कदमों ने छिन लिया बचपन,
जिम्मेदारियों की आड़ में छिप गया बचपन,
अक्सर तन्हाइयों के क्षणों में याद आ जाता है बचपन,
पता नहीं क्यों जुदा हो जाता है बचपन,
उलझी-सी ज़िंदगी में गुँथ जाता है बचपन।

तन्हाइयाँ ये तन्हाइयाँ
 
तन्हाइयाँ ये तन्हाइयाँ,
घर की चार दिवारी में कैद जीवन की परछाईयाँ,
बिखरी-सी है ज़िंदगी, टुकड़े चंद बिखरे हुए,
समेटते हुए थक गई, हाथों की ये लकीरें,
ढूँढती है मंजिल, देखती है सपने ये आँखें,
नज़र नहीं आती मंज़िल, सिर्फ दूर तक फैली है तनहाइयों की ये रातें,
बिना वजह की ये ज़िंदगी बस यूँ ही बिती जा रही,
वक्त की रेत हाथों से फिसलती जा रही,
ज़िंदगी में अब कोई नहीं लगता अपना, सिवा उस खुदा के,
स्वार्थी इस दुनिया में, रंगमंच के इस देश में,
न गिला है किसी से, न शिकवा किसे से,
ये ज़िंदगी मिली है ईश्वर से, चाहे तन्हाइ ही मिली हो मुझे।

एक दिन फिर तुम आओंगे
 
कल जब किसी ने दस्तक दी तो मुझे लगा तुम आए,
मैं भागी उस ओर जहाँ तुम्हारे होने का भास था
लेकिन अब भी मैं वही गलती कर रही थी
अपने टूटे हुए सपनों को यूँ ही समेट रही थी
जानती हूँ नदी सागर में मिलने पर उससे जुदा नहीं हो सकती
लेकिन हम उसी नदी के दो किनारे है जो कभी मिल नहीं सकते।
सब जानती हूँ बस दिल को समझाना नहीं जानती,
आँखों से रोती हूँ पर दिल की ही सुनती हूँ।
पता नहीं अब भी क्यों लगता है,
तुम जरूर आओंगे और एक दिन फिर नदी अपने अंतिम गंतव्य तक पहुँच जाएगी।

( रचनाकार परिचय:
जन्म: 11 जुलाई 1985       Name-Roshni Murarka
शिक्षा: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा से एम-फिल  
सृजन: कविता और लेख
संप्रति: वर्धा में रहकर स्वतंत्र लेखन 
संपर्क: roshni.boltoye@gmail.com)

 

                                                                
                                                              














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सोमवार, 22 जुलाई 2013

सीमा पर पिछड़ता मानवाधिकार


   

 






रजनेश कुमार पाण्डेय की क़लम से
भारत- बांग्लादेश सीमा  से लौट कर



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नार्थ-ईस्ट(उत्तर- पूर्व) भारत के अभिन्न हिस्से में आता है। इस क्षेत्र की विशेषता यह है कि ना सिर्फ ये सांस्कृतिक रूप से विविध है बल्कि राजनीतिक रूप से भी यहां कई पार्टियां सक्रिय हैं। जब यहां की भौगौलिक
स्थिति की बात करते हैं तो यह पूरा क्षेत्र कई तरह के उथल- पुथल से भरा पड़ा है। मसलन, मणिपुर के सीमावर्ती इलाके बर्मा से मिलते हैं तो अरूणाचल प्रदेश चीन से, सिक्किम नेपाल से तो असम मेघालय और त्रिपुरा के सीमावर्ती इलाके बंग्लादेश से मिलते हैं। भौगौलिक स्थिति को लेकर अक्सर कई प्रकार के राजनीतिक विवाद चर्चा में बने रहते हैं। अरूणाचल प्रदेश के तवांग पर चीन का दावा, भारत - बांग्लादेश सीमा विवाद, तीस्ता नदी पर दानो के बीच बातचीत। बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाके में कई उग्रवादी संगठनों का गुप्त
रूप से ठिकाना आदि। असम के ही दक्षिणी हिस्से में पड़ता है बराक घाटी। इस घाटी के अंतर्गत तीन जिले आते हैं। कछाड़, करीमगंज और हैलाकांडी। कछाड़ जहां मणिपुर और मिजोरम की सीमा से लगता है वहीं हैलाकांडी की सीमा मिजोरम से और करीमगंज बांग्लादेश की अंतररा’ट्रीय सीमा से लगता है। भौगौलिक रूप
से करीमगंज का एक बड़ा इलाका बांग्लादेश की सीमा से लगता है।

गुवाहाटी से 338 कि.मी. की दूरी पर स्थित करीमगंज में मुख्य रूप से चार नदी हैं, कोशियारा, लोंगाई, सिंगला और बराक। पहले - पहल सन् 1878 में करीमगंज सिलहेट जिले का सब डिवीजन बना और देश के बंटवारे के वक्त सन् 1947 में सिलहेट पूर्वी पाकिस्तान में चला गया जिसमें करीमगंज के कुछ हिस्से भी गए। सन् 1983 में करमगंज जिला बना। करीमगंज की मुख्य भाषा बांग्ला है। आर्थिक रूप से यह जिला समृद्ध है और वो भी इसलिए क्योंकि यहां से बांग्लादेश बड़ी मात्रा में कई प्रकार की व्यापारिक सामग्रियों का आदान-प्रदान होता है। करीमगंज से 25 कि.मी. दूरी पर स्थित है सुतारकांडी, जहां भारत-बांग्लादेश सीमा पर ’इंडो-बांग्लादेश ट्रेड सेंटर’ है और सड़क मार्ग से लोग बांग्लादेश और बांग्लादेश से भारत आते-जाते हैं। करीमगंज में ही ‘टाउन कालीबारी’ कोशियारा नदी के तट पर  स्थित है। शहर का यह हिस्सा जहां के दशमी घाट पर से बांग्लादेश साफ दिखाई पड़ता है और भारत – बांग्लादेश के विभाजन को भी साफ देख सकते हैं। यहीं पर इंडियन स्ट्रीम का आफिस भी आप देख सकते हैं और एक छोटा बंदरगाह भी जहां से भारी मात्रा में व्यापारिक सामग्रियों का आदान - प्रदान होता है।

यहां के व्यापारी काफी समृद्ध हैं, जाहिर है उसका कारण है इनके सामानों को स्थानीय स्तर पर ही अंतररा’ट्रीय बाजार का मुहैया हो जाना। बड़ी मात्रा में आदि का निर्यात यहां से होता है। ‘ दशमी घाट से आप बांग्लादेश देख सकते हैं। यहां भारतीय सीमा पर आप भारतीय फौजों द्वारा सख्त निगरानी देख सकते हैं। यहां प्रत्येक 100 मीटर पर आपको बीएसएफ (बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स - सीमा सुरक्षा बल) के जवान दिख जाएंगे। यहीं एक बीएसएफ जवान से बातचीत में पता चला कि शाम छह बजे के बाद यही दूरी 100 मीटर से घटकर 50 मीटर हो जाती है। जबरदस्त तरीके से पेट्रोलिंग सीमा सुरक्षा बल द्वारा चलायी जाती है। शाम छह बजे के बाद संदिग्ध स्थिति में गोली मारने का भी आदेश है। दूरबीन लिए बीएसएफ के जवान हमेशा आपको मुस्तैद दिखेंगे। हर बीएसएफ के जवान को एक दूसरे पर नजर रखनी पड़ती है। सीमा तस्करों पर इन्हें विशेष निगाह रखनी होती है। आम नागरिकों के लिए सीमावर्ती इलाके ज्यादातर घूमने - फिरने वाला ही माना जाता है। पर्यटन का दृष्टिकोण ही प्रमुख होता है। हालांकि आम जनता दबी जुबान में ये भी कहती है कि ये बीएसएफ वाले तस्करों से पैसा लेकर सामान इधर - उधर भी करवाते हैं। परंतु इसे प्रमाणित करना थोड़ा मुश्किल होता है। बीएसएफ वालों के लिए सीमा का मसला राजनीतिक रूप से एक देश की रक्षा, दुशमनों पर नजर एवं दूसरी सीमा में होने वाले गतिविधियों पर ही मुख्य रूप से केंद्रित रहती है। उनकी ट्रेनिंग ही ऐसी होती है कि सीमा की रक्षा उनके लिए राष्ट्र की रक्षा के समान है। उनके नजरिए से ये स्थिति ठीक भी है क्योंकि उनके नौकरी का उद्देश्य भी यही है। उनके साथ कुछ घटनाओं का जिक्र यहां मौजू होगा। 
हमारी बातचीत एक बीएसएफ जवान से हुई जिसमें कुछ सवालों का जवाब देने के क्रम में उन्होंने हमें बताया कि कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ अत्यंत गरीब लोग काम की तलाश में बांग्लादेश से भारत चोरी छिपे नदी पार कर चले आते हैं। ऐसे लोग अगर पकड़े गये चाहे इधर या उधर तो पहले तो उनकी जम के पिटाई होती है फिर संबंधित देश की पुलिस द्वारा उन्हें एक निश्चित अवधि तक जेल में रखा जाता है। बाद में वह जिस देश का नागरिक है, उस देश की पुलिस को सूचति किया जाता है, परंतु प्रायः दूसरे देश की पुलिस उन्हें अपना नागरिक मानने से इंकार करती है।
यहां मसला कूटनीतिक हो जाता है क्योंकि कोई भी देश अपनी छवि साफ-सुथड़ी रखना चाहता है और वह कभी नहीं मानती की जो नागरिक पकड़ा गया है वो उनके देश का है, क्योंकि ऐसे में कई प्रकार के सवाल उठ खड़े होंगे। मसलन, घुसपैठिया का सवाल, जासूसी का सवाल, आतंकवाद का सवाल आदि। ऐसी स्थिति में
उस बीएसएफ जवान ने बताया कि, उनके साथ जो होता है वो बस बयान करना मुश्किल है। ये दोनों देशों की द्विपक्षीय कूटनीतिक रिश्तों का परिणाम है तो वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार की असफलता भी। हमारे ये पूछने पर की क्या ऐसे लोगों के लिए किसी प्रकार का मानवाधिकार संबंधी सहयोग है कि नहीं, तो उसने कहा की इन मसलों पर चाहे तो बड़े अधिकारी या फिर मंत्रालय स्तर द्वारा ही कुछ हो सकता है। बातचीत में हमें ये महसूस हुआ कि फौजियों को चाहे वो सामी पर हो या अपने ही किसी गृह राज्य में उनमें मानवाधिकारों को
लेकर अब भी चेतना मजबूत स्तर पर नहीं है। अब चाहे इसे प्रशिक्षण की कमी कहें या जानकारी की। जब मैनें पूछा,  क्या आपने कभी संदेह की स्थिति होने पर गोली भी चलायी है तो उसने बताया  कि यहां करीमगंज में “शहरी लाकों में गोलीबारी प्रायः नहीं ही होती है। जब मेरी पोस्टिंग बंगाल में थी तो वहां सीमा पर रात्रि गश्ती के दौरान एक तस्कर को जब मेंरा भान हुआ तो उसने मुझ पर दाव (बांग्ला भाषा में छूड़ीनुमा एक बड़ा हथियार) फेंका, तो किसी प्रकार बचकर मैंने जवाबी फायरिंग की जिसके कारण वह छटपटाने लगा, तब तक हमारे अधिकारी आ चुके थे। अधिकारी ने मुझ से इसे और गोली मारने को कहा, परंतु मेरी हिम्मत नहीं हुई तो उन्होंने उसे गोली मारकर पूरी तरह मृत कर दिया। बाद में मुझे 1000रू इनाम के तौर पर मिला, शायद ये देशभक्ति का ही परिणाम था जो फौजियों में कूट-कूट कर भरी होती है है या भरी जाती है । 
हमारी पूरी बातचीत में फौजी ने हम से खुलकर बातचीत की और उसने कभी भी अपना नाक-भौं नहीं सिकोड़ा। ऐसे कई घटनाएं सीमा पर एक आम बात है जिसमें प्रायः गोलीबारी में काफी लोग मारे जाते हैं। कई बार बेवजह शक के कारण भी मौतें भी होती हैं। उस जवान ने हमें बताया की चाहे सीमा के लोगों में कितनी भी बातें आपसी मेलजोल की चलती रहे पर हम फौज वालों को दोस्ती भी कदम फूंक-फूंक कर रखनी पड़ती है। उसने बताया कि किसी भी पर्व त्योहार के मसले पर मिठाई या कोई भी खाने पीने की सामग्री आये पहले उसे हम जानवरों को खिलाकर जांच करते हैं उसके बाद ही यह निर्णय लिया जाता है कि उसे खाया जाय या नहीं। मसले कई प्रकार के हैं, परंतु इन मसलों के बीच शायद मानवाधिकार कहीं ना कहीं जरूर पिछड़ता नजर आ रहा है। ऐसी प्रत्येक स्थितियों के बीच चाहे कूटनीतिक स्तर पर कुछ भी चलता रहे पर मानवाधिकार के स्तर पर हमें काफी मजबूत होना बाकी है।


(लेखक-परिचय:
जन्म:23/08/1984, समस्तीपुर
शिक्षा:  प्रारंभिक समस्तीपुर से
संप्रति:  पी.एच.डी स्कॉलर, डिपार्टमेंट ऑफ मास कम्यूनिकेशऩ
असम यूनिवर्सिटी, सिलचर
सृजन: छिटपुट कहानी और रपट
संपर्क:rajnesh.reporter@gmail.com)
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सोमवार, 15 जुलाई 2013

धरती के दावेदार

 








उज्जवला ज्योति तिग्गा की क़लम से



अभिशप्त इतिहास

नहीं चाहिए मुझे
तुम्हारे उस असीम साम्राज्य का
नाम मात्र का राजपाट
जहां रचा जाता है
मेरे खिलाफ़
हर पल षडयंत्रो का खेल
मेरी इच्छाओं/अनिच्छाओं
आकाक्षांओ/स्वप्नों के खिलाफ़
दमन/शमन की व्यूह रचनाओं में
दफ़्न हो जाती है मेरी हर उड़ान
दिनोंदिन बढ़ता जाता है
तुम्हारा साम्राज्य
जिसके हर पत्थर पर
अंकित है मेरा अभिशप्त इतिहास
दोहराता बार-बार
हर पल
पराजय की दारूण गाथा
जहां गूंजती है
मेरी खामोश चीख
मंत्रकीलित पुतले की तरह
जिसमें चुभोया गया
तुम्हारे स्वामित्व का
हर दंश
बहता है विष बन
शिराओं में
क्या करूं?
क्या नीलकंठ बन रम जाऊं!
या हिमशैल सी जम जाऊं!!
किसी कठपुतली सी तन जाऊं!!!
क्या करू मैं?
...
मेरी बेचैन गतियों का दिशाज्ञान
दिमाग के इस कोने से उस कोने तक
मंडराता भटकता है जैसे कोई बवंडर
घिसटते हुए रात और दिन के बीच
गूंजता है एक चिरंतन विलाप!!
...

 धरती के दावेदार

एक दिन जुटेंगे कोने कोने से
धरती के दावेदार
और मांगेंगे हिसाब किताब
इस धरती के सौदागरों से
खून पसीने में लथपथ
अपने हर टूटे बिखरे सपनों का
जिसके बूते चला था सदियों
सौदागरों का चक्रवर्तीय राज
धरती से अंतरिक्ष तक
और तब्दील कर दिया जिसने
हर बात को एक बिकाऊ चीज में
...
धरती के दावेदार
धूमिल नहीं होने देंगे
अपने सपनों को
और बाकी दुनिया से
छीन झपट
सभी चटकीले शोख रंगों से
भरेंगे नए रंग
अपने फ़ीके उदास सपनों में
...
अंधेरों की खदबदाती
दलदली जमीन में
छिपे अपने खिलाफ़
षड्यत्रों के मकड़जाल का
करेंगे पर्दाफ़ाश
धरती के दावेदार
मिलकर एक साथ
और किसी के भुलावे में
अब हर्गिज न आएंगे वे
...
...
काश कि मिले मेरे शब्दों को

काश कि मिले मेरे शब्दों को
ढेर सारी खामोशी और अकेलापन
कि हर मौन आहट को
सहेज सकूं अपने अंतर में
काश कि मिले मेरे शब्दों को
इतनी समझ और ज्ञान
कि महसूस करूं उनमें छिपी
झिझक द्वंद्व और भय को
किसी से कहने से पहले
काश कि मिले मेरे शब्दों को
दग्ध खामोशियों में
ठंडी बयार का आधार
कि सपनों की राख में से
बटोर पाऊं कोई नन्ही सी अंगार
काश कि मिले मेरे शब्दों को
काई और कीचड़ से पटा संसार
कि खिलें वे सब के सब
कमल दल बनकर
और फ़ैलाएं सुवास सभी दिशाओं में
काश कि मिले मेरे शब्दों को
पत्थरीले सन्नाटे का संसार
कि गूंजे कोई गीत बनकर
मूक पाषाणों में बसता
उनका अनोखा समूहगान
काश कि मेरे शब्दों को मिले
इतनी दृढ़ता कि
तूफानों के बीच भी रह सके
अविचलित अडिग और अटल/अकेली
काश कि मिले मेरे शब्दों को
इतनी समझदारी कि
ढूंढ सके
इंद्रधनुष गंदले पानी के
डबरे में भी
और अगर
कभी गिरना ही पड़े
कीचड़ या दलदल में तो
निहार सके
आसमान में
जगमगाते हुए सितारों को
कीचड़ की जगह
....

क्यों  वाडिस

दौड़ रहे हैं कदम
जाने किस अनजानी चाह के पीछे
अनदेखते/कूदते/फ़ांदते
गिरते/पड़ते
गढ़ों में/कीचड़ में
दलदल में/रेत में
नहीं अभी नहीं
...
नहीं अभी नहीं
...
अभी रूको नहीं
...
अभी ठहरो नहीं
...
जाने कौन
फ़ुसफ़ुसाता है बार-बार
...
नहीं
...
नहीं अभी नहीं हुआ कुछ
...
नहीं
...
नहीं अभी खत्म नहीं हुआ सब
...
और... और... और
एक परिधि से दूसरी परिधि तक
जाने कितनी परिधियों के परे
जाने कहां तक
...
एक अंधा सफ़र!
जाने क्या है उस पार
...
इसलिए/ठहरकर बार-बार
पूछता है मन बार-बार
क्वो वाडिस
...
किधर चलें
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गुनगुना संसार

गुनगुना संसार...
सही और गलत के सीमारेखा पर
दुविधा अनिश्चय और अनिर्णय की दलदली जमीन
न तो सही को समर्थन
न ही गलत का कोई मुखर विरोध
बीच के खेमे से गूंजता हर पल
महज गत्तों के भोंथरे तलवारों की झंकार
न तो माथे पर पड़ी कभी कोई शिकन
न ही दामन में कभी लगे कीचड़ के कोई दाग
न ही कभी पड़ी हल्की सी भी कोई खरोंच
उनके वैयक्तिक निजी शीशमहलों पर
हर बात से पिंड छुड़ा
हर बहस से हाथ धो
मूक दर्शक तमाशबीन बन महज
लेते हैं मजा भर
सवालों की दुनिया को करके अलविदा
करते हैं गुजारा पीढ़ी दर पीढ़ी
जिंदगी की उतरन और कतरन पर
तुच्छ अभिलाषाओं और झूठे अहंकार के
उथले भंवरजाल में
डूबता उतराता भर रहता है
समस्त गुनगुना संसार
...
 उथली गहराईयों के गोताखोर

उथली गहराईयों के गोताखोर
बीनते/ बटोरतें हैं हर बार
काई/ कीचड़/ कंकड़...
उथले गढ़ों/ गर्तों में
और ढ़िंढ़ोरा पीटते/बखानते
सब पर अहसान जताते
अपनी क्षुद्र क्षणजीवी उपलब्धियों का
थकते नहीं जीवन भर
पेश करते है उन्हें
सबके सम्मुख
सजा संवारकर
बारंबार हर बार
मखमली डब्बियों में संजो
बेशकीमती मोतियों की तरह
और उड़ाते हैं मजाक
जान जोखिम में डालकर
समंदर की अतल गहराईयों से
दुर्लभ अनगढ़ मोतियां
लाने वालों का
पागल और मूर्ख कहकर
जो फ़ूंक डालते हैं जीवन
क्षण भर में ही
काई में से भी
कंचन/कमल को तलाशते
बेमकसद/बेसबब
बिना किसी नफ़े नुकसान के
मकड़जाल में फ़ंसे
गोकि काई पटी
धूसर सतह में भी
तलाशते जीवन की स्वर्णिम छटा
गंदगी/बदबू के बीच तलाशते
सुगंधित हवा के बुलबुलों का भंडार
कि धुंए/सीलन में लिपटी घुटन
बनी रहे सांस लेने लायक!
कि जीवन बचा रहे जीने लायक
निरर्थक श्रम में व्यय कर जीवन
मुर्झाते हैं बिन सराहे
रेगिस्तानी फ़ूलों की तरह
या गुम जाते हैं
किसी टूटी हुई बांसुरी की
खोई हुई धुन की तरह
या पानी पर उकेरे
किसी अभिलेख की तरह
या खदबदाते भाप के
बुलबुलों की तरह
कि नींव के पत्थर से
कंगूरे तक का सफ़र
रास न आया कभी
किसी भी तरह
उनके यानी
उथली गहराईयों के गोताखोरों के
सतह पर बने रहने
या टिके रहने के
मुहिम/जद्दोजहद में
जायज है सब कुछ
मुहब्बत और जंग की तरह
कपट झूठ धूर्तता से लबरेज
वक्त पर गधे को भी
बाप बनाने से गुरेज नहीं
क्योंकि मालूम है उन्हें/कि
वास्तविक संसार में
मुख्य पात्रों का
लीलामय रंगमंच ही
बटोरता है सभी वाहवाही/तालियां
फ़ूलों के गुच्छे और भी न जाने क्या क्या
नेपथ्य के हिस्से तो हमेशा से आया है
गुमनामी/अंधेरा और गहन उदासी
तो उन्हें क्या इतना गयागुजरा समझा है
अभागे असहाय और मजबूर
औरों की तरह
जो सहते हैं हर बात
भाग्य के लेखे की तरह
वे तो भला ठहरे
असाधारण/अवतरित
विलक्षण/सर्वगुणसंपन्न
वे भला क्यों सहें
औरों की तरह
मूर्ख अज्ञानी थोड़े ही न हैं वे
जो करें किसी की भी गुलामी
बुद्धि चातुर्य मे किससे कम हैं वे भला
वे उथली गहराईयों के गोताखोर
...
...
काफ़्का के वंशज

काफ़्का के वंशज आज भी
हैं अभिशप्त रेंगने और घिसटने को
और उन अभागों की जिंदगियों पर
अपनी रोटियां सेंकने वाले
मुक्त है आज भी
आकाश में हंस और बगुले बन
विचरने के लिए बिलकुल आजाद
...
और उन अभागों के अनकहे सवाल
उमड़ते हैं बारंबार
उनकी चेतना के आखिरी बिंदु तक
कि/ आखिर क्यों नहीं चाहती है ये दुनिया
कि हम सब उड़ें/कि
शायद हमारा तो जन्म ही हुआ है
रेंगने और घिसटने के लिए
...
वे चाहे तो उड़ें आकाश में
पंछी और तितली बनकर
पर क्या मजाल जो हम
देख पाए आकाश की
जरा सी भी झलक
...
हमारे तो सांस लेने पर भी पाबदी है
यूं तो हर तरफ़ कहने को
आजादी ही आजादी है
और फ़िर सब कुछ पर तो
एकाधिकार और आरक्षण
सिर्फ़ उनका ही है
...
गिनती की सांसे
और चंद एक सपनों के झुनझुने
बस इतना ही हक है हमें
इससे ज्यादा की उम्मीद
और कल्पना भी
राजद्रोह है यहां
जिसकी सजा तय है
मृत्यु दंड से लेकर
देश निकाला तक
...
शायद तुम्हें लगे कि
हमें डरा धमका कर
मार ही डालोगे इस बार
और किसी मूक बांसुरी सी
हमारी आवाजों को दबाकर
खुद चैन की वंशी बजाओगे फ़िर से
बेखटके अपने अपने घर जाकर
...
पर लौटेंगी हमारी प्रतिध्वनियां
दुस्वप्नों की चेतावनियां बनकर
और बिखर जाएगी हवाओं में
रक्तबीजों की आंधी बनकर
जो बनकर हजार आंखे
रखेगी नजर तुम्हारी
एक एक हरकत पर
और जो तुमने कभी सोचा
उनसे बचकर निकल जाने की
कोई भी तरकीब
तो समझ लेना कि
अब नहीं है वे
पहले की तरह बकलौल और मूर्ख
जो तुहारी चाल को न भांप पाएंगे
और तुम्हारी कैसी भी चिकनी चुपड़ी बातो में
फ़िर दुबारा से आ जाएंगे
...
उन्होंने भी एकलव्य बन
सीख लिया है तुम्हारा
हर कौशल हर ज्ञान
और नौसिखिए से वे सभी
बन गए है एक से एक धुरंधर तीरंदाज
अब किसी अर्जुन के लिए नहीं
होगा कुर्बान अंगूठा किसी एकलव्य का
अब तो अर्जुन भी जीतेगा
हर प्रतियोगिता अपने ही दम खम
छल बल झूठ प्रपंच अब
पैठ न बना पाएंगे
अब तो हर तरफ़ और हर जगह
सिर्फ़ एकलव्य और एकलव्य ही
नजर आयेंगे
...
इस बार बच निकल भागने की जगह
भी कम पड़ जाएगी
जब अपने अपने घरों से
भीड़ की भीड़ निकल कर आएगी
और बदला लेगी अपने टूटे सपनों
और बेबस आंसुओं का
वे अपने हजारों लाखों हाथों से
मिलकर देंगी पटखनियां
और रौंद डालेंगी तुम जैसों को
इस बार मौका मिलने पर
...
...
 मेरी कविताएं

मेरी हताशाओं/पराजयों की
अंतहीन/निस्पंद/निर्जन
जून सी दुपहरी में
अक्सर आ धमकती है
किसी बिन बुलाए मेहमान सी
मेरी कविताएं
मेरी उन्हें टरकाने/बहलाने की
सभी कोशिशों को नाकाम करती
मेरे आसपास/चारों तरफ़
मचे लूटपाट/मारकाट से
त्रस्त/घायल
मन के/अनगिन मुखौटों/कवचों को
चीरती/भेदती
उनकी तीक्ष्ण तरल
तेजोमय दृष्टि से
नहीं बच पाता है
मेरा कोई भी झूठ
मेरे अनर्थक प्रलापों को अनसुना करती
कि/सब ठीक- ठाक है
कि/मैं ठीक हूं
कि/सब कुछ ठीक चल रहा है
...
जाने किस उम्मीद में
जने किसका संदेशा ले
बीमारी की अधनींद/अधजाग के
दलदली प्रवाह में
डूबती उतराती
जाने किन टेढे मेढे
रास्तों से होकर
जाने किन किन जालों को काटकर
पहुंचती है मेरे घर तक
सपनों की एक लंबी कतार
झकझोरती/झिंझोड़ती
घेर लेती हैं मुझे/हर बार
मेरी कविताएं
...
जाने किस उम्मीद में
भीड़ भरी जगहों में
मुझे अकेला पा
कभी बस में/कभी बाजार में
और मेरी सूनी निष्प्रभ आंखों के सामने
गुजरते है फ़्रेम-दर-फ़्रेम
भूले बिसरे सपनों का
खामोश/वीतरागी जुलूस
किसी सनाका खाए व्यक्ति सा
बौखलाई सी ताकती हूं अपने आसपास
...
काफ़ी थकी/उदास निगाहों से घूरती
जाने आपस में मुड़ मुड़ कर
क्या बतियाती हैं वे
बार बार अपने सिरों को हिलाती
मेरी बेचारगी/दयनीयता का
लेखा जोखा सहेजती
बीती स्मृतियों को एडिट करती
गुम जाती हैं व्यस्तता के भंवर में
छोड़ जाती हैं मुझे हक्का-बक्का
हैरान-परेशान
अगली मुलाकात के लिए
...
झुंझलाई सी उन्हें विदा करने की हड़बड़ी मे
अक्सर किसी गलत स्टाप पर उतर जाती हूं कई बार
दिग्भ्रांत बौखलाई सी
गलत मकान में जा घुसती हू कभी कभार
ताकि वे छोड़ दें मेरा पीछा/तंग आकर
मुझे मेरे हाल पर अकेला छोड़ दें
जब कहीं भी कुछ भी सही नहीं है तो
भला मैं ही क्यों अपना पता सही बताकर
बारंबार उनके चंगुल में फ़ंसू
और बनती रहू बलि का बकरा/हर बार
क्यों न मैं औरों की तरह ही रहूं
...
...
 करती है परेशान
 
करती है परेशान/रोज ही
ढेरों बातें
बेवजह दुखता है मन
उन बातों को सोचकर
जिनपर अक्सर/कभी ध्यान नहीं जाता
किसी का भी/कि आखिर
क्यों होता है वैसा जो होता है
कि क्यों नहीं होता वैसा
जैसा कि होना चाहिए
क्यों छिनता जा रहा/अधिकार तक
सपने देखने/जीने का
उम्मीद की नन्ही सी किरण तक सहेजना
किसी खतरनाक जुर्म से कम नहीं
कुछ करने और कर सकने
के बीच के गहराते धुंधलके में
गर्क हो चुका/निरंतर घटता/मिटता संसार
होने और अनहोने का फ़र्क
किसी गोधूलिवेला क्षेत्र सा
जहां कि धूमिल पड़ चुकी हो
क्षितिज/दिशाओं को दर्शाने वाली सभी रेखाएं
वास्तविकता का संसार
समेटे है सभी संभावनाओं को
पर वक्त की गति/किसी कठपुतली सी
बढ़ी जा रही है/अपने किसी अज्ञात ओरबिट पर
...

 कमजोर सा  खंडहर

किसी कमजोर सी खंडहर की
थकी हुई दीवार के सहारे
टिक कर भी
सांस लेती है कई बार
जिंदगी/उसके
ढहने और गिरने के मध्य
तमाम उलझनों के बावजूद
और अपनी कमजोर टहनियों से
थाम लेती है उन ढहती दीवारों को
...
उसकी करूण कराह भरी विलाप में
मिला देती है जिंदगी अपना जोशीला संगीत
बीते हुए ठहरे खामोश पलों में घोल देती है जिंदगी
खिलखिलाहट भरे दिनों की अनवरत गूंज
जिसकी अलमस्त अल्हड़ और बेपरवाह
स्मृतियों तक के चूरे को भी परत-दर-परत
छीनता जा रहा है उससे समय हर पल हर क्षण
...
पर जिंदगी उसके अकेले निर्जन मूक संसार की
ढहती हुई मीनारों की कमजोर दीवारों पर
जो खड़ी थी सदियों से अडिग/अविचलित
हर तूफ़ान के सामने, उसकी सत्ता को धता बता
रोप देती है उनपर नए नए रस-रंग की बेलें
...
अपने आसपास के बेआवाज ढहते परिवेश में
आशा और उम्मीद की किरण बनकर
खिलती नन्ही कलियां
खेल रही है आंखमिचौली
समय के धूपछांही परछाईयों से
कि किसी दिन झांकेगी वही कमजोर टहनियां
समय के भंवरजाल से बाहर मजबूत लंगर बन
और देगी प्रश्रय तूफ़ानों मे फ़ंसे कितने ही
डूबते भटकते जहाजों को
जो आएंगे लौटकर किसी रोज
अपने अपने किनारों पर गले लगाने
अपनी भूली बिसरी जिंदगियों को
उनकी शीतल छांव में
खोजने अपना खोया हुआ सुकून
...
...
(लेखिका-परिचय:
जन्म: १७ फ़रवरी १९६० दिल्ली में.
शिक्षा: राजनीतिशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली से.
सृजन: कविता आलेख अनुवाद आदि.
संप्रति: भारतीय कृषि अनुसधान परिषद् दिल्ली में कार्यरत.
ब्लॉग : ख़ामोश फ़लक  और  अग्निपाखी
संपर्कujjwalajyotitiga@gmail.com )
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