बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

नज़ीर अकबराबादी की ईद
















है आबिदों को त'अत-ओ-तजरीद की ख़ुशी
और ज़ाहिदों को ज़ुहद की तमहीद की ख़ुशी

रिंद आशिक़ों को है कई उम्मीद की ख़ुशी
कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की ख़ुशी

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

पिछले पहर से उठ के नहाने की धूम है
शीर-ओ-शकर सिवईयाँ पकाने की धूम है

पीर-ओ-जवान को नेम'तें खाने की धूम है
लड़को को ईद-गाह के जाने की धूम है

कल्ला किसी का फूला है लड्डू की चाब से
चटकारें जी में भरते हैं नान-ओ-कबाब से

फिरते हैं दिल-बरों के भी गलियों में ग़त के ग़त
आशिक़ मज़े उड़ाते हैं हर दम लिपट लिपट

काजल हिना ग़ज़ब मसी-ओ-पान की धड़ी
पिशवाज़ें सुर्ख़ सौसनी लाही की फुल-झड़ी

कुर्ती कभी दिखा कभी अन्गिया कसी कड़ी
कह "ईद ईद" लूटेन हैं दिल को घड़ी घड़ी

रोज़े की ख़ुश्कियों से जो हैं ज़र्द ज़र्द गाल
ख़ुश हो गये वो देखते ही ईद का हिलाल

पोशाकें तन में ज़र्द, सुनहरी सफ़ेद लाल
दिल क्या के हँस रहा है पड़ा तन का बाल बाल

जो जो के उन के हुस्न की रखते हैं दिल से चाह
जाते हैं उन के साथ ता बा-ईद-गाह

तोपों के शोर और दोगानों की रस्म-ओ-राह
मयाने, खिलोने, सैर, मज़े, ऐश, वाह-वाह

रोज़ों की सख़्तियों में न होते अगर अमीर
तो ऐसी ईद की न ख़ुशी होती दिल-पज़ीर

सब शाद हैं गदा से लगा शाह ता वज़ीर
देखा जो हम ने ख़ूब तो सच है मियाँ "नज़ीर"

[आबिद=श्रद्धालु; त'अत=श्रद्धा,ज़ाहिद=पूजा करने वाला; ज़ुहद की तमहीद=धर्म की बात की शुरुआत,पीर=पुराना; नेम'त=इनाम/दया, ग़त =भीड़,पिश्वाज़= कुरती,हिलाल= ईद का चांद; पोशाक=कपड़े]

नज़ीर की लम्बी नज़्म ईद उल फ़ित्र से

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मंगलवार, 31 अगस्त 2010

दलित मोह कितना अपना

  












 मीरा कुमारी की क़लम से




क ल तक समाज के जिस वर्ग को घृणा और तिरस्कार की नज़रों से देखा जाता था, आजादी के वर्षों बाद तक जिसे अछूत मानकर लोग किनारा कर लिया करते थे, आज उसी वर्ग की सुनीता केरी के घर राहुल गांधी जैसे छोटे-बड़े नेताओं का आना-जाना लगा रहता है। दलितों की बस्तियों में अब अक्सर राजनेताओं की गाड़ियाँ चक्कर काटने लगी हैं। दलितों की इस तरह मिजाजपुर्सी की जाएगी, सुनीता केरी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, क्योंकि एक समय इन दलितों को अछूत मानकर इनकी बस्तियां और पीने के पानी के कुएं इत्यादि सवर्ण बस्तियों से काफी दूर रखे जाते थे। अगर इनसे कोई काम करवाना होता तो उन्हें दूर से ही निर्देश दे दिये जाते थे। यहां तक कि अगर भूलवश किसी दलित से कोई सामान छू जाता तो उस पर गंगाजल छिड़क कर उसे शुद्ध किया जाता था, पर आज अचानक ऐसा क्या हो गया कि राजनेताओं को इनके घरों की खाक छाननी पड़ रही है। इस वंचित वर्ग की उन्हें तीमारदारी करनी पड़ रही है।

दरअसल यह सारा खेल राजनीति का है। सत्ता की कुर्सी पर खुद को बनाए रखने के लिए तो राजनेता किसी के पांव तक पड़ने को तैयार हो जाते हैं। फिर यह तो केवल उनकी मिजाजपुर्सी की बात है। सत्ता के खेल में आज दलितजन अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्हीं के हाथों में सत्ता की कुंजी है। वह जिसे चाहें, उसकी सरकार बनवा दें, जिसे चाहें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दें। समाज का यह वंचित तबका आज सरकार बनाने और बिगाड़ने में महत्पूर्ण भूमिका निभा रहा है। देश के सबसे बड़े क्षेत्रफल वाले राज्य उत्तर प्रदेश और बड़े-बड़े साम्राज्य कायम करने वाले बिहार की बात करें तो इन दिनों यहां-वहां दलितों को ढाल बनाकर राजनीति के दांव-पेंच जमकर आजमाए जा रहे हैं। बिहार में दलित नेता तथा पूर्व केन्द्रीय मन्त्री रामविलास पासवान अपनी खोयी हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निशाना बना रहे हैं। पासवान नीतीश पर दलितों को आपस में बांट कर राजनीतिक रोटियां सेंकने का आरोप लगा रहे हैं ताकि वहां की दलित जनता नीतीश से कट कर बिरादरी के आधार पर पासवान को अपना नेता चुन ले। वहीं उत्तर प्रदेश में राजनीतिक बिसात बिछा कर दोनों बड़ी पार्टियाँ [बसपा और कांग्रेस] दलित कार्ड के सहारे सन् 2012 में होने वाला सत्ता संग्राम जीतने के लिए अपना सब कुछ झोंक देने के लिए सन्नद्ध दिख रही हैं। खुद को दलितों का मसीहा कहने वाली मायावती नहीं चाहतीं कि उनके गढ़ में कोई सेंधमारी करे। इसलिए उन्होंने अपनी पूरी ताकत अपने वोटरों, खासकर दलितों को रिझाने के लिए झोंक दी है। अंबेडकर जयन्ती के दिन मायावती उनके अनुयायियों को खुश करने के लिए कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने का संकल्प दिला चुकी हैं, मगर कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी भी हार मानने वालों में नहीं हैं। उन्होंने भी यह कह कर अपनी मंशा साफ कर दी कि अब हम पीछे हटने वाले नहीं। राहुल के तल्ख तेवर देख कर ऐसा लग रहा है कि इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उन्होंने मायावती को पटखनी देने की ठान ही ली है। तभी तो लड़ाई का मोर्चा उन्होंने मायावती के सबसे बड़े गढ़ अंबेडकर नगर से ही खोल दिया है। बाबा साहेब की प्रतिमा को माल्यार्पण करने का राहुल का निर्णय सीधे-सीधे मायावती के वोट बैंक पर हाथ डालने से जुड़ा हुआ है। इस बात को मायावती भांप गई थीं। वह अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी कैसे मार सकती थीं। वह अच्छी तरह जानती थीं कि राहुल द्वारा अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने से दलित वर्ग उनकी तरफ आकर्षित हो सकता है। इसलिए उन्होंने राहुल को ऐसा करने की इजाजत ही नहीं दी। कथित तौर पर माल्यार्पण करने की इजाजत नहीं मिलने पर कांग्रेस ने बसपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि मायावती अंबेडकर की विरासत पर एकाधिकार का प्रयास कर रही हैं। अंबेडकर जयन्ती को आधार बनाकर दोनों पार्टियों ने जिस तरह एक दूसरे पर कीचड़ उछाला, उससे तो यही लग रहा है कि सन् 2012 का विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प होने जा रहा है। दोनों तरफ से इसके लिए स्पष्ट संकेत भी किए जा चुके हैं। पिछले दिनों अंबेडकर नगर से शुरू हुआ घटनाक्रम उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल सकता है।
           अंबेडकर जयन्ती के बहाने बसपा और कांग्रेस एक-दूसरे के खिलाफ अपने तीर भरे तरकश लेकर मैदान में कूद पड़े हैं। दोनों पार्टियाँ  अच्छी जरह जान-समझ रही हैं कि सत्ता की कुंजी दलितों के पास ही है। दलित जिसकी मुट्ठी में होंगे, राज्य की कमान भी उसी के हाथ में होगी। लिहाजा दोनों पार्टियाँ  दलितों को प्रभावित करने के लिए अपने-अपने दावे पेश कर रही हैं। माया जहां वर्तमान में खुद को दलितों की सबसे बड़ी रहनुमा बता रही हैं, वहीं कांग्रेस कह रही है कि उन्हीं की पार्टी ने दलित समुदाय को आरक्षण और जमीनें देकर उनका भला किया था। कांग्रेस ने ही बाबा साहेब को संसद में पहुंचने का मौका दिया था। दलित उनके पुराने वोट बैंक रहे हैं। गौरतलब है कि देश की राजनीति में कांग्रेस युग का आधार दलित, मुस्लिम और बाह्मण वोट ही थे, मगर मण्डल और मन्दिर आन्दोलन ने कांग्रेस के वोटरों में भारी सेंधमारी की, जिसके कारण कांग्रेस का जनाधार खिसक कर अलग-अलग पार्टियों की तरफ चला गया। इसमें सबसे ज्यादा लाभ बसपा को मिला। जितने भी दलित वोट थे, वे सब बसपा की झोली में गिर गए और माया दलितों की मसीहा बन गईं। धीरे-धीरे मायावती ने अपनी पार्टी में बाह्मण, क्षत्रिय और मुस्लिम नेताओं को भी शामिल कर लिया ताकि दलितों के साथ-साथ सवर्णों के वोट भी उनके पाले में खिसक आए। आज मायावती की पार्टी में अनुमानत: 39 विधायक ब्राह्मण, 19 क्षत्रिय (ठाकुर), 11 मुस्लिम और 14 पिछड़ी जाति के हैं। इस तरह बसपा ने पूरे उत्तर प्रदेश पर कब्जा कर लिया, मगर 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के जो संकेत मिले, उससे कांग्रेस की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं। उत्तर प्रदेश में जमीन तलाश रही कांग्रेस को अप्रत्याशित रूप से 22 लोकसभा सीटों पर कामयाबी क्या मिल गई, उसे वहां अपनी वापसी की आस बंध गई और शुरू हो गया राहुल गांधी का मिशन 2012। उसी के साथ शुरू  हो गया अपने परंपरागत दलित वोटरों को रिझाने का सिलसिला।
            राहुल का दलित प्रेम किसी से छिपा नहीं है। इसलिए कांग्रेस राहुल को आगे कर अपनी योजना को मूर्त रूप देने में जुट गई है, जिसकी शुरुआत दलितों के गढ़ अंबेडकर नगर में रैली के आयोजन से कर दी गई है। कांग्रेस की रैली में उमड़ी भीड़ ने माया की आंखों से नीन्द गायब कर दी। कांग्रेस की रैली की सफलता को देखकर बसपा को यह डर सताने लगा है कि जिस तरह कांग्रेस रूठे मुसलमानों को मनाकर वापस अपने खेमे में शामिल कर चुकी है, कहीं उसी तरह दलित भी अपने पुराने घर की ओर चल पड़े तो  माया की सियासी हैसियत तार-तार हो जाएगी। दलितों पर कांग्रेस प्रेम हावी न हो जाए, इस भय से बहन जी ने सभी नेताओं को यह निर्देश जारी कर दिया कि वे गांव-गांव जाकर दलित वर्ग को बताएं कि कांग्रेस शुरू से ही कितनी अंबेडकर विरोधी रही है। इतना ही नहीं, बसपा नेताओं ने तो अंबेडकर  के अनुयायियों को यहां तक समझाया कि मान्यवर कांशी राम और मायावती ने दलितों में स्वाभिमान पैदा किया है। उन्हें राजनीतिक ताकत दी है। इससे वे देश में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन चुके हैं, मगर कांग्रेस साजिश के तहत मायावती को कमजोर करके दलितों की ताकत को खत्म कर देना चाहती है। दरअसल, इन दिनों उत्तर प्रदेश में दो तरह की दलित राजनीति गरमाई हुई है। एक दलित मायावती के हैं तो दूसरे कांग्रेस के। कांग्रेस के दलित वे हैं, जहां राहुल जाते हैं, उनकी झोपçड़यों में खाना खाते और ठहरते हैं। उन दलितों का रुझान कांग्रेस की तरफ है। वहीं मायावती के दलित प्रेम की बात करें तो वे उनकी दलित रैली में जाते तो हैं, मगर  सिर्फ डर और लालच की वजह से, स्वेच्छा से नहीं। भय इस बात का कि अगर बहन जी की रैली में साथ नहीं दिया तो उनके गुस्से का कोपभाजन बनना पड़ेगा और लालच इस बात का कि बहन जी की रैली में जो दलित आते हैं, उन्हें वह कांग्रेस से कहीं अधिक सुविधाएं मुहैया कराती हैं। रैली में आए दलितों को दो दिन का भोजन, आने-आने की सुविधा और 10 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से पैसा भी दिया जाता है। मायावती की सफल रैली के पीछे उनके कुछ दबंग नेताओं का हाथ होता है। रैली आयोजित करने से पहले पार्टी किसी एक ऐसे दलित व्यçक्त को मुखिया बनाती हैं, जिसका अन्य दलितों पर रोब हो। उसी व्यçक्त पर अधिक से अधिक दलितो को इकठ्ठा करने की जिम्मेदारी  सौंपी जाती है। दलितों का कांग्रेस के प्रति रुझान बसपा के लिए सिरदर्द बन गया है। कांग्रेस से भयभीत बसपा के सरकारी अमले के लोग लगातार उन दलितों के घरों के चक्कर काट रहे हैं, जिन घरों में बीते तीन सालों के दौरान राहुल गांधी आते-जाते रहे हैं। दलित वोटों को रिझाने-बचाने के लिए शुरू हुई सियासी जंग में दलितों की भी पौ-बारह हो गई है। दलित बस्तियों में इन दिनों बसपा कार्यकर्ताओं की आवाजाही बढ़ गई है। शह-मात के इस खेल में सरकारी अमला न सिर्फ गांव के लोगों की मिजाजपुर्सी करने में लगा हुआ है, बल्कि गांव की जरूरतों के बारे में हुक्मरान सूची भी तैयार कर रहे हैं। जिन-जिन गांवों में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का दौरा हुआ, उन सभी जगहों की जनता को पटाने में पुलिस और जिला प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। श्रावस्ती के जिस रामपुर देवमन गांव के तिलहर मजरे में राहुल ने 24 सितम्बर, 2009 को रात गुजारी थी, उसकी प्रधान जलवर्षा की भी इस बीच खूब मिजाजपुर्सी हो रही है। तकरीबन 2628 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 676 दलित निवास करते हैं, मगर आज भी इस गांव की साक्षरता दर मात्र पांच फीसदी है। यही नहीं, सन् 2007 में अमेठी के जौहर गांव की जिस सुनीता केरी के यहां राहुल ने रात गुजारी थी, बसपा नेता उसके भी खूब चक्कर काट रहे हैं।
             बसपा चाहे खुद को कितना भी दलितों की हिमायती बताए और बाबा साहेब की प्रतिमाएं बनवा कर उन पर माल्यार्पण करवाती रहे, मगर सच तो यही है कि जमीनी तौर पर उनके विकास के लिए बसपा ने आज तक कुछ भी ठोस नहीं किया। जिन दलितों के बल पर आज वह सत्ता पर काबिज हैं, उन्हें अभी तक समाज की मुख्यधारा से जोड़ तक नहीं पाई हैं। दलित मतदाता भी इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि बसपा सिर्फ उनका सहारा लेकर सत्ता में बने रहना चाहती है। उसका मकसद मात्र सत्ता सुख का निर्बाध उपभोग है, न कि दलितों का हित साधन। अगर सही मायने में मायावती दलितों का हित चाहतीं तो इतने सालों बाद भी दलित बस्तियों में लोग शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी के संकट से जूझ नहीं रहे होते।
               खुद को दलितों का मसीहा बता कर मायावती ने सिर्फ मूर्तियां ही तो लगवाईं हैं, मगर जो जीवित हैं, उन दलितों को कौन सा अधिकार उन्होंने दिलाया है? मायावती सरकार को सत्ता में आए तीन साल होने को हैं, मगर दलितों की स्थिति आज भी वैसी की वैसी है। विकास के नाम पर उन्होंने सिर्फ पार्क और दलित जाति के महापुरुषों की मूर्तियां ही बनवाई हैं। वह भले ही यह कह कर खुद को दलितों का रहनुमा साबित करने की कोशिश का रही हों कि क्वहम दलित और पिछड़ी जातियों के महापुरुषों के नाम पर पार्क और मेमोरियल इसलिए बनवा रहे हैं ताकि उन्हें उनका जायज सम्मान दिया जा सकें, पर वास्तविकता तो यही है कि जितने पैसे उन्होंने उन बेजान मूर्तियों के निर्माण में लगाये, उसका आधा हिस्सा भी अगर वे दलितों के हित के लिए खर्च करतीं तो उत्तर प्रदेश के दलितों का झुकाव कांग्रेस की तरफ नहीं होता। उनके रसूख और दबदबे की वजह से लोग भले ही अपना मुंह नहीं खोलते हों, पर सच्चाई तो यही है कि अब वे दलित अपना मसीहा मायावती को नहीं, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को मानने लगे हैं। हालांकि कांग्रेस ने अभी शुरुआत ही की है, लेकिन दलितों के प्रति उसका जो लगाव है और आज तक उनके लिए जो कुछ भी उसने किया है, वह सब दलितों को लुभाने का लालीपॉप भर नहीं है, क्योंकि दलितों को उनका हक दिलाने और उनको हरिजन कहे जाने पर आपçत्त जताने वाले बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को महात्मा गांधी ने ही संसद के गलियारों तक पहुंचने का मार्ग दिया। वही जज्बा अब राहुल के दिल में भी है।


[ लेखक-परिचय:
जन्म:२४ दिसंबर १९८३,मुजफ्फरपुर बिहार
शिक्षा: बी.ए.और जनसंचार एवं पत्रकारिता में उपाधि
सृजन: छिट-पुट पत्र-पत्रिकाओं में लेख, समीक्षा रपट प्रकाशित 
संप्रति: लोकायत में कापी एडिटर
संपर्क: meeramuskan@gmail.com ]



 
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सोमवार, 30 अगस्त 2010

हिन्दुत्व की अवधारणा ही आतंकी है










अमलेंदु उपाध्याय  की क़लम से
कांग्रेस के साथ आरंभ से दिक्कत यह रही है कि वह किसी भी मुद्दे पर कोई भी स्टैण्ड चुनावी गुणा भाग लगाकर लेती है और अगर मामला गांधी नेहरू खानदान के खिलाफ न हो तो उसे पलटी मारने में तनिक भी हिचक नहीं होती है। उसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाकर देश में सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतें अपना विस्तार करती रही हैं और कांग्रेस फौरी नुकसान देखकर अहम मसलों पर अपने कदम पीछे हटाती रही है जिसका बड़ा नुकसान अन्तत: देश को उठाना पड़ा है। कुछ ऐसा ही मामला फिलहाल 'भगवा आतंकवाद' के मसले पर हुआ जब राज्य पुलिस महानिदेशकों के एक तीन दिवसीय सम्मेलन में गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने धयान दिलाया कि देश में भगवा आतंकवाद भी है। बस भगवा गिरोह ने जब शोर मचाना शुरू किया तो कांग्रेस बैकफुट पर आ गई और चिदंबरम से उसने अपना पिण्ड छुड़ा लिया। नतीजतन हिन्दुत्ववादी  आतंकवादियों  के हौसले बुलन्द हैं।
     यहां सवाल यह है कि क्या वास्तव में भगवा आतंकवाद जैसा कुछ है? और क्या आतंकवाद का कोई धर्म होता है? जाहिर सी बात है कि समझदार लोगों का जवाब यही होगा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और न कोई रंग होता है। लेकिन चिदंबरम ने जो कहा उससे भी असहमत होना आसान नहीं है। चिदंबरम के शब्द प्रयोग में असावधानी हो सकती है लेकिन भावना एकदम सही है। जिस आतंकवाद की तरफ चिदंबरम ने इशारा किया उसकी आमद तो आजादी के तुरंत बाद हो गई थी और इस आतंकवाद ने सबसे पहली बलि महात्मा गांधी की ली। उसके बाद भी यह धीरे धीरे बढ़ता रहा और 6 दिसम्बर 1992 को इसका विशाल रूप सामने आया।
     हाल ही में जब साध्वी प्रज्ञा, दयानन्द पाण्डेय और कर्नल पुरोहित नाम के दुर्दान्त आतंकवादी पकड़े गए तब यह फिर साबित हो गया कि ऐसा आतंकवाद काफी जड़ें जमा चुका है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी का चिदंबरम के बयान पर हो- हल्ला मचाना 'चोर की दाड़ी में तिनका' वाली कहावत को चरितार्थ करता है।
     पहली बात  तो यह है कि भगवा रंग पर किसी राजनीतिक दल का अधिकार नहीं है और न करने दिया जाएगा। यह हमारी सदियों पुरानी आस्था का रंग है। लेकिन चिदंबरम के बयान के बाद भाजपा और संघ यह दर्शाने का प्रयास कर रहे हैं गोया भगवा रंग उनका ही हो। अगर ऐसा है तो भाजपा का झण्डा भगवा क्यों नहीं है?
     अब संघी भाई कह रहे हैं कि हिन्दू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता। बात सौ फीसदी सही है और हम भी यही कह रहे हैं कि हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता और आतंकवादी गतिविधिायों में जो आतंकवादी पकड़े गए हैं या अभी पकड़ से बाहर हैं वह किसी भी हाल में हिन्दू नहीं हो सकते वह तो 'हिन्दुत्व' की शाखा के हैं। दरअसल 'हिन्दुत्व' की अवधारणा ही आतंकी है और उसका हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं है। कोई भी धर्मग्रंथ, वेद, पुराण, गीता रामायण हिन्दुत्व की बात नहीं करता न किसी भी धर्मग्रंथ में 'हिन्दुत्व' शब्द का प्रयोग किया गया है।
हिन्दुत्व एक राजनीतिक विचार धारा है जिसकी बुनियाद फिरकापरस्त, देशद्रोही और अमानवीय है। आज हमारे संधी जिस हिन्दुत्व के अलम्बरदार बन रहे हैं, इन्होंने भी इस हिन्दुत्व को विनायक दामोदर सावरकर से चुराया है। जो अहम बात है कि सावरकर का हिन्दुत्व नास्तिक है और उसकी ईश्वर में कोई आस्था नहीं है। जबकि हिन्दू धर्म पूर्णत: आस्तिक है। उसकी विभिन्न शाखाएं तो हैं लेकिन ईश्वर में सभी हिन्दुओ की आस्था है। लिहाजा ईश्वर के बन्दे आतंकी तो नहीं हो सकते पर जिनकी ईश्वर में आस्था नहीं है वही आतंकी हो सकते हैं। 
     जो अहम बात है कि हिन्दू धर्म या किसी भी धर्म के साथ कोई 'वाद' नहीं जुड़ा है क्योंकि 'वाद' का कंसेप्ट ही राजनीतिक होता है जबकि 'हिन्दुत्व' एक वाद है। और आतंकवाद भी एक राजनीतिक विचार है। दुनिया में जहां कहीं भी आतंकवाद है उसके पीछे राजनीति है। दरअसल आतंकवाद, सांप्रदायिकता के आगे की कड़ी है। जब धर्म का राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए हथियार की तरह प्रयोग किया जाता है तब सांप्रदायिकता का उदय होता है और जब सांप्रदायिकता के जुनून को पागलपन की हद तक ले जाया जाता है तब आतंकवाद पैदा होता है। 
 भारत में भी जिसे भगवा आतंकवाद कहा जा रहा है वस्तुत: यह 'हिन्दुत्ववादी आतंकवादहै, जिसे आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन पालते पोसते रहे हैं। संघ की शाखाओं में बाकायदा आतंकवादी प्रशिक्षित किए जाते हैं जहां उन्हें लाठी- भाला चलाना और आग्नेयास्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। दशहरे वाले दिन आतंकवादी अपने हथियारों की शस्त्र पूजा करते हैं।
     फिर प्रतिप्रश्न यह है कि भाजपा और संघ को चिदंबरम के बयान पर गुस्सा क्यों आता है? 'मजहबी आतंकवाद', 'जिहादी आतंकवाद' और 'वामपंथी उग्रवाद' जैसे शब्द तो संघ के शब्दकोष की ही उपज हैं न! अगर मजहबी आतंकवाद होता है तो भगवा आतंकवाद क्यों नहीं हो सकता? अगर वामपंथी उग्रवाद होता है तो दक्षिणपंथ का तो मूल ही उग्रवाद है। अगर 'जिहादी आतंकवाद' और 'इस्लामिक आतंकवाद' का अस्तित्व है तब तो 'भगवा आतंकवाद' भी है। अब यह तय करना भाजपा- आरएसएस का काम है कि वह 'किस आतंकवाद' को मानते हैं?


 [ लेखक-परिचय:  
जन्म : 18,मई १९७० को बदायूं  में 
शिक्षा: एक सभ्य सुसंस्कृत और शैक्षणिक परिवार से होने के बावजूद अमलेंदु जी कहते हैं कि  लेकिन मैं स्वयं शिक्षित नहीं [हँसना मना है !]
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन साथ ही समाचार पोर्टल  ]     
 http://hastakshep.com/   के संपादक
संपर्क: amalendu.upadhyay@gmail.com ]
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गुरुवार, 26 अगस्त 2010

पैसे से खलनायकी ...सफ़र कबाड़ का

 उड़ीसा से छत्तीसगढ़ तक वेदांता की ख़ूनी रेल















सैयद एस क़मर की कलम से



  यह कोई फ़िल्मी  कहानी नहीं है जिसमें एक कुली मजदूर किस तरह रातों रात खरब पति बन जाता है,यह कहानी वेदांता जैसी कंपनी के मालिक की  है, जिसकी छवि आम लोगों के दरम्यान खलनायक की है ,लेकिन उसे  नायक बनाने के लिए कुछ अफसरों और राजनेताओं ने सारे नियम-कानून को धता बताते हुए ज़मीन-आसमान एक कर दिए हैं। जो किसी भी मोल पर अपने साम्राज्य को बढाए रखना चाहता है, जहां सिसकती विधवाएं हैं ,जवाँ बेटे को खो चुकी बुढी माओं का विलाप है और दरवाज़े को निहार रही उन बच्चों की मासूमियत है, जिनके पिता रोज़ काम करने जाते हैं लेकिन लौट कर कभी नहीं आते! बालको की चिमनी में राख कर दिए जाते हैं । कुछ की ख़बर भी नहीं लगती । ख़बर है कि उड़ीसा में पर्यावरण दोष के कारण वेदांता की एक परियोजना को प्रतिबंधित कर दिया गया है। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे सुरम्य और शांत अंचल की सुध किसे है। यहाँ तो वही होता है जो अनिल अग्रवाल चाहें या उनके सुपारी पर पल रहे  सरकारी अमले  !

उड़ीसा में आदिवासियों की सुन ली गयी। वेदान्ता जैसी कुख्यात कंपनी के पर सरकार ने कुतर दिए. हम कह सकते हैं बोलो जयराम!! केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम नरेश ने एन. सी. सक्सेना की रिपोर्ट के आधार पर उड़ीसा के कालाहांडी जिले की कंपनी की खनन योजना पर रोक लगा दी । इस खनन योजना से पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम का घोर उलंघ्घन हो रहा था। अनिल अग्रवाल  की कंपनी वेदांता नियमगिरि पहाडिय़ों में बाक्साइड  निकालने के लिए कऱीब पांच हज़ार करोड़ की योजना पर काम कर रही थी। पश्चिमी उड़ीसा के हरे भरे अकाल के नाम से कुख्यात जिले कालाहांडी के तिहत आने वाला प्रस्तावित खनन का यह इलाक़ा डोंगरिया आदिवासियों का गढ़ है। सक्सेना रिपोर्ट के मुताबिक 7500 वर्ग किलोमीटर के इलाके में फैले वन क्षेत्र को खतरा पैदा हो गया था।
छत्तीसगढ़ में हज़ारों एकड़ ज़मीन मुफ्त के भाव में अनिल अग्रवाल को दे दी गयी है। जिसमें सिर्फ बालको में 2700 एकड़ है उसके अलावा राजधानी  रायपुर और कवर्धा यानी कबीरधाम का एक बड़ा हिस्सा वेदांता को खनिज उत्खनन के लिए दे दिया  गया है । पेड़ की अवैध कटाई भी खूब की जा रही है। अभी एक सर्वे से बात सामने आई है कि यदि यही हाल रहा तो प्रदेश  के जंगल तीस सालों के अन्दर ही  ख़त्म हो जायेंगे। पर्यावरण का संकट यहाँ भी खड़ा हो चुका है। वेदांता खूब धज्जियां उड़ा रही है। वहीे अवैध ज़मीन पर बन रही उसकी चिमनियाँ ज़िंदा लोगों को निगलती जा रही हैं। बालको में सितम्बर 2009 में ऐसी ही चिमनी ने सौ मजदूरों को जिंदा निगल लिया था। बालको की चिमनी जहां बन रही थी, वह अवैध कब्जे वाली जमीन है। वनभूमि पर निर्माण हो रहा था और प्रशासन वहां मूकदर्शक बना हुआ था।


छत्तीसगढ़ का कोरबा राज्य का पावर हब कहा जाता है। 2001 में  एनआरआई उद्योगपति अनिल अग्रवाल की लंदन में रजिस्टर्ड कंपनी वेदांता-स्टरलाइट द्वारा  551 करोड़ रुपये में भारत सरकार के उपक्रम भारत एल्युमीनियम कंपनी यानी बालको की 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदे जाने के बाद से बालको पर अनिल अग्रवाल की वेदांता का कब्जा है और वेदांता के साम्राज्य का विस्तार लगातार जारी है। इस विस्तार  में चिमनी में तप रहे और मलवे में दब रही लाशों का ढेर है तो लगातार कट रहे जंगल के कारण उजाड़ श्मशानी सन्नाटा है।

रविवार जैसी साईट ने इस मुद्दे पर लगातार लिखा है.रविवार में दर्ज है कि बालको को अतिक्रमण हटाने की नोटिस दी गई तो उसने कोर्ट से स्टे ले लिया था। बालको प्रबंधन के खिलाफ सरकार कार्रवाई करने से डरती है। यही वजह है कि न्यायालय में प्रकरण की सुनवाई के दौरान राज्य के एडवोकेट जनरल खड़े नहीं होते एक सामान्य वकील को खड़ा कर दिया जाता है। चिमनी हादसे में १०० लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार बालको के मालिक अनिल अग्रवाल पर भी सरकार कार्रवाई नहीं करना चाहती। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के मज़दूर युनियन से संबद्ध सुधा भारद्वाज पूछती हैं- जब भोपाल गैस कांड में एंडरसन के प्रत्यार्पण की कोशिश जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं तो इस पूरे मामले के लिए सीधे तौर पर जिम्मेवार वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल और उनके मातहत गुंजन गुप्ता को अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है ?


इस निर्माण स्थल पर दिए गए ठेकों के बारे में पता करें, तो पता चलता है कि यहां का काम एक चीनी कंपनी सेपको और एक भारतीय कंपनी गैनन डंकरले को दिया गया था. दुर्घटना होते ही इन कंपनियों के अधिकारी वहां से खिसक लिए थे. प्रशासन ने चीनी कंपनी के 76 अधिकारियों के वापस चीन जाने का पूरा प्रबंध तक कर डाला था। प्रशासन ने पहले ही दिन बिना बयान लिए सेपको के चीनी अधिकारियों को अपने संरक्षण में देश से बाहर जाने के लिए भारी सुरक्षा के बीच एयरपोर्ट भी पहुंचा दिया था ।


बिहार में कभी सत्तर के आस-पास  कबाड़ी के रूप में अपनी जीवन यात्रा शुरु करने वाले वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल सन चौरासी तक मुंबई के पेडर रोड पर रहा करते  थे । दो दशक के अंतराल में किस तरह देश में येन केन प्रकारेण खरब पति बनने का सिलसिला शुरू हुआ है ,उसकी ज़िंदा मिसाल धीरे-धीरे बनते चले गए. जिसमें उनका साथ दिया सियासी नेताओं  ने और प्रशासनिक अधिकारियों ने। उनके सहयोगियों में एक केंद्रीय मंत्री का भी नाम सरे फेहरिस्त है जो हर कांग्रेसी हुकूमत में हर बार केन्द्रीय पदों पर रहे हैं। वेदान्त्ता जैसी कुख्यात कंपनी के सर्वेसर्वा अनिल अग्रवाल ने भ्रष्ट होती जा रही सडांध मारती इस व्यवस्था को अपने माकूल करने के लिए अपने सारे अस्त्र खोल दिए थे। अगर प्रमाण सहित कहा जाय तो सन 77 से आज तक कई घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि अपने स्वार्थ के लिए अनिल अग्रवाल कुछ भी कर सकते हैं.उनके गोरख धंधे की एक मिसाल ही लीजिये  वेदांता रिसोर्से प्रा.लि. कंपनी मुंबई स्टाक एक्सचेंज में दिसंबर 2003 में सूचीबद्ध होती है जिसमें स्टारलाईट  के शेयर थे । 88 फीसदी शेयर  इसी अग्रवाल परिवार के थे.और रातों रात इसमें हज़ारों प्रतिशत की उछाल आ जाती है सब कुछ वित्त मंत्रालय के प्रमुख के वरदहस्त से संपन्न होता है । सिर्फ केंद्रीय मंत्री ही नहीं ,इस व्यक्ति ने उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में भी सरकारी अमले को अपने शिकंजे में कसना शुरू किया और किंचित सफल रहा। कहा जाता है कि भाजपा सरकार के पिछले कार्यकाल में जब कोरबा निवासी राज्य के वन मंत्री ननकी राम कंवर ने वेदांता के खिलाफ मोर्चा खोला और 1036 एकड़ वन भूमि पर बेजा कब्जे का सवाल उठाया तो हफ्ते भर बाद उनका विभाग छिन गया था। अभी जब पर्यावरण मंत्रालय ने सक्सेना रिपोर्ट के आधार पर वेदांता की एक खनन परियोजना पर उड़ीसा में रोक लगाने की सोची तो इस मंत्री ने बताया जाता है कि उसे रुकवाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा दिया था। लेकिन पर्यावरण मंत्री जयराम  नरेश आखिर सफल रहे और रोक लग गयी। इधर उड़ीसा की पटनायक सरकार भी अपने तईं वेदांता का सहयोग और समर्थन करती रही है। पर्यावरण मंत्रालय ने इस रोक के लिए आधार वन सलाहकार समिति,महालेखा परीक्षक और एफएसी की सिफारिशों को बनाया है। इन तीनों ने ही वेदान्त के साथ उड़ीसा सरकार पर भी वन कानूनों को तोडऩे का आरोपी बतलाया है। इस फैसले के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक दिल्ली दौड़ पड़ते हैं तो उधर राज्य के  औद्योगिक  इस्पात व खनन मंत्री रघुनाथ मोहंती इस क्रांतिकारी और आदिवासी हितार्थ फैसले को दुर्भाग्य पूर्ण कहते हैं। वहीँ पर्यावरण और वन मंत्री श्री नरेश दो टुक कहते हैं कि लांजीगढ़, कालाहांडी और रायगढ़ जिलों में फैले नियामगिरि पहाडी क्षेत्र में राज्य के स्वामित्व वाली उड़ीसा माइनिंग कर्पाेरोशन और स्टरलाईट  अनिल अग्रवाल की कंपनी की बाक्साइड खनन परियोजना के दूसरे चरण की वन मंजूरी नहीं दी जा सकती । वनोपज पर जिवनोपर्जन कर रहे दलित आदिवासियों की यह जीत है जैसा उड़ीसा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद भक्त चरण दास कहते हैं। दरअसल इस इलाके के आदिवासी बरसों से अपने ज़मीन और अपने प्रेम जंगल के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन इस जीत को उनकी पूरी आज़ादी नहीं कहा जा सकता। छत्तीसगढ़ आज भी अनिल अग्रवाल जैसे कई पूंजीपतियों के निशाने पर है ! सवाल उठना लाजिम है कि विकास के नाम पर आदिवासियों और दलितों से जल, जंगल , ज़मीन और आजीविका छीन लेना कितना उचित है!

दक्षिण भारतीय उस राजनेता को पाठक जानते ही होंगे  जिनका ज़िक्र बतौर केन्द्रीय मंत्री ऊपर आया है. न समझ सके हों तो मैं बतलाता चलूँ आप हैं पी. चिदंबरम .आपके बारे में और स्पष्ट बतला देना ज़रूरी होगा कि आप वेदांता समूह के निदेशक बोर्ड में रह चुके हैं। आर. पोद्दार की लिखी किताब ‘वेदांताज़ बिलियंस’ में बताया गया है कि चिदंबरम वेदांता रिसोर्सेज़ के निदेशक के तौर पर भारी-भरकम तनख्वाह लेते थे। सालाना 70,000 डॉलर उन्हें एक गैर-कार्यकारी निदेशक के तौर पर कंपनी से मिलते थे। यह बात 2003 की है। उस दौरान स्टरलाइट के शेयरों में चिदंबरम के रहते 1000 फीसदी का उछाल आया था।


लेखक-परिचय 
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