बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 26 मार्च 2014

गूंजती है हथोड़े सी आवाज़, औरत भी शामिल है इंसानो में

  शहनाज़ इमरानी की कविताएं   हथोड़े की आवाज़ गूंजती है एक वक़्त ऐसा भी था जब दरख्त लोगों का सारा सच सुनते थे दरख्तों के तनों में बने लकड़ी के कानों में सब कहा करते थे दरख्तों के पास अनगिनत राज़ जमा हो गए थे और वो कुल्हाड़ियों से नहीं डरते...
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मंगलवार, 18 मार्च 2014

मां उबालती रही पत्थर तमाम रात, बच्चे फ़रेब खाकर चटाई पे सो गए

  अमित राजा  की क़लम से कहानी: बारह साल का बुड्ढा  हालांकि देश के बीसियों मनभावन जगहों की मैंने सैर की है।  मगर जमशेदपुर का महज़  चार दिनों का प्रवास स्मृति में अजीब तरह से चस्पां हो गया है। जमशेदपुर की सैर से...
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गुरुवार, 13 मार्च 2014

चुनावी बुखार की गुलेल गोली

अभिषेक तिवारी का कार्टून साभार  शहरोज़  की दो अख़बारी फूलझड़ी  कहीं सच तुम बदल तो नहीं जाओगे भैया की धडक़नें इनदिनों शहर के  मौसम की तरह  बदल रही हैं। दरअसल उनकी प्रेयसी पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। इसके  लिए भाप...
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मंगलवार, 11 मार्च 2014

दुपट्टे को बांध दूंगी बरगद की ऊंची शाख पर परचम की तरह

  ब्लॉगर्स की कविताओं की रंगत बेशुमार @ शब्द संवादसैयद शहरोज क़मर की क़लम से 'अपने दुपट्टे को  बांध दूंगीउस पक्की  सडक़ के  कि नारे वालेबरगद की  ऊंची शाख पर परचम की  तरह।' इसे पढ़ते हुए...
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