बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 16 अगस्त 2010

काशी दिखाई दे कभी काबा दिखाई दे


 

 

 

 

 

 

 

योगराज प्रभाकर की चार ग़ज़ल 

 

 


उसका हर गीत ही अख़बार हुआ जाता है,
क्यों ये फ़नकार  पत्रकार हुआ जाता है !

जबसे अ'शार का मौजू बना लिया सच को,
बेवज़न शे'र भी शाहकार हुआ जाता है !

अपने बच्चों को जो बाँट के खाते देखा ,
दौर ग़ुरबत का भी त्यौहार हुआ जाता है !

बेल बेख़ौफ़ हो गले से क्या लगी उसके
बूढा पीपल तो शर्मसार हुआ जाता है !

हरेक दीवार फ़ासलों की गिरा दी जब से
सारा संसार भी परिवार हुआ जाता है !

2

मेरे बच्चों को खाना मिल गया है,
मुझे सारा ज़माना मिल गया है !

जबसे तेरा ये शाना मिल गया है,
आँसुओं  को ठिकाना मिल गया है !

मेरा पड़ोस  परेशान है यही सुनकर
मुझे क्यों आब-ओ-दाना मिल गया है!

तेरे अ'शार और मुझको मुख़ातिब,
मुझे मानो ख़ज़ाना मिल गया है !

क़लम उगलेगी आग अब यक़ीनन,
ज़ख्म दिल का पुराना मिल गया है !

मेरे अ'शार और है ज़िक्र उनका,
दीवाने को दीवाना मिल गया है !

लुटेंगीं अस्मतें बहुओं की अब तो,
मेरे क़स्बे को थाना मिल गया है !

(शाना=कंधा, आब-ओ-दाना=दाना पानी, मुख़ातिब=संबोधित, 'शार= शे'र का बहुवचन, अस्मतें=इज्जतें)

3

कई बरसों के बाद घर मेरे चिड़ियाँ आईं
बाद मुद्दत ज्यों पीहर में बेटियाँ आईं !

ज़मीं वालों के तो हिस्से में कोठियाँ आईं,
बैल वालों के नसीबों में झुग्गियाँ आईं !

जाल दिलकश बड़े ले ले के मकड़ियां आईं
क़त्ल हों जाएँगी यहाँ जो तितलियाँ आईं !

झोपडी कांप उठी रूह तलक सावन में,
ज्योंही आकाश पे काली सी बदलियाँ आईं !

ऐसे महसूस हुआ लौट के बचपन आया,
कल बड़ी याद मुझे माँ की झिड़कियां आईं !

बेटियों के लिए पीहर में पड़ गए ताले
हाथ बहुओं के जिस दिन से चाबियाँ आईं

उसके घर में है यक़ीनन ही कंवारी बेटी
जिसके चेहरे पे ये बेवक़्त झुर्रियां आईं !




4

नफ़रत का अन्धकार यूं फैला दिखाई दे
नाम-ओ-निशान अमन का मिटता दिखाई दे !

काशी दिखाई दे कभी का'बा दिखाई दे,
नन्हा-सा बच्चा जब कोई हँसता दिखायी दे !

जिनको भी ऐतमाद है अपनी उड़ान पर
उनको आसमान भी छोटा दिखाई दे !

वो शख्स जिसकी नींद ही खुलती हो शाम को,
उसको ये आफ़ताब क्यूँ चढ़ता दिखाई दे !

खिड़की ही जब नहीं है कोई घर के सामने,
फिर कैसे भला चाँद का टुकड़ा दिखाई दे !

श्रद्धा नहीं तो हर नदी पानी के सिवा क्या ?
श्रद्धा हो गर तो हर नदी गंगा दिखाई दे





शायर का परिचय :

 जन्म: १८ नवम्बर १९६१ , पटियाला  
शिक्षा: पंजाबी विश्वविद्यालय से उच्च स्तरीय
सृजन : छिटपुट रचनाओं का प्रकाशन
सम्प्रति :मिल्क फ़ूड में अधिकारी और अंतरजाल पर एक अदबी कम्युनिटी बुक्स ऑनलाइन का संचालन
संपर्क: yr_prabhakar@yahoo.com

read more...

रविवार, 15 अगस्त 2010

पंद्रह अगस्त यानी किसानों के माथे पर पुलिस का डंडा















युसुफ़ किरमानी की क़लम से

























हाँ ! किसानों को पीटा अंग्रेज़ी नहीं देसी पुलिस ने  
दो की जान गयी 


भारत जब अपनी आजादी की जब 63वीं वर्षगांठ मना रहा था और लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसानों के लिए लंबी-चौड़ी बातें कर रहे थे तो ठीक उसी वक्त अलीगढ़-मथुरा मार्ग पर पुलिस ही पुलिस थी। यह सडक ठहर गई थी।[खबर है कि किसान और पुलिस के संघर्ष में दो किसान और पीएसी के जवान की मौत हो गयी है.-माडरेटर ] सड़क के दोनों तरफ बसे गांवों के किसानों और उनके परिवार के लोगों को बाहर निकलने की मनाही थी। जो निकला, उसे पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया। यह सब किसी अंग्रेजी पुलिस ने नहीं बल्कि देश की पुलिस फोर्स ने किया। यहां के किसानों ने गलती यह की थी कि इन्होंने सरकार से उनकी जमीन का ज्यादा मुआवजा मांगने की गलती कर दी थी। आंदोलन कोई नया नहीं था और महीनों से चल रहा था लेकिन पुलिस वालों की नासमझी से 14 अगस्त की शाम को हालात बिगड़े और जिसने इस पूरी बेल्ट को झुलसा दिया। यह सब बातें आप अखबारों में पढ़ चुके होंगे और टीवी पर देख चुके होंगे।

अपनी जमीन के लिए मुआवजे की ज्यादा मांग का आंदोलन कोई नया नहीं है। इस आंदोलन को कभी लालगढ़ में वहां के खेतिहर लोग वामपंथियों के खिलाफ लड़ते हैं तो कभी बिहार के भूमिहीन लोग सामंतों के खिलाफ लड़ते हैं तो हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपेक्षाकृत संपन्न इलाकों में वहां के किसान शासन के खिलाफ लड़ते हैं। छत्तीसगढ़ में यह तेंदुपत्ता माफिया के खिलाफ लड़ा जाता है।

लेकिन मुद्दा हर जगह किसान या खेतिहर मजदूरों की जमीन का ही है, जिसे सरकार अपने नियंत्रण में लेकर वहां कंक्रीट के जंगल खड़ा करना चाहती है या फिर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी (एमएनसी) के पालन-पोषण का जरिया बनाने के लिए सौदा किया जाता है। कतिपय लोग विकास, रोटी-रोजी का वास्ता देकर इस तर्क को खारिज कर सकते हैं। लेकिन यह तर्क सुनने वाला कोई नहीं है कि जिस किसान से उसकी जमीन छीनी जा रही है वह उसके बाद क्या खाएगा और कैसे जिंदा रहेगा। आपके कुछ लाख रुपये कुछ समय के लिए उसका लाइफ स्टाइल तो बदल देंगे लेकिन उसके मुंह में जिंदगी भर निवाला नहीं डाल सकेंगे।

मैं ही क्या आप तमाम लोगों में से बहुतों ने देखा होगा कि इस तरह का पैसा किस तरह किसानों को या उस इलाके की आबादी के हालात को बदल देता है। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली के शहरीकृत गांवों और एनसीआर के तमाम गांवों के किसानों को बड़ा मुआवजा मिला और देखते ही देखते उन गांवों में लैंड क्रूजर और पजेरों पहुंच गई। मुखिया और उनके बेटे शहर में आकर बार में बैठने लगे और कुछ ने होटल में कमरा लेकर कॉलगर्ल भी बुला ली। यह सब गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, सोनीपत, बहादुरगढ़, लोनी में हुआ। और अगर दिल्ली के गांवों की बात करें तो जौनापुर, जैतपुर, पल्ला, मुनीरका, महरौली के किसानों के साथ भी यही बीता। इन इलाकों के गांवों में आप चले जाएं तो पाएंगे कि दरवाजे पर पजेरो खड़ी है, पूछेंगे कि आपका बिजनेस क्या है तो जवाब मिलेगा कि हम तो पुराने जमींदार हैं। तगड़ा मुआवजा मिला है, उसी को खर्च कर रहे हैं। या फिर किसी ने ब्लूलाइन बस खरीद ली है और उसको चलवा रहा है।

फरीदाबाद के ग्रेटर फरीदाबाद या नहरपार इलाके में चले जाइए, आपको सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े अपार्टमेंट नजर आएंगे, लेकिन जैसे ही आप इन इलाकों के गांवों में जाएंगे तो घरों के सामने कोई न कोई गाड़ी खड़ी नजर आएगी। पता चलेगा कि घर का मुखिया सुबह से शराब पी रहा है और लड़का अपनी अलग मंडली लगाए हुए हैं। जिन किसान परिवारों का पैसा खत्म हो चुका है वे कब को जमीन पर आ चुके हैं और उस घर का लड़का अब उसकी जमीन पर बने अपार्टमेंट में या तो तीन हजार रुपये वेतन पाने वाला चौकीदार बन चुका है या फिर किसी की गाड़ी की धुलाई करके दो हजार रुपये कमा रहा है।

मैं चाहता तो इन तथ्यों को तमाम आंकड़ों औऱ नामों की चाशनी के साथ पेश करके बड़े ही गंभीर किस्म की रिपोर्ट बना सकता था लेकिन मैं यहां किसी नई रिसर्च रिपोर्ट को पेश करने नहीं आया हूं। यह हकीकत मेरे सामने की है इसलिए बयान कर रहा हूं। मुझे इन तमाम गांवों में जाने का मौका मिलता रहता है और हर बार कुछ नई जानकारी किसी न किसी परिवार के बारे में मिलती रहती है। यह ऐसे गांव हैं जहां टीवी भी उपलब्ध है और अखबार भी।

इन्हीं गांवों का किसान जब उसी अखबार में पढ़ता है कि किस तरह जिस जमीन का मुआवजा उसे सरकार ने छह लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिया है और अब वही जमीन डीएलएफ, यूनीटेक, बीपीटीपी या ओमेक्स जैसे बिल्डर सरकार से नीलामी में कई करोड़ रुपयों में खरीद रहे हैं तब उसकी नींद टूटती है। उसे अपने छले जाने का एहसास होता है। फिर वह अपनी बात कहने का मंच कहीं तो टिकैत के साथ खोजता है तो कहीं माओवादियों के रूप में उसे नजर आता है। कहीं उसे कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल भी मिल जाते हैं। पर लाठी, गोली में उसका आंदोलन बिगड़ जाता है। वह जेल जाता है और वहां से लौटने के बाद यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है। तब तक उसकी जमीन पर कोई न कोई मॉल या पीवीआर अपनी शक्ल ले चुका होता है।

बहरहाल, इन बातों और तर्कों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, यह ब्लॉग मेरे नियंत्रण में है तो इन विचारों को यहां जगह भी मिल गई है, चाहे आप उसे पढ़ें या न पढ़ें। वरना ऐसी सोच रखने वाले अब हाशिए पर जा चुके हैं। शहरों में रहने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, जिन्हें बड़े-बड़े मॉल्स में विकास नजर आता है, वे ऐसी तमाम बातों को खारिज करते रहे हैं और आगे भी करेंगे लेकिन वे ऐसे छोटे-छोटे आंदोलनों को अपने तर्कों से रोक नहीं पाएंगे। बेशक, उनका हिमायती, दलाल या पेड जर्नलिजम करने वाला मीडिया भी उनका साथ दे लेकिन वे समाज में आ रही चेतना को रोक नहीं पाएंगे। वह किसी न किसी रूप में फूटकर सामने आएगी। यह डरे हुए लोग लोगों को और डराना चाहते हैं। लेकिन इधर आंदोलनों का रुख बता रहा है कि इन डरे हुए लोगों के तर्क अब पब्लिक में खारिज होने लगे हैं।

अंत में एक अपील

यह लेख लिखने की सबसे बड़ी वजह वह संदेश है, जो मुझे पत्रकार और अंग्रेजी की मशहूर लेखिका अनी जैदी ( recent book - Known Turf) की ओर से मिला। उन्होंने शीतल रामजी बर्डे नामक बालिक की ओर से एक अपील इंटरनेट पर जारी की है जो दिल को हिला देती है। इस लड़की के पिता किसान थे और अब आत्महत्या कर चुके हैं। अब यह परिवार कागज के लिफाफे बनाकर अपना पेट पालता है। इस लड़की ने देशभर के लोगों से अपील की है कि वे उसे हर महीने एक पुरानी मैगजीन उसके पते पर भेजें, जिसका वह इस्तेमाल लिफाफा बनाने में कर सके। इससे उसकी मदद तो होगी ही और पर्यावरण की भी मदद होगी। प्लास्टिक की थैलियों का प्रचलन रुक सकेगा। आप नीचे उस बच्ची की अपील पढ़ें और जो कर सकते हैं करें।

From Annie Zaidi, Mumbai
One old magazine = somebody's freedom of livelihood "I was barely nine when my dear father committed suicide. My mother has worked really hard to send my brother, sister & me to school. She is still working hard to make our two ends meet... all she wants is ONE OLD MAGAZINE from you all, so she can make paper envelopes to earn & save environment... dear uncles & aunties, please-please do send us one old magazine every month to support us, so that we can go to better schools and live our lives with dignity and less suffering. 

My mother and other widow mothers like her will not hesitate to work hard to earn for us while saving the environment for the nation...I will be waiting with great expectations dear uncles & aunties for ONE OLD MAGAZINE from each one of you every month...If each one of you send one, it will become so many for my mother and other widow mothers to work hard to earn some amount every month...
A very BIG THANK YOU from my brother, sister, my mother and me...
SHEETAL RAMJI BARDE"
our address:
support 4 suicide farmers families, House No: 200 Opp: Dr. Harne's Hospital, Dhantoli Chowk Wardha: 442001


अगर मौका हो तो  इसे भी पढ़ें..


[लेखक-परिचय :
 टाइम्स के पत्रकारिता विद्यालय से सनदयाफ़्ता राजधानी दिल्ली के चर्चित युवा पत्रकार.गत कई वर्षों से नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ कापी सम्पादक.इनका ब्लॉग है हिन्दी वाणी .
आप इनसे yusuf.kirmani@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.
read more...

शनिवार, 14 अगस्त 2010

आज शहीदों ने तुमको अहले वतन ललकारा : अज़ीमउल्लाह ख़ान-- जिन्होंने पहला झंडा गीत लिखा

सैयद एस. क़मर की क़लम से


बना रहे बनारस ..सब की तमन्ना है लेकिन इस बहाने भाई रंगनाथ बेहद ज़रूरी सवालों से मुठभेड़ करते दीखते हैं.उन्होंने विस्मृत हो चुके शहीद अज़ीमउल्लाह ख़ान के उस गीत को पोस्ट किया है जिसे पहला झंडा गीत होने का श्रेय हासिल है.अंग्रेजों ने अपनी कुटिल चालें चलीं और कामयाब हुए..लेकिन इस सच से कौन इनकार कर सकता है कि मुस्लिम हुकूमतों या मुसलमानों के भारत आगमन के बाद जिस साझा संस्कृति ,सरोकारों का उदय हुआ.और देश के इन दो प्रमुख सम्प्रदाय के लोगों ने जिस तरह विदेशियों से लोहा लिया.इतिहास के पन्नों में सुरक्षित है.लेकिन भारत का आर्थिक दोहन करने राजनितिक सत्ता बरक़रार रखने के ध्येय से अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम को दो कट्टर धार्मिक खेमों में विभक्त कर दिया ताकि राष्ट्रीय चेतना का अभुदय पारस्परिक एकता के अभाव में मुमकिन न हो.भारतीय जनमानस लम्हों के लिए इन भरम जाल में अवश्य उलझा, जिस वजह कर राष्ट्रीय आन्दोलन में बाधा उत्पन्न हुई.कालांतर में कुछ लोगों ने इसे समझ लिया और कन्धा से कन्धा मिलाकर संग्राम में सशक्त भागीदारी निभाई.यह १८५७ का समय है.दरअसल यही दौर चाणक्य द्वारा प्रतिपादित भारतीय राष्ट्रवाद का सच था.बकौल प्रसिद्ध राजनितिक दार्शनिक जे एस मिल राष्ट्रीयता मानव जाति का वह भाग है , जो सामान्य सहानुभूति द्वारा आपस में संगठित है और सामान्य सहनुभुतियाँ एक राष्ट्रीयता की दूसरी राष्ट्रीयता से नहीं होती हैं.इस सामान्य सहानुभूति के कारण एक राष्ट्रीयता के लोगों में जितने सहयोग की भावना रहती है , उतनी दूसरों से नहीं हो पाती.
यही राष्ट्रीयता भारतियों के अंतस में समाहित हो चुकी थी, जो कि अंग्रेजों की राष्ट्रीयता [अंग्रेजी राज सत्ता] को किसी भी कीमत पर सहयोग करने को तत्पर नहीं थी.

विभिन्नताओं के बावजूद भारत में एकानुभुति की भावना पायी जाती है.सर हर्बट रिजले ने सही लिखा है, भारत में धर्म, रीती-रिवाज , भाषा तथा सामाजिक और शारीरिक भिन्नताओं के होते हुए भी जीवन की एक विशेष एकरूपता कन्याकुमारी से लेकर हिमाचल तक देखी जा सकती है. आज जिस प्रकार जाति,धर्म और क्षेत्र व भाषा ,मंदिर-मस्जिद को राष्ट्रीयता से ज़्यादा महत्त्व दिया जाता है , ऐसी संकीर्णता के पोषक या तो राष्ट्रिय आन्दोलन से अनभिज्ञ हैं या जानबूझ कर पाश्चात्य साम्राज्यवादी शक्तियों के उस षडयंत्र के यंत्र बने हुए हैं, जिसे देश की एकता अखंडता के विरुद्ध रचा गया है. आज कितने लोग हैं जिन्हें सत्येन्द्र नाथ ठाकुर, रंगोजी बापूजी और अज़ीम उलाह ख़ान के सम्बन्ध में थोडी बहुत भी जानकारी है.

बंगाल में १८६१ में सम्पादनी सभा की स्थापना की गयी थी.अमार बँगला कहने वाले भी तब भारत,हिन्दुस्तान या राष्ट्र शब्दों का बेहिचक प्रयोग किया करते थे.सभा के हर आयोजन में भारतेर जय बुलंद स्वर में गाई जाती थी.इस झंडा गीत के रचयिता थे प्रखर राष्ट्रवादी सत्येन्द्र नाथ ठाकुर. लेकिन इस झंडा गीत से बहुत पहले अज़ीमउलाह ख़ान ने १८५७ के आस पास भारत का झंडा गीत लिख लिया था.

गीत कुछ इस प्रकार था :

हम हैं इसके मालिक हिन्दुस्तान हमारा
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी न्यारा

यह है हमारी मिल्कियत हिन्दुस्तान हमारा
इसकी रूहानियत से रौशन है जग सारा

कितना क़दीम,कितना नईम सब दुनिया से प्यारा
करती है जिसे सरखेज़ गंग-ओ-जमुन की धारा

ऊपर बर्फीला पर्वत, पहरेदार हमारा
नीचे साहिल पे बजता सागर का नक़क़ारा

इसकी खानें उगल रही हैं, सोना, हीरा, पारा
इसकी शान-ओ-शौकत का दुनिया में जयकारा

आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
लूटा दोनों हाथों से न्यारा वतन हमारा

आज शहीदों ने तुमको अहले वतन ललकारा
तोड़ो गुलामी की जंजीरें , बरसाओ अंगारा

हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख हमारा,भाई-भाई प्यारा
यह है आज़ादी का झंडा इसे सलाम हमारा


इस गीत को रानी लक्ष्मी बाई ,तात्या टोपे से लेकर रंगोंजी तक के सिपाही गाया करते थे. क्रांतिकारी अज़ीमउल्लाह ख़ान १८५७ के स्वंत्रता संग्राम के उन महानायकों में से हैं जिनके शौर्य, साहस और अदम्य देशभक्ती के किस्से इतिहास के पन्नों में गुम होकर रह गए हैं. वरिष्ठ पत्रकार दिवंगत उदयन शर्मा , वरिष्ठ लेखक रूपसिंह चंदेल [जिन्होंने अज़ीमउल्लाह खान पर पुस्तक लिखी] जैसे लोग ही यदाकदा उनका स्मरण कर पाते हैं .

उदयन शर्मा ने अज़ीमउल्लाह के बारे में लिखा था कि उनका सम्बन्ध अत्यंत निर्धन परिवार से था .किशोरावस्था पर उन्हें किसी प्रकार अंग्रेजों के रसोई घरों में बावर्ची की नौकरी मिल गयी थी.ज्यादा पढ़े-लिखे तो थे नहीं, इसलिए अच्छी नौकरी की आशा ही बेकार थी . दूसरी तरफ़ उन्हें विदेशियों की गुलामी पसंद न थी.यहाँ पर आज़ादी के ख्वाब देखा करते थे.विदेशी माहौल में उन्होंने फ्रांसीसी और अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान अर्जन किया . हिन्दू-मुस्लिम एकता के वह प्रबल हिमायती थे.बिना आपसी एकता और सौहाद्र के आज़ादी हासिल करना मुश्किल था. उन्हें इस बात का इल्म था .इसलिए वह जहां खानसामे की भूमिका में विदेशी ज़बान सीख रहे थे तो साथ साथ हिन्दू-मुस्लिम के बीच प्रेम सद्भाव कायम रखने के लिए यत्नशील थे.


भाषा ज्ञान पश्चात अज़ीमउल्लाह ख़ान ने बावर्ची की नौकरी छोड़ दी.एक स्कूल में शिक्षक हो गए. इस प्रकार वह दूरस्थ ग्रामों के लोगों के संपर्क में आये. धीरे-धीरे उनकी चर्चा नाना साहब के दरबार तक जा पहुँची .नाना साहब ने उनको अपने दरबार में बुला लिया. वह उनके सबसे प्रिय सलाहकार बन गए.1854 में नाना साहब ने अज़ीमउल्लाह को अपना प्रतिनिधी बना कर इंग्लॅण्ड भेजा. यहाँ उनकी मुलाक़ात रंगोंबापू जी से हुई. वैचारिक साम्य के कारण दोनों जल्द ही मित्र बन गए.दोनों मित्र भारत को आज़ाद कराने के सपने संजोने लगे. विश्व समर्थन के लिए दोनों ने कई योरोपीय देशों की यात्रा की.अज़ीमउल्लाह ख़ान अंग्रेजों के विरुद्ध मदद मांगने रूस और तुर्की भी गए थे.
रूस से आकर अज़ीमउल्लाह ने राजमहल को क्रांति के वाहकों की छावनी में तब्दील कर दिया. वह सैनिकों को हथियार चलाने का अभ्यास कराने लगे.वह नाना साहब के साथ उत्तर भारत के उन सभी शहरों में गए जहां जहां अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल बज रहा था. इसी दौरान उन्होंने वह गीत लिखा, जिसे उत्तर भारत के सभी क्रांतिकारी सैनिक झंडा गीत की तरह गाते थे. १८५७ के विद्रोह के बाद हज़ारों राष्ट्रभक्तों को बिना किसी मुक़दमें के पेड़ों पर लटका कर फांसी दी गयी थी.इन में हिन्दू भी थे और मुसलमान भी.नीम के पेड़ों पर लटकी इन अनगिनत लाशों में एक लाश पयाम-ए -आज़ादी पत्र के सम्पादक मिर्ज़ा बेदार बख्त की भी थी.















लेखक-परिचय
read more...

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

विभाजन की ६३ वीं बरसी पर आर्तनाद : कलश से यूँ गुज़रकर जब अज़ान हैं पुकारती














शमशाद इलाही अंसारी 'शम्स' की कविता


तुम कब समझोगे ! कब जानोगे !!



तुम पीछे छोड गये थे
मेरे बिलखते,मासूम पिता को
घुटनों-घुटनों खून में लथपथ
अधजली लाशों और धधकते घरों के बीच
दमघोटूं धुऐं से भरी उन गलियों में
जिसे दौड कर पार करने में वह समर्थ न था.
नफ़रत और हैवानियत के घने कुहासे में
मेरे पिता ने अपने भाईयों,परिजनों के
डरे सहमे चेहरे विलुप्त होते देखे थे.

दूषित नारों के व्यापारियों ने
विखण्डन के ज्वार पर बैठा कर
जो ख्वाब तुम्हारी आंखों में भर दिये थे
तुम्हें उन्हें जीना था, लेकिन
तुम पीछे छोड गये थे
मेरे बिलखते,मासूम पिता को
उसके आधे परिवार के साथ...


मैं पूछ्ता हूँ तुमसे
आखिर क्या हासिल हुआ तुम्हें
उन कथित नये नारों से
नया देश, नये रास्ते और नये इतिहास से
जो आरम्भ होता कासिम, गज़नी,लंग से
और मुशर्रफ़ तक जाता.
पिछ्ली आधी सदी में क्या हुआ हासिल.
युद्ध,चन्द धामाके और बामियान में बुद्ध की हत्या.


तुम कब जानोगे
कि विघटन सिर्फ़ धरती का ही सम्भव है
विरासत, संस्कृति, इतिहास का नहीं.
तोप के गोलों से मूर्ती भंजन है सम्भव
विचार और अस्तित्व भंजन नहीं.

तुम कब जानोगे
कि तुम्हारे गहरे हरे रंग छाप नारों की
प्रतिध्वनि मेरे घर में भगवा गर्म करती है.
जो घर परिवार तुम बेसहारा, लाचार, जर्जर
पीछे छोड कर गये थे
वहां भी कभी कभी त्रिशूल का भय सताता है.
तुम्हारे गहरे हरे रंग ने
भगवे का रंग भी गहरा कर दिया है.

तुम कब जानोगे
कि वह ऐतिहासिक ऊर्जा
जो विघटन का कारण बनी
वह नए भारत की संजीवनी बन सकती थी
जो लोग परस्पर हत्यायें कर रहे थे
वे बंजर ज़मीन को सब्ज़ बना सकते थे
कल-कारखाने चला सकते थे
निर्माण के विशाल पर्वत पर चढ़ कर
संसार को बता सकते थे कि यह है
एक विकसित, जनतांत्रिक,सभ्य, विशाल हिंदुस्तान

तुक कब जानोगे
कि तुम्हारे बिना यह कार्य अब तक अधूरा है
अधर में लटका है क्योंकि
तुम पीछे छोड़ गए थे
मेरे बिलखते मासूम पिता को

तुम कब जानोगे
कि मेरे निरीह पिता को सहारा देने वाले हाथ
हर शाम कृष्ण की आराधना में जुड़ते थे
गंगा का जमुना से जुड़ने का रहस्य
बुद्ध का मौन और महावीर की करुणा
कबीर के दोहे, खुसरों की रुबाइयां
मंदिर में वंदना और मस्जिदों में इबादत
तुम कैसे समझोगे ?
क्योंकि तुमने इस धरती की तमाम मनीषा के विपरीत
सरहदें चिंतन में भी बनाई थी

तुम कब जानोगे
कि धर्म के नाम पर निर्मित यह पिशाच
अब खुद तुमसे मुक्त हो चुका है
वह हर पल तुम्हारे अस्तित्व को लील रहा है क्योंकि
तुम पीछे छोड़ गए थे
मेरे बिलखते मासूम पिता को

तुम कब जानोगे
कि अतीत असीम, अमर और अभाज्य है
वह सत्य की भांति पवित्र है
कब तक झुठलाओगे उसे
कितनी नस्लें और भोगेंगी
तुम्हारे इतिहास के कदाचार को
क्यों नहीं बताते उन्हें
कि हम सब एक ही थे
हमारे ही हाथों ने बोई थी पहली फसल
मोहन जोदाडो में
सिन्धु सभ्यता के आदिम मकान
हमने ही बनाये थे
हमने ही रची थी वेदों की ऋचाएं
हम सब थे महाभारत
हमारा ही था राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर
हमने ही स्वीकार किया था मोहम्मद का पैगाम
हमने ही बनाई थी पीरों की दरगाहें

तुम कब जानोगे
कि झूठ के पैर नहीं होते
झूठ को नहीं मिलती अमरता
तुम्हारे हर घर में रफी की आवाज़
मीना, मधुबाला, ऐश्वर्या की सुन्दरता
कृष्ण की बांसुरी पर लहराती दिलों की धड़कनें
हर नौजवान में छिपा दिलीप, अमित , शाहरुख़ का चेहरा
तुम्हारे झूठ से बड़ा सच
और क्या हो सकता है

तुम कब मानोगे
कि तुम सब कुछ जानते हो
सियासी फ़रेब की रेत में
दबी आँखें, दिमाग, दिल और वजूद
सच की आँधी में
बर्लिन की दीवार की भाँति
कभी भी ढह सकता है.
झूठ की चादर में लिपटे बम, बन्दूकें और बारूद
घोर असत्य की दीवारें, सरहदें, फ़ौजें
नपुंसक बन सकती हैं
लाखों बेगुनाह लोगों का बहा खून
कभी भी माँग सकता है हिसाब
उजडे़ घरों की बद-दुआयें
अपना असर दिखा सकती हैं, क्योंकि
तुम पीछे छोड गये थे
मेरे बिलखते मासूम पिता को..

तुम कब जानोगे
कि हम भी खतावार हैं
हमने भी चली हैं सियासी चालें
हमने भी तोडी हैं कसमें
हमें भी बतानी हैं गांधी की जवानी की भूलें
समझनी है जिन्नाह की नादानी
नौसिखिया कांग्रेस की झूठी मर्दानगी
अंग्रेज़ों की घोडे़ की चाल, शह-मात का खेल
फ़ैज़, फ़राज़,जोश,जालिब का दर्द
और ज़फ़र के बिखरे ख्वाब, क्योंकि
तुम पीछे छोड गये थे
मेरे बिलखते मासूम पिता को..

तुम कब जानोगे
कि मेरे पिता कई बरस हुए गुज़र गये हैं
खुली आँखों में ख्वाब और आस लिये
कि तुम लौट आओगे
उनका वो जुमला मुझे भी कचोटता है
"जो छोड़ कर गया है, उसे ही लौटना होगा"
मैनें जब से होश सम्भाला है
मैं भी यही दोहराता हूँ
मेरे बच्चे भी अब हो गये हैं जवान
वो भी सवाल करते हैं
नई रोशनी, नई तर्ज़, नई समझ के साथ
तुम्हारे यहाँ भी यही है हाल
आज नहीं तो कल ये शोर और तेज़ होगा
जवान नस्लें जायज़ सवाल पूछेंगी
हज़ारों बरस के साझें चूल्हे?
पचास साठ बरस की अलहेदगी?
तुम्हें देने होंगे जवाब क्योंकि
तुम पीछे छोड गये थे
मेरे बिलखते मासूम पिता को..

तुम कब जानोगे
कि पीछे छुटे,जले,बिखरे,टूटे घर
फ़िर आबाद हो गये हैं
वहाँ फ़िर से बस गये हैं
बचपन की किलकारियाँ,
जवानी की रौनक
और बुढा़पे का वैभव
तुम्हारा पलंग, तुम्हारी कुर्सी
तुम्हारी किताबें, तुम्हारे ख़त
तुम्हारी गलियाँ, वो छत
और आम जामुन के पेड़
सभी कुछ का़यम हैं प्रतीक्षारत है
तुम्हें वापस आना होगा
तुम्हें ही लौटना होगा क्योंकि
तुम्ही तो छोडकर गये थे
मेरे बिलखते मासूम पिता को..
साठ बरस पूर्व









[ कवि-परिचय :   नाम: शमशाद इलाही अंसारी
उपनाम: "शम्स"
जन्म:, कस्बा मवाना, ज़िला मेरठ (उत्तर प्रदेश) के एक निम्न-मध्यवर्गीय मेहनतकश मुस्लिम परिवार में वर्ष 1966, जनवरी  की 16 वीं तारीख़, रात पौने नौ बजे
शिक्षा: दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर, 1988 में पी-एच.डी. के लिये पंजीकृत किन्तु किन्ही कारणवश  अपूर्ण

छात्र जीवन से ही वामपंथी .पूर्ण कालिक पार्टी कार्यकर्ता भी रहे
पत्रकारिता की शुरुआत 1989 में अमर उजाला से फिर  कुछ दिनों बाद स्वतंत्र राह अख्तियार कर ली .लगभग दशक भर हिन्दी अखबारों के लिए स्थायी-अस्थायी तौर पर कार्य करने के बाद दूरदर्शन के लिए कुछ दिनों स्क्रिप्ट लेखन.अमर उजाला के अलावा नवभारत टाइम्स, कुबेर टाइम्स और जनपथ मेल से सम्बद्धता रही.
.बक़ौल शम्स साहब हराम की खायी नहीं, हलाल की मिली नहीं, विवश होकर सन २००२ में दुबई चले गए यहाँ मार्च २००९ में आर्थिक मंदी के शिकार हुए .

प्रखर प्रगतिशील विचारों के लिए दकियानूसी मुस्लिमों के कोफ़्त के शिकार रहे मूलत: पत्रकार शम्स साहब के कई ठिकाने हैं जहां आप इन से संवाद कर सकते हैं यथा न्यू एज इस्लाम, इस्लाम विमर्श और यहाँ यहाँ भी.

संप्रति: कनाडा में रोज़गार.
संपर्क :Shamshad66@hotmail.com ]





IN URDU
 



 
تقسیم کی 63 و یں  بر سی پر

  شمشا د الہی انصاری شمس کی نظم







کب جانو گے!! !   تم کب سمجھو گے


تم پیچھے چھوڑ گئے تھے
 
میرے بلکھتے ، معصوم والد کو
گھٹنوں -- گھٹنوں خون میں لتھپتھ
آ دھی جلی لاشوں اور دھد کتے گھروں کے درمیان
 سے بھری ان گلیوں میں د م گھو ٹو ں د ھو یں
جسے د و ڈ کر  پار کرنے میں وہ ا ہل نہ تھا.
نفرت اور ہیوانیت کے گھنے کہا سے میں
میرے والد نے اپنے بھائیوں ، لواحقین کے
ڈ ر ے سہمےچہرے غا ئب ہوتے دیکھے تھے.




غلیظ نعر و ں کے تا جرو ں نے
تخر یب کے تلا تم پر بیٹھا کر
جو خواب تمہاری آنکھوں میں بھر دیئے تھے
تمہیں انہیں جینا تھا ، لیکن
تم پیچھے چھوڑ گئے تھے
میرے بلکھتے ، معصوم والد کو
اس کے آدھے خاندان کے ساتھ...



میں پو چھتا ہوں تم سے
آخر کیا حاصل ہوا تمہیں
ان مبینہ نئے نعر و ں سے
نیا ملک ، نئ ر اہ اور نئی تاریخ سے
جو شر و ع ہوتی قا سم ، غز نی ، لنگ سے
اور مشرف تک جا تی.
گز شتہ نصف صدی میں کیا ہوا حاصل.
جنگ ، چند د ھما کے اور بامیان میں بدھ کا قتل.




تم کب جانو گے
کہ تقسیم صرف ز مین کا ہی ممکن ہے
وراثت ، ثقافت ، تاریخ کا نہیں.
توپوں کے گولوں سے مجسمہ کشی ہے ممکن
خیال اور وجود کشی نہیں.

تم کب جانو گے
کہ تمہارے گہرے سبز رنگ عکس نعر و ں کی
بر عکس گو نج میرے گھر میں زعفر ا ن گرم کرتی ہے.
جو گھر خاندان تم بیسہارا ، مجبو ر ، مخد وش
پیچھے چھوڑ کر گئے تھے
وہاں بھی کبھی کبھی ترشول کا خوف ستا تا ہے.
تمہارے گہرے سبز رنگ نے
زعفر ا ن کا رنگ بھی گہرا کر دیا ہے.





تم کب جانو گے
کہ وہ تاریخی توانائی
جو تقسیم کی با ئث بنی
وہ نئے بھارت کی سنجیو نی بن سکتی تھی
جو لوگ باہم قتل کر رہے تھے
وہ بنجر زمین کو سبز ہ بنا سکتے تھے
کل -- کارخانے چلا سکتے تھے
تعمیر کے بلند کو ہ پر چڑھ کر
دنیا کو بتا سکتے تھے کہ یہ ہے
ایک ترقی یا فتہ ، جمہوری ، مہذب ، بلند ہندوستان




تم کب جانو گے
کہ تمہارے بغیر یہ کام اب تک نا مکمل ہے
خلا میں لٹکا ہے کیونکہ
تم پیچھے چھوڑ گئے تھے
میرے بلکھتے معصوم والد کو




تم کب جانو گے
کہ میرے پس ماند ہ والد کو سہارا دینے والے ہاتھ
ہر شام کرشن کی عبا د ت میں مربوط ہو تے تھے
گنگا کا جمنا سے ر بط کا راز
بدھ کی خمو شی اور مہا ویر کی ر حم د لی
کبیر کے دو ہے ، خسر و کی ر با ئیا ں
مندر میں پو جا اور مسجد و ں میں عبادت
تم کس طرح سمجھو گے ؟
کیونکہ تم نے اس خطے کی تمام عقل کے برعکس
سرہد یں ز ہن میں بھی بنائی تھیں



تم کب جانو گے
کہ مذہب کے نام پر تعمیر یہ شیطا ن
اب خود تم سے آزاد ہو چکا ہے
وہ ہر پل تمہارے وجود کو ختم کر رہا ہے کیونکہ
تم پیچھے چھوڑ گئے تھے
میرے بلکھتے معصوم والد کو




تم کب جانو گے
کہ ماضی لا محد و د ، تا بند ہ اور غیر منقسم ہے
وہ سچ کی طر ح مقدس ہے
کب تک جٹھلا و گے اسے
کتنی نسلیں اور بھو گیگیں
تمہارے تاریخ کے بد فعل کو
کیوں نہیں بتاتے انہیں
کہ ہم سب ایک ہی تھے
ہمارے ہی ہاتھوں نے بوئ تھی پہلی فصل
مہن جوداڈو میں
سند ھو تہذیب کے عا دم مکا ن
ہم نے ہی بنا ئے تھے
ہم نے ہی رچی تھی ویدوں
کی رچا ئیں  
ہم سب تھے مہا بھا رت
ہمارا ہی تھا رام ، کرشن ، بدھ ، مہا ویر
ہم نے ہی قبول کیا تھا محمد کا پیغام
ہم نے ہی بنائی تھی پیروں کی درگاہیں





تم کب جانو گے
کہ جھوٹ کے پاؤں نہیں ہوتے
جھوٹ کو نہیں ملتی تا  بند گی
تمہارے ہر گھر میں رفیع کی آواز
مینا ، مدھوبالا ، ایشوریہ کا حسن
کرشن کی بانسر ی پر لہر ا تی دلوں کی د ھڑکنيں
ہر نوجوان میں چھپا دلیپ ، امت ، شاہ رخ کا چہرہ
تمہارے جھوٹ سے بڑا سچ
اور کیا ہو سکتا ہے



تم کب مانو گے
کہ تم سب کچھ جانتے ہو
سیاسی فریب کی ریت میں
دبی آنکھیں ، دماغ ، دل اور وجود
سچ کی آ ند ھی میں
برلن کی دیوار کی طر ح
کبھی بھی ڈ ھہ سکتا ہے.
جھوٹ کی چادر میں لپٹے بم ، بند و قیں اور بارود
محو فر بیب کی دیواریں ، سر حدیں  ، ا فو اج
مخنث بناسکتی ہیں
لاکھوں بے گنا ہ لوگوں کا بہا خون
کبھی بھی مانگ سکتا ہے حساب
ا جڑ یں گھر و ں کی بد د عا ئیں
اپنا اثر دکھا سکتی ہیں ، کیونکہ
تم پیچھے چھوڑ گئے تھے
میرے بلکھتے معصوم والد کو..




تم کب جانو گے
کہ ہم بھی خطاوا ر ہیں
ہم نے بھی چلی ہیں سیاسی چا لیں
ہم نے بھی توڈی ہیں قسمیں
ہمیں بھی بتانی ہیں گاندھی کی جوانی کی بھولیں
سمجھنی ہے جنا ح کی نا دانی
نوسکھیا کانگریس کی جھوٹی مر د ا نگی
انگریزوں کی گھو ڑ وں کی چال ، شہ - مات کا کھیل
فیض ، فراز ، جوش ، جالب کا درد
اور ظفر کے بکھرے خواب ، کیونکہ
تم پیچھے چھوڑ گئے تھے
میرے بلکھتے معصوم والد کو..



تم کب جانو گے
کہ میرے والد کئی برس ہوئے گزر گئے ہیں
کھلی آنکھوں میں خواب اور آس لئے
کہ تم لوٹ آ و گے
ان کا وہ جملہ مجھے بھی کچو ٹتا ہے
"
جو چھوڑ کر گیا ہے ، اسے ہی لوٹنا ہوگا"
میں نے جب سے ہوش سمبھا لا ہے
میں بھی یہی دہرا تا ہوں
میرے بچے بھی اب ہو گئے ہیں جوان
وہ بھی سوال کرتے ہیں
نئی روشنی ، نئی طرز ، نئی سمجھ کے ساتھ
تمہارے یہاں بھی یہی ہے حال
آج نہیں تو کل یہ شور اور تیز ہوگا
جوان نسلیں جائز سوال پوچھیگیں
ہزاروں برس کے سا جھے چلھے؟
پچاس ساٹھ برس کی علیحد گی؟
تمہیں دینے ہوں گے جواب کیونکہ
تم پیچھے چھوڑ گئے تھے
میرے بلکھتے معصوم والد کو..





تم کب جانو گے
کہ پیچھے چھٹے  ، جلے ، بکھرے ، ٹو ٹےگھر
پھر آباد ہو گئے ہیں
وہاں پھر سے بس گئے ہیں
بچپن کی کلکاریاں ،
جوانی کی رونق
اور ضعیفی
کی  شا ن و شو کت
تمہارا پلنگ ، تمہاری کرسی
تمہاری کتابیں ، تمہارے خط
تمہاری گلیاں ، وہ چھت
اور آم جامن کے پیڑ
تمام کچھ قا یم ہیں منتظر ہیں
تمہیں واپس آنا ہوگا
تمہیں ہی لوٹنا ہوگا کیونکہ
تمہی تو چھوڈ کر گئے تھے
میرے بلکھتے معصوم والد کو..
ساٹھ برس قبل



ہند ی سے ا ر د و پیشکش شہر و ز


 
read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)