बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शनिवार, 21 अगस्त 2010

लालगढ़ से संसद तक लाल हुईं ममता





















अमलेन्दु उपाध्याय की क़लम से


माओवादी ममता !

पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर ज़िले में, माओवादियों के प्रभाव वाले इलाक़े लालगढ़ में रैली के दौरान ममता बनर्जी ने पुलिस मुठभेड़ में मारे गए नक्सल प्रवक्ता आज़ाद की मौत पर सवाल उठाए थे. जिसको लेकर टिप्पणी को लेकर संसद के दोनों सदनों में पिछले दिनों जमकर हंगामा हुआ. एक दूसरे के धुर विरोधी  भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी दल  यहाँ एकजुट नज़र आए. लेकिन दीदी जिन्हें अपना हमराज़ हमदम समझ रही थीं उनका कहना है की दीदी भी व्यवस्था का ही एक हिस्सा हैं.भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्यूरो के सदस्य कोटेश्वर राव यानी किशनजी ने विपक्षी नेताओं के उस आरोप को ठुकरा दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि ममता बनर्जी की लालगढ़ में आयोजित रैली को माओवादियों का समर्थन हासिल था.

इस दहर में सब कुछ है पर इन्साफ नहीं है।



इन्साफ हो किस तरह कि दिल साफ नहीं है।



राजनीति के विषय में अक्सर कई कहावतें सुनने को मिलती हैं। जैसे राजनीति में दो और दो चार नहीं होते या राजनीति में कुछ सही गलत नहीं होता या फिर राजनीति और अवसरवादिता एक दूसरे के पर्याय हैं। राजनीति के इन मुहावरों और सिद्धान्तहीन अवसरवादी राजनीति की ताजा मिसाल रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी ने हाल ही में पेश की है। एक समय में अटल बिहारी वाजपेयी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की आंखों का तारा रहीं और हिन्दू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी के कारनामों को समर्थन देने वाली ममता दीदी अब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन पार्ट-2 में प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह और संप्रग मुखिया सोनिया गांधी के जिगर का टुकड़ा हैं।



बीती नौ अगस्त को पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में एक रैली में ममता दीदी का प्यार गृह मंत्री पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दुश्मन न. एक माओवादियों के लिए उमड़ पड़ा। ममता ने लालगढ़ में ऐलान किया कि माओवादी नेता आजाद का फर्जी एनकाउन्टर किया गया है। बात सही भी हो सकती है क्योंकि ममता केन्द्र सरकार में महत्वपूर्ण पद पर आसीन हैं और सरकार के अन्दर जो चलता है उसकी पल पल की जानकारी उन्हें रहती है। क्योंकि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और लोग अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस की प्रदेश सरकारें अपने हाईकमान के इशारे पर ही चलती हैं। लिहाजा जब दीदी कह रही हैं कि आजाद का फर्जी एन्काउन्टर हुआ, तो यकीन न करने का भला कौन सा कारण हो सकता है?



लेकिन सवाल यह है कि दीदी जो बात आज सरेआम कह रही हैं वह उन्होंने सरकार के अन्दर क्यों नहीं की? दूसरा जब आजाद का फर्जी एन्काउन्टर करने का षड्यन्त्र रचा जा रहा था उस समय दीदी ने आजाद को बचाने का प्रयास क्यों नहीं किया? इसलिए ममता को अपने गिरेबान में भी झांक कर देखना चाहिए कि आजाद की हत्या के लिए जितने दोषी मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और चिदंबरम हैं, ममता उनसे कम गुनाहगार नहीं हैं। क्योंकि मनमोहन सरकार को बैसाखी अब ममता दीदी की लगी हैं उनके दुश्मन माकपाइयों की नहीं। इसलिए अगर आजाद का फर्जी एन्काउन्टर हुआ है, जैसा कि दीदी का आरोप है और अपना भी मानना है, तो आजाद की हत्या के जुर्म से ममता भी बरी नहीं हो सकती हैं।



लोगों को याद होगा कि जब ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस हादसा हुआ था उस समय ममता बनर्जी ही वह पहली शख्स थीं जिन्होंने आरोप लगाया था कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को विस्फोट से उड़ाया गया है और उन्होंने माओवादियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था। जबकि गृह मंत्रालय ने साफ कहा था कि विस्फोट के कोई सुबूत नहीं है। यानी जब जरूरत होगी तब ममता माओवादियों को हत्यारा भी कहेंगी और जब जरूरत होगी तब उनके समर्थन से रैली भी करेंगी। यह राजनीति की बेशर्म अवसरवादिता का जीता जागता उदाहरण है।



ममता बनर्जी का यह कोई नया कारनामा नहीं है। वह इससे पहले भी ऊट-पटांग हरकतें करती रही हैं। याद है न समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महासचिव अमर सिंह के साथ दिल्ली के जामियानगर में ममता गईं थीं और उन्होंने बटला हाउस एन्काउन्टर को फर्जी करार दिया था और मौके पर ही कुछ पत्रकारों की पिटाई भी करवा दी थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में वह बटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के लिए जिम्मेदार कांग्रेस के साथ ही मैदान में उतरीं।



मीडिया में जो खबरें आई हैं उनके अनुसार ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस हादसे के मुख्य आरोपियों में से कई ममता की रैली की कमान संभाल रहे थे। इतना ही नहीं ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की दुर्घटना के लिए जिस पीसीपीए को दोशी ठहराया जा रहा है, ममता की रैली उसी पीसीपीए के बैनर तले हुई। ममता के बहाने सवाल तो गृह मंत्री पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और माओवादी नेता किशन जी से भी हो सकते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब चिदंबरम माओवादियों का समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों को पुलिसिया भाषा में हड़का रहे थे। अब चिदम्बरम साहब माओवादियों की खुलकर हिमायत करने वाली ममता बनर्जी के खिलाफ क्या कदम उठाएंगे? नक्सलवाद को देश का दुश्मन न. एक करार देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह क्या ममता बनर्जी को अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने और उनके माओवादियों से संबंधों की जांच कराने की हिम्मत जुटा पाएंगे? लालगढ़ दौरे पर जाकर मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को कानून व्यवस्था का उपदेश देने वाले गृह मंत्री क्या अपनी मंत्रिमंडलीय सहयोगी को भी कुछ ज्ञान देंने की जहमत उठाएंगे?



जो अहम सवाल है वह माओवादी नेता किशन जी और पूरे माओवादी नेतृत्व से है। माओवादी लगातार माकपा और भाकपा को इसलिए कोसते रहे हैं कि इन दोनों दलों ने संसदीय जनतंत्र का रास्ता अपना लिया है। जहां तक माकपा-भाकपा और माओवादियों के अन्तिम लक्ष्य का सवाल है, दोनों के लक्ष्य में कोई अन्तर नहीं है, झगड़ा लक्ष्य को पाने के रास्ते का है। क्या किशन जी यह बता सकते हैं कि नरेन्द्र मोदी का समर्थन करने वाली, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की जिगर का टुकड़ा रहीं ममता बनर्जी का समर्थन करने से देश में साम्यवाद आ जाएगा? क्या जिस संसदीय जनतंत्र को माओवादी लगातार कोसते रहे हैं, उनका यह कदम उसी भ्रष्ट व्यवस्था को पोषित करने वाला नहीं है? क्या यही नई जनवादी क्रांति है? क्या किशन जी यह गारंटी दे सकते हैं कि माकपा को उखाड़ कर और तृणमूल कांग्रेस को सत्ता में लाकर माओवादियों का लक्ष्य पूरा हो जाएगा? अब यह तय करना माओवादी नेतृत्व का काम है कि क्या वह ममता बनर्जी के साथ खड़े होकर देश भर में अपने समर्थकों को खोना चाहेंगे?



नौ अगस्त की लालगढ़ रैली ने सवाल तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और मेधा पाटकर के लिए भी खड़े किए हैं। अभी तक दोनों ही लोग स्वयं को सामाजिक कार्यकर्ता घोषित करते आए हैं। लेकिन ममता बनर्जी के साथ उनका मंच साझा करना उनकी नीयत पर भी सवाल खड़ा करता है। एक आरोप अक्सर लगता रहा है कि देश के अन्दर कम्युनिस्ट पार्टियों के खिलाफ पूंजीवादी ताकतें पिछले दरवाजे से काम कर रही हैं और अब माओवादी भी जाने अनजाने इन ताकतों के हाथ का खिलौना बन रहे हैं। यह आरोप ममता की लालगढ़ रैली के बाद अब काफी हद तक सही लगने लगा है। अगर स्वामी अग्निवेश, मेधा पाटकर, ममता और माओवादी एक साझे मंच पर आते हैं तो क्या कहा जाएगा?



ममता बनर्जी का बयान सिर्फ राजनीतिक अवसरवादिता की ही बानगी नहीं है, बल्कि यह मौजूदा मनमोहन सरकार के ऊपर कई सवालिया निशान लगाती है। ममता रेल मंत्री हैं और किसी भी मंत्री का बयान पूरे मंत्रिमंडल का बयान समझा जाता है। यूपीए-2 के ही कई मंत्रियों को मंत्रिमंडल की भावना के खिलाफ जाकर बयानबाजी करने के कारण सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी है। क्या प्रधानमंत्री ममता से भी माफी मंगवाएंगे?





[ लेखक-परिचय:  
जन्म : 18,मई १९७० को बदायूं  में 
शिक्षा: एक सभ्य सुसंस्कृत और शैक्षणिक परिवार से होने के बावजूद अमलेंदु जी कहते हैं कि  लेकिन मैं स्वयं शिक्षित नहीं [हँसना मना है !]
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन साथ ही एक नये समाचार पोर्टल       
 http://hastakshep.com/   की तैयारी में व्यस्त
संपर्क: amalendu.upadhyay@gmail.com ]

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सोमवार, 16 अगस्त 2010

काशी दिखाई दे कभी काबा दिखाई दे


 

 

 

 

 

 

 

योगराज प्रभाकर की चार ग़ज़ल 

 

 


उसका हर गीत ही अख़बार हुआ जाता है,
क्यों ये फ़नकार  पत्रकार हुआ जाता है !

जबसे अ'शार का मौजू बना लिया सच को,
बेवज़न शे'र भी शाहकार हुआ जाता है !

अपने बच्चों को जो बाँट के खाते देखा ,
दौर ग़ुरबत का भी त्यौहार हुआ जाता है !

बेल बेख़ौफ़ हो गले से क्या लगी उसके
बूढा पीपल तो शर्मसार हुआ जाता है !

हरेक दीवार फ़ासलों की गिरा दी जब से
सारा संसार भी परिवार हुआ जाता है !

2

मेरे बच्चों को खाना मिल गया है,
मुझे सारा ज़माना मिल गया है !

जबसे तेरा ये शाना मिल गया है,
आँसुओं  को ठिकाना मिल गया है !

मेरा पड़ोस  परेशान है यही सुनकर
मुझे क्यों आब-ओ-दाना मिल गया है!

तेरे अ'शार और मुझको मुख़ातिब,
मुझे मानो ख़ज़ाना मिल गया है !

क़लम उगलेगी आग अब यक़ीनन,
ज़ख्म दिल का पुराना मिल गया है !

मेरे अ'शार और है ज़िक्र उनका,
दीवाने को दीवाना मिल गया है !

लुटेंगीं अस्मतें बहुओं की अब तो,
मेरे क़स्बे को थाना मिल गया है !

(शाना=कंधा, आब-ओ-दाना=दाना पानी, मुख़ातिब=संबोधित, 'शार= शे'र का बहुवचन, अस्मतें=इज्जतें)

3

कई बरसों के बाद घर मेरे चिड़ियाँ आईं
बाद मुद्दत ज्यों पीहर में बेटियाँ आईं !

ज़मीं वालों के तो हिस्से में कोठियाँ आईं,
बैल वालों के नसीबों में झुग्गियाँ आईं !

जाल दिलकश बड़े ले ले के मकड़ियां आईं
क़त्ल हों जाएँगी यहाँ जो तितलियाँ आईं !

झोपडी कांप उठी रूह तलक सावन में,
ज्योंही आकाश पे काली सी बदलियाँ आईं !

ऐसे महसूस हुआ लौट के बचपन आया,
कल बड़ी याद मुझे माँ की झिड़कियां आईं !

बेटियों के लिए पीहर में पड़ गए ताले
हाथ बहुओं के जिस दिन से चाबियाँ आईं

उसके घर में है यक़ीनन ही कंवारी बेटी
जिसके चेहरे पे ये बेवक़्त झुर्रियां आईं !




4

नफ़रत का अन्धकार यूं फैला दिखाई दे
नाम-ओ-निशान अमन का मिटता दिखाई दे !

काशी दिखाई दे कभी का'बा दिखाई दे,
नन्हा-सा बच्चा जब कोई हँसता दिखायी दे !

जिनको भी ऐतमाद है अपनी उड़ान पर
उनको आसमान भी छोटा दिखाई दे !

वो शख्स जिसकी नींद ही खुलती हो शाम को,
उसको ये आफ़ताब क्यूँ चढ़ता दिखाई दे !

खिड़की ही जब नहीं है कोई घर के सामने,
फिर कैसे भला चाँद का टुकड़ा दिखाई दे !

श्रद्धा नहीं तो हर नदी पानी के सिवा क्या ?
श्रद्धा हो गर तो हर नदी गंगा दिखाई दे





शायर का परिचय :

 जन्म: १८ नवम्बर १९६१ , पटियाला  
शिक्षा: पंजाबी विश्वविद्यालय से उच्च स्तरीय
सृजन : छिटपुट रचनाओं का प्रकाशन
सम्प्रति :मिल्क फ़ूड में अधिकारी और अंतरजाल पर एक अदबी कम्युनिटी बुक्स ऑनलाइन का संचालन
संपर्क: yr_prabhakar@yahoo.com

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रविवार, 15 अगस्त 2010

पंद्रह अगस्त यानी किसानों के माथे पर पुलिस का डंडा















युसुफ़ किरमानी की क़लम से

























हाँ ! किसानों को पीटा अंग्रेज़ी नहीं देसी पुलिस ने  
दो की जान गयी 


भारत जब अपनी आजादी की जब 63वीं वर्षगांठ मना रहा था और लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसानों के लिए लंबी-चौड़ी बातें कर रहे थे तो ठीक उसी वक्त अलीगढ़-मथुरा मार्ग पर पुलिस ही पुलिस थी। यह सडक ठहर गई थी।[खबर है कि किसान और पुलिस के संघर्ष में दो किसान और पीएसी के जवान की मौत हो गयी है.-माडरेटर ] सड़क के दोनों तरफ बसे गांवों के किसानों और उनके परिवार के लोगों को बाहर निकलने की मनाही थी। जो निकला, उसे पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया। यह सब किसी अंग्रेजी पुलिस ने नहीं बल्कि देश की पुलिस फोर्स ने किया। यहां के किसानों ने गलती यह की थी कि इन्होंने सरकार से उनकी जमीन का ज्यादा मुआवजा मांगने की गलती कर दी थी। आंदोलन कोई नया नहीं था और महीनों से चल रहा था लेकिन पुलिस वालों की नासमझी से 14 अगस्त की शाम को हालात बिगड़े और जिसने इस पूरी बेल्ट को झुलसा दिया। यह सब बातें आप अखबारों में पढ़ चुके होंगे और टीवी पर देख चुके होंगे।

अपनी जमीन के लिए मुआवजे की ज्यादा मांग का आंदोलन कोई नया नहीं है। इस आंदोलन को कभी लालगढ़ में वहां के खेतिहर लोग वामपंथियों के खिलाफ लड़ते हैं तो कभी बिहार के भूमिहीन लोग सामंतों के खिलाफ लड़ते हैं तो हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपेक्षाकृत संपन्न इलाकों में वहां के किसान शासन के खिलाफ लड़ते हैं। छत्तीसगढ़ में यह तेंदुपत्ता माफिया के खिलाफ लड़ा जाता है।

लेकिन मुद्दा हर जगह किसान या खेतिहर मजदूरों की जमीन का ही है, जिसे सरकार अपने नियंत्रण में लेकर वहां कंक्रीट के जंगल खड़ा करना चाहती है या फिर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी (एमएनसी) के पालन-पोषण का जरिया बनाने के लिए सौदा किया जाता है। कतिपय लोग विकास, रोटी-रोजी का वास्ता देकर इस तर्क को खारिज कर सकते हैं। लेकिन यह तर्क सुनने वाला कोई नहीं है कि जिस किसान से उसकी जमीन छीनी जा रही है वह उसके बाद क्या खाएगा और कैसे जिंदा रहेगा। आपके कुछ लाख रुपये कुछ समय के लिए उसका लाइफ स्टाइल तो बदल देंगे लेकिन उसके मुंह में जिंदगी भर निवाला नहीं डाल सकेंगे।

मैं ही क्या आप तमाम लोगों में से बहुतों ने देखा होगा कि इस तरह का पैसा किस तरह किसानों को या उस इलाके की आबादी के हालात को बदल देता है। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली के शहरीकृत गांवों और एनसीआर के तमाम गांवों के किसानों को बड़ा मुआवजा मिला और देखते ही देखते उन गांवों में लैंड क्रूजर और पजेरों पहुंच गई। मुखिया और उनके बेटे शहर में आकर बार में बैठने लगे और कुछ ने होटल में कमरा लेकर कॉलगर्ल भी बुला ली। यह सब गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, सोनीपत, बहादुरगढ़, लोनी में हुआ। और अगर दिल्ली के गांवों की बात करें तो जौनापुर, जैतपुर, पल्ला, मुनीरका, महरौली के किसानों के साथ भी यही बीता। इन इलाकों के गांवों में आप चले जाएं तो पाएंगे कि दरवाजे पर पजेरो खड़ी है, पूछेंगे कि आपका बिजनेस क्या है तो जवाब मिलेगा कि हम तो पुराने जमींदार हैं। तगड़ा मुआवजा मिला है, उसी को खर्च कर रहे हैं। या फिर किसी ने ब्लूलाइन बस खरीद ली है और उसको चलवा रहा है।

फरीदाबाद के ग्रेटर फरीदाबाद या नहरपार इलाके में चले जाइए, आपको सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े अपार्टमेंट नजर आएंगे, लेकिन जैसे ही आप इन इलाकों के गांवों में जाएंगे तो घरों के सामने कोई न कोई गाड़ी खड़ी नजर आएगी। पता चलेगा कि घर का मुखिया सुबह से शराब पी रहा है और लड़का अपनी अलग मंडली लगाए हुए हैं। जिन किसान परिवारों का पैसा खत्म हो चुका है वे कब को जमीन पर आ चुके हैं और उस घर का लड़का अब उसकी जमीन पर बने अपार्टमेंट में या तो तीन हजार रुपये वेतन पाने वाला चौकीदार बन चुका है या फिर किसी की गाड़ी की धुलाई करके दो हजार रुपये कमा रहा है।

मैं चाहता तो इन तथ्यों को तमाम आंकड़ों औऱ नामों की चाशनी के साथ पेश करके बड़े ही गंभीर किस्म की रिपोर्ट बना सकता था लेकिन मैं यहां किसी नई रिसर्च रिपोर्ट को पेश करने नहीं आया हूं। यह हकीकत मेरे सामने की है इसलिए बयान कर रहा हूं। मुझे इन तमाम गांवों में जाने का मौका मिलता रहता है और हर बार कुछ नई जानकारी किसी न किसी परिवार के बारे में मिलती रहती है। यह ऐसे गांव हैं जहां टीवी भी उपलब्ध है और अखबार भी।

इन्हीं गांवों का किसान जब उसी अखबार में पढ़ता है कि किस तरह जिस जमीन का मुआवजा उसे सरकार ने छह लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिया है और अब वही जमीन डीएलएफ, यूनीटेक, बीपीटीपी या ओमेक्स जैसे बिल्डर सरकार से नीलामी में कई करोड़ रुपयों में खरीद रहे हैं तब उसकी नींद टूटती है। उसे अपने छले जाने का एहसास होता है। फिर वह अपनी बात कहने का मंच कहीं तो टिकैत के साथ खोजता है तो कहीं माओवादियों के रूप में उसे नजर आता है। कहीं उसे कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल भी मिल जाते हैं। पर लाठी, गोली में उसका आंदोलन बिगड़ जाता है। वह जेल जाता है और वहां से लौटने के बाद यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है। तब तक उसकी जमीन पर कोई न कोई मॉल या पीवीआर अपनी शक्ल ले चुका होता है।

बहरहाल, इन बातों और तर्कों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, यह ब्लॉग मेरे नियंत्रण में है तो इन विचारों को यहां जगह भी मिल गई है, चाहे आप उसे पढ़ें या न पढ़ें। वरना ऐसी सोच रखने वाले अब हाशिए पर जा चुके हैं। शहरों में रहने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, जिन्हें बड़े-बड़े मॉल्स में विकास नजर आता है, वे ऐसी तमाम बातों को खारिज करते रहे हैं और आगे भी करेंगे लेकिन वे ऐसे छोटे-छोटे आंदोलनों को अपने तर्कों से रोक नहीं पाएंगे। बेशक, उनका हिमायती, दलाल या पेड जर्नलिजम करने वाला मीडिया भी उनका साथ दे लेकिन वे समाज में आ रही चेतना को रोक नहीं पाएंगे। वह किसी न किसी रूप में फूटकर सामने आएगी। यह डरे हुए लोग लोगों को और डराना चाहते हैं। लेकिन इधर आंदोलनों का रुख बता रहा है कि इन डरे हुए लोगों के तर्क अब पब्लिक में खारिज होने लगे हैं।

अंत में एक अपील

यह लेख लिखने की सबसे बड़ी वजह वह संदेश है, जो मुझे पत्रकार और अंग्रेजी की मशहूर लेखिका अनी जैदी ( recent book - Known Turf) की ओर से मिला। उन्होंने शीतल रामजी बर्डे नामक बालिक की ओर से एक अपील इंटरनेट पर जारी की है जो दिल को हिला देती है। इस लड़की के पिता किसान थे और अब आत्महत्या कर चुके हैं। अब यह परिवार कागज के लिफाफे बनाकर अपना पेट पालता है। इस लड़की ने देशभर के लोगों से अपील की है कि वे उसे हर महीने एक पुरानी मैगजीन उसके पते पर भेजें, जिसका वह इस्तेमाल लिफाफा बनाने में कर सके। इससे उसकी मदद तो होगी ही और पर्यावरण की भी मदद होगी। प्लास्टिक की थैलियों का प्रचलन रुक सकेगा। आप नीचे उस बच्ची की अपील पढ़ें और जो कर सकते हैं करें।

From Annie Zaidi, Mumbai
One old magazine = somebody's freedom of livelihood "I was barely nine when my dear father committed suicide. My mother has worked really hard to send my brother, sister & me to school. She is still working hard to make our two ends meet... all she wants is ONE OLD MAGAZINE from you all, so she can make paper envelopes to earn & save environment... dear uncles & aunties, please-please do send us one old magazine every month to support us, so that we can go to better schools and live our lives with dignity and less suffering. 

My mother and other widow mothers like her will not hesitate to work hard to earn for us while saving the environment for the nation...I will be waiting with great expectations dear uncles & aunties for ONE OLD MAGAZINE from each one of you every month...If each one of you send one, it will become so many for my mother and other widow mothers to work hard to earn some amount every month...
A very BIG THANK YOU from my brother, sister, my mother and me...
SHEETAL RAMJI BARDE"
our address:
support 4 suicide farmers families, House No: 200 Opp: Dr. Harne's Hospital, Dhantoli Chowk Wardha: 442001


अगर मौका हो तो  इसे भी पढ़ें..


[लेखक-परिचय :
 टाइम्स के पत्रकारिता विद्यालय से सनदयाफ़्ता राजधानी दिल्ली के चर्चित युवा पत्रकार.गत कई वर्षों से नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ कापी सम्पादक.इनका ब्लॉग है हिन्दी वाणी .
आप इनसे yusuf.kirmani@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.
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शनिवार, 14 अगस्त 2010

आज शहीदों ने तुमको अहले वतन ललकारा : अज़ीमउल्लाह ख़ान-- जिन्होंने पहला झंडा गीत लिखा

सैयद एस. क़मर की क़लम से


बना रहे बनारस ..सब की तमन्ना है लेकिन इस बहाने भाई रंगनाथ बेहद ज़रूरी सवालों से मुठभेड़ करते दीखते हैं.उन्होंने विस्मृत हो चुके शहीद अज़ीमउल्लाह ख़ान के उस गीत को पोस्ट किया है जिसे पहला झंडा गीत होने का श्रेय हासिल है.अंग्रेजों ने अपनी कुटिल चालें चलीं और कामयाब हुए..लेकिन इस सच से कौन इनकार कर सकता है कि मुस्लिम हुकूमतों या मुसलमानों के भारत आगमन के बाद जिस साझा संस्कृति ,सरोकारों का उदय हुआ.और देश के इन दो प्रमुख सम्प्रदाय के लोगों ने जिस तरह विदेशियों से लोहा लिया.इतिहास के पन्नों में सुरक्षित है.लेकिन भारत का आर्थिक दोहन करने राजनितिक सत्ता बरक़रार रखने के ध्येय से अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम को दो कट्टर धार्मिक खेमों में विभक्त कर दिया ताकि राष्ट्रीय चेतना का अभुदय पारस्परिक एकता के अभाव में मुमकिन न हो.भारतीय जनमानस लम्हों के लिए इन भरम जाल में अवश्य उलझा, जिस वजह कर राष्ट्रीय आन्दोलन में बाधा उत्पन्न हुई.कालांतर में कुछ लोगों ने इसे समझ लिया और कन्धा से कन्धा मिलाकर संग्राम में सशक्त भागीदारी निभाई.यह १८५७ का समय है.दरअसल यही दौर चाणक्य द्वारा प्रतिपादित भारतीय राष्ट्रवाद का सच था.बकौल प्रसिद्ध राजनितिक दार्शनिक जे एस मिल राष्ट्रीयता मानव जाति का वह भाग है , जो सामान्य सहानुभूति द्वारा आपस में संगठित है और सामान्य सहनुभुतियाँ एक राष्ट्रीयता की दूसरी राष्ट्रीयता से नहीं होती हैं.इस सामान्य सहानुभूति के कारण एक राष्ट्रीयता के लोगों में जितने सहयोग की भावना रहती है , उतनी दूसरों से नहीं हो पाती.
यही राष्ट्रीयता भारतियों के अंतस में समाहित हो चुकी थी, जो कि अंग्रेजों की राष्ट्रीयता [अंग्रेजी राज सत्ता] को किसी भी कीमत पर सहयोग करने को तत्पर नहीं थी.

विभिन्नताओं के बावजूद भारत में एकानुभुति की भावना पायी जाती है.सर हर्बट रिजले ने सही लिखा है, भारत में धर्म, रीती-रिवाज , भाषा तथा सामाजिक और शारीरिक भिन्नताओं के होते हुए भी जीवन की एक विशेष एकरूपता कन्याकुमारी से लेकर हिमाचल तक देखी जा सकती है. आज जिस प्रकार जाति,धर्म और क्षेत्र व भाषा ,मंदिर-मस्जिद को राष्ट्रीयता से ज़्यादा महत्त्व दिया जाता है , ऐसी संकीर्णता के पोषक या तो राष्ट्रिय आन्दोलन से अनभिज्ञ हैं या जानबूझ कर पाश्चात्य साम्राज्यवादी शक्तियों के उस षडयंत्र के यंत्र बने हुए हैं, जिसे देश की एकता अखंडता के विरुद्ध रचा गया है. आज कितने लोग हैं जिन्हें सत्येन्द्र नाथ ठाकुर, रंगोजी बापूजी और अज़ीम उलाह ख़ान के सम्बन्ध में थोडी बहुत भी जानकारी है.

बंगाल में १८६१ में सम्पादनी सभा की स्थापना की गयी थी.अमार बँगला कहने वाले भी तब भारत,हिन्दुस्तान या राष्ट्र शब्दों का बेहिचक प्रयोग किया करते थे.सभा के हर आयोजन में भारतेर जय बुलंद स्वर में गाई जाती थी.इस झंडा गीत के रचयिता थे प्रखर राष्ट्रवादी सत्येन्द्र नाथ ठाकुर. लेकिन इस झंडा गीत से बहुत पहले अज़ीमउलाह ख़ान ने १८५७ के आस पास भारत का झंडा गीत लिख लिया था.

गीत कुछ इस प्रकार था :

हम हैं इसके मालिक हिन्दुस्तान हमारा
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी न्यारा

यह है हमारी मिल्कियत हिन्दुस्तान हमारा
इसकी रूहानियत से रौशन है जग सारा

कितना क़दीम,कितना नईम सब दुनिया से प्यारा
करती है जिसे सरखेज़ गंग-ओ-जमुन की धारा

ऊपर बर्फीला पर्वत, पहरेदार हमारा
नीचे साहिल पे बजता सागर का नक़क़ारा

इसकी खानें उगल रही हैं, सोना, हीरा, पारा
इसकी शान-ओ-शौकत का दुनिया में जयकारा

आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
लूटा दोनों हाथों से न्यारा वतन हमारा

आज शहीदों ने तुमको अहले वतन ललकारा
तोड़ो गुलामी की जंजीरें , बरसाओ अंगारा

हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख हमारा,भाई-भाई प्यारा
यह है आज़ादी का झंडा इसे सलाम हमारा


इस गीत को रानी लक्ष्मी बाई ,तात्या टोपे से लेकर रंगोंजी तक के सिपाही गाया करते थे. क्रांतिकारी अज़ीमउल्लाह ख़ान १८५७ के स्वंत्रता संग्राम के उन महानायकों में से हैं जिनके शौर्य, साहस और अदम्य देशभक्ती के किस्से इतिहास के पन्नों में गुम होकर रह गए हैं. वरिष्ठ पत्रकार दिवंगत उदयन शर्मा , वरिष्ठ लेखक रूपसिंह चंदेल [जिन्होंने अज़ीमउल्लाह खान पर पुस्तक लिखी] जैसे लोग ही यदाकदा उनका स्मरण कर पाते हैं .

उदयन शर्मा ने अज़ीमउल्लाह के बारे में लिखा था कि उनका सम्बन्ध अत्यंत निर्धन परिवार से था .किशोरावस्था पर उन्हें किसी प्रकार अंग्रेजों के रसोई घरों में बावर्ची की नौकरी मिल गयी थी.ज्यादा पढ़े-लिखे तो थे नहीं, इसलिए अच्छी नौकरी की आशा ही बेकार थी . दूसरी तरफ़ उन्हें विदेशियों की गुलामी पसंद न थी.यहाँ पर आज़ादी के ख्वाब देखा करते थे.विदेशी माहौल में उन्होंने फ्रांसीसी और अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान अर्जन किया . हिन्दू-मुस्लिम एकता के वह प्रबल हिमायती थे.बिना आपसी एकता और सौहाद्र के आज़ादी हासिल करना मुश्किल था. उन्हें इस बात का इल्म था .इसलिए वह जहां खानसामे की भूमिका में विदेशी ज़बान सीख रहे थे तो साथ साथ हिन्दू-मुस्लिम के बीच प्रेम सद्भाव कायम रखने के लिए यत्नशील थे.


भाषा ज्ञान पश्चात अज़ीमउल्लाह ख़ान ने बावर्ची की नौकरी छोड़ दी.एक स्कूल में शिक्षक हो गए. इस प्रकार वह दूरस्थ ग्रामों के लोगों के संपर्क में आये. धीरे-धीरे उनकी चर्चा नाना साहब के दरबार तक जा पहुँची .नाना साहब ने उनको अपने दरबार में बुला लिया. वह उनके सबसे प्रिय सलाहकार बन गए.1854 में नाना साहब ने अज़ीमउल्लाह को अपना प्रतिनिधी बना कर इंग्लॅण्ड भेजा. यहाँ उनकी मुलाक़ात रंगोंबापू जी से हुई. वैचारिक साम्य के कारण दोनों जल्द ही मित्र बन गए.दोनों मित्र भारत को आज़ाद कराने के सपने संजोने लगे. विश्व समर्थन के लिए दोनों ने कई योरोपीय देशों की यात्रा की.अज़ीमउल्लाह ख़ान अंग्रेजों के विरुद्ध मदद मांगने रूस और तुर्की भी गए थे.
रूस से आकर अज़ीमउल्लाह ने राजमहल को क्रांति के वाहकों की छावनी में तब्दील कर दिया. वह सैनिकों को हथियार चलाने का अभ्यास कराने लगे.वह नाना साहब के साथ उत्तर भारत के उन सभी शहरों में गए जहां जहां अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल बज रहा था. इसी दौरान उन्होंने वह गीत लिखा, जिसे उत्तर भारत के सभी क्रांतिकारी सैनिक झंडा गीत की तरह गाते थे. १८५७ के विद्रोह के बाद हज़ारों राष्ट्रभक्तों को बिना किसी मुक़दमें के पेड़ों पर लटका कर फांसी दी गयी थी.इन में हिन्दू भी थे और मुसलमान भी.नीम के पेड़ों पर लटकी इन अनगिनत लाशों में एक लाश पयाम-ए -आज़ादी पत्र के सम्पादक मिर्ज़ा बेदार बख्त की भी थी.















लेखक-परिचय
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