बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 9 जनवरी 2012

आशा के गानों के दीवाने हजारों हैं.....




















(आधी सदी से भी ज्यादा समय से अपनी आवाज के जादू से लोगों को मदहोश करती आ रहीं आशा भोंसले इस इतवार 08.01.2012 को रांची में थी.कुछ पैसे वालों की मदद से इक अखबार ने उनका लाइव प्रोग्राम आयोजित किया था.यह खबर भास्कर के लिए लिखी गयी थी.)

सैयद शहरोज क़मर  की क़लम से

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये

घुमड़ते बादलों के  बीच आवाजों का हौला हौला मीठा झोंका । फिजा में गूंजती बिजली सी स्वर लहरियां। जोहार झारखंड के  साथ एवरग्रीन गायिका  आशा भोंसले मंच पर आयीं। फिर तालियों की  गडग़ड़ाहट के  बीच ही उनका  सनोला स्वर बिरसा स्टेडियम की फिजा में चस्पां हो गया। मखमली आवाजों के रेशमी उजालों में पंजाब का  तड़का , भोजपुर की  ठुमक , गजल की  नफासत और वालीवुड की  चमकीली रंगत थी। उसके  बाद तो मोहब्बत की दीवानगी, उसकी  बेरुखी, उसके  मनुहार, उसके  करार....को  सुरों के  शीशे सी पारदर्शिता में श्रोताओं ने बहुत निकट से महसूस किया ।

आशा ने पहले फिल्म डान के इस गाने को स्वर दिया..ये मेरा दिल प्यार का  दीवाना..दीवाना, दीवाना प्यार का परवाना। रांची के  उमड़े प्रेम के  प्रति यह उनकी  कृतज्ञता थी। परवानों का हुजूम बेशक  उमड़ा। बहुत उमड़ा। उसने झूमकर अपने प्यार का इजहार भी किया । उसके  बाद उनके  स्वर की  रंगत एहसासों को  सहलाती रही। कुरेदती रही। शरारा शरारा..फिल्म मेरे यार की शादी का गाना हो, या हम किसी से कम नहीं का पूछो न यार क्या हुआ। 78 वर्षीया आशा के सामने ऋषि कुमार से जवानों का उत्साह बौना नजर आया। यूं उन्होंने आवाज भी दी: ये लडका हाय अल्लाह कैसा है दीवाना! श्रोताओं की अल्हड़ दीवानगी में उमराव जान की गजल ने थोड़ी देर के  लिए शाइस्तगी जरूर बख्शी, लेकिन आंखों की मस्ती के मस्तानों में कमी हरगिज नहीं आई। वही अंदाज। आवाज का वही जादू। मंद मंद चलती ठंठी हवाओं को उनके  जज्बाती आवाज ने गर्म आगोश में ले लिया। रुई के  फाहे बनकर उनका मीठा  स्वर सर्दी को बचाने में कामयाब रहा। शहरयार की लिखी उमराव जान फिल्म की दोनों मशहूर गजलों को उन्होंने उमराव की अदा के साथ अदा किया। दिल चीज क्या है आप मेरी, जान लीजिए..और  इन आंखों की  मस्ती के  मस्ताने हजारों हैं। बीच में हल्की  बूंदाबांदी हुई। लोग कुछ छिटके । आशा मंच से उतर गईं। दूसरे दौर में बाबुल सुप्रियो ने उनका साथ दिया। गाना तो सुनिए...ओ हसीना जुल्फों वाली...वहीं एक  मैं एक  और तू दोनों मिले इस तरह...उनके  कंठ ही नहीं, उनके  बदन भी थिरकते रहे। आशा ने भरसक श्रोताओं को  निराश नहीं किया। उनके  तरकश से अनगिनत सांगीतिक तीर निकले। जिसने कोहरे की चादर को बार बार तार किया.घंटों लोग उससे घायल होते रहे। मेरा साया का गाना झुमका गिरा रे बरेली के  बाजार में में उनकी  आवाज की  जुगलबंदी उनके  ठुमके  ने भी की । अचानक  उन्होंने एक  चुटकुले के बहाने पंजाबी का याहूं याहूं...ओ याहूं याहूं गाकर सारी महफिल को  भांगड़ा करने  पर मजबूर कर दिया। अब वे मूड में थीं। मोहब्बत वाली कजरारी अंखियों का काली बदरिया ने समर्थन किया तो वह भोजपुरी में उतर आईं। फिल्म बलम परदेसिया सामने थी..स्वर ने बल खाया...हंस कर देखो तो एक  बेरिया...हम मारी-मारी जाइब  तोहार किरिया। बारिश थम चुकी  थी । लेकिन हवाएं  नहीं। आवाज का दीपक खूब भभक रहा था। अब उसके  जाने की बारी थी। जाने से पहले आशा ने आवाज जरूर दी, दम मारो दम..मिट जाए गम .....

रांची का ये मल्हार

बाबुल सुप्रियो की आवाज का  झुमका भी श्रोताओं के  कानों पर खूब अटका। शुरुआत उन्होंने कहो न प्यार है के  रिमिक्स से की । नौजवान अभी स्टेडियम में थे। बाबुल ने फिल्म हम तुम का चर्चित गाना सांसों को सांसों में ढलने दो जरा...को सुरमई आवाज दी। उसके बाद तो अपना सपना मनी मनी के गानों पर चढ़ा खुमार देर तक झूमता रहा। उन्हें कहना पड़ा, सावन में देखो यार रांची का ये मल्हार।


---------------

चित्र: संदीप नाग


Digg Google Bookmarks reddit Mixx StumbleUpon Technorati Yahoo! Buzz DesignFloat Delicious BlinkList Furl

3 comments: on "आशा के गानों के दीवाने हजारों हैं....."

shikha varshney ने कहा…

बहुत खूब .आशा जी की तो बात ही अलग है.

kshama ने कहा…

Lata aur Asha kee aawazen...na bhooto na bhavishyati!

एक टिप्पणी भेजें

रचना की न केवल प्रशंसा हो बल्कि कमियों की ओर भी ध्यान दिलाना आपका परम कर्तव्य है : यानी आप इस शे'र का साकार रूप हों.

न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)