सोमवार, 29 अगस्त 2011

केदारनाथ का ईद मुबारक











केदारनाथ अग्रवाल की कलम से


हमको,
तुमको,
एक-दूसरे की बाहों में
बँध जाने की
ईद मुबारक।

बँधे-बँधे,
रह एक वृंत पर,
खोल-खोल कर प्रिय पंखुरियाँ
कमल-कमल-सा
खिल जाने की,
रूप-रंग से मुसकाने की
हमको,
तुमको
ईद मुबारक।

और
जगत के
इस जीवन के
खारे पानी के सागर में
खिले कमल की नाव चलाने,
हँसी-खुशी से
तर जाने की,
हमको,
तुमको
ईद मुबारक।





















और
समर के
उन शूरों को
अनुबुझ ज्वाला की आशीषें,
बाहर बिजली की आशीषें
और हमारे दिल से निकली-
सूरज, चाँद,
सितारों वाली
हमदर्दी की प्यारी प्यारी
ईद मुबारक।

हमको,
तुमको
सब को अपनी
मीठी-मीठी
ईद-मुबारक।

रचनाकाल: २१-११-१९७१ 


हिंदी के इस अहम कवि का यह जन्मशती वर्ष है!

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4 comments: on "केदारनाथ का ईद मुबारक"

Sunil Kumar ने कहा…

सुबह सुबह एक सुंदर रचना पढ़ने को मिली किसको धन्यवाद दूँ किस्मत को या आपको

वाणी गीत ने कहा…

ईद मुबारक !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सबको सबकी ईद मुबारक।

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हम स्याही के हैं दुश्मन,
न सफेदी के दोस्त
हम तो आईना हैं ,
आईना दिखा देते हैं.

शायर क़सीम अख्तर की दुआ





हम क़लम हम ज़ुबान बन जाओ,

बन सको तो इन्सान बन जाओ.
तारीकी -ए- जहालत है हर सू,
नूर-ए-इल्म बनो, फैज़ान बन जाओ.
हालात -ए- जंग हों गर पैदा,
वतन-ए-अज़ीज़ का पासबान बन जाओ.
तय कर लो तरक्क़ी के मदारिज,
और बुलंदी -ए- आसमान बन जाओ.
कहलाने के वास्ते ही नहीं,
अमल से मुसल्लम ईमान बन जाओ.

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